अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेता मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्ही-नन्ही किश्तियाँ बड़ी ही चंचल, शरीर और अलमस्त किश्तियाँ कागज की जो लहरों पर लहर होकर बढ़ी जा रही हैं इस बुलंद हौसले के साथ कि जैसे कभी रुकेंगी ही नहीं, नहीं थमेंगी कहीं भी… और नदी-नालों और समुद्रों की छाती पर हो सवार विजेता बनकर लौटेंगी एक दिन
वे कागज की किश्तियाँ हैं नन्हे हाथों के नन्हे इरादों से बनी पर उनके भीतर ताजा मन, ताजी इच्छाओं के हैं बहुरंगे पुष्पगुच्छ और मोरपंख गर्वीले उनके खिले हुए चेहरों की हँसी हजार घातक तूफानों पर भारी वे प्रलय के तूफानों पर हँसकर सवारी कर सकती हैं कि जैसे यह भी हो कोई खो-खो नुमा दिलचस्प खेल
इस अथाह समंदर की हिचकोले खाती विशाल छाती पर मैं देख रहा हूँ नन्ही-नन्ही किश्तियाँ और खुश हूँ कि अब जबकि मैं समेट रहा हूँ अपनी जिंदगी का आखिरी पाल और हसरतों से देख रहा हूँ अपना बूढ़ा चप्पू तब हजारों हजार किश्तियाँ ये हवाओं से मीठी छेड़छाड़ करती चली जा रही हैं एक बेपरवाह धुन में अलमस्त
असीसें निकलती हैं भीतर से जियो…जियो मेरे अनगिनत बेटो, बेटियो कि हमारी हारी हुई लड़ाइयाँ, खीज और टूटन… तुम्हारे हाथों में बन जाएँ अमोघ अस्त्र, ढाल और कवच कि तुम विजेता होकर लौटो वहाँ-वहाँ से भी, जहाँ हम हारे… अपने संशय, अविश्वास और कौशल की कमी से।
नदी किनारे के हरे-भरे बूढ़े पेड़ तुम्हारे आगे हरे पत्तों का बंदनवार सजाएँ और जब तुम लौटो अपनी गर्वीली विश्वयात्राओं से तो बिछाएँ तुम्हारी राह में महकते फूलों के कालीन
तब यह बूढ़ा मल्लाह शायद न रहे पर इस बूढ़े मल्लाह का बूढ़ा चप्पू नदी के एक किनारे पर उपेक्षित पड़ा टूटते सुर में नए युग के नए आने वाले विजेताओं का विजय-गीत गा रहा होगा… गाता रहेगा धीरे-धीरे टूटकर बिखरने तक
*
(2)
चिड़िया का घर
……………………………
चिड़िया को घर बनाना है चिड़िया के पास कुछ खास नहीं, मगर क्या नहीं है चिड़िया के पास?
तिनके हैं घास है जरा सी कला-कला ढेर सा उछाह और एक बड़ी जिजीविषा धूप और पानियों और सादा आसमानों की तरह फैली दूर तलक आखिर क्या नहीं है चिड़िया के पास!
सूतली? हाँ, सूतली…
चिड़िया परेशान! महानगर में सूतली…? मगर डर क्या अगले ही पल वो उड़ी और उड़ के गई वहाँ जहाँ ढीली खटिया पर बैठा कवि लिखने के बाद कविता पढ़ रहा है कोई किताब
चिड़िया देखती है कवि की कविता, किताब, चेहरा और भरपूर दृष्टि फैला देती है चारपाई पर, उसकी चौकन्नी नजरें देख लेती हैं चारपाई का कौन सा कोना है उसके काम का!
एक निर्भीक दृष्टि डाल कवि के चेहरे पर चिड़िया शुरू करती है अपना काम आराम से
चोंच की ठूँग मार-मारकर निकालती है मूँज, निकालती है सूतली दस मिनट, मुश्किल से दस मिनट और अब दुनिया उसकी है उसका है जहान चिड़िया चोंच में भर लेती है उतना जितना भी उसके बस में है
और यल्लो, चिड़िया पंखों पर नहीं, चिड़िया पर-पर है चिड़िया है घर की रानी, चिड़िया है सोनपरी बिटिया है लाडली सूरज की घास, तिनके, धूप, उत्साह के साथ मिलाकर सूतली अपनी अचूक कला से रचेगी वह घर जरूर रच लेगी कल तलक!
कैसा भी हो माहौल कैसा भी युद्ध या अकाल चिड़िया को घर बनाने से भला कौन रोक पाएगा?
*
(3)
पेड़ हरा हो रहा है
……………………….
हौले-हौले बरस रही हैं रस-बूँदें हौले-हौले पेड़ हरा हो रहा है।
हरा और गोल-छतनार और भीतर तक रस से भरा हरा और आह्लादित डालें थिरकतीं पत्ते नाचते अंग-अंग थिरकता चहकती चिड़ियाँ गूँजती हवाएँ— पेड़ हरा हो रहा है, पेड़ हरा हो रहा हैं…!!
सुनो-सुनो…गूँजती दिशाओं का शोर पेड़ हरा हो रहा है, पेड़ हरा हो रहा हैं… पेड़ हरा…!!
बहुत दिनों की इकट्ठी हुई थकान जिस्म और रूह की बह रही है बह रहा है ताप बह रही है ढेर सारी गर्द स्मृतियों पर पड़ी दुख-अवसाद की छाया मटमैली दाह-तपन मन की सब बह रही है और पेड़ हरा हो रहा है हरा और रस से भरा नया-नया सुकुमार, आह्लादित।
अभी-अभी मैंने उसकी खटमिट्ठी बेरियों-सी हँसी सुनी अभी-अभी मैंने उसे बाँह उठाए कहीं कुछ गुपचुप इशारा-सा करते देखा और मैं जानता हूँ पेड़ अब रुका नहीं रहेगा वह चलेगा और तेज-तेज कदमों से सारी दुनिया में टहलकर आएगा ताकि दुनिया कुछ और सुंदर हो कुछ और हरी-भरी, प्यार से लबालब और आत्मीय
और जब लंबी यात्रा से लौटकर वह आएगा उसके माथे से, बालों की लटों और अंग-अंग से झर रही होंगी बूँदें
सुख की भीतरी उजास और थरथराहट लिए रजत बूँदें गीली चमकीली और उन्मुक्त हरा-भरा उल्लास हमारे भीतर उतर जाएगा कहीं दूर जड़ों तक… अँधेरों और अँधेरों और अँधेरों के सात खरब तहखानों के पार।
फिर-फिर होगी बरखा फिर-फिर होगा पेड़ हरा स्नेह से झुका-झुका तरल और छतनार… फिर-फिर हमारे भीतर से निकलेगा किसी नशीले जादू की तरह ठुमरी का-सा उनींदा स्वर कि भैरवी की-सी लय-ताल… कि पेड़ हरा हो रहा है पेड़ सचमुच हरा हो रहा है।
*
(4)
तानाशाह और बच्चे
……………………………..
बच्चे खेल रहे हैं छत पर भूलकर इस उखड़ी दुनिया के सारे उखाड़-पछाड़ उबले हुए दुख और दाह
मगर नाराज है तानाशाह!
पसंद नहीं है तानाशाह को यह कतई पसंद नहीं है कि बच्चे खेलें अपनी मर्जी का खेल ऐन अपनी मर्जी के वक्त में तानाशाह को पसंद नहीं है बच्चे बनाएँ अपनी मर्जी का चित्र अपनी मर्जी की लकीरें उसमें मर्जी के रंग भरें
तानाशाह को पसंद नहीं है बच्चे जोर-जोर से करें बातें हँसें बेबात खिलखिलाएँ जब मेहमान डाइनिंग टेबल पर तनकर बैठे हों!
भूलकर उसकी और मेहमानों की महिमामयी उपस्थिति बच्चे अपने गुड्डे-गुड़ियों, नाटक, चित्रकला में रहें लीन तानाशाह को यह पसंद नहीं है कि बच्चे खुद सोचें खुद रोपें खुद रचें खुद बनाएँ नक्शा और उस पर चलें
तो फिर जो बेशकीमती नक्शा उसने तैयार करवाया है होशियार आर्किटेक्टों, इंजीनियरों से खूब सोच-समझकर तैयार करवाया है जो अंतर्राष्ट्रीय फ्रेम बिजूका बच्चे का टाईदार उसका क्या होगा?
सो तानाशाह गुस्से में है वह झिड़कता है तेज नकसुरी आवाज में झिंझोड़ता है बेरहमी से डाल, हरी डाल— उसमें दम ही कितना नया बिरवा ही तो है!
भरभराकर गिर जाता है बच्चों का खेल-संसार!
रुक गया है नाटक अब रुक गई है गति सहमे गुड्डे-गुड़ियाँ भालू ऊँट खरगोश मिट्टी और कपड़े के
बच्चे सहम गए हैं मेहमान खुशी-खुशी विदा हुए बुद्धिजीवी मसिजीवी मस्तिष्क मरु विशाल!
तानाशाह उठता है सुकून से अपने लिखने की मेज पर जा बैठता है खोलकर सोने का पेन लिखेगा अब वह बच्चों के मनोविज्ञान पर कोई बढ़िया सा लेख उसे इंटरनेशनल जर्नल में छपाएगा
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
बूढ़े मल्लाह वाली कविता बेहद खूबसूरत और मानिखेज़ बन पड़ी है।ज़िंदगी का अफसाना और फ़साना बयां करती है।
यह कविता एक ऐसे कवि या बहुमुखी प्रतिभा वाली विभूति की कलम से निकली है जिसने जीवन का अमृत वर्ष पूर्ण कर अब संन्यास के अमृत काल में हैं।भविष्य में अध्यात्म से परिपूर्ण रचनाएं पढ़ने को मिल सकती हैं।
चिड़िया का घर ,आज के भौतिक युग में गांवों और कस्बों के लोगों के संघर्ष को प्रतिबिंबित करती है,अतः महानगरीय जीवन के अभ्यस्त पाठकों को कुछ विलग सी लग सकती है।
इसी प्रकार तानाशाह रचना,बाल साहित्य में उगे कुकुरमुत्ते से भुतहा लेखकों पर सटीक व्यंग्य सा प्रतीत होती है जो पैसे सम्पर्क और प्रभाव के बल पर बच्चों की दुनिया में घुसपैठ करने पर आमादा हैं।
आदरणीय डॉक्टर प्रकाश मनु जी को बधाई हो।
सादर
सूर्य कांत शर्मा
बूढे.मल्लाह का गीत
आदरणीय प्रकाश मनु सर.सृजित यह कविता बेहद संवेदनशील मार्मिक और भावप्रवण रचना है।एक एक शब्द भावनाओं में.बहा ले जाता है।बूढे मल्लाह के रुप में जीवन की सांझ में अनुभवों की कश्ती पर सवार कवि का मन.ही है जो अकेला अपने सफर में चलता जा रहा है। लहरों के अनगिनत थपेडे सहता ,झंझावातों का सामना करता हुआ। अपने आसपास अनेक छोटी छोटी नावों को लहरों संग बहते देखकर एक आशा की किरण जगमगाती है कि एक दिन ये नन्हीं किश्तियां विजेता बनकर लौटेंगी अवश्य। जीवन संघर्षों में जूझते हुए अपनी लड़ाई जो वह हार गया था ये किश्तियां वहां से जीत कर वापस आयेंगी चाहें लहरों के विकराल तूफान ही क्यों न हों। लहरों का उत्थान पतन राह क्यों न भटकायें।
बहुत सुंदर प्रतीकात्मक भाव बिंब से.सजी यह कविता हृदय को स्पर्श करती.है,मन भावुक हो जाता है। बूढे मल्लाह के रुप में स्वयं कवि ने अपनी जीवन यात्रा में चुनौतियों का सामना कर अपनी साधना और कर्मठता से जो राह बनायी है वह एक दिन पीढियों का मार्गदर्शन करेगी। नन्हे सपनों की पतवार थामें ये नन्हीं किश्तियां जो कल सृजन की पतवार थामेगी और उनमे नया जोश उत्साह और हौसला है.वे अपनी यात्रा पूरी कर शिखर तक जरुर पहुंचेंगी यह विश्वास कवि मन के रुप में.उस मल्लाह के मन को आश्वस्त करता है।
असीसें निकलती हैं भीतर से
जियो…जियो मेरे अनगिनत बेटो, बेटियो
कि हमारी हारी हुई लड़ाइयाँ, खीज और टूटन…
तुम्हारे हाथों में बन जाएँ
अमोघ अस्त्र, ढाल और कवच
कि तुम विजेता होकर लौटो
वहाँ-वहाँ से भी, जहाँ हम हारे…
अपने संशय, अविश्वास और कौशल की कमी से।
अद्भुत कल्पना कवि मन की।पाठक की आंखें भर आती हैं,मन विह्वल हो जाता है और स्वयं उस बूढे मल्लाह की वेदना से अंतर्मन भींगने लगता है। बहुत सुंदर सृजन। अनुभूतियों की नाव पर सवार कविता का शब्द शब्द जैसे मन की गहराईयों तक भिंगो देता.है।हृदय से अशेष आभार इस सुंदर सृजन के लिए। प्रणाम बाबूजी।आप.स्वस्थ दीर्घयु व यशस्वी हों यही कामना है।मन भावुक हो रहा है।बहुत बहुत बधाई।आदरणीय प्रकाश मनु.सर द्वारा रचित दूसरी कविता जीवन की आपाधापी में उम्मीदों की लौ जगाये एक जिजीविषा की व्यथा कथा है जो हारना नहीं जानती।चिडिया एक प्रतीक है मासूम कमजोर पर अपने पंखों से अनंत आकाश की ऊंचाईयां नाप सकती है,अपनी दृढ संकल्प शक्ति से तिनकों का घर बना सकती है।वह.इतनी सशक्त है जितनी कवि की कलम,उसकी कल्पना।
यह कविता एक सुंदर और प्रेरणादायक संदेश देती है, जिसमें चिड़िया के माध्यम से जीवन के मूल्यों और संघर्ष की भावना को दर्शाया गया है। कविता में चिड़िया के पास सीमित संसाधन होने के बावजूद उसके पास एक मजबूत इच्छाशक्ति और जिजीविषा है, जो उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
उसकी कला ही उसकी सर्जना शक्ति है,क्योंकि वह उत्साहित है,वह अपना घर अपने सपनों को साकार करना चाहती है। इसलिए वह निर्भीक है,चपल है क्योंकि उत्साह से भरी है। चिड़िया की निर्भीकता, कला और जिजीविषा कवि की कविता, किताब और चेहरे को देखती है, लेकिन उसकी दृष्टि कवि के आसपास के वातावरण पर अधिक केंद्रित है, जहां वह अपने घर के लिए तिनकों की तलाश करही है।
चिड़िया अपने घर को बनाने के लिए पूरी तरह से समर्पित है और उसके पास उत्साह और जिजीविषा है, जो उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करती है।
– कवि मन की आशावादिता कविता के माध्यम से एक आशावादी दृष्टिकोण देती है जिसमें चिडिया मानव मन का प्रतीक है जो उसे जीवन की चुनौतियों को पार करने में मदद करती है, चाहे वह युद्ध हो या अकाल। स्वयं कवि का जीवन समर्पण निष्ठा और दृढ़संकल्प शक्ति को समर्पित है,इसलिए यह कविता जीवन में चुनौतियों और संघर्षों को विजित कर आगे बढ जाने और नैतिक आदर्शों के मूल को पा लेने की सुखद प्रेरणा है।हार्दिक बधाई बाबूजी,इतने सुंदर व प्रेरक सृजन के लिए।प्रकाश मनु सर की तीसरी कविता *पेड हरा हो रहा है*उदार आशावादी सोच और जीवन की चैतन्यता की प्रतीक है। यह रचना हृदय पर गहरा प्रभाव छोडती है।इसे पढते समय दिनकर की प्रसिद्ध रचना याद आती है*लोहे के पेड हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल*। दिनकर जी की तरह ही कवि की कल्पना भी जीवन के कठोर मृत नैराश्य में भी आशावादी सोच को जागृत करती.है।
पेड का हरा होना प्रकृति के स्नेह उर्जा और गतिमयता का संकेत है।मानवीय जीवन भी प्रकृति से ही.संचरित होता है अत: जिस प्रकार अनेक प्राकृतिक झंझावातों और पतझर के थपेडे सहने के बाद पेड मुरझाता नहीं बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति से स्नेह, उर्जा ग्रहण कर पुन: पुष्पित पल्लवित होकर हरा हो रहा है।,जीवंत हो रहा है वैसा ही यह जीवन भी है।संघर्षों.से.हारता महीं अपितु पुन: प्रेम राग संवेदना की संजीवनी ग्रहण कर अपने मार्ग पर आगे बढ जाता है।
बहुत सुंदर सृजन आदरणीय प्रकाश मनु.सर का।अत्यंत भावुक, प्रेरक रचना।कवि का मन प्रकृति के उपादानों से प्रेरणा लेकर मानव.को सशक्त उर्जावान और आशा की सुनहली उम्मीद के साथ जीने का सुखद संदेश भी देता है।
सुख की भीतरी उजास और थरथराहट लिए
रजत बूँदें गीली चमकीली
और उन्मुक्त हरा-भरा उल्लास
हमारे भीतर उतर जाएगा कहीं दूर जड़ों तक…
अँधेरों और अँधेरों और अँधेरों के सात खरब तहखानों के पार।
हृदय से अशेष आभार और हार्दिक बधाई इस खूबसूरत सृजन के लिए। उनकी रचनाए हमें सदैव नयी उर्जा साहस और शक्ति देती हैं। सादर प्रणाम बाबूजी।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
बेटी, आपने मेरी कविताओं को समझा। पूरे मन और गहराई से समझा, और इतनी गहन संवेदनात्मक टिप्पणी लिखी है कि क्या कहूं। शुरू की तीनों कविताओं का आपने बड़ा सुंदर भाष्य किया है। लिखा भी कितने सलीके से।
मेरी कविताओं पर इतनी गहराई से तो आज तक किसी ने नहीं लिखा।
आपका चाहे लेख हो, चाहे संस्मरण हो, या फिर कविताएँ हों! उन्हें पढ़ने और समझने के लिए बहुत अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि जो भी लिखा जाता है वह उनकी कलम नहीं आत्मा रचती है।
आपका जीवन अनुभव इतना सघन है, मानो एक जिंदगी में ही न जाने कितनी जिंदगियाँ जी ली हों।
कायदे से तो एकांत और खामोशी में धैर्य से पढ़ने वाली, महसूस करने वाली रचनाएँ होती हैं आपकी। उन्हें शब्दों में व्यक्त करना इतना आसान नहीं होता
1-
*”एक बूढ़े मल्लाह का गीत”*
यह कविता पहले भी पढ़ी हुई है। “मैंने किताबों से घर बनाया है” पुस्तक की समीक्षा के दौरान हमने पुस्तक की लगभग सभी कविताओं को पढ़ा।”
किसी भी काव्य संग्रह पर यह हमारी पहली समीक्षा थी।
यह कविता वास्तव में कवि की स्वयं की कविता है। वह बूढ़ा मल्लाह और कोई नहीं, बल्कि कवि-मन की अपनी अभिव्यक्ति है!
*अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेते मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्हीं- नन्हीं किश्तियाँ।*
बच्चे भले ही कागज की किश्तियों को पानी में बहाते हुए देखकर खुश हो रहे हैं किंतु कवि-मन बूढ़े मल्लाह के रूप में अपनी जीवन रूपी नाव की बात कर रहे हैं जिन्हें चलाते हुए वह थकान महसूस करने लगे हैं।
लंबे समय तक बाल साहित्य से जुड़े होने के कारण बच्चों की छोटी से छोटी गतिविधियों पर भी आपकी पैनी नजर रहती है।
कागज की कश्तियों को दूर तक जाते हुए देखना, बच्चों का खिलखिला कर हँसना, खुश होना; वास्तव में
सांसारिक गतिविधियों के तमाम हलचल से दूर बचपन की उस उन्मुक्त निश्छल हँसी और खिलखिलाहट में कवि-मन भविष्य का विजय नाद महसूस करता है।
कवि उनके भविष्य और विजय के प्रति आश्वस्त है। स्नेह से भरी शुभकामनाएँ हैं बच्चों के प्रति। जैसे घर का एक बुजुर्ग एक बरगद की तरह होता है जिसकी छाया तले पूरा परिवार विकसित होता है। बच्चों के भविष्य में परिवार के बुजुर्गों की विजय छिपी होती है।
बूढ़े मल्लाह की सहृदयता और आत्मीयता से भरी संवेदनाएँ, कोमल भावनाएँ, उनका आशीर्वाद और उनकी खुशी के साथ ही उनका दृढ़ विश्वास कि इस संसार- सागर के समस्त तूफानों को झेल कर भी ये बच्चे निश्चित रूप से विजयी होंगे। यह कभी मन की उनके प्रति आश्वस्ति है
लेखक या कवि, फिर वह चाहे कोई भी क्यों न हो, उसके लिये सारा संसार एक परिवार की तरह ही होता है। यह बीते हुए कल की आने वाले कल के प्रति शुभकामनाओं की कविता है, प्रेम की कविता है। साहित्य के क्षेत्र में ,भविष्य के प्रति विश्वास की कविता है।
अपने अतीत को भुलाकर भविष्य को देखने और संवारने की कविता है।
इस पूरी कविता को पढ़ते हुए बाबूजी के कोमल भाव और बच्चों के प्रति असीम निश्छल प्रेम महसूस होता रहा ।
कोमल भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है यह कविता।
*2- चिड़िया का घर*
इस कविता की चिड़िया गृहस्थिन चिड़िया है, जो तिनका-तिनका जोड़ती है अपने बच्चों के लिये, घर बनाने और परिवार को सुरक्षा देने के लिये।
चिड़िया का संबोधन प्रतीकात्मकता में बेटियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। वे भी चिड़िया की तरह उड़ जाती हैं, दूसरे घर चली जाती हैं और उस घर को बसाने और सँवारने के लिये जीवन को तिनका तिनका कर संवारती हैं।
इसका कविता का अर्थ गृहस्थ स्त्री से भी है जो अपनी कलात्मकता का परिचय देते हुए परिवार को बचाने के लिये सारे कष्ट सह कर भी तिनका- तिनका जोड़कर घर को सँवारती है।
इस तरह यह जीवन का भी प्रतीक है।
*चिड़िया है घर की रानी*
*चिड़िया है सोनपरी* *बिटिया है लाडली सूरज की*
कवि-मन का विश्वास सकारात्मक प्रतिफल के प्रति यहाँ भी आश्वस्त है।
इसके लिए तो हम यही कहेंगे वाह! वाह!! और वाह!!!
*3-पेड़ हरा हो रहा है*
यह कविता सिर्फ पर्यावरण की कविता नहीं है, ऐसा हमें लगा।
हरा होना खुशहाली का प्रतीक है, समृद्धि का प्रतीक है, उत्थान का प्रतीक है, सृजन का प्रतीक है। यह श्रृंगार रस से जुड़ा हुआ है। यह प्रेम और मिलन का प्रतीक है। तप्त धरती की तृप्ति का प्रतीक है। रत्नगर्भा वसुंधरा के गर्भाधान का प्रतीक है।
और इन सबसे ऊपर उम्मीद का ,आशा का, प्रसन्नता का प्रतीक है।
ग्रीष्म काल में ठूँठ हुए वृक्षों पर वर्षा काल में हरियाली छा जाती है।
कवि-मन पेड़ की इस हरियाली से आल्हादित है।
इस कविता को अगर प्रकृति की दृष्टि से देखें
तो ग्रीष्म की भीषण तपन से त्रस्त धरती और मानव; दोनों में मानो प्राण आ जाते हैं वृक्ष की हरियाली से।
किंतु प्रतीकात्मकता में देखें तो मानव के नीरस और अवसाद भरे मन में उम्मीद और हौसले की कविता है यह।
*अंधेरों और अंधेरों और अंधेरों के सात* *खरब तहखानों के पार* करके आने के बाद का विजयनाद है।
*4-तानाशाह और बच्चे*
यह कविता ऐसे नकली लेखकों पर है, जो दोहरा जीवन जीते हैं, दो प्रकृति रखते हैं या कहें कि दो चेहरे रखते हैं ।जीते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं।
दिखते कुछ और हैं और होते कुछ और हैं।
मासूम फूल जैसे बच्चों का मन कुचलकर, वे बचपन पर शानदार लेख लिख-लिखकर बढ़िया जर्नल्स में छपवाएंगे।
नाम के लिए जीने वाले ऐसे लोग लेखक वास्तव में कृत्रिम जीवन जीते हैं।
वर्तमान में ऐसे कवियों की कमी नहीं जिनके अंतर्मन में खोट होता है लेकिन चेहरे से अच्छे दिखने की पूरी कोशिश की जाती है।
कवि-मन इन दो चेहरों वाली राजनीतिक चाल से आहत है वह इसका विरोध करता है।
ऐसे लोगों को लगता है की कोई उन्हें पहचान नहीं पा रहा, लेकिन सच्चाई छुपाए नहीं छुपती।
आपकी कविताएँ जिंदगी के सच को उजागर करती हैं। आपके जीवन अनुभव शिल्पगत सौंदर्य के साथ
अपने उद्देश्य तक पहुँचते हैं। दिल से निकली हुई बात, दिल को छूती हुई झंकृत करती है।ठहर जाती है दिलों दिमाग में और हलचल मचाती रहती हैं हौले-हौले।
बेहतरीन कविताओं के लिए दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया बाबू जी। आपकी कलम निरंतर सृजनरत रहे।
आपसे एक निवेदन और है -जो उम्मीद, आशा विश्वास और हौसला आपके सृजन का मूल है,वह आपके अपने जीवन में भी रहे। आप बूढ़े वृक्ष की तरह न सोचें।आप जानते हैं कि वृक्ष कभी बूढ़े नहीं होते। आपका यह आत्मविश्वास आपके जीवन में भी बना रहे। यही आपके लिये ईश्वर से प्रार्थना है। आपकी छाया तले, आपके अनुभव का लाभ लेते हुए हम सभी समृद्ध होते रहें। हम सब का यह विश्वास हमारे साथ हैं।
में बेहतरीन कविताओं की प्रस्तुति के लिये नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
बेटी, आपने क्या खूब लिखा। कविता के छिपे हुए आशयों को बहुत सुंदर, क्रिएटिव और अनुभवसिद्ध भाषा में उजागर कर दिया। आपमें एक अलग तत्वबोधिनी दृष्टि है जो रचना के गहरे मर्म तक जा पहुंचती है, जहां पूरी रचना फूल की तरह खुल पड़ती है।
आपने बिल्कुल ठीक कहा कि पहली कविता के बूढ़े मल्लाह में स्वयं कवि उपस्थित है। दूसरी कविता की चिड़िया तिनका-तिनका जोड़ती एक गृहस्थिन स्त्री है। तीसरी कविता में पेड़ का हरा होना आशा और जिजीविषा है, और चौथी कविता में तानाशाह वे दोहरे चेहरे वाले लोग हैं, जो दूसरों की कोमल भावनाएं कुचलते हैं। और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऐसी तरल भाषा और यह भावबोधिनी दृष्टि ही आपको औरों से अलग बनाती है। इसे सहेजकर रखना बेटी। यही आपकी साहित्यिक शख्सियत का वैशिष्ट्य भी है।
आदरणीय प्रकाश मनु.सर की चौथी रचना **तानाशाह और बचचे**एक सशक्त सोच और विचार मंथन के.साथ किसी भी तानाशाही का प्रतिकार करती है। जहां स्वतंत्रता मानव के मौलिक अधिकारों का प्रतिफल है.वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक या विरोध निजता का हनन है।आदरणीय प्रकाश मनु सर की यह कविता अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर अनेक वैचारिक प्रश्न उठाती है।
अभिव्यक्ति चाहे वैचारिक हो.या कलात्मक वह मानवीय संवेदना का एक मजबूत स्तंभ है। एक तानाशाह शासक जो दूसरों पर जबरन अपने विचार थोपना चाहता है सत्य से बिल्कुल दूर अपना आधिपत्य चाहता है कवि का संवेदनशील कोमल हृदय इस विरोध का प्रतिकार करता है।
यह कविता वैश्विक परिदृश्य में तानाशाही और स्वतंत्रता के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। यहां तक कि मासूम बच्चों के खेल .उनकी कलात्मकता और चित्रात्मकता का आनंद लेने की खुशी ,सबका विरोध किया जाता है। आदरणीय प्रकाश मनु.सर कहते.हैं –
तानाशाह को यह कतई पसंद
नहीं है
कि बच्चे खेलें अपनी मर्जी का खेल
ऐन अपनी मर्जी के वक्त में
तानाशाह को पसंद नहीं है
बच्चे बनाएँ अपनी मर्जी का चित्र
अपनी मर्जी की लकीरें
उसमें मर्जी के रंग भरें।
-कोमल भाव के कवि की सृजित कविता में बच्चों को अपनी मर्जी का खेल खेलने, चित्र बनाने, और अपनी कल्पना को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है। यह उनकी रचनात्मकता और आत्मविश्वास को दर्शाता है। बालमन की क्रियाशीलता उनकी रचनात्मकता कोई बंधन नहीं मानती। आदरणीय प्रकाश मनु.सर स्वयं बालमन के कुशल चितेरे हैं ,बच्चों के मन को समझते.हैं,इसलिए उनकी कविता बहुत ही सुखद सार्थक संदेश देती है-
बच्चे खेल रहे हैं छत पर
भूलकर इस उखड़ी दुनिया के सारे उखाड़-पछाड़
उबले हुए दुख और दाह।
यह रचना स्वतंत्रता का महत्व और बच्चों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रत उनकी रचनात्मकता का महत्व प्रतिपादित किया गया है। वैचारिक स्वतंत्रता और रचनात्मकता जीवन के लिए आवश्यक हैं और इन्हें दबाने से जीवन की सुंदरता और अर्थ खत्म हो जाता है।
कविता का संदेश यह है कि स्वतंत्रता और रचनात्मकता जीवन के लिए आवश्यक हैं ,जिसकी कमी जीवन से सारे सौंदर्य खुशी उल्लास, उत्साह सब खत्म कर देती है।तानाशाही और नियंत्रण की प्रवृत्ति को कविता में नकारात्मक रूप से दिखाया गया है, जबकि स्वतंत्रता और रचनात्मकता को सकारात्मक रूप से दिखाया गया है।
भूलकर उसकी और मेहमानों की
महिमामयी उपस्थिति
बच्चे अपने गुड्डे-गुड़ियों, नाटक, चित्रकला में रहें लीन
तानाशाह को यह पसंद नहीं है
कि बच्चे खुद सोचेंखुद रोपें
खुद रचें
खुद बनाएँ नक्शा और उस पर चलें।
बेहद भावुक संवेदनशील मुखर अभिव्यक्ति है इस कविता में।आदरणीय प्रकाश मनु.सर की कलम मानो पूरे परिवेश में जादू सा असर डालती है। बालमनोविज्ञान का कोना कोना उनका परिचित है। रचना का.शब्द शब्द जीवन के संघर्षों गूढ रहस्यों की अकथ व्यथा कथा है जहां.वैश्विक स्तर पर सत्ता संपन्न तानाशाह शासकों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कडा अंकुश लगाया है।कविता पाठकीय दृष्टि से अत्यंत सफल है।
वाह बेटी, बहुत अच्छा। कविता को आपने समझा। बहुत गहराई से समझा और उसके मर्म, उसके वास्तविक आशय तक पहुंच गईं।
कविता कुछ अलग सी थी। इसलिए मुझे कुछ संदेह था। लेकिन आपसे बिल्कुल चूक नहीं हुई। आपने अपनी संवेदना और अचूक समझदारी से उसके मर्म को थाह लिया और उसकी बड़ी ही खूबसूरत व्याख्या की।
बूढ़े मल्लाह वाली कविता बेहद खूबसूरत और मानिखेज़ बन पड़ी है।ज़िंदगी का अफसाना और फ़साना बयां करती है।
यह कविता एक ऐसे कवि या बहुमुखी प्रतिभा वाली विभूति की कलम से निकली है जिसने जीवन का अमृत वर्ष पूर्ण कर अब संन्यास के अमृत काल में हैं।भविष्य में अध्यात्म से परिपूर्ण रचनाएं पढ़ने को मिल सकती हैं।
चिड़िया का घर ,आज के भौतिक युग में गांवों और कस्बों के लोगों के संघर्ष को प्रतिबिंबित करती है,अतः महानगरीय जीवन के अभ्यस्त पाठकों को कुछ विलग सी लग सकती है।
इसी प्रकार तानाशाह रचना,बाल साहित्य में उगे कुकुरमुत्ते से भुतहा लेखकों पर सटीक व्यंग्य सा प्रतीत होती है जो पैसे सम्पर्क और प्रभाव के बल पर बच्चों की दुनिया में घुसपैठ करने पर आमादा हैं।
आदरणीय डॉक्टर प्रकाश मनु जी को बधाई हो।
सादर
सूर्य कांत शर्मा
बहुत अच्छा लिखा सूर्य भाई। कविताओं की संवेदना में गहरे उतरकर आपने यह मार्मिक टिप्पणी लिखी है, जो कविताओं के भाष्य सरीखी है।
बहुत-बहुत आभार।
स्नेह,
प्रकाश मनु
बूढे.मल्लाह का गीत
आदरणीय प्रकाश मनु सर.सृजित यह कविता बेहद संवेदनशील मार्मिक और भावप्रवण रचना है।एक एक शब्द भावनाओं में.बहा ले जाता है।बूढे मल्लाह के रुप में जीवन की सांझ में अनुभवों की कश्ती पर सवार कवि का मन.ही है जो अकेला अपने सफर में चलता जा रहा है। लहरों के अनगिनत थपेडे सहता ,झंझावातों का सामना करता हुआ। अपने आसपास अनेक छोटी छोटी नावों को लहरों संग बहते देखकर एक आशा की किरण जगमगाती है कि एक दिन ये नन्हीं किश्तियां विजेता बनकर लौटेंगी अवश्य। जीवन संघर्षों में जूझते हुए अपनी लड़ाई जो वह हार गया था ये किश्तियां वहां से जीत कर वापस आयेंगी चाहें लहरों के विकराल तूफान ही क्यों न हों। लहरों का उत्थान पतन राह क्यों न भटकायें।
बहुत सुंदर प्रतीकात्मक भाव बिंब से.सजी यह कविता हृदय को स्पर्श करती.है,मन भावुक हो जाता है। बूढे मल्लाह के रुप में स्वयं कवि ने अपनी जीवन यात्रा में चुनौतियों का सामना कर अपनी साधना और कर्मठता से जो राह बनायी है वह एक दिन पीढियों का मार्गदर्शन करेगी। नन्हे सपनों की पतवार थामें ये नन्हीं किश्तियां जो कल सृजन की पतवार थामेगी और उनमे नया जोश उत्साह और हौसला है.वे अपनी यात्रा पूरी कर शिखर तक जरुर पहुंचेंगी यह विश्वास कवि मन के रुप में.उस मल्लाह के मन को आश्वस्त करता है।
असीसें निकलती हैं भीतर से
जियो…जियो मेरे अनगिनत बेटो, बेटियो
कि हमारी हारी हुई लड़ाइयाँ, खीज और टूटन…
तुम्हारे हाथों में बन जाएँ
अमोघ अस्त्र, ढाल और कवच
कि तुम विजेता होकर लौटो
वहाँ-वहाँ से भी, जहाँ हम हारे…
अपने संशय, अविश्वास और कौशल की कमी से।
अद्भुत कल्पना कवि मन की।पाठक की आंखें भर आती हैं,मन विह्वल हो जाता है और स्वयं उस बूढे मल्लाह की वेदना से अंतर्मन भींगने लगता है। बहुत सुंदर सृजन। अनुभूतियों की नाव पर सवार कविता का शब्द शब्द जैसे मन की गहराईयों तक भिंगो देता.है।हृदय से अशेष आभार इस सुंदर सृजन के लिए। प्रणाम बाबूजी।आप.स्वस्थ दीर्घयु व यशस्वी हों यही कामना है।मन भावुक हो रहा है।बहुत बहुत बधाई।आदरणीय प्रकाश मनु.सर द्वारा रचित दूसरी कविता जीवन की आपाधापी में उम्मीदों की लौ जगाये एक जिजीविषा की व्यथा कथा है जो हारना नहीं जानती।चिडिया एक प्रतीक है मासूम कमजोर पर अपने पंखों से अनंत आकाश की ऊंचाईयां नाप सकती है,अपनी दृढ संकल्प शक्ति से तिनकों का घर बना सकती है।वह.इतनी सशक्त है जितनी कवि की कलम,उसकी कल्पना।
यह कविता एक सुंदर और प्रेरणादायक संदेश देती है, जिसमें चिड़िया के माध्यम से जीवन के मूल्यों और संघर्ष की भावना को दर्शाया गया है। कविता में चिड़िया के पास सीमित संसाधन होने के बावजूद उसके पास एक मजबूत इच्छाशक्ति और जिजीविषा है, जो उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
उसकी कला ही उसकी सर्जना शक्ति है,क्योंकि वह उत्साहित है,वह अपना घर अपने सपनों को साकार करना चाहती है। इसलिए वह निर्भीक है,चपल है क्योंकि उत्साह से भरी है। चिड़िया की निर्भीकता, कला और जिजीविषा कवि की कविता, किताब और चेहरे को देखती है, लेकिन उसकी दृष्टि कवि के आसपास के वातावरण पर अधिक केंद्रित है, जहां वह अपने घर के लिए तिनकों की तलाश करही है।
चिड़िया अपने घर को बनाने के लिए पूरी तरह से समर्पित है और उसके पास उत्साह और जिजीविषा है, जो उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करती है।
– कवि मन की आशावादिता कविता के माध्यम से एक आशावादी दृष्टिकोण देती है जिसमें चिडिया मानव मन का प्रतीक है जो उसे जीवन की चुनौतियों को पार करने में मदद करती है, चाहे वह युद्ध हो या अकाल। स्वयं कवि का जीवन समर्पण निष्ठा और दृढ़संकल्प शक्ति को समर्पित है,इसलिए यह कविता जीवन में चुनौतियों और संघर्षों को विजित कर आगे बढ जाने और नैतिक आदर्शों के मूल को पा लेने की सुखद प्रेरणा है।हार्दिक बधाई बाबूजी,इतने सुंदर व प्रेरक सृजन के लिए।प्रकाश मनु सर की तीसरी कविता *पेड हरा हो रहा है*उदार आशावादी सोच और जीवन की चैतन्यता की प्रतीक है। यह रचना हृदय पर गहरा प्रभाव छोडती है।इसे पढते समय दिनकर की प्रसिद्ध रचना याद आती है*लोहे के पेड हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल*। दिनकर जी की तरह ही कवि की कल्पना भी जीवन के कठोर मृत नैराश्य में भी आशावादी सोच को जागृत करती.है।
पेड का हरा होना प्रकृति के स्नेह उर्जा और गतिमयता का संकेत है।मानवीय जीवन भी प्रकृति से ही.संचरित होता है अत: जिस प्रकार अनेक प्राकृतिक झंझावातों और पतझर के थपेडे सहने के बाद पेड मुरझाता नहीं बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति से स्नेह, उर्जा ग्रहण कर पुन: पुष्पित पल्लवित होकर हरा हो रहा है।,जीवंत हो रहा है वैसा ही यह जीवन भी है।संघर्षों.से.हारता महीं अपितु पुन: प्रेम राग संवेदना की संजीवनी ग्रहण कर अपने मार्ग पर आगे बढ जाता है।
बहुत सुंदर सृजन आदरणीय प्रकाश मनु.सर का।अत्यंत भावुक, प्रेरक रचना।कवि का मन प्रकृति के उपादानों से प्रेरणा लेकर मानव.को सशक्त उर्जावान और आशा की सुनहली उम्मीद के साथ जीने का सुखद संदेश भी देता है।
सुख की भीतरी उजास और थरथराहट लिए
रजत बूँदें गीली चमकीली
और उन्मुक्त हरा-भरा उल्लास
हमारे भीतर उतर जाएगा कहीं दूर जड़ों तक…
अँधेरों और अँधेरों और अँधेरों के सात खरब तहखानों के पार।
हृदय से अशेष आभार और हार्दिक बधाई इस खूबसूरत सृजन के लिए। उनकी रचनाए हमें सदैव नयी उर्जा साहस और शक्ति देती हैं। सादर प्रणाम बाबूजी।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
–
बेटी, आपने मेरी कविताओं को समझा। पूरे मन और गहराई से समझा, और इतनी गहन संवेदनात्मक टिप्पणी लिखी है कि क्या कहूं। शुरू की तीनों कविताओं का आपने बड़ा सुंदर भाष्य किया है। लिखा भी कितने सलीके से।
मेरी कविताओं पर इतनी गहराई से तो आज तक किसी ने नहीं लिखा।
मन विभोर है और आपके लिए बहुत असीसें निकल रही हैं।
मेरे बहुत-बहुत आशीर्वाद,
प्रकाश मनु
आदरणीय बाबूजी
आपका चाहे लेख हो, चाहे संस्मरण हो, या फिर कविताएँ हों! उन्हें पढ़ने और समझने के लिए बहुत अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि जो भी लिखा जाता है वह उनकी कलम नहीं आत्मा रचती है।
आपका जीवन अनुभव इतना सघन है, मानो एक जिंदगी में ही न जाने कितनी जिंदगियाँ जी ली हों।
कायदे से तो एकांत और खामोशी में धैर्य से पढ़ने वाली, महसूस करने वाली रचनाएँ होती हैं आपकी। उन्हें शब्दों में व्यक्त करना इतना आसान नहीं होता
1-
*”एक बूढ़े मल्लाह का गीत”*
यह कविता पहले भी पढ़ी हुई है। “मैंने किताबों से घर बनाया है” पुस्तक की समीक्षा के दौरान हमने पुस्तक की लगभग सभी कविताओं को पढ़ा।”
किसी भी काव्य संग्रह पर यह हमारी पहली समीक्षा थी।
यह कविता वास्तव में कवि की स्वयं की कविता है। वह बूढ़ा मल्लाह और कोई नहीं, बल्कि कवि-मन की अपनी अभिव्यक्ति है!
*अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेते मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्हीं- नन्हीं किश्तियाँ।*
बच्चे भले ही कागज की किश्तियों को पानी में बहाते हुए देखकर खुश हो रहे हैं किंतु कवि-मन बूढ़े मल्लाह के रूप में अपनी जीवन रूपी नाव की बात कर रहे हैं जिन्हें चलाते हुए वह थकान महसूस करने लगे हैं।
लंबे समय तक बाल साहित्य से जुड़े होने के कारण बच्चों की छोटी से छोटी गतिविधियों पर भी आपकी पैनी नजर रहती है।
कागज की कश्तियों को दूर तक जाते हुए देखना, बच्चों का खिलखिला कर हँसना, खुश होना; वास्तव में
सांसारिक गतिविधियों के तमाम हलचल से दूर बचपन की उस उन्मुक्त निश्छल हँसी और खिलखिलाहट में कवि-मन भविष्य का विजय नाद महसूस करता है।
कवि उनके भविष्य और विजय के प्रति आश्वस्त है। स्नेह से भरी शुभकामनाएँ हैं बच्चों के प्रति। जैसे घर का एक बुजुर्ग एक बरगद की तरह होता है जिसकी छाया तले पूरा परिवार विकसित होता है। बच्चों के भविष्य में परिवार के बुजुर्गों की विजय छिपी होती है।
बूढ़े मल्लाह की सहृदयता और आत्मीयता से भरी संवेदनाएँ, कोमल भावनाएँ, उनका आशीर्वाद और उनकी खुशी के साथ ही उनका दृढ़ विश्वास कि इस संसार- सागर के समस्त तूफानों को झेल कर भी ये बच्चे निश्चित रूप से विजयी होंगे। यह कभी मन की उनके प्रति आश्वस्ति है
लेखक या कवि, फिर वह चाहे कोई भी क्यों न हो, उसके लिये सारा संसार एक परिवार की तरह ही होता है। यह बीते हुए कल की आने वाले कल के प्रति शुभकामनाओं की कविता है, प्रेम की कविता है। साहित्य के क्षेत्र में ,भविष्य के प्रति विश्वास की कविता है।
अपने अतीत को भुलाकर भविष्य को देखने और संवारने की कविता है।
इस पूरी कविता को पढ़ते हुए बाबूजी के कोमल भाव और बच्चों के प्रति असीम निश्छल प्रेम महसूस होता रहा ।
कोमल भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है यह कविता।
*2- चिड़िया का घर*
इस कविता की चिड़िया गृहस्थिन चिड़िया है, जो तिनका-तिनका जोड़ती है अपने बच्चों के लिये, घर बनाने और परिवार को सुरक्षा देने के लिये।
चिड़िया का संबोधन प्रतीकात्मकता में बेटियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। वे भी चिड़िया की तरह उड़ जाती हैं, दूसरे घर चली जाती हैं और उस घर को बसाने और सँवारने के लिये जीवन को तिनका तिनका कर संवारती हैं।
इसका कविता का अर्थ गृहस्थ स्त्री से भी है जो अपनी कलात्मकता का परिचय देते हुए परिवार को बचाने के लिये सारे कष्ट सह कर भी तिनका- तिनका जोड़कर घर को सँवारती है।
इस तरह यह जीवन का भी प्रतीक है।
*चिड़िया है घर की रानी*
*चिड़िया है सोनपरी* *बिटिया है लाडली सूरज की*
कवि-मन का विश्वास सकारात्मक प्रतिफल के प्रति यहाँ भी आश्वस्त है।
इसके लिए तो हम यही कहेंगे वाह! वाह!! और वाह!!!
*3-पेड़ हरा हो रहा है*
यह कविता सिर्फ पर्यावरण की कविता नहीं है, ऐसा हमें लगा।
हरा होना खुशहाली का प्रतीक है, समृद्धि का प्रतीक है, उत्थान का प्रतीक है, सृजन का प्रतीक है। यह श्रृंगार रस से जुड़ा हुआ है। यह प्रेम और मिलन का प्रतीक है। तप्त धरती की तृप्ति का प्रतीक है। रत्नगर्भा वसुंधरा के गर्भाधान का प्रतीक है।
और इन सबसे ऊपर उम्मीद का ,आशा का, प्रसन्नता का प्रतीक है।
ग्रीष्म काल में ठूँठ हुए वृक्षों पर वर्षा काल में हरियाली छा जाती है।
कवि-मन पेड़ की इस हरियाली से आल्हादित है।
इस कविता को अगर प्रकृति की दृष्टि से देखें
तो ग्रीष्म की भीषण तपन से त्रस्त धरती और मानव; दोनों में मानो प्राण आ जाते हैं वृक्ष की हरियाली से।
किंतु प्रतीकात्मकता में देखें तो मानव के नीरस और अवसाद भरे मन में उम्मीद और हौसले की कविता है यह।
*अंधेरों और अंधेरों और अंधेरों के सात* *खरब तहखानों के पार* करके आने के बाद का विजयनाद है।
*4-तानाशाह और बच्चे*
यह कविता ऐसे नकली लेखकों पर है, जो दोहरा जीवन जीते हैं, दो प्रकृति रखते हैं या कहें कि दो चेहरे रखते हैं ।जीते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं।
दिखते कुछ और हैं और होते कुछ और हैं।
मासूम फूल जैसे बच्चों का मन कुचलकर, वे बचपन पर शानदार लेख लिख-लिखकर बढ़िया जर्नल्स में छपवाएंगे।
नाम के लिए जीने वाले ऐसे लोग लेखक वास्तव में कृत्रिम जीवन जीते हैं।
वर्तमान में ऐसे कवियों की कमी नहीं जिनके अंतर्मन में खोट होता है लेकिन चेहरे से अच्छे दिखने की पूरी कोशिश की जाती है।
कवि-मन इन दो चेहरों वाली राजनीतिक चाल से आहत है वह इसका विरोध करता है।
ऐसे लोगों को लगता है की कोई उन्हें पहचान नहीं पा रहा, लेकिन सच्चाई छुपाए नहीं छुपती।
आपकी कविताएँ जिंदगी के सच को उजागर करती हैं। आपके जीवन अनुभव शिल्पगत सौंदर्य के साथ
अपने उद्देश्य तक पहुँचते हैं। दिल से निकली हुई बात, दिल को छूती हुई झंकृत करती है।ठहर जाती है दिलों दिमाग में और हलचल मचाती रहती हैं हौले-हौले।
बेहतरीन कविताओं के लिए दिल की गहराइयों से आपका शुक्रिया बाबू जी। आपकी कलम निरंतर सृजनरत रहे।
आपसे एक निवेदन और है -जो उम्मीद, आशा विश्वास और हौसला आपके सृजन का मूल है,वह आपके अपने जीवन में भी रहे। आप बूढ़े वृक्ष की तरह न सोचें।आप जानते हैं कि वृक्ष कभी बूढ़े नहीं होते। आपका यह आत्मविश्वास आपके जीवन में भी बना रहे। यही आपके लिये ईश्वर से प्रार्थना है। आपकी छाया तले, आपके अनुभव का लाभ लेते हुए हम सभी समृद्ध होते रहें। हम सब का यह विश्वास हमारे साथ हैं।
में बेहतरीन कविताओं की प्रस्तुति के लिये नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
बेटी, आपने क्या खूब लिखा। कविता के छिपे हुए आशयों को बहुत सुंदर, क्रिएटिव और अनुभवसिद्ध भाषा में उजागर कर दिया। आपमें एक अलग तत्वबोधिनी दृष्टि है जो रचना के गहरे मर्म तक जा पहुंचती है, जहां पूरी रचना फूल की तरह खुल पड़ती है।
आपने बिल्कुल ठीक कहा कि पहली कविता के बूढ़े मल्लाह में स्वयं कवि उपस्थित है। दूसरी कविता की चिड़िया तिनका-तिनका जोड़ती एक गृहस्थिन स्त्री है। तीसरी कविता में पेड़ का हरा होना आशा और जिजीविषा है, और चौथी कविता में तानाशाह वे दोहरे चेहरे वाले लोग हैं, जो दूसरों की कोमल भावनाएं कुचलते हैं। और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऐसी तरल भाषा और यह भावबोधिनी दृष्टि ही आपको औरों से अलग बनाती है। इसे सहेजकर रखना बेटी। यही आपकी साहित्यिक शख्सियत का वैशिष्ट्य भी है।
मेरा स्नेहाशीष,
प्रकाश मनु
आदरणीय प्रकाश मनु.सर की चौथी रचना **तानाशाह और बचचे**एक सशक्त सोच और विचार मंथन के.साथ किसी भी तानाशाही का प्रतिकार करती है। जहां स्वतंत्रता मानव के मौलिक अधिकारों का प्रतिफल है.वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक या विरोध निजता का हनन है।आदरणीय प्रकाश मनु सर की यह कविता अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर अनेक वैचारिक प्रश्न उठाती है।
अभिव्यक्ति चाहे वैचारिक हो.या कलात्मक वह मानवीय संवेदना का एक मजबूत स्तंभ है। एक तानाशाह शासक जो दूसरों पर जबरन अपने विचार थोपना चाहता है सत्य से बिल्कुल दूर अपना आधिपत्य चाहता है कवि का संवेदनशील कोमल हृदय इस विरोध का प्रतिकार करता है।
यह कविता वैश्विक परिदृश्य में तानाशाही और स्वतंत्रता के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। यहां तक कि मासूम बच्चों के खेल .उनकी कलात्मकता और चित्रात्मकता का आनंद लेने की खुशी ,सबका विरोध किया जाता है। आदरणीय प्रकाश मनु.सर कहते.हैं –
तानाशाह को यह कतई पसंद
नहीं है
कि बच्चे खेलें अपनी मर्जी का खेल
ऐन अपनी मर्जी के वक्त में
तानाशाह को पसंद नहीं है
बच्चे बनाएँ अपनी मर्जी का चित्र
अपनी मर्जी की लकीरें
उसमें मर्जी के रंग भरें।
-कोमल भाव के कवि की सृजित कविता में बच्चों को अपनी मर्जी का खेल खेलने, चित्र बनाने, और अपनी कल्पना को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है। यह उनकी रचनात्मकता और आत्मविश्वास को दर्शाता है। बालमन की क्रियाशीलता उनकी रचनात्मकता कोई बंधन नहीं मानती। आदरणीय प्रकाश मनु.सर स्वयं बालमन के कुशल चितेरे हैं ,बच्चों के मन को समझते.हैं,इसलिए उनकी कविता बहुत ही सुखद सार्थक संदेश देती है-
बच्चे खेल रहे हैं छत पर
भूलकर इस उखड़ी दुनिया के सारे उखाड़-पछाड़
उबले हुए दुख और दाह।
यह रचना स्वतंत्रता का महत्व और बच्चों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रत उनकी रचनात्मकता का महत्व प्रतिपादित किया गया है। वैचारिक स्वतंत्रता और रचनात्मकता जीवन के लिए आवश्यक हैं और इन्हें दबाने से जीवन की सुंदरता और अर्थ खत्म हो जाता है।
कविता का संदेश यह है कि स्वतंत्रता और रचनात्मकता जीवन के लिए आवश्यक हैं ,जिसकी कमी जीवन से सारे सौंदर्य खुशी उल्लास, उत्साह सब खत्म कर देती है।तानाशाही और नियंत्रण की प्रवृत्ति को कविता में नकारात्मक रूप से दिखाया गया है, जबकि स्वतंत्रता और रचनात्मकता को सकारात्मक रूप से दिखाया गया है।
भूलकर उसकी और मेहमानों की
महिमामयी उपस्थिति
बच्चे अपने गुड्डे-गुड़ियों, नाटक, चित्रकला में रहें लीन
तानाशाह को यह पसंद नहीं है
कि बच्चे खुद सोचेंखुद रोपें
खुद रचें
खुद बनाएँ नक्शा और उस पर चलें।
बेहद भावुक संवेदनशील मुखर अभिव्यक्ति है इस कविता में।आदरणीय प्रकाश मनु.सर की कलम मानो पूरे परिवेश में जादू सा असर डालती है। बालमनोविज्ञान का कोना कोना उनका परिचित है। रचना का.शब्द शब्द जीवन के संघर्षों गूढ रहस्यों की अकथ व्यथा कथा है जहां.वैश्विक स्तर पर सत्ता संपन्न तानाशाह शासकों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कडा अंकुश लगाया है।कविता पाठकीय दृष्टि से अत्यंत सफल है।
हार्दिक बधाई बाबूजी।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
वाह बेटी, बहुत अच्छा। कविता को आपने समझा। बहुत गहराई से समझा और उसके मर्म, उसके वास्तविक आशय तक पहुंच गईं।
कविता कुछ अलग सी थी। इसलिए मुझे कुछ संदेह था। लेकिन आपसे बिल्कुल चूक नहीं हुई। आपने अपनी संवेदना और अचूक समझदारी से उसके मर्म को थाह लिया और उसकी बड़ी ही खूबसूरत व्याख्या की।
जुग-जुग जियो बेटी।
मेरे आशीर्वाद,
प्रकाश मनु