यहाँ सब राजी-खुशी है। कल हाईस्कूल का रिजल्ट निकल आया है। मैं फस्ट क्लास पास हो गई। वे दो पेपर नईं बिगड़ गए थे… अरे वही जिसमें सौ-सौ रुपये के लोट धरे थे। उनमें ठीक लम्बर आ गए। प्राननाथ, मैं अब समझी कि नियम से पढ़ो जाए तो परीक्षा देना सहल है। परीक्षार्थी सैंके-मैकें परीक्षा का हौवा बनाएँ रहत। ज्यादा कहाँ पढ़ पाई थी, सुबह-शाम किताबें उलटती-पलटती रही और पास हो गई। गाँव भर मोई बड़वाई कर रहो है। मैंने सोऊ मुहल्ला भर में पेड़ा बँटवा दिए। भूरी भैंस का दूध ओंट लिया था। शक्कर डालकर पेड़ा बना लिए।
आज भी जो लोग मेरी मार्कशीट देखने आते हैं, मैं उनका मुँह मीठा कराए बिना नहीं जाने देती हूँ। मार्कशीट तुम भी देख लेना, मैं इसी चिठिया के साथ उसकी फोटोकापी रख दूँगी। हओ, मैं जानती हूँ कि मार्कशीट देखकर तुम खुश हो जाओगे।
औरतें कह रही थीं कि हद कर दी रमकल्लो तैने! घर का काम भी करती रही और पास हो गई। उन्हें ऐसी खुशी है जैसे मैं नहीं, वे पास हुई हों। प्राननाथ, मेरे लिए ये खुशी के पल हैं।
परधान जी तो इतने खुश हैं कि कछु पूछो न। कह रहे थे कि धन्य री बहू ! तूने गाँव का नाम रोशन कर दिया। औरतें पढ़ने की सोच नहीं सकती हैं और तूने हाईस्कूल पास कर लिया, वह भी फस्ट डिवीजन में। तू तो गाँव की नाक हो गई।
प्राननाथ, इस खुशी में मेरी दो रातें आँख न लगी थी। पूरे गाँव में हंका मचो है कि फलाने की बहू ने गजबई कर दिया। बताव ले, जब गाँव वालों ने इतनी बड़ी पद्दी (पदवी) पर बैठा दिया है, तो उस गरिमा की रक्षा तो करनी ही पड़ेगी।
प्राननाथ, मैं आगे भी पढ़ना चाहती हूँ। तुम आज्ञा दे दो, तो मैं ग्यारहवीं में एडमीशन ले लूँ। चिल्लर सर कह रहे थे कि रमकल्लो हमारे कॉलेज में अपना नाम लिखवा ले। प्राननाथ, उनका असली नाम चिल्लर सर थोड़े है, वो तो छात्रों ने उनका नामकरण कर दिया था।
एक बार छोटे-छोटे बच्चे उनके आस-पास शोर मचा रहे थे। वे क्रोध में भन्ना पड़े कि ये चिल्लर बहुत खोपड़ी खाते हैं। बच्चे हैं, उनका क्या? बच्चे और बंदर बराबर होते हैं। उन्होंने उनका डालोग उन्हीं पर चस्पा कर दिया। बच्चे उन्हें चिल्लर सर कहकर चिढ़ाते हैं। वे बच्चों को मारने के लिए दौड़ते हैं, तो वे उड़नछू हो जाते हैं। उनके सामने कह दो तो वे चिढ़ जाते हैं। मैं तो कभी न कहूँगी। सुना है, वे हिन्दी अच्छी पढ़ाते हैं। उनसे पढ़ लूँगी, तो मेरी हिन्दी अच्छी हो जाएगी। हिन्दी मातृभाषा है, इसका ज्ञान होना बहुत जरूरी है।
सर कह रहे थे कि फीस की चिन्ता न करना, आगे-पीछे जमा कर देना। तुम मनीऑर्डर भेज दोगे, तो मैं साल भर की इकट्ठी फीस जमा कर दूँगी। पेन्डिंग फीस बच्चों के सामने माँग दी, तो बेइज्जती हो जाएगी। ऐसा कैसा है कि पहले से ही जमा करा दो।
किताबें तो मैं पुरानी खरीद लूँगी। चार किलो के लगभग घी हो गया है, उसी को बेच दूँगी। कापी-किताबों की चिन्ता नहीं है। चिल्लर सर ड्रेस की कह रहे थे। मैं ड्रेस न पहनूँगी। मायका थोड़े है, ससुराल में मौड़ी बनी फिरूँगी, तो लोग क्या कहेंगे? मैंने सर से साफ कह दिया है कि मैं तो धोती पहनकर ही आऊँगी। वे हँस रहे थे।
उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि रमकल्लो नई ड्रेस में तू एक-दो दिन असहज रहेगी, फिर आदत में आ जाएगा। मन तो नहीं था पर ड्रेस बनवा लूँगी।
प्राननाथ मैंने अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर लिया है। कालेज जाने के फैसले से कई लोग नाक-भौं सिकोड़ेंगे। सिकोड़ते रहें, मुझे क्या? औरतें ज्यादा मीन-मेख निकालेंगी। इन्हीं के पेट में शूल उठेंगे। पता नहीं, इनकी कैसी आदत होती है। हर काम में नुक्ता निकालती हैं। परीक्षा दे रही थीं, तब हरबी जिज्जी कह रही थी कि पढ़-लिखकर कलट्टर बनेगी क्या? घर का काम देख उसी में सार है, ज्यादा तमाशा न बगरा। जब पास हो गई, तो सबसे पहले पेड़ा खाने वही आई थी। तारीफ भी कर रही थी।
सरबत चाची भी कम है क्या? पढ़ना-लिखना वे फालतू मानती हैं। चिठिया-पतिया बाँच लो, इतना पर्याप्त है। उन्होंने अपने लड़के को आठ तक पढ़ाया है और पढ़ा देती तो कुछ करने न लगता। घर का काम करता रहता है, उसी काम में सब घर लगे रहो।
मुहल्ला की औरतें इकट्ठी हो जाती हैं, तो आलोचना का एक दौर शुरू हो जाता है। दुनिया भर का उल्टा सीधा बकती हैं। उन्हें पता चल गया है कि मैं इस साल से रेगुलर पढ़ूंगी। मखना कक्का के घर से कह रही थी कि बिना नाथ-पगहिया की है, उसे किसका डर है। कुछ भी करती रहे, उसे कौन रोकने वाला है। काकी इसी मंत्र का जाप करती रहती है।
बताव ले प्राननाथ, मैं ऐसा क्या करती हूँ कि मुझे कोई रोकने वाला चाहिए। पढ़ना-लिखना छोड़कर इनके निन्दा पुराण में शामिल हो जाऊँ तो ठीक है। कुछ अलग हटकर काम करूँ, तो इनकी नजरों में बिगड़ी हूँ। हद रे जमाने! तेरी लीला भी अपरम्पार है।
प्राननाथ, मैं कहे देती हूँ, कालेज जरूर जाऊँगी। जैसे घर में बैठी रहती हूँ, वैसे वहाँ बैठी रहूँगी। घर से अच्छा कालेज। अकेले में तो दुनिया भर की बातें दिमाग में आती हैं। सुबह-शाम भैंस की उसार भर तो है, सो कर लिया करूँगी। शाम के समय जल्दी छुट्टी हो जाती है, उतने समय में ग्योड़े वाले खेत से चारा काट लाया करूँगी। भैंस के चारे-पत्ते से समझौता थोड़े करूँगी।
चिल्लर सर कह रहे थे कि पढ़ाई से अनुभव बढ़ता है। किताबें ऐसे थोड़े लिखी गई हैं। उनमें हजारों साल के मानवीय अनुभव होते हैं। हमारा जीवन सीमित है, हम हजारों साल तक नहीं जी सकते हैं। मानव सभ्यता के अच्छे-बुरे अनुभव हमें किताबों से ही मिलते हैं। किताबें न लिखी गई होतीं, तो हम आज भी जंगली होते। अगर नहीं भी होते, तो आज जैसी स्थिति में नहीं होते। हमारे पुरखे आगे की पीढ़ी के सतत विकास के लिए अपने अनुभव लिखित रूप में हमारे लिए छोड़ गए हैं। इसी ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए कालेज खोले गए।
प्राननाथ, चिल्लर सर पकाते बहुत हैं। एडमीशन के लिए कई बार चक्कर लगा गए। उन्हें लगता है कि मैं उनके कालेज में एडमीशन ले लूँगी, तो छात्र संख्या बढ़ जाएगी। वे मेरे पास आते हैं और एक घंटा उपदेश झाड़ते हैं। सुनो उनके उपदेश।
प्राननाथ, हाथ में किताबें दाबे कालेज जाने में शरम तो बहुत लगेगी। लेकिन आगे बढ़ना है, तो इन चीजों को दरकिनार करना पड़ेगा। ‘पराए घर मट्ठा लेने जाव और बर्तन पीछे छिपाव’ तो तुम्हीं बताव ऐसा कहीं होता है।
मैं चाहती हूँ कि आप जल्दी मनीआर्डर भिजवा दो। एडमीशन में काहे देरी हो। जिस दिन रजिस्टर में नाम लिख जाएगा, उसी दिन से कालेज जाना शुरू कर दूँगी।
अपना खयाल रखना।
आपकी ही
रमकल्लो
लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित।
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001
आज रमकल्लो की सोलहवीं पाती पढ़कर लग रहा है कि जैसे उसका एक सपना पूरा हो गया हो। पाती में उसकी खुशियों की गागर छलके जा रही है। और क्यों न हो? मेधावी रमकल्लो ने हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की है। गाँव-गली हर जगह लोगों की जुबान पर उसका नाम है। गांव का नाम उसने रोशन कर दिया। इसे सोच कर उसे अपने पर गर्व हो रहा है। इस खुशी में उसने घर में पेड़े बना कर गांव भर में बांटे। जिन्हें उसपर विश्वास नहीं था अब वह उसकी काबिलियत की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
उसकी महत्वाकांक्षा का आकाश और विस्तृत हो रहा है। अब वह कॉलेज ज्वाइन करके आगे और भी पढ़ना चाहती है। पर कुछ जान पहचान के लोग ताना मारने से बाज नहीं आ रहे। वह गांव की अन्य औरतों से अलग-थलग सी है। वह उनकी तरह सारा दिन फिजूल की बातों में समय गुजारने में रुचि नहीं रखती। उसके ज्ञान की पिपासा बढ़ रही है। और पढ़ना तो अच्छी बात है ना। वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहती है। अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि वह लोगों के तानों व जलन की परवाह किये बिना आगे की शिक्षा जारी रखेगी। वह जानती है कि किताबों में कितना ज्ञान भरा होता है। उत्साह और साहस की प्रतिमूर्ति रमकल्लो को अब कोई नहीं रोक सकता। एक अलमस्त बयार की तरह वह अपने जीवन की दिशा खुद चुनती जा रही है। वह अपने जीवन के निर्णय लेने में इतनी सक्षम हो चुकी है कि अब वह अपने पति से पूछने की बजाय उसे अपना फैसला सुनाया करती है कि वह आगे क्या करना चाहती है या क्या करने जा रही है। वह एक नदिया की तरह है जो स्वछंद बहना चाहती है।
चिल्लर मास्साब के प्रोत्साहन ने उसे और हिम्मत दी। कॉलेज के अपने ड्रेस कोड होते हैं। उस हिचकिचाहट को भी वह पार कर लेगी। अब उसे बस कॉलेज की फीस की चिंता है। अगर प्राननाथ की इनायत हो जाये तो पूरी फीस वह इकट्ठी ही भर देगी। वरना अन्य छात्रों के सामने पेंडिंग फीस का जिक्र हो गया तो उसे झेंपना पड़ेगा। (रमकल्लो अब अंग्रेजी के तमाम शब्द पाती में इस्तेमाल करने लगी है) वह जब-तब अंग्रेजी के शब्दों को लेकर भी अपनी प्रतिभा दिखाने लगी है जिसे अंग्रेजी में कहते है: If you have got it, flaunt it.
वह खुशी से फूली नहीं समा रही है।
She is over the moon
Let’s hope she joins
The college soon.
आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, आपकी यह सारगर्भित प्रतिक्रिया पाती की स्वीकार्यता को बल प्रदान करती है। आपने उसके विकास क्रम *उसकी महत्वाकांक्षा का आकाश और विस्तृत हो रहा है* को अच्छे से व्यक्त कर दिया है। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी
आदरणीय लखनलाल पाल जी ,
आपकी मानस कन्या शालान्त परीक्षा उत्तीर्ण हुई इसलिए रमकल्लो के साथ आपको भी बधाई और शुभ कामनाएँ !
रमकल्लो की सफलता पर गाँव में औरतें जो चर्चा करती है उससे यह स्पष्ट होता है कि इसमें प्रशंसा तो है किन्तु साथ में हमें ईर्ष्या का भाव नजर आता है जिससे एक और बात स्पष्ट होती है कि औरत ही औरत की सबसे बडी शत्रु है।
रमकल्लो की पढाई की लगन निश्चित ही काबीले तारीफ है इसमें कोई संशय नहीं है। जब वह कॉलेज की दहलीज पर अपने कदम रखेगी तो क्या होगा यह जानने के लिए हम
मुन्तजिर हैं और इच्छूक भी कि आखिर रमकल्लो का नसीब और क्या करवटें लेगा?
ग्रामीण औरतों का यह चित्रण हमें सीमोन द बुआर की सेकंड सेक्स की एक पंक्ति की याद दिलाता है – ‘ औरत पैदा नहीं होती अपितु वह बनाई जाती है । ‘
हमारे सामने सवाल यह है कि रमकल्लो जैसी कितनी औरतें आज समाज में विद्यमान है जो रमकल्लो की तरह साहसी और निर्भिक एवं बहादूर है?
निःसंदेह आपकी पाती .भविष्य में पाती साहित्य में एक माइल स्टोन बनेगी इसके प्रति हम आश्वस्त हैं और हमारे मन में इसके प्रति कोई संशय नहीं है।
रमकल्लो की सफलता देखकर एक पुराना शे ‘ र याद आ रहा है ।
बकौल कैफी आजमी –
तेरे माथेपे ये आँचल बहुत खूब है लेकिन …..
तू इस आँचल का एक परचम बना लेती तो अच्छा था !!
रमकल्लो धोती पहनकर ही कॉलेज जाना चाहती है इसलिए यह शेर याद आया , अन्य कोई वजह इसके पीछे नहीं है।
पुनश्च आपको और रमकल्लो को बधाई ! आजकल काफी व्यस्त हूँ इसलिए देखने और लिखने में विलंब हुआ ।
प्रो. विजय महादेव गाडे
आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपकी पूरी समीक्षा में रमकल्लो स्वच्छंद विचरण करती है। वह नाममात्र को भी कहीं ओझल नहीं हो पाती है। समीक्षा की यह विशेषता आकर्षित कर रही है।
दरअसल रमकल्लो के कालेज भेजने का आइडिया मेरे गांव की एक लड़की से आया है। सन् 1985 के आसपास मेरे गांव की एक लड़की सबसे पहले गांव से छै किलोमीटर दूर कस्बे के कालेज में पढ़ने गई थी। इससे पहले न किसी लड़की ने साइकिल चलाई थी और न कालेज पढ़ने गई थी।
उसके कालेज जाने पर गांव के लोगों ने न जाने क्या-क्या कहा था। लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी। आज की स्थिति यह है कि गांव की हर लड़की साइकिल से कालेज जा रही हैं। इसका श्रेय मैं उसी लड़की को देता हूं।
मैं जब कभी गांव जाता हूं तो लोगों से पूछता हूं कि क्या आप लोगों को पता है कि सबसे पहले गांव की किस लड़की ने साइकिल चलाई थी? कौन लड़की सबसे पहले गांव से कस्बा पढ़ने गई थी। बहुत बड़े गांव के बहुत कम लोग इस बात को याद रख पाए हैं। वहां के छात्रों को मैं इसकी जानकारी जरूर देता हूं। बस इस कांसेप्ट को मैंने रमकल्लो से जोड़ दिया है।
आपने बहुत बढ़िया समीक्षा लिखी सर। इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर
रमकल्लो की पिछली पाती भी पढ़ ली थी पर लिख नहीं पाए थे। भतीजे की शादी करके खुश थी।
इस पाती को पढ़कर तो बहुत ही अधिक खुशी हुई। रमकल्लो पास जो हो गई वह भी प्रथम श्रेणी में। परंपराओं को तोड़कर अगर कोई आगे बढ़ता है तो उसकी प्रशंसा तो होनी ही चाहिये। पर जब परंपरा टूटती हैं तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं होती।जो लोग जीवन में रूढ़ि और परंपराओं के जंगलों को काटकर रास्ते बनाते हुए आगे बढ़ते हैं, मुश्किलों का सामना उन्हें ही करना पड़ता है फिर उनके बनाए हुए रास्तों पर अनेक लोग सहजता से चलने लगते हैं।
उसके पास होने से तो हम बहुत ज्यादा खुश हैं और उसको निश्चित रूप से आगे पढ़ना भी चाहिए।
हम रमकल्लो की खुशी को महसूस कर पा रहे हैं।
साड़ी पहन के जाना उसकी मर्यादा का प्रतीक है। कोई बुराई नहीं उसमें, लेकिन अगर यूनिफॉर्म स्कूल का नियम है तो वह तो उसे मनाना ही पड़ेगा।
प्राइवेट परीक्षा देना भी सार्थक है लेकिन अगर हम रेगुलर पढ़ने जाते हैं तो बहुत सारी अन्य चीजें भी सीखते हैं। यह एक लाभ नियमित विद्यार्थी को मिलता है।
गाँव के विचार एक ही लीक पर चलने के आदी होते हैं, और लीक से हटकर चलना सब की नजरों में दोष ही माना जाता है। विशेष तौर पर महिलाएँ हिम्मत नहीं कर पाती हैं।
लेकिन किसी को तो हिम्मत करनी ही थी।
रमकल्लो बहुत समझदार है। पढ़ कर वह और समझदार हो जाएगी। भाषा में भी निखार आएगा।
इस बेहतरीन पाती के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई!
वैसे रमकल्लो अब परिवार का सदस्य ही लगने लगी है।जब यह श्रृंखला बंद होगी तो एक लंबे समय तक उसकी याद आएगी।
प्रस्तुति के लिए नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आप जैसे समीक्षकों की टिप्पणियां पाकर रचना संवर जाती है। क्योंकि आप रमकल्लो के क्रियाकलापों को स्वीकृत देकर लेखक के विजन पर मोहर लगा देती हैं। उसका संघर्ष व्यक्तिगत न रहकर समूचे समाज की उस स्त्री का संघर्ष बन जाता है जो ऐसी रूढ़ियों को तोड़ती हुई आगे का रास्ता बनाती है।
आपने बढ़िया टिप्पणी लिखी है नीलिमा करैया जी। आपका बहुत-बहुत आभार
*रमकल्लो की सोलहवीं पाती* बड़े काम की है। रमकल्लो गाँव की बहू होते हुए *पढ़ें बेटियाँ-बढ़ें बेटियाँ* के उद्घोष को सार्थकता प्रदान कर रही है।
रमकल्लो भले ही हाईस्कूल की परीक्षा में पास हो गई है। मगर उसकी जिंदगी की असली परीक्षा तो तब शुरू होगी जब वह कालेज पढ़ने जाएगी।
कोई कुछ भी कहे, गाँवों में आज भी स्त्रियों की दशा पूरी तरह सुधरी नहीं है।
गाँवों में सरबत चाची व हिरबी जैसी पिछड़ी सोच की महिलाएं हैं जो स्त्री होते हुए भी स्त्रियों की प्रगतिवादी सोच के खिलाफ हैं। रमकल्लो को आगे पढ़ने के लिए पुरुषवर्चस्ववाद के कायदे कानूनों से गुजरने में संघर्ष करना होगा। उसे कदम-कदम पर अपने स्वत्व को प्रमाणित करने की परीक्षाएँ देनीं होंगी। कभी धैर्य, कभी सत्य व ईमान की, तो कभी साहस और स्वाभिमान की परीक्षाएँ उसे पग- पग पर देनीं होंगी। यही नहीं, उसे चरित्र की अग्नि- परीक्षाओं से भी गुजरना होगा।
हाईस्कूल की परीक्षा पास कर लेना तो सरल है लेकिन समाज की सोच को बदलना बहुत मुश्किल है। हर कदम फूँक- फूंक कर रखना पड़ेगा। रमकल्लो को कॉलेज जाने से लेकर, कॉलेज से वापस आने तक की जो उसकी यात्रा है वह बहुत दुर्गम होगी। उसे इस यात्रा के अगल-बगल खड़ी बुरी नजरों से घूरतीं आँखें के बीच से होकर गुजरना पड़ेगा।
लेकिन रमकल्लो जैसे किरदार इन कलुषित दुर्भावनाओं और दुश्वारियों से कभी डरते नहीं। वे जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। वह न बारिश में भीगते हैं, न तेज धूप में तपते हैं, न कठोर शीत में काँपते हैं। अदम्य होती हैं उनकी जिजीविषाएँ।
रमकल्लो अपनी खुद्दारियों से जिंदगी के नए दस्तावेज लिख रही। नित नए निरापद रास्ते बना रही है। इन्हीं रास्तों पर चलकर समाज का विकास होता है।
ऊर्ध्वगामी होता है।
कथाकार डॉ० लखनलाल पाल ने *रमकल्लो की पाती* में भाषा को अपनी सघन अनुभूतियों के लिवाश और संवेदनात्मक पैहरन से इतनी रोचक, आकर्षक और ग्राह्य बना दिया है कि वह बरबस अपनी ओर खींच ही लेती है।
आज कहानियों में भाषा प्रयोग को लेकर जिस तरह से बितंडावाद है, लेखन की जिस तरह की नव्य मान्यताएं तथा विमर्शीय अवधारणाएं प्रचलित हैं, उन सभी को ध्यान में रखकर यदि *रमकल्लो की पाती* के शिल्प, व्यंजना, कथासूत्रता, प्रभावोत्पादकता और संप्रेषणीयता जैसी तत्वों को पड़ताल करें तो ये तत्व पाती में बखूबी बोलते नजर आते हैं।
मुझे लगता है *रमकल्लो की पाती* का वैशिष्ट्य उसकी सहज प्रभावोत्पादकता है। जिसमें लोकभाषा के शब्दों का शहद भरा आस्वाद अपना प्रभाव छोडे बिना नहीं रहता।
*रमकल्लो* जैसे निचाट गाँव के प्रगतिशील चरित्र को उद्घाटित करने के लिए वरिष्ठ कथाकार डॉ० लखनलाल पाल को अनेक साधुवाद।
*
*रामशंकर भारती*
23 सितंबर 2025
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपकी इस समीक्षा में रमकल्लो के कृतित्व को जिस संजीदगी से उभारा है वह मधुर संगीत की तरह गूंज रहा है मेरे मन में।
रमकल्लो से आपका जुड़ाव स्पष्ट झलकता है। उसके लिए चिंता और भविष्य का भय इस बात की तस्दीक करता है।
शिल्प, व्यंजना, कथासूत्रता, प्रभावोत्पादकता, संप्रेषणीयता और संवेदना जैसे कथा तत्वों की बात कहकर रचना की बुनावट और कसावट को स्पष्ट कर दिया है।
भारती जी आपने इस समीक्षा में भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों समाहित करके रचना की स्वीकार्यता को एक पायदान और बढ़ा दिया हैं। बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी ।
बिटिया रमकल्लो,
बहुत-बहुत बधाई ,जुग जुग जियो बिटिया,खुश रहो,
तोहर परिच्छा फल के बारे में सुनके तो हमार करेजा जुड़ाइ गै। गांव भरे कै औरत,- लुगाई लोग बहुत खुश हुइ गै हैं, अरे काहे न खुस होइहै ! कोनो मेहरारू आगे बढ़ै ,नाम करै तौ अइसन लागत है कि हम ही ई कारनामा कीन्ह हैं!हम औरत लोगन का करेजा बहुत बड़ा होता है।
औ तुम तौ बिटिया बड़ी हुसियार हौ, आगे की पढ़ाई केर खर्चा- बर्चा कै कुलि इन्तज़ाम कै लीन्हे हौ ,!, साबास बेटी, खूब तरक्की करौ।
हमकां तो तोहार खुशी यही से मालूम पड़त है कि यह बेर तूं अपने प्राननाथ कां घरे आवैका नाहीं लिख्यु, बस मनीआडर भेजै की बात किन्हे हौ ।
पढ़ाई लिखाई कै बाति तौ बहुत नीक है बेटी, लेकिन दुनिया जहान कै औरो बात भी मन मां याद राखे रह्यो रमकल्लो। पढ़ाई के जोस मां होस न गंवायौ , दुनिया बड़ी बिकट है बिटिया। हम बहुत दुनिया देखे हैं ।बात बनत देर से है ,मुल बिगड़त देर नाहीं लागति।फूंकि -फूंकि के एक -एक कदम बढ़ायौ।
हमारा आसिरबाद हमेसा तोहरे साथे है।
ईसर से हम रोज इहै मनाइत है कि तूं दूनों परानी जल्दी से जल्दी साथे रहै लागौ।
आजकल तो बढ़ियां खेती करै बदे सरकारौ बहुत मदत देत है। प्राननाथ से कहौ कि अपने थाने-पवाने, खेते- घरे आइके आर्गेनिक खेती करैं,और दुसरे के भी सिखावैं। एसे धन भी मिलिहै और नांव भी कमइहैं।
ह्वइ सकत है कौनो सरकारी इनामौ मिलि जाए।
अच्छा बिटिया अब बस करबै, ढेर उपदेस न देवै चाही।
खुस रहौ।
आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी ,हर बार की तरह इस पाती में भी आपका भावुक रूप अंदर तक भिगो गया। रमकल्लो से आपका आत्मीय जुड़ाव भावविभोर कर देता है।
दिल को छू लेने वाली इस टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सरोजिनी जी
बा बा भौतिइ नोनी बात भई , साबास रमकालिया , फस्ट नंबर पास हो गई ते, भोत भोत बढ़वाई तुमाई
मगर जो बात पूरी पक्की है कि तुम लाख कछु पढ़ जाओ , रे हो तुम पूरी बुंदेलखंडी,
तुमआव हिंदी सिखबू भोतई जरूरी है,चिट्ठी में अबे तक नोटन को
लोट लिख राई,ओर नंबर्न खो लंबर लिख राई
और जैसे बड़ी बात तो जा हे कि तेने अपनी चिट्ठी में
*हओ* शब्द लिखो, अ री तेरी जा हओ से तो पूरी दुनिया टू बुंदेलखंडी कोसार्टिफिकेट दे दे
काय से मिट बुंदेलखंडीयाई बस हओ बोलत हैं
ओर केसों हेगो जो लांस को कड़ों, घरे अबे की काय का
चिट्ठी को जवाब तक तो दे नई राव
सांसी कऊ तो मोई भोत गुस्सा सी चढ़ राई
चलो छोड़ो,खसम तो खसमई होत
तुम तो आगे की सोचो ,शिक्षित होवो शेरनी को दूध पीवो के समान है ,ओर सो आदमी होतो तो दौड़ के घरे आऊतो
जो है तो हे ,कछु फिकर न करीयो
एक दिना सबरे गांव के लोग तुमई को पूज हैं
ओर फिर बे गांव के लखन लाला सो तो पुरों साथ दे राय
तुमआव,कछु परेशानी होय तो उन्हाई खो बता दियो
प्राणनाथ उये लोट छाप राय तुम अपनी पढ़ाई में मन लगाए रखियो,परिपंचयत से शिक्षा अच्छी
कबहुं तो आ हे प्राणनाथ
वैसे अच्छों आदमी तो है, टेम से पाईसा टका पौचा राव
चलो हमुहू को नींद आ राई, तनक हमाई तबियत सुन्दा ठीक नई या,कमर , घूटै सब पिरा राय ,दबाई भी खा राय , कछु फायदों नई दिखा राव
चलो परत हैं ,राम राम अपना धियान रखियो
आदरणीया कुंती हरिराम झांसी जी, आपकी टिप्पणी बुंदेली बोली बानी में रची पगी बहुतई नोंनी लगी। रमकल्लो के काजै आपने खूबई बढ़िया लिखो और ओखी तरफदारी करी। ओखे करेजे के दुख खें महसूसयऊ करो। साथ में ओखे धीरज औ साहस की बड़वाई करी।
रमकल्लो तो समझन लगी है कि लोट खें नोट कहो जात है पै ओखौ प्राननाथ नईं समझ पाउत, ईसें वा ये सब चीजें जानबूझ खें लिखत। ‘हओ’ की तो ऐसी है कि बुंदेलखंडी चाहे जितनौ पढ़-लिख जाए पै हओ नईं छूटत। काएसें कि ये पेटेंट शब्द तो ऊखे चरुआ के पानी में मिला दओ जात। वही सब मां से संतान में आ जात।
आपने बढ़िया टिप्पणी लिखी। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार
सपनों का छोर नहीं होता
बिना बात शोर नहीं होता।
आज रमकल्लो की सोलहवीं पाती पढ़कर लग रहा है कि जैसे उसका एक सपना पूरा हो गया हो। पाती में उसकी खुशियों की गागर छलके जा रही है। और क्यों न हो? मेधावी रमकल्लो ने हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की है। गाँव-गली हर जगह लोगों की जुबान पर उसका नाम है। गांव का नाम उसने रोशन कर दिया। इसे सोच कर उसे अपने पर गर्व हो रहा है। इस खुशी में उसने घर में पेड़े बना कर गांव भर में बांटे। जिन्हें उसपर विश्वास नहीं था अब वह उसकी काबिलियत की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
उसकी महत्वाकांक्षा का आकाश और विस्तृत हो रहा है। अब वह कॉलेज ज्वाइन करके आगे और भी पढ़ना चाहती है। पर कुछ जान पहचान के लोग ताना मारने से बाज नहीं आ रहे। वह गांव की अन्य औरतों से अलग-थलग सी है। वह उनकी तरह सारा दिन फिजूल की बातों में समय गुजारने में रुचि नहीं रखती। उसके ज्ञान की पिपासा बढ़ रही है। और पढ़ना तो अच्छी बात है ना। वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहती है। अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि वह लोगों के तानों व जलन की परवाह किये बिना आगे की शिक्षा जारी रखेगी। वह जानती है कि किताबों में कितना ज्ञान भरा होता है। उत्साह और साहस की प्रतिमूर्ति रमकल्लो को अब कोई नहीं रोक सकता। एक अलमस्त बयार की तरह वह अपने जीवन की दिशा खुद चुनती जा रही है। वह अपने जीवन के निर्णय लेने में इतनी सक्षम हो चुकी है कि अब वह अपने पति से पूछने की बजाय उसे अपना फैसला सुनाया करती है कि वह आगे क्या करना चाहती है या क्या करने जा रही है। वह एक नदिया की तरह है जो स्वछंद बहना चाहती है।
चिल्लर मास्साब के प्रोत्साहन ने उसे और हिम्मत दी। कॉलेज के अपने ड्रेस कोड होते हैं। उस हिचकिचाहट को भी वह पार कर लेगी। अब उसे बस कॉलेज की फीस की चिंता है। अगर प्राननाथ की इनायत हो जाये तो पूरी फीस वह इकट्ठी ही भर देगी। वरना अन्य छात्रों के सामने पेंडिंग फीस का जिक्र हो गया तो उसे झेंपना पड़ेगा। (रमकल्लो अब अंग्रेजी के तमाम शब्द पाती में इस्तेमाल करने लगी है) वह जब-तब अंग्रेजी के शब्दों को लेकर भी अपनी प्रतिभा दिखाने लगी है जिसे अंग्रेजी में कहते है: If you have got it, flaunt it.
वह खुशी से फूली नहीं समा रही है।
She is over the moon
Let’s hope she joins
The college soon.
आल द बेस्ट डियर रमकल्लो
-शन्नो अग्रवाल
आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, आपकी यह सारगर्भित प्रतिक्रिया पाती की स्वीकार्यता को बल प्रदान करती है। आपने उसके विकास क्रम *उसकी महत्वाकांक्षा का आकाश और विस्तृत हो रहा है* को अच्छे से व्यक्त कर दिया है। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी
आदरणीय लखनलाल पाल जी ,
आपकी मानस कन्या शालान्त परीक्षा उत्तीर्ण हुई इसलिए रमकल्लो के साथ आपको भी बधाई और शुभ कामनाएँ !
रमकल्लो की सफलता पर गाँव में औरतें जो चर्चा करती है उससे यह स्पष्ट होता है कि इसमें प्रशंसा तो है किन्तु साथ में हमें ईर्ष्या का भाव नजर आता है जिससे एक और बात स्पष्ट होती है कि औरत ही औरत की सबसे बडी शत्रु है।
रमकल्लो की पढाई की लगन निश्चित ही काबीले तारीफ है इसमें कोई संशय नहीं है। जब वह कॉलेज की दहलीज पर अपने कदम रखेगी तो क्या होगा यह जानने के लिए हम
मुन्तजिर हैं और इच्छूक भी कि आखिर रमकल्लो का नसीब और क्या करवटें लेगा?
ग्रामीण औरतों का यह चित्रण हमें सीमोन द बुआर की सेकंड सेक्स की एक पंक्ति की याद दिलाता है – ‘ औरत पैदा नहीं होती अपितु वह बनाई जाती है । ‘
हमारे सामने सवाल यह है कि रमकल्लो जैसी कितनी औरतें आज समाज में विद्यमान है जो रमकल्लो की तरह साहसी और निर्भिक एवं बहादूर है?
निःसंदेह आपकी पाती .भविष्य में पाती साहित्य में एक माइल स्टोन बनेगी इसके प्रति हम आश्वस्त हैं और हमारे मन में इसके प्रति कोई संशय नहीं है।
रमकल्लो की सफलता देखकर एक पुराना शे ‘ र याद आ रहा है ।
बकौल कैफी आजमी –
तेरे माथेपे ये आँचल बहुत खूब है लेकिन …..
तू इस आँचल का एक परचम बना लेती तो अच्छा था !!
रमकल्लो धोती पहनकर ही कॉलेज जाना चाहती है इसलिए यह शेर याद आया , अन्य कोई वजह इसके पीछे नहीं है।
पुनश्च आपको और रमकल्लो को बधाई ! आजकल काफी व्यस्त हूँ इसलिए देखने और लिखने में विलंब हुआ ।
प्रो. विजय महादेव गाडे
आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपकी पूरी समीक्षा में रमकल्लो स्वच्छंद विचरण करती है। वह नाममात्र को भी कहीं ओझल नहीं हो पाती है। समीक्षा की यह विशेषता आकर्षित कर रही है।
दरअसल रमकल्लो के कालेज भेजने का आइडिया मेरे गांव की एक लड़की से आया है। सन् 1985 के आसपास मेरे गांव की एक लड़की सबसे पहले गांव से छै किलोमीटर दूर कस्बे के कालेज में पढ़ने गई थी। इससे पहले न किसी लड़की ने साइकिल चलाई थी और न कालेज पढ़ने गई थी।
उसके कालेज जाने पर गांव के लोगों ने न जाने क्या-क्या कहा था। लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी। आज की स्थिति यह है कि गांव की हर लड़की साइकिल से कालेज जा रही हैं। इसका श्रेय मैं उसी लड़की को देता हूं।
मैं जब कभी गांव जाता हूं तो लोगों से पूछता हूं कि क्या आप लोगों को पता है कि सबसे पहले गांव की किस लड़की ने साइकिल चलाई थी? कौन लड़की सबसे पहले गांव से कस्बा पढ़ने गई थी। बहुत बड़े गांव के बहुत कम लोग इस बात को याद रख पाए हैं। वहां के छात्रों को मैं इसकी जानकारी जरूर देता हूं। बस इस कांसेप्ट को मैंने रमकल्लो से जोड़ दिया है।
आपने बहुत बढ़िया समीक्षा लिखी सर। इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर
आदरणीय सर जी!
रमकल्लो की पिछली पाती भी पढ़ ली थी पर लिख नहीं पाए थे। भतीजे की शादी करके खुश थी।
इस पाती को पढ़कर तो बहुत ही अधिक खुशी हुई। रमकल्लो पास जो हो गई वह भी प्रथम श्रेणी में। परंपराओं को तोड़कर अगर कोई आगे बढ़ता है तो उसकी प्रशंसा तो होनी ही चाहिये। पर जब परंपरा टूटती हैं तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं होती।जो लोग जीवन में रूढ़ि और परंपराओं के जंगलों को काटकर रास्ते बनाते हुए आगे बढ़ते हैं, मुश्किलों का सामना उन्हें ही करना पड़ता है फिर उनके बनाए हुए रास्तों पर अनेक लोग सहजता से चलने लगते हैं।
उसके पास होने से तो हम बहुत ज्यादा खुश हैं और उसको निश्चित रूप से आगे पढ़ना भी चाहिए।
हम रमकल्लो की खुशी को महसूस कर पा रहे हैं।
साड़ी पहन के जाना उसकी मर्यादा का प्रतीक है। कोई बुराई नहीं उसमें, लेकिन अगर यूनिफॉर्म स्कूल का नियम है तो वह तो उसे मनाना ही पड़ेगा।
प्राइवेट परीक्षा देना भी सार्थक है लेकिन अगर हम रेगुलर पढ़ने जाते हैं तो बहुत सारी अन्य चीजें भी सीखते हैं। यह एक लाभ नियमित विद्यार्थी को मिलता है।
गाँव के विचार एक ही लीक पर चलने के आदी होते हैं, और लीक से हटकर चलना सब की नजरों में दोष ही माना जाता है। विशेष तौर पर महिलाएँ हिम्मत नहीं कर पाती हैं।
लेकिन किसी को तो हिम्मत करनी ही थी।
रमकल्लो बहुत समझदार है। पढ़ कर वह और समझदार हो जाएगी। भाषा में भी निखार आएगा।
इस बेहतरीन पाती के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई!
वैसे रमकल्लो अब परिवार का सदस्य ही लगने लगी है।जब यह श्रृंखला बंद होगी तो एक लंबे समय तक उसकी याद आएगी।
प्रस्तुति के लिए नीलिमा शर्मा जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आप जैसे समीक्षकों की टिप्पणियां पाकर रचना संवर जाती है। क्योंकि आप रमकल्लो के क्रियाकलापों को स्वीकृत देकर लेखक के विजन पर मोहर लगा देती हैं। उसका संघर्ष व्यक्तिगत न रहकर समूचे समाज की उस स्त्री का संघर्ष बन जाता है जो ऐसी रूढ़ियों को तोड़ती हुई आगे का रास्ता बनाती है।
आपने बढ़िया टिप्पणी लिखी है नीलिमा करैया जी। आपका बहुत-बहुत आभार
*आसान नहीं है रमकल्लो की डगर*
*रमकल्लो की सोलहवीं पाती* बड़े काम की है। रमकल्लो गाँव की बहू होते हुए *पढ़ें बेटियाँ-बढ़ें बेटियाँ* के उद्घोष को सार्थकता प्रदान कर रही है।
रमकल्लो भले ही हाईस्कूल की परीक्षा में पास हो गई है। मगर उसकी जिंदगी की असली परीक्षा तो तब शुरू होगी जब वह कालेज पढ़ने जाएगी।
कोई कुछ भी कहे, गाँवों में आज भी स्त्रियों की दशा पूरी तरह सुधरी नहीं है।
गाँवों में सरबत चाची व हिरबी जैसी पिछड़ी सोच की महिलाएं हैं जो स्त्री होते हुए भी स्त्रियों की प्रगतिवादी सोच के खिलाफ हैं। रमकल्लो को आगे पढ़ने के लिए पुरुषवर्चस्ववाद के कायदे कानूनों से गुजरने में संघर्ष करना होगा। उसे कदम-कदम पर अपने स्वत्व को प्रमाणित करने की परीक्षाएँ देनीं होंगी। कभी धैर्य, कभी सत्य व ईमान की, तो कभी साहस और स्वाभिमान की परीक्षाएँ उसे पग- पग पर देनीं होंगी। यही नहीं, उसे चरित्र की अग्नि- परीक्षाओं से भी गुजरना होगा।
हाईस्कूल की परीक्षा पास कर लेना तो सरल है लेकिन समाज की सोच को बदलना बहुत मुश्किल है। हर कदम फूँक- फूंक कर रखना पड़ेगा। रमकल्लो को कॉलेज जाने से लेकर, कॉलेज से वापस आने तक की जो उसकी यात्रा है वह बहुत दुर्गम होगी। उसे इस यात्रा के अगल-बगल खड़ी बुरी नजरों से घूरतीं आँखें के बीच से होकर गुजरना पड़ेगा।
लेकिन रमकल्लो जैसे किरदार इन कलुषित दुर्भावनाओं और दुश्वारियों से कभी डरते नहीं। वे जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। वह न बारिश में भीगते हैं, न तेज धूप में तपते हैं, न कठोर शीत में काँपते हैं। अदम्य होती हैं उनकी जिजीविषाएँ।
रमकल्लो अपनी खुद्दारियों से जिंदगी के नए दस्तावेज लिख रही। नित नए निरापद रास्ते बना रही है। इन्हीं रास्तों पर चलकर समाज का विकास होता है।
ऊर्ध्वगामी होता है।
कथाकार डॉ० लखनलाल पाल ने *रमकल्लो की पाती* में भाषा को अपनी सघन अनुभूतियों के लिवाश और संवेदनात्मक पैहरन से इतनी रोचक, आकर्षक और ग्राह्य बना दिया है कि वह बरबस अपनी ओर खींच ही लेती है।
आज कहानियों में भाषा प्रयोग को लेकर जिस तरह से बितंडावाद है, लेखन की जिस तरह की नव्य मान्यताएं तथा विमर्शीय अवधारणाएं प्रचलित हैं, उन सभी को ध्यान में रखकर यदि *रमकल्लो की पाती* के शिल्प, व्यंजना, कथासूत्रता, प्रभावोत्पादकता और संप्रेषणीयता जैसी तत्वों को पड़ताल करें तो ये तत्व पाती में बखूबी बोलते नजर आते हैं।
मुझे लगता है *रमकल्लो की पाती* का वैशिष्ट्य उसकी सहज प्रभावोत्पादकता है। जिसमें लोकभाषा के शब्दों का शहद भरा आस्वाद अपना प्रभाव छोडे बिना नहीं रहता।
*रमकल्लो* जैसे निचाट गाँव के प्रगतिशील चरित्र को उद्घाटित करने के लिए वरिष्ठ कथाकार डॉ० लखनलाल पाल को अनेक साधुवाद।
*
*रामशंकर भारती*
23 सितंबर 2025
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपकी इस समीक्षा में रमकल्लो के कृतित्व को जिस संजीदगी से उभारा है वह मधुर संगीत की तरह गूंज रहा है मेरे मन में।
रमकल्लो से आपका जुड़ाव स्पष्ट झलकता है। उसके लिए चिंता और भविष्य का भय इस बात की तस्दीक करता है।
शिल्प, व्यंजना, कथासूत्रता, प्रभावोत्पादकता, संप्रेषणीयता और संवेदना जैसे कथा तत्वों की बात कहकर रचना की बुनावट और कसावट को स्पष्ट कर दिया है।
भारती जी आपने इस समीक्षा में भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों समाहित करके रचना की स्वीकार्यता को एक पायदान और बढ़ा दिया हैं। बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी ।
बिटिया रमकल्लो,
बहुत-बहुत बधाई ,जुग जुग जियो बिटिया,खुश रहो,
तोहर परिच्छा फल के बारे में सुनके तो हमार करेजा जुड़ाइ गै। गांव भरे कै औरत,- लुगाई लोग बहुत खुश हुइ गै हैं, अरे काहे न खुस होइहै ! कोनो मेहरारू आगे बढ़ै ,नाम करै तौ अइसन लागत है कि हम ही ई कारनामा कीन्ह हैं!हम औरत लोगन का करेजा बहुत बड़ा होता है।
औ तुम तौ बिटिया बड़ी हुसियार हौ, आगे की पढ़ाई केर खर्चा- बर्चा कै कुलि इन्तज़ाम कै लीन्हे हौ ,!, साबास बेटी, खूब तरक्की करौ।
हमकां तो तोहार खुशी यही से मालूम पड़त है कि यह बेर तूं अपने प्राननाथ कां घरे आवैका नाहीं लिख्यु, बस मनीआडर भेजै की बात किन्हे हौ ।
पढ़ाई लिखाई कै बाति तौ बहुत नीक है बेटी, लेकिन दुनिया जहान कै औरो बात भी मन मां याद राखे रह्यो रमकल्लो। पढ़ाई के जोस मां होस न गंवायौ , दुनिया बड़ी बिकट है बिटिया। हम बहुत दुनिया देखे हैं ।बात बनत देर से है ,मुल बिगड़त देर नाहीं लागति।फूंकि -फूंकि के एक -एक कदम बढ़ायौ।
हमारा आसिरबाद हमेसा तोहरे साथे है।
ईसर से हम रोज इहै मनाइत है कि तूं दूनों परानी जल्दी से जल्दी साथे रहै लागौ।
आजकल तो बढ़ियां खेती करै बदे सरकारौ बहुत मदत देत है। प्राननाथ से कहौ कि अपने थाने-पवाने, खेते- घरे आइके आर्गेनिक खेती करैं,और दुसरे के भी सिखावैं। एसे धन भी मिलिहै और नांव भी कमइहैं।
ह्वइ सकत है कौनो सरकारी इनामौ मिलि जाए।
अच्छा बिटिया अब बस करबै, ढेर उपदेस न देवै चाही।
खुस रहौ।
तोहार
बड़की
सरोजिनी पाण्डेय
आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी ,हर बार की तरह इस पाती में भी आपका भावुक रूप अंदर तक भिगो गया। रमकल्लो से आपका आत्मीय जुड़ाव भावविभोर कर देता है।
दिल को छू लेने वाली इस टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सरोजिनी जी
बा बा भौतिइ नोनी बात भई , साबास रमकालिया , फस्ट नंबर पास हो गई ते, भोत भोत बढ़वाई तुमाई
मगर जो बात पूरी पक्की है कि तुम लाख कछु पढ़ जाओ , रे हो तुम पूरी बुंदेलखंडी,
तुमआव हिंदी सिखबू भोतई जरूरी है,चिट्ठी में अबे तक नोटन को
लोट लिख राई,ओर नंबर्न खो लंबर लिख राई
और जैसे बड़ी बात तो जा हे कि तेने अपनी चिट्ठी में
*हओ* शब्द लिखो, अ री तेरी जा हओ से तो पूरी दुनिया टू बुंदेलखंडी कोसार्टिफिकेट दे दे
काय से मिट बुंदेलखंडीयाई बस हओ बोलत हैं
ओर केसों हेगो जो लांस को कड़ों, घरे अबे की काय का
चिट्ठी को जवाब तक तो दे नई राव
सांसी कऊ तो मोई भोत गुस्सा सी चढ़ राई
चलो छोड़ो,खसम तो खसमई होत
तुम तो आगे की सोचो ,शिक्षित होवो शेरनी को दूध पीवो के समान है ,ओर सो आदमी होतो तो दौड़ के घरे आऊतो
जो है तो हे ,कछु फिकर न करीयो
एक दिना सबरे गांव के लोग तुमई को पूज हैं
ओर फिर बे गांव के लखन लाला सो तो पुरों साथ दे राय
तुमआव,कछु परेशानी होय तो उन्हाई खो बता दियो
प्राणनाथ उये लोट छाप राय तुम अपनी पढ़ाई में मन लगाए रखियो,परिपंचयत से शिक्षा अच्छी
कबहुं तो आ हे प्राणनाथ
वैसे अच्छों आदमी तो है, टेम से पाईसा टका पौचा राव
चलो हमुहू को नींद आ राई, तनक हमाई तबियत सुन्दा ठीक नई या,कमर , घूटै सब पिरा राय ,दबाई भी खा राय , कछु फायदों नई दिखा राव
चलो परत हैं ,राम राम अपना धियान रखियो
आदरणीया कुंती हरिराम झांसी जी, आपकी टिप्पणी बुंदेली बोली बानी में रची पगी बहुतई नोंनी लगी। रमकल्लो के काजै आपने खूबई बढ़िया लिखो और ओखी तरफदारी करी। ओखे करेजे के दुख खें महसूसयऊ करो। साथ में ओखे धीरज औ साहस की बड़वाई करी।
रमकल्लो तो समझन लगी है कि लोट खें नोट कहो जात है पै ओखौ प्राननाथ नईं समझ पाउत, ईसें वा ये सब चीजें जानबूझ खें लिखत। ‘हओ’ की तो ऐसी है कि बुंदेलखंडी चाहे जितनौ पढ़-लिख जाए पै हओ नईं छूटत। काएसें कि ये पेटेंट शब्द तो ऊखे चरुआ के पानी में मिला दओ जात। वही सब मां से संतान में आ जात।
आपने बढ़िया टिप्पणी लिखी। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार