Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : आखर-आखर प्रेम का (भाग – 12)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
गाँव में एक-दूसरे तरह की बयार बहने लगी है। पता नहीं यहाँ क्या हो गया है कि हर दो महीने में एक प्रेम कहानी गाँव के मादा सीने पर अंकित हो जाती है। प्यार की बड़ी विचित्र लीला है। यह मच्छर की तरह अपना रूप बदलने लगा है। एक रोग की दवा तैयार होती है, तब तक दूसरी बीमारी युगलों के दिलों में प्रवेश कर जाती है। कोई नहीं जानता है कि दिलों की सेंधमारी कहाँ से शुरू होती है। इसका कार्य-कारण सम्बन्ध जो भी हो पर जवान बेटी का बाप इन घटनाओं से सहम जाता है। वे ‘काल्ह हमारी बार’ वाले अदृश्य भय से सिहर उठते हैं।
कल उसकी बेटी (चिठिया में उसका नाम लिखना ठीक नहीं) एक लड़के के साथ भाग गई। इस वर्ष की भागने वाली यह तीसरी लड़की है। अब न तो जाति बाहुल्य वालों का खून उबाल मारता है, न यह भाव जागता है कि बिना इज्जत के जीवन किस काम का? इज्जत का विचलन और जीवन ढर्रा समानान्तर चल रहा है।
औरतें कहती हैं कि गाँव को सुनैना का सराप लग गया है। वही भूत बनकर युवा दिलों पर सवार हो जाती है और घटनाओं को अंजाम दे देती है। आदमी कुछ नहीं कर पाता है। आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध गाँव, आज मुँह में कालिख पोते उदास है। अब इज्जत भी गाँव, मुहल्ले से घटकर व्यक्ति पर केन्द्रित हो गई है।
औरतें बार-बार सुनैना का नाम ले रही थीं। मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। फिर मैंने सरबत चाची से पूछा, तब कहानी समझ में आई। अपने परधान जी हैं न, इन्हीं की छोटी बहन का नाम सुनैना था। परधान जी के पिता लालाराम का उस समय बड़ा रुतवा था। निम्न जाति के लोगों की हिम्मत नहीं थी कि उनके दरवाजे से जूता पहनकर निकल जाएं। गाँव का कोई आदमी उनसे नजर मिलाकर बात नहीं करता था।
प्राननाथ बीच गाँव में जो खंडहरनुमा हवेली है, वह इन्हीं (लालाराम) की थी। उसी हवेली में पली-बढ़ी थी सुनैना। रमना उनका पुराना नौकर था। रमना का बेटा बल्लू उनकी भैंसें चराता था। बचपन से ही बल्लू हवेली की हर कच्ची-पक्की ईंट से परिचित था। भैंसें चराने के साथ वह घर के अन्य काम भी करता था। कभी-कभी सुनैना उत्सुकतावश उसके काम में हाथ बँटा देती थी। खासकर भैंस की दुहनी वह जरूर कराती थी। मेल-मिलाप में पता ही नहीं चला कि कब उनके दिलों में प्यार का अंकुर फूट पड़ा। एक-दूसरे को देखे बिना उन्हें चैन न मिलता था।
मुहल्ला की एक शादी में नौटंकी आई थी। नौटंकी का चलन लगभग खतम-सा हो गया था लेकिन डबरा की तीन रंडियों ने नौटंकी को खास बना दिया था। युवा, जवान, वृद्ध सभी नौटंकी देखने उमड़ पड़े। युवा पूरी रात रंडियों के ठुमकों में थिरकते रहे। रंडियाँ भी कशिश जवानी के गीत गा-गाकर मर्दों को फिकरेबाजी को उकसाती रहीं।
बल्लू और सुनैना की प्रेमकथा परवान चढ़ गई। कहाँ सुनैना का परिवार और कहाँ वह नौकर का लड़का। न तो सामाजिक स्तर पर उनका कोई मेल था और न आर्थिक स्तर पर। पता नहीं, प्रेमी युगल इसी विषमता पर क्यों ज्यादा प्रहार करते हैं। प्रेम की जड़ें विजातीय ऊँच-नीच की जमीन पर मजबूती से पनपती हैं। युगल अलग दुनिया बसाने के लिए रात में ही भाग गए।
सवेरे गाँव में हड़कम्प मच गया। प्रेमी जोड़ा गाँव वालों के केन्द्र में आ गया था। जो उन्हें जानते थे, वे उनके आचार-विचारों पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे।
प्राननाथ, मैंने तो उन्हें नहीं देखा था। तब तो मेरा जन्म भी नहीं हुआ होगा। सरबत चाची बता रही थी कि लड़की बहुत सुन्दर थी पर कभी लगा नहीं कि ऐसा कांड रच सकती है। किसी से ज्यादा बोलती भी नहीं थी।
चाची की बात सुनकर हरबी जिज्जी हँस पड़ी, “बाहर घुंघटिया पोले पाँव…। जमीन पर धीरे से पैर रखने वाली और घूँघट काढ़कर चलने वाली स्त्री कब कटार भौंक दे, किसी को पता नहीं चलता है। उसके घातक प्रहार से कोई नहीं बच सकता।
हरबी जिज्जी किसी को नहीं छोड़ती है। उस नादान की वह बड़ी बेदर्दी से आलोचना कर रही थी। जैसे दुनिया का सबसे बड़ा पाप उसी ने किया हो। किशोरवय का उन्माद था, सही दिशा दिखा दी होती, तो शायद ऐसा न होता। उन्होंने किसी को हवा न लगने दी। अलग दुनिया बसाने का निर्णय कब ले लिया, कोई न जान सका। परिणाम की परवाह उन्होंने न की थी।
चाची ने बताया कि लड़की काफी समय से दिखाई न दी, तो उसकी माँ परेशान हो गई। यद्यपि वह सुरक्षित जोन में थी क्योंकि नौटंकी देख रही औरतें छत पर बैठी थीं। नौटंकी में अश्लीलता की संभावना थी, इसलिए महिला समाज को यहीं बैठा दिया गया था। गाँव वालों ने प्रयास किया था कि नौटंकी ठीक-ठाक हो, ज्यादा बेहूदगी न
बरती जाए।
माँ पहले सोचती थी कि बेटी पेशाब के लिए गई होगी, आ जाएगी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी बेचैनी बढ़ती गई। माँ अपने स्तर से उसे ढूँढ़ती रही। अन्त में थक-हारकर पति को सारी बात बता दी। परधान जी के पिता ने अपने आदमी दौड़ा दिए। बात दबाए रखने के लिए उन्होंने ज्यादा हो-हल्ला नहीं किया।
लड़के की तलाश हुई। वह भी गायब था। इसी से वे समझ गए कि हवेली के कंगूरे दागी हो गए। उनके आदमियों ने गाँव से बाहर जाने वाले हर रास्ते की नाकाबन्दी कर दी।
जमींदारी चली गई पर रुतवा में फर्क न आया था। बड़ी जाति की लड़की को निम्न जाति का लड़का भगा ले जाए, हवेली के लिए डूब मरने वाली बात थी। उन्होंने निम्न वर्ग की स्त्रियों को भोगा था, यह उनका अधिकार था। इससे सामाजिक व्यवस्था पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था लेकिन सदियों से चली आई परम्परा को आज इस युवा वर्ग ने पलट दिया था।
ये लोग उत्तेजित हो उठे। उन युगलों को ढूँढ़ने के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया पर वे किसी के हाथ न आए। असफलता से खीझे लोगों ने लड़के के माता-पिता को उठा लिया। बेटा किस बिल में छुपा बैठा है, इन्हें मालूम होगा। उन पर यातनाओं का दौर शुरू हो गया। रूह कंपा देने वाली क्रूरता के साथ उन पर लात-घूंसे और डंडे बरसाए गए। पिता को नहीं मालूम था कि लड़का कहाँ है। बुरी तरह से घबराए हुए बेइज्जत लोगों ने पिता के हाथ-पैरों में कीलें ठोंक दीं।
दामन में लगे दागों को धोने के लिए लड़के की माँ का सामूहिक बलात्कार शुरू हो गया। प्राननाथ, मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना ने गाँव की छाती पर एक गहरी लकीर खींच दी थी, जो सदियों बाद भी समय के बदनुमा भाल पर अंकित मिलेगी।
शर्म की बात तो यह थी कि किसी मुंस के बेटे ने इसका विरोध न किया। रिश्तेदारों ने हिम्मत जुटाकर पुलिस से शिकायत की थी पर अत्याचारियों का रसूख ऊपर तक था। पुलिस वाले भी बाल-बच्चों वाले थे। इस अक्षम्य घटना के विरोध में कैसे जा सकते थे। सबको सुनैना में अपनी बेटी दिखने लगी थी और म्लेच्छ के रूप में बल्लू।
अत्याचारियों ने अपनी तरफ से चाक-चौबन्द व्यवस्था कर ली थी। पुलिस गाँव की तरफ हेरी तक न। अधिकारी, नेता उन्हीं के रिश्तेदार थे। लड़की को ढूँढ़ना उनकी जिम्मेदारी बन चुकी थी। पीड़ित के रिश्तेदारों को विश्वास हो गया था कि क्रूरता के विरुद्ध आवाज उठाने पर उनकी भी जान जा सकती है।
रिश्तेदार, रिश्तेदार होते हैं। उन्हें पीड़ा थी, आक्रोश था पर असहाय थे। अपनी जान जोखिम में डालकर वे रिस्क नहीं लेना चाहते थे।
एक दिन नहीं, लगातार तीन दिनों तक उस माँ के साथ सामूहिक बलात्कार होता 
रहा। बलात्कार करने वाले सारे दबंग युवा थे। शरीर के सहन करने की भी सीमा होती है, असहनीय वेदना से बचने के लिए एक ही विकल्प था मौत। शराब के नशे में बलात्कारियों से चूक हो गई। बस उसके लिए इतना समय काफी था। वह औरत रस्सी का फंदा बनाकर झूल गयी।
हैवानों की हैवानियत से ऊबकर मनुष्य ईश्वर का सहारा लेता है लेकिन जब वहाँ से भी आस टूट जाती है, तब मनुष्य के सामने दो विकल्प खुलते हैं। पहला विकल्प मृत्यु का और दूसरा स्वयं को न्याय दिलाने का। पहला विकल्प आसान है जबकि दूसरा विकल्प कठिन। इसमें अपनी पीड़ा, वेदना एवं क्रोध को बच्चे की तरह दुलारना पड़ता है। प्राननाथ, चाची बता रही थी कि लड़का-लड़की का आज तक पता नहीं चला है। सुना है कि पुलिस ने उन दोनों को ढूँढ़कर परधान जी के हवाले कर दिया था। परधान जी उस समय युवा थे। उन्होंने उन दोनों को कुल्हाड़ी से काटकर नदी में बहा दिया था। रहस्य कैसा भी हो, कुछ सालों बाद खुल ही जाता है। काटते वक्त वे युगल कह रहे थे कि हमें मत मारो, हम जीना चाहते हैं। लड़की ने तो साफ कह दिया था कि बल्लू का कोई दोष नहीं है। मारना है तो मुझे मार दो, उसे छोड़ दो। दोनों एक-दूसरे को बचाने का प्रयास करते रहे। पर कातिल भाई की आँखों में खून सवार था। बड़ी बेरहमी के साथ उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। उन्हें मारकर परधान जी ने अपनी खोई हुई इज्जत लौटा ली थी। इसी के साथ ही गाँव में उनका दबदबा कायम बना रहा। कत्ली आदमी से वैसे ही सब डरते हैं।
लड़की मरते-मरते कह गई थी कि कितने मारोगे। हर घर में एक सुनैना जन्म लेगी। सचमुच प्राननाथ, गाँव में आजकल यही शोर है। इन सुनैनाओं ने दबंगों के हथियार कुंद कर दिये हैं। अब तो लड़कियों का भागना आम बात हो गई है। प्रेमी युगल गाँव से भाग जाते हैं, महीना भर बाद वापस आ जाते हैं। फिर एक छत के नीचे रहकर उनकी छाती पर मूँग दलते हैं।
प्राननाथ, लोग दूसरे की बहू-बेटी को बुरी नजर से देखते हैं। ये नहीं सोचते हैं कि हमारे घर में भी बहू-बेटियाँ हैं, उन्हें कोई गलत नजर से देखेगा तो कैसा लगेगा। परधान जी अपनी इज्जत की खातिर कतल कर डालते हैं और दूसरे की इज्जत…। परधान जी की हरकत से मुझे दो दिन तक खाना नहीं खाया गया था। इन्हें थोड़े कुछ फर्क पड़ा होगा। इनके इतिहास ही ऐसे हैं।
प्राननाथ मेरी चिन्ता न करना। मैं ठीक हूँ।
आपके दर्शन की अभिलाषी
आपकी ही
 रमकल्लो
जीवन परिचय 
नाम – लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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10 टिप्पणी

  1. मैं सोच रही थी कि रमकल्लो की हर पाती में कोई न कोई चिंता की बात जरुर होती है। और उसकी इस बार की १२ वीं पाती ने तो चौंका ही दिया।

    प्रेम प्रसंगों को लेकर जमाने की हवा न गांव देखती है न शहर।इस बार गांव में लगता है कि युवाओं में प्यार-प्यार को लेकर कुछ अधिक ही नशा चढ़ने लगा है। जाति-पाँति के बंधन तो टूट ही रहे हैं। साथ में घर वाले भी अब उतना सख्त कदम नहीं उठाते जितना कि परधान जी की बहन सुनैना के साथ हुआ। सरबत चाची और हरबी जिज्जी जैसे लोगों से रमकल्लो को यह बात पता लगी तो सुनकर रमकल्लो का कलेजा कांप उठा होगा। अपने प्रेमी बल्लू के साथ भागी हुई सुनैना जब पकड़ी गई तो उन दोनों को उसके भाई परधान जी ने समाज को दिखाने के लिये अपनी इज्जत की परवाह करते हुये उन दोनों को काटकर नदी में फेंक दिया। और बल्लू के माता पिता ने जो झेला वह अलग। आखिर उनका क्या दोष था? बदला निकालने को उसकी मां का सामूहिक बलात्कार और अंत में आत्महत्या। सुनकर किसी का भी कलेजा कांप उठेगा।

    दूसरी तरफ अगर कुछ दिनों का प्रेम समय के साथ छूमंतर हो जाये तो ऐसे भी जीवन की कल्पना करना ठीक नहीं। रमकल्लो की सोच भी शायद ऐसी ही है। इसलिये इन सब बातों को वह चुपके से अपने प्राननाथ से साझा करती रहती है। अकेले रहते हुये भी वह इस नये जमाने की हवा को महसूस नहीं करना चाहती। ऐसे प्रसंगों के बारे में सुनकर वह सचेत हो जाती है। दुनिया चाहें कैसी भी हो किंतु उसकी सोच काफी अलग है। वह ऐसे समय से गुजर रही है जहाँ उसे सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सबको देखते हुये उसके विचार परिपक्व हैं। एक नवयौवना का एकाकी रहना कितना मुश्किल होता है इसे वह जानती है। और अब तो ऐसी वारदातें अक्सर ही होती रहती हैं। लेकिन वह सिर्फ अपने प्राननाथ की माला ही जपना चाहती है। आज के समय में रमकल्लो एक उदाहरण है।

    लखनलाल जी, आप एक उत्कृष्ट रचनाकार हैं। पाती पढ़ते हुये लगता नहीं कि वह किसी लेखक की कल्पना है जो एक उपन्यास के पन्नो से कूदकर पाठकों तक आई है। लगता है जैसे रमकल्लो अब अपनी सजीवता का अहसास कराने लगी है। उसकी हर पाती के माध्यम से ग्राम जीवन को लेकर नई समस्याओं और वहाँ की परिस्थितियों से अवगत कराने के लिये आपको व आपकी लेखनी को नमन।
    -शन्नो अग्रवाल

    • शन्नो जी, आप पाती के अंत:करण को छूकर प्रतिक्रिया देती हैं। आपने आखर आखर प्रेम के दोनों पक्षों का सम्यक विवेचन करके पात्र रमकल्लो की समझदारी की बात कह दी है। इससे पाती का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है।
      बढ़िया प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  2. आदरणीय लखनलाल पाल जी
    हमेशा की तरह यह पाती भी पठनीय है जिसे पढ़ते समय प्रेम की एक परिभाषा का स्मरण हुआ –
    अदना-सा लफ्ज़ ए मुहब्बत का इतना सा फ़साना है
    सिमटे तो दिले आशिक और फैले तो ज़माना है!
    प्रेम के आयाम और अंजाम को आपने सफलतापूर्वक परीक्षण करते हुए रेखांकित और मूल्यांकित किया है.
    सुनैना का क़त्ल हुआ यह निश्चित ही दुःख की बात है किन्तु उसकी मुहब्बत की सज़ा निरीह मां – बाप को हुई इस बात का जियादा अफ़सोस है.
    कहने के लिए हम आधुनिक या उत्तर आधुनिक हैं या अब तो हम पराधुनिक बने हैं लेकिन दिल का क्या करें?
    इक़बाल ने ही कहा है दिल पुराना पापी है
    सही मायने में जब तक हम मानवतावादी नहीं होंगे तब तक यह मौसम बरकरार रहेगा.
    आप की रमकल्लो अब अपने प्राणनाथ के अलावा यथार्थ का बोध ग्रहण कर रही है यह निस्संदेह प्रशंसनीय बात है.
    अपनी पाती के माध्यम से अपने विदेशी पति को यहां की हक़ीक़त से जानकारी देते हुए खुद की जिज्ञासा और अवधारणाओं को प्रकट करती हैं यहीं हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है.
    अंत में मृत सुनैना और बल्लू के संदर्भ में ग़ालिब का मत रखना आवश्यक है –
    जिंदगी यूं ही गुज़र जाती
    क्यों तेरा रहगुजर याद आया!
    बहुत बहुत बढ़िया पाती और बधाई
    प्रो विजय महादेव गाडे

    • आदरणीय प्रोफेसर महादेव गाडे जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर दिल खुश हो गया है। आपने महत्वपूर्ण रचनाकारों की रचनाओं को कोट करते हुए पाती के महत्व को बढ़ा दिया है। आप जैसे श्रेष्ठ समीक्षक की पाती पर समीक्षा आना मेरे लिए बड़ी बात है। मेरा लिखना सफल हो गया ।
      बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर

  3. सुनैना का सराप

    रमकल्लो तैं सिररिन हो गई का
    हरबी जिज्जी मानो रमकल्लो से आँखों ही आँखों में कह रहीं हों।
    गाँव में जब किसी बड़े खानदान की लड़की प्रेम प्रसंग में छोटी जाति के लड़के के साथ घर छोड़कर चली जाती है (भाग जाती है) तो कहा जाता है उसे नीची जाति का लड़का बहला फुसलाकर भगा ले गया। सारा दोष उस लड़के को दिया जाता है। और जब कोई नीची जाति की लड़की किसी दूसरी जाति के लड़के के साथ घर से चली जाती है तो कहा जाता है लड़की भाग गई। लड़की को ही बदचलन कहा जाता है।
    लड़का भगा ले गया / लड़की भाग गई इन दो वाक्यों का जो समाजशास्त्रीय अध्ययन है, वह बहुत विकट है। इस समाजशास्त्रीय अध्ययन के परिणाम में किसी के माथे पर बाल आ जाता है तो किसी की नाक-मुंह से सिकुड़ जाती है। किसी की मूँछ तुर्राने लगती है तो किसी की मूँछ नीची हो जाती है।
    लेकिन सच बयानी से तो बचा नहीं जा सकता। अक्सर देखा गया है गाँव में छोटी जाति के यहाँ अगर आपस में किसी तरह की ऊँच-नीच हो जाए तो पूरे गाँव में ढोल बजाकर उसका ढिंढोरा पीटा जाता है। दोषी को पंचायत में सजा देने के अलावा उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है। लोग चटखारे लेकर फिकरे कसते हैं। यही घटना किसी ऊँची जाति के साथ हो जाए तो सभी चुप रहते हैं, लोगों को कानों कान खबर भी नहीं होती, मानो कुछ हुआ ही न हो। और यदि छोटी जाति का लड़के का प्रेमप्रसंग बड़ी जाति की लड़की से सार्वजनिक हुआ तो भूचाल आ जाता था। बबलू के मातापिता के साथ हुई बर्बरता इसकी बानगी भर है।
    गाँवों में जब जमींदारी का दौर था, तब कुछ बिगडै़ल किस्म के रईसों का रखैल औरतें रखने का शौक था। जो जितनी रखैलें रखता था वह उतना बड़ा रईस माना जाता था। ये रखैलें अक्सर छोटी जाति की महिलाएँ हुआ करतीं थी। इन महिलाओं को जबरन रखैल या यौन सेविकाओं की तरह प्रयोग में लाया जाता था। किसी की क्या मज़ाल जो इस अनैतिकता का विरोध करे।
    हालांकि लड़की भाग गई या लड़का भाग ले गया जैसी घटनाएँ उस दौर में न के बराबर थीं और यदि होतीं थीं तो सालों-साल सुर्खियों में रहती थीं और उनके भयानक परिणाम भी होते थे।
    रमकल्लो की इस पाती में बेमेल प्रेम प्रसंग से उपजी त्रासदियों को लेखक ने जिस तरह ने उजागर किया है वह कटु यथार्थतम् है। उसमें कहीं कोई शक की गुंजाइश नहीं है। अंशमात्र भी कल्पना मिश्रित नहीं है। कटु यथार्थ का लेखन बड़े साहस और जोखिम भरा होता है। यह जोखिम लेखक ने उठाया भी है।
    पाती को पढ़ाते हुए एक चित्र सा बनता चला जाता है। मानो पाठक कोई फिल्म देख रहा हो। अनेक वीभत्स, डरावने दृश्यों से गुजर रहा हो। कहीं-कहीं तो ऐसा वर्णन किया है कि रूह सिहर जाती है।
    काश! इस तरह का यथार्थ न होता तो कल्पनाओं की उड़ान भी न होती।
    वास्तव में चरित्र का शुद्धिकरण या चारित्रिक विकास समाज की धुरी है। संस्कारों की खेती है। प्रेम के सात्विक संबंधों में जब वासना अनैतिक रूप से भीतर घुस आती है तब इस तरह के अप्रिय प्रसंग उठना स्वभाविक है…
    ईश्वरीय करे किसी को सुनैना का सराप न लगे।

    • आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने तो पूरा समाजशास्त्र निचोड़कर रख दिया है। आपके इस तर्क को झुठलाया नहीं जा सकता है। रमकल्लो भी तो यही कहना चाह रही थी। पर उसने इतना साफ नहीं लिखा है। उसने सोचा होगा कि क्यों प्राननाथ को उत्तेजित किया जाए। जितने में रस बना रहे उतना ही कहा जाए।
      भारती जी आप पाती का पूरा विश्लेषण कर देते हैं।
      भारती जी पाती पर सटीक प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  4. https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-pati-by-lakhan-lal-pal-12/

    आदरणीय सर जी!
    अबकी बार रमकल्लो की पाती पढ़ कर स्तब्ध रह गये।
    हालांकि इस तरह की घटनाएँ पहले भी पढ़ी हैं।खाप जाति में इस तरह की दरिंदगी पढ़ने में आई। और वैसे भी इस तरह की घटनाओं का आज-कल अलग-अलग कथानकों के अनुसार बाजार सा लगा हुआ है। महंगाई इतनी बढ़ गई है ,बस इंसान की जान से सस्ता कुछ नहीं। पर रामकल्लो की पाती में भी इस तरह का जिक्र आएगा यह कल्पना भी न थी।

    सुनैना की कहानी सुनकर दिल दहल गया।
    गाँव का मुखिया हो, जाति का दबदबा हो या नेतागिरी हो;इंसान जितना बड़ा होता है, उतना ही ज्यादा बड़ा शैतान उसके दिमाग में घुसा हुआ होता है।

    पिता के हाथ-पैर में कील ठोकना और माँ के साथ सामूहिक बलात्कार !!!!!! और दोनों बच्चों को पकड़ कर कुल्हाड़ी से मार कर फेंक देना दरिंदगी की हद है। ऐसे लोगों को कानून की क्या जरूरत? न्यायालय की क्या जरूरत? सरेआम फाँसी दे देनी चाहिये।

    बेचारी सीधी-सादी रमकल्लो यह सब सुनकर तो सहम ही गई होगी!
    लेकिन उसने यह भी बता दिया कि समय बदल गया है। अब गंगा उल्टी बहने लगी है। अब महीने भर बाद वापस बच्चे आकर उनकी छाती पर मूंग दलने लगे हैं। ऐसा ही है कभी गाड़ी नाव पर और कभी नाव गाड़ी पर।

    समय का परिवर्तन पहली बार ही दखलअंदाजी लगती है धीरे-धीरे लोग अभ्यस्त होने लगते हैं।

    इस बार की पाती ने वैसे तो दिल दहलाया , लेकिन कुछ वाक्यांश भा गए । *”गाँव के मादा सीने पर”* , पहली बार सुना, *”मच्छर की तरह अपना रूप बदलना”*, *”दिलों की सेंधमारी”* “*बाहर घुंघटिया पोले पाँव”*

    एक वाक्य ‘वाह’ के लायक लगा- *इसमें अपनी पीड़ा, वेदना एवं क्रोध को बच्चों की तरह दुलारना पड़ता है।*
    जो बहुत प्यारा लगा- ‘मनुष्य’के लिये ‘मुंस’ शब्द।

    जो सूत्र वाक्य की तरह काबिले गौर लगा- *इज्जत का विचलन और जीवन ढर्रा समानांतर चल रहा है।*
    *अब इज्जत भी गांव मोहल्ले से घटकर व्यक्ति पर केंद्रित हो कर रह गई है।*

    रमकल्लो की पाती लिखने के लिए आपको बधाई।

    • नीलिमा करैया जी, आपकी यह बात सच है कि जाति बाहुल्य गांवों में इस तरह की घटनाएं होती ही हैं। बाहुल्य कमजोर पर हावी रहता ही है। इसीलिए अधिकांश गांवों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।
      इस पाती ने आपको द्रवित कर दिया है। ऐसी घटनाएं सुनी तो खूब जाती है लेकिन जब रमकल्लो अपने मुंह से बताती है तो वह घटना और करुण हो जाती है। आपका द्रवित हो जाना रमकल्लो से जुड़ाव का परिणाम है।
      इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  5. अत्यंत विचलित करने वाली पाती है। यद्यपि इसमें यथार्थ का ही वर्णन हुआ है किंतु यथार्थ के कितने घिनौने रूप होते हैं। कम से कम अब प्रेमी युगल फांसी नहीं लगाता है, यह बहुत गनीमत की बात है। कथा प्रसंग में रोचकता है और प्रवाह भरपूर है ।हार्दिक बधाई।

    • आदरणीया विद्या सिंह जी पाती पर इतनी अच्छी टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

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