Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : नत्थू का ब्याह (भाग : 15)

प्राननाथ, 
चरन स्पर्श।
नत्थू का ब्याह उतरत बैशाख की सातें को हो गया है। अन्य महीनों में ब्याह बन नहीं रहा था। पंडिज्जी ने पतरा से देखकर बताया था कि यही एक शुभ मुहूर्त है। जेठ के महीना में लाल दान लग रहा था। ब्याह में लाल दान ठीक नहीं होता है। पंडिज्जी बता रहे थे कि इस मुहूर्त में ब्याह नहीं करोगे, तो शुभ मुहूर्त एक साल बाद आएगा। अब बताव ले, नत्थू कब तक अपने हाथों रोटी थोपता रहता। लड़की वाला उसकी परिस्थिति से वाकिफ था। इसी से उसने सुतकरा ले लिया था।
ब्याह से दस दिन पहले नत्थू मुझे लिबाने आया था। मैंने कहा, ‘भैया दस दिन में तो भैंस बिलकुल सूख जाएगी। भैंस दूसरों के भरोसे इतने दिन के लिए नहीं छोड़ी जा सकती है। तू ऐसा कर, काकी, ताइयों का अभी सहारा ले ले। मैं चार दिन पहले आकर तेरा काम संभाल लूँगी। कूटना, पिसना करा लेना। ये काम उस दिन के लिए न रहें। मेरी मजबूरी समझकर नत्थू लौट गया था।
प्राननाथ, नत्थू के खाली हाथ लौट जाने से मुझे बहुत अफसोस हुआ था। बेचारा सहारे के लिए आया था पर मैं उसके साथ न जा सकी। क्या करती, भैंस खूँटे से बँधी है, इसे एक आदमी चाहिए। सरबत चाची इतने दिन उसे न संभाल पाती। उसके भी बारह काम हैं, अपना देखती कि मेरा।
मैं चार दिन पहले वहाँ पहुँच गई थी। नत्थू खुश हो गया था। उसने घर की चाबी सौंपते हुए मुझसे कहा कि बुआ तुम्हीं घर संभालो। इतनी बड़ी जिम्मेदारी को निभाना आसान न था पर मैंने निभाया। इधर-उधर बिखरे सामान को एक जगह इकट्ठा किया।
उनका स्थान निश्चित कर दिया था। ब्याह का घर, कोई कुछ माँगता, तो कोई कुछ। अगर चीजें यथास्थान न रखती, तो दिन भर उन्हें ही ढूँढ़ती रहती। मैं नहीं चाहती थी कि कोई यह कहे कि रमकल्लो को घर की मालकिन क्या बना दिया, माँगने पर वहाँ कुछ मिलता ही नहीं।
दो दिन पहले बाजार की सौदा खरीदी गई। मैंने कह दिया था कि भैया सौदा जल्दी खरीद लेना, पर उसने न खरीदी। वह मेरा इन्तजार करता रहा। ट्रैक्टर बाजार गया, तो साथ में मुझे भी लिबा ले गया। मैंने मना किया था, पर नत्थू माना क्या? कह रहा था कि हम लोग चढ़ाव के कपड़े न खरीद पाएँगे, इसकी जानकारी तुम्हें ज्यादा है। क्या करती, मैं फिर गई बाजार। सात साड़ी-बिलाउस के साथ पेटीकोट खरीदे। साले-बहनोई के कपड़े, साली के लिए सूट खरीदा। नत्थू ने बहन-बुआओं के लिए भी साड़ियाँ खरीदने को कहा। मैंने कहा, भैया ज्यादा खर्च न कर। आगे कोई दिक्कत आ गई तो क्या करेगा तू?
वह हँसकर बोला कि बुआ रोज-रोज ब्याह थोड़े होना है, एक बार की ही बात तो है। इतने दिनों से किया क्या है, कमा ही तो रहा हूँ। कह तो वह ठीक रहा था लेकिन फिर भी मैंने कुछ अनावश्यक चीजें नहीं खरीदने दी। अन्जान लड़का है, जिसने जैसा कह दिया, वही मान लेता है। कुछ लोग उसे जोश दिला रहे थे। मैंने उन्हें समझाया कि भैया इसे ज्यादा टुंगा पर न चढ़ाओ, कर्ज में फँस जाएगा। जितने में काम चले, उतने में चला लो। मेरी बात उन्हें समझ में आ गई थी।
मुला दो दिन के लिए आई थी। उसकी सास की तबियत ठीक नहीं थी, सो वह जल्दी लौट गई। कह रही थी कि रमकल्लो अब मेरी सास मुझसे नहीं लड़ती है। मुझे भी समझ में आ गया कि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता है। रमकल्लो तू इतना सब कैसे जान लेती है? मैंने उसे बताया कि जिन्दगी सबसे अच्छी पाठशाला है, वह सब सिखा देती है।
ब्याह में आदमी ज्यादा हो गए थे। लड़का है, उसे कौन ज्ञान था। उसने रिश्तेदार के रिश्तेदारों को भी निमंत्रण दे दिया था। गाँव भैया भी ज्यादा हो गए थे। अधिकतर परिवारों को उसने चूल्ह से बुला लिया था। बारात अधिक हो जाने से लड़कीवाला भुनभुना रहा था। गुस्से में उसने एक बार ही खाना खिलाकर बिटिया की विदा कर दी। लड़कीवाले को ब्याह तो करना ही था। गरीबती की हालत थी। उसने जैसे-तैसे लड़की को डोली में बिठा दिया। उसकी और भी लड़कियाँ ब्याहने को हैं। दहेज ज्यादा नहीं मिला। मैंने नत्थू को समझाया, भैया सामान कम मिला, इसका दुख मत करना। बहू मिल गई, यही सबसे बड़ा दहेज है।
मैंने उसी समय बहू की सारी रस्में पूरी करवा दी थी। दोबारा बहू आती, तो इन रस्मों को करने में फिर उसका खर्च बढ़ जाता। खिचड़ी की रस्म के समय कुछ औरतें मुँह बना रही थीं। कह रही थीं, रमकल्लो बिन्नू सब कुछ अभी निपटाए दे रही हैं, दूसरी बार बहू आएगी, तब के लिए क्या बचेगा? मैंने कहा, “भौजी, ठीक ही तो कर रही हूँ। अकेली को कौन रोटी खिलाने आएगा? इस रस्म के बाद अब वह घर की मालकिन हो जाएगी। भोजन बनाने का अधिकार उसे मिल जाएगा।”
बहू का स्वभाव ठीक है। मैं लौट रही थी, तो वह मुझसे चिपटकर रो पड़ी। रोक रही थी कि बुआ दो-चार दिन और रह लो। मैंने उसे मीठी झिड़की दी, “काए री! मैं कब तक तेरा घर संभालती रहूँगी। अपना घर संभाल। नत्थू को तकलीफ मत होने देना। बारे का अभागी है, उसे खुश रखना।” बहू कह रही थी कि बुआ तुम रहती तो मैं कुछ और सीख लेती। मैंने कहा, पगली, समय सब सिखा देता है। किसी को सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती है।
जितना मुझसे बना, उतना बना आई। जलम भर का ठेका कोई किसी का नहीं लेता है। मैं नत्थू से कह आई थी कि बहू आठ-दस दिन रह लेगी। इसके बाद लिबा लाना। मुहूर्त मत निकलवाते रहना। अच्छे दिन चल रहे हैं, इनमें मुहूर्त-उहूर्त की आवश्यकता नहीं है। वह हँस रहा था।
आती बेर बहू ने मुझे एक साड़ी दी थी। मैं नहीं ले रही थी पर बहू ने जबर्दस्ती मेरे थैले में डाल दी। नत्थू ने सौ रुपये देकर मेरे पैर छुए थे। खूब मना किया पर वह पगला माना क्या…। कह रहा था, “बुआ ये तो सम्मान है। देने लेने से कोई रईस नहीं होता है। मौके पर आकर तुमने मेरा काम बना दिया।”
बरगओ, आती बेरा वह मुझसे चिपटकर रो पड़ा। मुझे भी रोना आ गया था। आज महतारी-बाप जिन्दा होते, तो वह इतना अधीर न होता। यही सोचकर लौंडा पर तरस आ रहा था।
मैं समझा आई थी कि दोनों मेहरिया-मुंसवा सुख में रहियो। बनाओ चाहे बिगाड़ो, कोई देखने-सुनने वाला नहीं है। उसे भी कह आई थी कि पराए घर का लड़का-बिटिया है, उसे तकलीफ मत होने देना। उसकी इच्छाओं का खयाल रखना, नहीं तो अपने में ही मस्त बना रहे।
बहू मोहली है। मैं घर लौट आई थी, तब भी उसकी याद आती रही। अपनों से बिछुड़ना भी कष्टकारक होता है। पता नहीं प्राननाथ, मेरा जीवन ऐसे ही निकल जाएगा क्या?
तुम आ जाओगे तो उन्हें देखने चलेंगे। जल्दी आना, मैं तुम्हारी राह देखूँगी।
हाँ, एक बात और प्राननाथ, हाईस्कूल का रिजल्ट आने वाला है। देखती हूँ, कैसा परिणाम आता है। जैसा भी होगा, आपको सूचित कर दूँगी। मेरे मन में बहुत उत्सुकता है। लिखना बन्द करती हूँ।
आपके दर्शन की प्यासी
आपकी ही
रमकल्लो
जीवन परिचय 
नाम – लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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6 टिप्पणी

  1. आखिरकार नत्थू ने भी शादी का लड्डू खा लिया। आदमी लोगों को घर के काम-काज व रोटी आदि बनाने का खटराग अच्छा नहीं लगता। अच्छा हुआ कि पंडित जी ने मुहूरत आदि देखकर चेतावनी दे दी कि या तो अभी या फिर साल भर बाद। बिना बाप व महतारी का नत्थू कब तक अकेला रहता।

    शादी के समय उसे रमकल्लो जैसी समझदार बुआ के सहारे की बहुत जरूरत थी। और रमकल्लो है भी अपनी उम्र से अधिक समझदार और सूझ-बूझ वाली। उसने पहुंचते ही नत्थू के ब्याह से संबंधित सारी जिम्मेदारियां संभाल लीं। अकेली रहते हुये समय ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया है। दस दिन पहले आने का वादा किया था। किंतु भैंसिया को कौन संभालता इतने दिन तक। वह तो सूख कर कांटा हो जाती। इसीलिए किसी तरह चार दिन के लिये ही आई और आते ही घर की सारी जिम्मेदारी को संभाल लिया।

    आते ही नाज-पानी और घर में सारी जरूरत की चीजों की खरीददारी और शादी में लेन-देन आदि जैसी बातों की जिम्मेदारी उसने अपनी बुआ रमकल्लो पर डाल दी। क्योंकि उसे विश्वास था कि उससे बेहतर कोई और रिश्तेदार स्त्री नहीं कर सकती। वह शादी की खुशी में इतना पगलाया हुआ था कि तमाम लोगों को निमंत्रण देने की सोच बैठा। किंतु बुआ की चतुराई ने उसे ऐसा करने से रोक लिया। वरना नत्थू की नाक में कर्जे की नकेल पड़ने का डर था। इतनी होशियार बुआ को पाकर का वह दिल ही दिल में खूब खुश हुआ होगा।

    वाकई में रमकल्लो के आत्मज्ञान की तारीफ करनी पड़ेगी। भतीजे की आर्थिक स्थिति का ध्यान करते हुये उसने रिश्तेदारों को उपहार में कपड़े-लत्ते आदि देने के मामले में लोगों के नाम की लंबी लिस्ट में से तमाम नाम कम कर दिये। सोचा होगा कि अब नथुआ के माँ-बाप तो हैं नहीं। ले देकर बची वह तो बुआ का कहना नहीं मानेगा तो फिर किसका? है भी तो वह अपनी बुआ का इतना लाडला। अपनी बुआ पर उसका अधिकार है। चाहें उसकी बुआ उसे लाड करे या गरिआये। अरे यही तो अपनापन है। उसपर वह आँख मूंदकर विश्ववास करता है।

    मायके से विदाई का समय बड़ा कठिन होता है। किंतु फिर भी जिंदगी भर तो वह रह नहीं सकती वहाँ। उसे अपने घर की भी तो चिंता है। साड़ी, मिठाई व पैसे देकर बड़े प्यार और सम्मान के संग भतीजे ने बुआ की विदाई की। भतीजे और बहू को मिलजुलकर रहने का उपदेश देकर चार दिन बाद वह अपने घर वापस आ जाती है। अब नत्थू शादी के लड्डू खाकर खुश होंगे या पछताएंगे यह तो उनकी बुआ की आगे आने वाली चिट्ठियों से ही पता लगेगा।

    उन चार दिनों में रमकल्लो जैसे चारों धाम कर आई। आकर तुरंत अपने प्राननाथ को पाती लिखने बैठ गई। शादी से संबंधित शुरू से अंत तक का सारा ब्यौरा वह जस का तस लिखती है। और उम्मीद करती है कि पाती पढ़ने के बाद जब प्राननाथ घर आयेंगे तो उनके साथ वह अपने भतीजे नत्थू व उसकी नई नवेली दुल्हनिया से मिलने फिर जायेगी। पर अब वह अपने हाई स्कूल की परीक्षा के रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रही है जो शीघ्र आने वाला है।

    उसके मन में हैं ढेरों सपने
    और आँखों में इंतजार
    रमकल्लो हो गई इंटेलिजेंट
    अब न कहना उसे गंवार।

    लखनलाल जी, हर बार एक नई पाती में रमकल्लो की बढ़ती क्षमता, उसकी नई सोच और जीवन के प्रति उसका बढ़ता उत्साह जानकर मस्तिष्क में उस साहसी नवयौवना की एक नई बोल्ड छवि उभरने लगी है। आपको बहुत बधाई।
    अगली पाती के इंतजार में….
    -शन्नो अग्रवाल

    • शन्नो जी आपकी यह प्रतिक्रिया बड़ी भली लगी मुझे। पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जैसे आप रमकल्लो को सामने देख रही हों। आपकी प्रतिक्रिया की सबसे बड़ी खूबसूरती बिंदासपन है।
      बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी

  2. *बरगओ, आती बेरा वह मुझसे चिपटकर रो पड़ा*…
    सच कहूँ, आज की पाती पढ़कर मुझे भी रोना आ गया। रोना इसलिए नहीं आया कि नत्थू अपनी बुआ रमकल्लो से चिपट कर रोया और मेरा दिल भर आया। बल्कि रोना इसलिए आया कि आज के हमारे पारिवारिक संबंध बाँझ होते जा रहे हैं। विवाह हो अन्य तीज- त्योहार उनमें जो आत्मीयता, बतरस और शुद्ध चुहल होती थी अब वह सूखकर ठूँठ हो गई है। रिश्ते रिसते- रिसते नासूर हो गए हैं। मैं गाँव के भीतर वाले मन से जुड़ा होने के कारण गाँवों के रीति रिवाजों को बखूबी जीता रहा हूँ। उनकी प्राण पीड़ाओं से रूबरू हूँ…
    कथाकार आदरणीय लखनलाल पाल ने रमकल्लो को नत्थू के विवाह में उत्साह से भागीदारी तो कराई ही है। इसके साथ ही उन्होंने रमकल्लो के माध्यम से नत्थू को फिजूलखर्ची से रोका है। मुझे लगता है लेखक ने बुआ- भतीजे के रिश्तों की मिठास को इस पाती में एक नई शक्ल में प्रस्तुत किया है। रमकल्लो जैसे चरित्र गाँवों में भी इक्के दुक्के ही बचे होंगे।
    काश ! आज हर गाँव में रमकल्लो जैसी कोई महिला होती तो शायद गाँवों की तस्वीर कुछ और होती…
    ••••
    डॉ० रामशंकर भारती

    • भारती जी आप गांव से जुड़े हुए हैं इसलिए ये सब आप गहरे तक महसूस कर रहे हैं। इसे ही तो सहृदयता कहा जाता है।
      भारती जी बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार

  3. आदरणीय लखनलाल पाल जी
    रमकल्लो की पाती का 15 वां भाग नत्थू का ब्याह पढ़ते समय मन अतीत की गलियों से लौटकर वापस आया.

    जिंदगी सबसे अच्छी पाठशाला है, वह सब सिखा देती है.
    बहु मिल गई यही सबसे बड़ा दहेज़ हैं.

    समय सब सिखा देता है , किसी को सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती है .

    उक्त सभी वाक्य पाती के प्राणतत्व है और इसके कारण ही रचनाकार और रचना की मौलिकता बढ जाती है.
    हमारे लिए जिज्ञासा की यही विषय वस्तु है कि रमकल्लो के प्राणनाथ कब वापस आनेवाले हैं?
    वरना –
    गज़ब किया इंतिजार किया
    तेरे वादे पे जो एतबार किया!!

    रमकल्लो अब स्वतन्त्र है और अपनी निर्णय क्षमता को बढ़ा रहीं हैं यह आनंद की बात है .

    बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं
    सादर
    प्रो विजय महादेव गाडे.

    • आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, आपने रमकल्लो के निर्णय और उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व पर सटीक प्रतिक्रिया दी है।
      *गज़ब किया इंतिजार…. एतबार किया* इन पंक्तियों ने तो उसके मन की पीड़ा को पूरी तरह से व्यक्त ही कर दिया है। बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार सर

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