Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. वंदना मुकेश का यात्रा-संस्मरण : हिंद महासागर के बीच – मौत का द्वार

मन अति प्रफुल्लित और उत्साहित था। एक विवाह में सम्मिलित होने के लिए अपनी शादी के लगभग 32 साल बाद पहली बार हम दोनों बिना बच्चों के घूमने निकले, और निकले भी तो सीधे दक्षिण अफ्रीका। कहाँ इंग्लैण्ड, कहाँ अफ्रीका? दरअसल, हम अब तक हम जब भी घूमने गये बच्चे साथ ही होते थे। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि बिटिया स्पेन के  वैलेंसिया शहर में डैंटिस्ट्री की  पढ़ाई कर रही थी और बेटा यहीं इंग्लैण्ड में नौकरी कर रहा था। 
केन्या के विषय में थोड़ी रिसर्च की तो, पता लगा कि कुछ टीके लगवाना जरूरी हैं, जैसे यैलो फीवर , रैबीज़, टिटेनस इत्यादि। खैर जब डॉक्टर के पास गये तो पता लगा कि टीके की उपलब्धता पर है । फिर हलचल शुरु हुई, पता लगा कि यैलो फीवर के कार्ड के बिना नैरोबी में एंट्री नहीं मिलती आदि….। सो हम रात आठ बजे एक क्लीनिक पर पँहुच गये, टीके लगवाये तब और विस्तृत जानकारी मिली कि रैबीज़ के टीके के तीन डोज़ होते हैं। उसका समय अब नहीं था । रैबीज़ की भयावहता के बयान के बाद उसे पढ़ने का अवसर भी मिला। लेकिन मुफ्त सलाह यह भी मिली कि सफारी पार्क में जानेवालों को रैबीज़ से सुरक्षा हेतु टीका अवश्य ही लगवाना चाहिये, मन आशंकित होने लगा। वहाँ नीले रंग के कपड़े मत पहनना वरना एक किस्म की जहरीली मक्खी काट लेती है। मच्छरों को भगाने की क्रीम-स्प्रे इत्यादि बेटे ने ऑनलाईन मँगवाए। अकेले मत जाना, लूट लेते हैं। यह मत करना , वह मत करना आदि आदि। अचानक यह यात्रा भयावह लगने लगी। लगने लगा कि हम घूमने नहीं किसी खौफ़नाक स्थान पर जा रहे हैं। अब पीछे लौटना संभव न था। आखिरकार अनेक हिदायतों, आनंद और आशंका के मिलेजुले भावों से हम 12 फरवरी 2020 को नैरोबी के लिए निकल पड़े। इधर मेरा गला खराब हो रहा था, पानी तक निगलने में तकलीफ थी पैरासीटामॉल खा-खाकर यात्रा चल रही थी। उतरने पर करोना वाईरस के कारण हर यात्री का बुखार नापा जा रहा था, एक बार मन डर गया कि अगर बुखार हुआ तो यहाँ पँहुच कर भी कभी रोक न दें लेकिन ईश्वर की कृपा से  जैसे ही मुझे आगे जाने को कहा तो मेरी जान में जान आयी। 
एयरपोर्ट से नैरोबी शहर के रास्ते में दोनों ओर जेब्रा की मूर्तियाँ बनी थीं और मैंने मज़े से कहा, अरे वाह, जिराफ..। मेरे पति ने सुधारा , जिराफ़ नहीं जेब्रा। मैं अपने पर ही खूब हँसी। मुझे अहसास हुआ कि मेरा भय खत्म हो गया था और मैं प्रसन्न थी इसलिये मुझे ज़ेबरा और जिराफ के भेद की फिक्र भी न रही। हमारे कार्यक्रम में  कैरीचो निष्काम गुरुद्वारा, जहाँ शादी थी, के अतिरिक्त मोंबासा एवं  टाईटा हिल्स सफारी की यात्रा भी शुमार थी
नैरौबी से केरीचो की यात्रा में  सड़क पर कई स्थानों पर स्कूल के बोर्ड देखे किंतु स्कूल कहीं नहीं दिखे। अलबत्ता स्कूल की यूनिफॉर्म पहने बच्चे पैदल चलते जरूर आये। इसका एक अर्थ तो यह हुआ कि स्कूल मुख्य सड़क से कहीं बहुत दूर अंदर थे और दूसरा यह कि स्कूल और घर की तरफ दौड़ते इन्हीं बच्चों में में कोई ओलिंपिक खिलाड़ी पैदा हो जाता है।  गाँव भी मुख्य सड़क से दूर कहीं अंदर थे। लाल मिट्टी का पगडंडी दूर तक चली जाती थीं। शहरों से बाहर मुख्य सड़क पर बस्ती कम ही थी। नैरोबी से केरीचो की यात्रा में इस बात की पुष्टि हो गई थी कि यहाँ गाँव दूर-दूर होने के कारण मीलों चलना लोगों की आदत और मजबूरी दोनों ही है। पहाड़ियों–घाटियों में चढ़ते- उतरते यहाँ आम आदमी की शारीरिक क्षमता किसी शहरी इलाके के आम आदमी के मुकाबले कई गुना अधिक होती है और इस क्षमता का विकास बचपन से ही होने लगता है। ओलिंपिक एथलीट यूनीस जेपकोरीर, जैनेट जैपकॉसगेई, विल्सन किप्सेंग किप्रोटिच, पॉल टैरागट… जैसे विश्व के अनेक सर्वश्रेष्ठ महिला एवं पुरुष धावक विश्व को केन्या की ही देन  है ।
अगले दिन सुबह बहुत ही सुंदर शबद तथा पाठ के साथ विवाह संपन्न हुआ।  बधाईयों की बौछार के साथ सबसे मिलकर दूल्हा-दुल्हन उसी शाम मोम्बासा निकल गए। नये ज़माने की यह दुल्हन आगे के कार्यक्रमों की संयोजक अथवा ‘ईवेंट मैनेजर’ भी थी। उसे अगले दिन पहुँचनेवाले पचास मेहमानों की सारी व्यवस्था देखनी थी।  
मोम्बासा में गर्मी बहुत ज्यादा थी, और धूप शरीर को जलानेवाली। केरीचो की ठंडी हवाओं के बाद यह मौसम आग उगल रहा था। वहाँ दो मिनी बसों ओर कारों से दोपहर के लगभग 12 बजे हम ‘व्हाईटसेंड बीच रिसॉर्ट’ पँहुचे। जहाँ मोम्बासा के पारंपरिक लोक-नृत्य से हमारा स्वागत हुआ।
अगले दिन हमने मोम्बासा में स्वामीनारायण मंदिर देखा।  वहाँ से हमें उस सड़क पर ले जाया गया जिस पर  ऐल्युमिनियम से बने हाथी दाँत के आकार के  दो बड़े भव्य द्वार बने थे जिन्हें  एलीफेंट टस्की कहा जाता है । इस द्वार का  निर्माण 1952 में रानी ऐलिजाबेथ की मोम्बासा यात्रा के स्मारक के रूप में किया गया था। मोम्बासा बंदरगाह 16वीं-17वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह थ। जहाँ फोर्ट जीसस नामक किला बना है।  यह किला हिंद महासागर के व्यापार मार्गों पर पुर्तगालियों के शासन तथा अंग्रेज़ों की बर्बरता की लोमहर्षक कहानी कहता है। इसका निर्माण 1593-1596 के मध्य पुर्तगाली राजा किंग फिलिप के के द्वारा मोम्बासा बंदरगाह की रक्षा के लिये बनाया था। जियोवानी बातिस्ता नामक वास्तुशास्त्री ने इसका नक्शा बनाया। यह किला इस तरह से बना है कि दूर से ही आनेवाले जहाजों को देखा जा सकता था। मोम्बासा के मूल निवासी स्वाहिली लोगों ने इसे बनाने में समुद्री वनस्पति जैसे कोरल आदि का उपयोग भी किया। फोर्ट जीसस की बनावट मानव –शरीर के जैसी है सिर वाला भाग समुद्र की तरफ, फिर बाँहे और धड़, पैर तट की तरफ। यह किला की सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों की सैन्य किलेबंदी के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। पुर्तगालियों के बाद इस किले पर कई आक्रमण हुए और 1698 में ओमानी अरबों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया। 1895 में  इस किले पर अंग्रेजों ने कब्ज़ा कर इसे जेल में तब्दील कर दिया तथा इसके निचले हिस्से में गुलामों को बंद किया गया। जहाँ उन्हें तरह-तरह की अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं और न जाने कितने गुलाम गुलामी की नयी यात्रा की प्रतीक्षा करते-करते यातना, भुखमरी और बीमारी से काल के गाल में समा गये। जो बच जाते थे वे किले के निचले द्वार से सीधे जहाज़ पर लाद दिये जाते थे, अमानवीय यातनाओं की नयी यात्रा। उसमें से कितने गंतव्य तक पहुँच पाते थे यह कहना मुश्किल है किंतु किले  से समुद्र की ओर खुलनेवाला यह द्वार मौत का द्वार था जहाँ से कोई वापस नहीं लौट पाता था। वहाँ खड़ी में उन दासों की हृदय-विदारक चीखों को सुन सकती थी। मन व्याकुल हो गया। सत्ता की भूख मनुष्य को राक्षस बना देती है। 
किले के संग्रहालय में व्यापारी जहाजों से मिले सामानों की प्रदर्शनी थी । जिसमें अमीरी- ग़रीबी की कभी न पटनेवाली खाई का स्पष्ट चित्र दिखाई देता था। एक हिस्से में ओमानी अरबों की वस्तुओं का छोटा- सा संग्रहालय अलग से बना है।  हमारा युवा गाईड धैर्यपूर्वक हमारे प्रश्नों का उत्तर देते हुए बड़े ही विस्तार से हमें किले का इतिहास बता रहा था। 
1200 शिलिंग को हिसाब से दो 2400 शिलिंग के टिकिट लिये और और गाईड को 1000 शिलिंग दिये। किले का टिकिट मुझे महँगा लगा। गाईड युनीवर्सिटी का  एक छात्र था इसलिये उसे पैसे देना बुरा नहीं लगा। 2 घंटे में हमने किला और संग्रहालय दोनों देख लिये। 
वहाँ से हमें हमारा ड्रायवर विल्सन मामंगीना वाटर फ्रंट की ओर ले गया। मामांगीना वाटरफ्रंट, मुंबई की मेरीन ड्राइव की तरह समुद्र किनारे की पट्टी है, वहाँ एक लाईटहाउस पर हम तस्वारें खिंचवाने रुके तो नारियल पानीवालों ने घेर लिया। गर्मी में नारियल पानी अमृत के समान लगा, ड्राइवर ने संकोच के साथ उसका आनंद लिया। शायद उसे कल्पना नहीं थी कि उसकी सवारी उसे भी नारियल पानी पिला सकती है  । ओल्ड टाऊन का वास्तुशिल्प मुझे स्पेन की याद दिला रहा था। मेरी बिटिया दिव्या वेलेंसिया में पढ़ रही है, वहाँ अक्सर मेरा जाना होता है, वैलेंसिया मुझे बहुत पसंद है। वहाँ का वास्तुशिल्प पुराने मुंबई की याद दिलाता था और आज इन भवनों को देख कर मुझे फिर वैलेंसिया की याद आ रही थी, विशेष रूप से ओल्ड टाऊन। लेकिन यही वह इलाका भी था जहाँ पर्यटकों को विशेष सावधान रहने की आवश्यकता पड़ती है। हमने तो गर्मी के कारण गाड़ी में बैठे- बैठे ही ओल्ड चाऊन की सैर की।
हॉलर पार्क नामक चिड़ियाघर मगरमच्छ को भोजन करवाने का कार्यक्रम यहाँ का प्रमुख आकर्षण। जब हम वहाँ पँहुचे तो एक भी मगरमच्छ न था हम पानी में आँखें गड़-गड़ा कर देखते रहे। लेकिन समय होते ही पानी ने हलचल सी पैदा हो गई और हर दिशा से मगरमच्छ वहाँ इकठ्ठा होने लगे थे। उन्हें पता था कि अब भोजन आयेगा। पहले तो वे निर्जीव से पड़े रहे। निरापद- अनासक्त। मानो उन्हें कोई चाह-परवाह नहीं, कोई भी कुछ भी ले ले। लेकिन पहले टुकड़े के लटकते ही वे सब सजग हो गये। उनकी भावहीन-अनासक्त आँखों में एक खूँखार चमक आ गई। एक रस्सी से माँस के टुकड़े को मगरमच्छों को उपर डोरी से ऊपर नीचे किया जाता था और मगरमच्छ उसके लिये कम से कम दस-दस फुट ऊँची छलांग लगा देते थे। 6-7 माँस के टुकड़ों के लिये बीसियों मगरमच्छ। वह दृश्य अत्यंत रोमांचक था। मैं वहाँ खड़ी सोच रही थी कि भूल से यदि जीवित व्यक्ति इनके चंगुल में फँस जाए तो ये भी भेदभाव किये बिना उसे अपना तीक्ष्ण दाँतों से चबा डालेंगे। जिंदगी औऱ मौत के बीच का फ़ासला बहुत ही कम होता है। फिर भी जिंदगी में मोह कितना ज़बरदस्त होता है कि मगरमच्छ की चमड़ी के पर्स और जूते आदि बनाने के लिये उस जैसे खतरनाक जीव को भी नहीं छोड़ता इंसान। वहाँ दो बहुत बड़े-बड़े कछुए देखे जिनकी आयु 130 वर्ष के आसपास बताई गई। इतने बड़े कछुए को देख कर लगा कि कहीं यह ‘कछुए और खरगोश’ वाली कहानी का खरगोश तो नहीं है? फोर्ट जीसस देख कर जो मन व्यथित था वही मन अब प्रसन्न था। 
अगले दिन हम चल पड़े अफ़्रीका के घने जंगलों की ओर । भवानीप्रसाद मिश्र की कविता दो पंक्तियाँ याद आ गयीं- सतपुड़ा के घने जंगल… की तर्ज पर अफ़्रीका के घने जंगल , नींद में डूबे हुए से , ऊँघते अनमने जंगल। रात कमरे की बालकनी में बैठे आसमान निहार रहे थे।  आसमान में इतने तारे देखे हुए बरसों बीत गये थे। ऐसा लग रहा था कि अनगिनत सितारे टँकी स्लेटी चादर है।काश, शुक्ल पक्ष या चाँदनी रात होती तो हमारी नज़र की पँहुच रात में भी दूर तक होती। वन्य प्राणियों, भाँति- भाँति के पक्षियों झींगुरों ,  मेंढकों की समवेत आवाज़ें एक विशिष्ट लय में  आती थी। 
बुडुक……बुडुक…. बुडुक……बुडुक।
कुक्कुक्कुक्कुक, कुक्कुक्कुक्कुक…….
स्सिस्सिस्सि, हिस्सहिस्स।
चिक चिक चिक चिक 
ब्लमब्लमब्लमब्लम टर्र टर्र टर्र,
टिर्र, टिर्र,
शुकशुकशुकशुक
मानो सबने तय किया था कि किसके बाद कौन बोलेगा। उसी क्रम में बार बार । बीच में इन्हीं पशु पक्षियों , कीट- पतंगों का कोई अनजाना अतिथि भी अपना सुर मिला लेता था। सब कुछ अविश्वसनीय सा, बिसरा हुआ सा रहा था । कब नींद लगी पता ही नहीं चला। होटल की कॉरिडोर में झींगुरों के अलावा बैंगन के आकार के मोटे-मोटे काले कीड़ों मुलाक़ात हुई । ये मोटे कीड़े शायद अपने वजन और आकार के कारण उलटे हो गये थे और सीधे होने को हाथ- पैर  चला रहे थे। यही है कीड़े – मकोड़े सी ज़िंदगी । किसी में इधर से धक्का दिया किसी ने उधर से । न जीने में न मरने में। कोई अस्तित्व ही नहीं अपना । अस्तित्वहीन ज़िंदगी । आज कीड़े – मकोड़े सी ज़िंदगी वाले मुहावरे का सच देख रही थी। किंतु एक सच जो हम नहीं देख पाते । वह यह कि हम अस्तित्वदार लोग कितना डरते हैं इनसे। अब सोचने की बात हैकि अस्तित्व किसका हीन है?
प्रकृति से ही सब कुछ सीखा और उसे ही भुला दिया । सब ले लिया और देने के नाम पर कुछ नहीं। अब भी ले ही रहे हैं। फ़ैशन की दुनिया को ही लीजिये, कपड़ों के डिज़ाइन, रंग, रंग- संयोजन …. इतना कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन शहरीकरण ने जंगलों को खा लिया  और हमारी भूख ही ख़त्म नहीं होती। सब कुछ रीत जायेगा, तब क्या होगा? क्या यही है नवयुग की तैयारी ?
डॉ. वंदना मुकेश
35 Brookhouse Road, Walsall,
WS5 3AE
UK


डॉ. वंदना मुकेश
डॉ. वंदना मुकेश
वर्तमान में वॉलसॉल कॉलेज यू.के. में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका है और हिंदी लेखन में सतत संलग्न हैं। संपर्क - [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. वंदना मुकेश जी का संस्मरण महासागर के बीच की कथा यात्रा है। इस यात्रा में बहुत कुछ का स्मरण है। मानव के जींस कितने अपने और कितने पराए हैं, कितने निष्क्रिय और कितने सक्रिय है। हम जितने बौद्धिक होते जाते हैं उतनी ही मानव की विकास यात्रा पर हमारी आंखें टंक जाती हैं। यह स्वाभाविक है।
    समुद्र किनारे का किला जो अपने इतिहास में बर्बरता को समेटे हुए है। आज वीरान खड़ा है। मानो प्रायश्चित कर रहा हो मानव की दुर्दम महत्वकांक्षाओं का। संसाधन और बुद्धि बल से युक्त मानव भले ही हो गया हो पर जिंदगी तो कीड़े मकोड़े जैसी ही बिता रहा है। इसमें शंका है ही नहीं है।
    संस्मरण तो बढ़िया है पर पढ़ते वक्त ऐसा लगा जैसे कुछ छूट गया हो। क्या छूट गया है मैं नहीं बता सकता हूं। या हो सकता है कि लेखिका ने इसे जानबूझकर छोड़ दिया हो।अच्छी रचना के लिए बधाई आपको

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