फ़िल्म और टेलीविजन की दुनिया में संदीप मारवाह का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। नोएडा फ़िल्म सिटी के संस्थापक सहित मारवाह स्टूडियो और एशियन एकेडमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलीविजन के अध्यक्ष के रूप में संदीप मारवाह की पहचान न केवल भारत अपितु विश्व भर में फैली हुई है। यह पुरवाई परिवार के लिए प्रसन्नता का विषय है कि संदीप जी ने समय निकालकर पुरवाई टीम के सवालों के जवाब दिए हैं। इस बातचीत में संदीप जी ने अपने निजी और व्यावसायिक दोनों ही जीवनों के विषय में खुलकर बात की है। प्रस्तुत है।
प्रश्न – संदीप जी आपका जन्म दिल्ली में हुआ। मगर फ़िल्मों के लेकर आपकी इतनी परिपक्व सोच कैसे पैदा हुई कि आपने 26 साल की आयु में दिल्ली सरकार को फ़िल्म सिटी बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया?
संदीप जी – नमस्कार। जी, बिलकुल ठीक कहा आपने। हक़ीक़त तो ये है कि मैं अपने कॉलेज के दौरान थिएटर और क्रिएटिव आर्ट में बहुत ज़्यादा व्यस्त रहा था। वहीं से पहले फ़िल्मों और फिर एक्टिंग की तरफ़ मेरा रुझान हुआ। ये मेरी ख़ुशक़िस्मती थी कि मुझे कॉलेज और स्कूल दोनों ही में बहुत प्रोत्साहन मिला। मैं आर्ट और म्यूज़िक को लेकर बहुत ज़्यादा सक्रिय था, तो मेरे टीचरों ने भी आगे बढ़ाने की कोशिश की। चाहें वो नाटक हो, म्यूज़िक हो, रेसाइटेशन हो, इंटरेक्शन प्रोग्राम हो या स्पोर्ट हो, हर चीज में मुझे स्कूल और कॉलेज में बहुत प्रोत्साहन मिला। मुझे अच्छी तरह याद है कि एक दिन कॉलेज में प्रिंसिपल ने मुझे बुलाकर कहा कि यार मारवाह, तुम हर हफ़्ते अपनी कोई न कोई नई रिक्वायर्मेंट लेकर के आ जाते हो और कोई न कोई नई चीज़ के चक्कर में पड़े रहते हो, तो ऐसा करो कि तुम ख़ुद ही कॉलेज चला लो। तब किसे मालूम था कि उनके वो शब्द मेरा भाग्य बदल देंगे और एक दिन मैं ख़ुद कॉलेज का प्रिंसिपल बन जाऊँगा।
फिर दिल्ली में नाटकों का एक ग्रुप था, वहाँ मैं नादरा ज़हीर जी के साथ जुड़ गया। सौभाग्यशाली हूँ कि नादरा जी के साथ एंट्री डायरेक्शन में राज बब्बर, पंकज कपूर, नीना गुप्ता, अनुपम खेर, धीर और कविता जैसे अच्छे आर्टिस्ट के साथ मुझे काम करने का अवसर मिला। मुझे लगता है कि वहाँ से मुझे थोड़ी और प्रेरणा मिली। कॉलेज ख़त्म करने के बाद मेरी बड़ी इच्छा थी कि हिंदुस्तान का जो पुराना प्रीमियर फ़िल्म स्कूल है, वहाँ से एक्टिंग का एक कोर्स करूँ। लेकिन वहाँ जाने पर पता चला कि वहाँ एक्टिंग का कोर्स बंद हो चुका है। तब मेरी जिज्ञासा और जोश एक जर्क खा गई और लगा कि हज़ारों लोग भारत में फ़िल्म और टीवी के साथ जुड़ना चाहते हैं, लेकिन भारत का एक इंस्टीट्यूशन है और वो भी अपना एक्टिंग का कोर्स बंद करके बैठा हुआ है। ख़ैर, मैं फिर दिल्ली वापस आ गया और थियेटर करता रहा। टेलीविज़न में मुझे मौक़ा मिला। दिल्ली दूरदर्शन का एक चैनल था, जिसमें एक दफ़ा आपको काम मिल जाए तो फिर छ: महीने से पहले काम मिलता नहीं था। लाइनों में खड़े रहिए, ऑडिशन देते रहिए, लेकिन उनका ये तय किया हुआ था कि जो आज एक दफ़ा आ गया वो अगले छः महीने बाद ही टेलीविजन पर किसी रूप में आ सकता है। क्योंकि, एक ही चैनल था और हज़ारों कलाकार वहाँ मौजूद रहते थे।

ख़ैर, फिर एक दफ़ा मुझे मौक़ा मिला दिल्ली में, वहाँ एक फ़िल्म प्रॉड्यूसर मिस्टर एच एन रेड्डी आए हुए थे। उनसे मेरी मुलाक़ात हुई। मेरे पिताजी के अच्छे मित्रों में रहे मशहूर एक्टर ओम प्रकाश, बड़े डायरेक्टर व प्रॉड्यूसर प्रकाश मेहरा, सत्यम पाल चौधरी आदि भी, जब मेरे घर आते तो मुझे मोटीवेट करते थे कि, आइये-आइये, बंबई आइए, थोड़ी जान लड़ाइये तो कहीं न कहीं मौक़ा मिल जाएगा। मैं बंबई चला गया। वहाँ मुझे वही एच एन रेड्डी जो मुझे दिल्ली में मिले थे, ने मुझसे कहा कि मैं आपको अपनी फ़िल्म में लेना चाहता हूँ। तीन फ़िल्में उन्होंने मेरे साथ साइन कीं, उस वक़्त की तीन बड़ी हीरोइनों के साथ। मेरा इंटरेस्ट वहाँ जाग गया। लेकिन अफ़सोस की बात यह रही कि आदरणीय एच एन रेड्डी जी का स्वर्गवास हो गया और वो तीनों फ़िल्में बंद हो गईं। मैं निराश होकर दिल्ली वापस आ गया। इस बार मैंने ये सोच लिया था कि मैं जो कुछ भी करूँगा, दिल्ली में करूँगा। इसी ज़िद को लेकर मैं आगे बढ़ा और फिर 1986 के अंदर मैंने ये सपना देखा कि जिस चीज़ केलिए हम बंबई की तरफ़ भाग रहे हैं, वैसा ही कुछ दिल्ली में क्यों न हो! इस सपने को मैंने कागज पर उतारा, एक नक़्शा बनाया और उसे लेकर दिल्ली में गली-गली घूमता रहा कि कोई इसे उठा ले। मैं एलएनडीए, एमसीडी, दिल्ली सरकार सबसे मिला और कई दफ़्तरों में गया। लेकिन इन्होंने मेरी एक नहीं सुनी। कई लोगों ने तो मुझे बेवकूफ़ और पागल ही समझा कि, इसे फ़िल्मी कीड़े ने काट रखा है और ये नाटक या फ़िल्म करके दीवाना हुआ कागज लेकर घूम रहा है।
फिर मैं कहूँगा मेरी क़िस्मत अच्छी थी कि हमारी अपनी दुकान जो ख़ान मार्केट में मेरे भाई चलाते थे, वहाँ एक रोज़ जब मैं गया तो, मेरे भाई ने कहा कि, ये देखिए आपके सामने नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन खड़े हैं। आप इनसे मिलिए और इन्हें अपनी बात बताइये। योगेश चन्द्र जी तब नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन थे। उन्हें मैंने बताया कि एक फ़िल्म सिटी का सपना मैंने देखा है। अगर सरकार उसमें जुड़े और आपको ये ठीक लगता है, तो मैं ये प्रोजेक्ट आपको देना चाहता हूँ। उन्होंने ध्यान से मेरी बात सुनी और कहा कि आप कल परसो में मेरे दफ़्तर में आकर मिलिए। मैं एक-दो दिन बाद उनके दफ़्तर में अपनी फाइल लेकर चला गया। उन्होंने बड़े इत्मीनान से फाइल देखी और तब मैंने पहली दफ़ा किसी आईएएस ऑफिसर को कुर्सी से उछलते देखा। उन्होंने कहा, देखिए मेरे पास ज़मीन भी है और मुझे नई प्रोजैक्ट्स की ज़रूरत भी है। उन्होंने कहा कि आप इसे एक डिटेल प्रोजेक्ट बनाकर लाइए। इसे हम सबमिट करेंगे। तब लगा कि संदीप मारवाह तेरा काम होता नज़र आ रहा है।
1986 के दिसंबर का महीना था। मैंने दस दिन बाद एक पूरा प्रोजेक्ट बनाकर सबमिट किया और वो प्रोजेक्ट नोएडा अथॉरिटी के बलबूते पर लखनऊ में, तब के हमारे, चीफ मिनिस्टर आदरणीय वीर बहादुर सिंह जी के पास पहुँच गया। यह भी एक संयोग कहेंगे कि वीर बहादुर सिंह जी को फ़िल्मों का बड़ा शौक़ था और उन्हें ये प्रोजेक्ट बहुत अच्छा लगा। उस प्रोजेक्ट को लेकर फिर भले ही एक साल कभी लीगल डिपार्टमेंट तो कभी लैंड डिपार्टमेंट वग़ैरह में लगा। फिर दिसंबर, 1987 में ये प्रोजेक्ट यूपी की विधानसभा से पास हो गया। इसके बाद लोगों ने मुझे नोएडा का फाउंडर कहना शुरू कर दिया। फिर एक लंबी कहानी है, नोएडा फ़िल्म सिटी को तैयार करने की। लेकिन इस प्रोजेक्ट की सोच के पीछे, आठवीं-नौवीं से लेकर पूरी कॉलेज लाइफ़ और उसके बाद तक चौदह-पंद्रह साल का पूरा एक वनवास मैंने बिताया। मैं समझता हूँ कि किसी फ़िल्म स्कूल में मुझे एडमिशन न मिलना, बंबई में कामयाबी न मिलना और फिर मेरी ये ज़िद कि उत्तर भारत में ही काम करना है, जैसी कई चीजें इस प्रोजेक्ट के पक्ष में काम कर गई थीं।
प्रश्न – आपका रीना जी से विवाह 23 वर्ष की आयु में ही हो गया था जो कि आम तौर पर किसी लड़के के लिये छोटी मानी जाती है। क्या यह एक लव-मैरिज थी या फिर माता-पिता द्वारा तय की गयी शादी?
संदीप जी – बिल्कुल, माता-पिता द्वारा तय की गई शादी थी। हक़ीक़त तो ये थी कि, मैं उस वक़्त बिल्कुल भी मेंटली तैयार नहीं था और ना उस वक़्त शादी करना चाहता था। उम्र मेरी काफ़ी छोटी थी। मुझे फिल्म, टीवी, मीडिया, आर्ट-कल्चर का तो भूत सवार ही था और कुछ करके दिखा देना चाहता था।
मैंने थियेटर में तो अच्छा नाम दिल्ली में कमा लिया था। इतना पता है कि, आई वाज हाईएस्ट पेड एक्टर और मेरे साथ काम करने वाले नैशर स्क्रो ड्रामा के सभी आर्टिस्टों को कम मिलता था, मुझे सबसे जादा मिलता था। मैंने अच्छे नाटक किये, ख़ुद मैंने नाटक प्रोड्यूस किये, डायरेक्ट किये, एक्ट किये, स्टेज क्राफ़्ट किया तो सारी विद्याएँ मैंने नाटक में तो सीख ही ली थीं। टेलीविज़न में दूरदर्शन के सहारे मुझे काम मिलना शुरू हो गया था। एक छोटी सी recognition बन गयी थी। लोग जानते थे कि ये लड़का दिल्ली में काम करता है। इस बीच में पिता जी के business के साथ भी मैं जुड़ा ही रहा। क्योंकि जब मैंने 1978 में कॉलेज पास कर लिया था, मैं मात्र 18 साल का था। मुझे अपने पढ़ाई के दौरान स्कूल और कॉलेज में दो बार डबल प्रमोशन मिली। मैं 15 साल की उम्र में स्कूल पास कर लिया था और जो बाद में थोड़ा difficult भी हुआ मुझे कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए तो मुझे special letter इशू की गई बोर्ड से और स्कूल से कि भाई इसे डबल प्रमोशन दी गई थी। इसलिए ये एक साल आगे चल रहा है। और इसी तरीक़े से मैं अट्ठारह साल की उम्र में कॉलेज से बाहर हो गया, तो मैंने पिताजी के साथ काम करना शुरू कर दिया। पिता जी को ये लगने लगा कि लड़का बहुत mature हो गया है और मैं obedient स्टूडेंट और एक बहुत ही obedient बच्चा था। अपने माँ-बाप की हर बात को मानता था। मुझे लगता था कि माता-पिता के experience को आप absorb कर लें तो आपकी अपने ज़िन्दगी के हाथ जलाने वाले जो दिन हैं, वो कम हो जाते हैं।और इसी बीच में ये रिश्ता आया। छोटे-मोटे रिश्ते इधर-उधर से जरूर आते रहे होंगे। कपूर फैमिली का दिल्ली आने का कार्यक्रम बना जिसमें उनकी मदर-फ़ादर और रीना खुद एक शादी अटेंट करने आ रहे थे। उनकी कज़िन की शादी थी। हमारे एक कॉमन फ्रेंड से उन्होंने रेफ़र किया कि आप भी आइए। मेरे माता-पिता गए, लेकिन मैं नहीं गया। मेरा तो कहीं कोई विचार ही नहीं था कि शादी करनी है। ये बात वहाँ अधूरी सी हुई। उस दिन शाम को माँ-बाप वापस आ गए। लेकिन उन्होंने रीना को देखा और उन्हें रीन बहुत पसंद आई। उन्होंने आकर ये कन्विन्सिंग शुरू कर दी कि, भाई देखो ऐसा है कि तुम एक दफ़ा लड़की देख के हाँ-ना बोल दो ताकि उन लड़की वालों को भी संतोष हो जाए। अगर वो इस सोच से दिल्ली आए भी हैं तो। ये एक बड़ा अजीब सा माहौल हो गया मेरे लिए। वो लोग कुछ दिन दिल्ली रहने वाले थे। एक दिन का शायद गैप छोड़ के उसके अगले दिन कनॉट प्लेस के अंदर प्लाजा सिनेमा में एक जो थिएटर है, उसके उपर एक बहुत खूबसूरत सा फ्लैट है जहां रीना के मामा जी एफसी मेहरा जो ख़ुद चर्चित फ़िल्म प्रोड्यूसर और प्लाज़ा के मालिक रहे, उनके साथ हमारी वहाँ पर जनरल फ़ैमिली मीट हुई। चार-पाँच लोग उनकी ओर से, चार-पाँच लोग हमारी तरफ़ से। ड्राइंग रूम में बैठकर जैसे सब लोग बात करते हैं, वैसे ही वहाँ से बातों की एक हल्की सी सरसराहट शुरू हुई।
वहाँ पर मैंने जब रीना को देखा तो हक़ीक़त यही है कि मैं भी मोहित हो गया। शी इज़ वैरी नाइस गर्ल। मैं उनकी तमीज़, तहज़ीब और उनके बोलने के ढंग से प्रभावित हुआ, सिर्फ़ प्रभावित हुआ, लेकिन तय नहीं कर पाया कि, मुझे शादी करनी है या नहीं। ख़ैर, वो बात फिर एक दफ़ा अधूरी रह गई। हम लोग घर आ गए, वो लोग जवाब माँगते रहे। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। फिर एक दिन का गैप और आ गया और मेरे पिताजी ने बड़ी हिम्मत करके कहा कि मुझे लगता है कि लड़का-लड़की को खुलके बातचीत करने का भी मौक़ा देना चाहिए। फिर पिताजी ने हमारे घर पर एक डिनर रखा और उसमें सभी लोग शाम को आए। इसबार मुझे रीना से बात करने का मौक़ा भी मिला। हम लोग अलग से एक कमरे में बैठकर चर्चा करते रहे और शायद उस आधे घंटे के दौरान उन हालात, उन तौर-तरीक़ों और नज़ाकतों ने मुझे मजबूर किया या मुझे ऐसा लगा कि ये मेरे लिए हैं। वो शायद दिन था कि लव एट फ़र्स्ट साइट जैसा कुछ हुआ और मुझे लगा कि यकीनन हां कह देनी चाहिए। शायद वहीं से बात तय हुई, बाक़ी आगे तो कहानियाँ बन गईं; और फिर रिश्ता पक्का हो गया, और एक दिन के गैप के बाद, बल्कि उन्होंने ज़बरदस्त तैयारी कर दी और दोनों फैमिलियों के तक़रीबन 200 लोग मिले और एक बहुत तरीक़े से एंजेगमेंट फंक्शन दिल्ली में ऑर्गनाइज़ कर दिया गया। तो मुझे वो पुरानी बात याद आ जाती हैं कि मैरिजेज आर सेटल्ड इन हेवन।
प्रश्न – एक मामले में आप महान शोमैन राज कपूर के मुकाबले में आ खड़े होते हैं। उन्होंने जिस उम्र में आर.के. स्टूडियो की स्थापना की, लगभग उसी उम्र में आपने नोएडा फ़िल्म सिटी की स्थापना कर दी। पुरवाई के पाठकों को अपने इस अनुभव के बारे में बताइये।
संदीप जी – मैं समझता हूँ, ये ऊपर वाले का आशीर्वाद है, हमारे माता-पिता का आशीर्वाद है कि, मुझे एक एक्स्क्लूसिव काम करने का मौका मिला भारत के लिए, और क्योंकि बंबई में तो महाराष्ट्र की फिल्म सिटी बनी हुई थी, लेकिन और कहीं पे भी कोई दूसरी फिल्म सिटी देश में नहीं थी। मद्रास में फिल्म बिज़नस थोड़ा ज़रूर इस्टेब्लिश था, कलकत्ते में बहुत थोड़ा सा फ़िल्म बिज़नस इस्टेब्लिश था। इस तरह ये उत्तर-भारत की पहली और भारत की दूसरी फ़िल्म-सिटी तैयार हो रही थी। जिसको पास होने के बाद भी कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा और कई लोग तो इसके पास होने पे और इग्नोरेन्स होने के बाद भी इसे कोसते रहे। कुछ लोग ये कहते रहे कि ये कभी सफल नहीं होगी। कुछ लोग इसे 1970 में, जब सुनील दत्त भी एक दफ़ा गाजियाबाद के अंदर फिल्म सिटी बनाने का सपना लेकर आए थे और वहाँ पर उन्होंने एक भव्य कार्यक्रम में ये एनाउंस किया था। लेकिन उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ था। पिछली सरकारों ने भी कई बार ये सब बातें की थीं, कभी साउथ से आवाज आती थी, कभी नॉर्थ से, लेकिन कभी भी कोई कॉन्क्रीट जॉब नहीं हो पाया था।
जब ये फ़िल्म-सिटी पास हुई, तो एक बहुत बड़ा काम हुआ। क्योंकि ये कहते हुए मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है कि, ये इन सोलह स्टूडियो में से तक़रीबन साढ़े तीन सौ चैनल, एक सौ बासठ मुल्कों में प्रसारित हो रहे हैं, करीब सत्रह हज़ार लोग इस वक्त आठ घंटे की तीन शिफ्ट में यहां पर काम कर रहे हैं। जब फिल्म सिटी का सपना लेकर हम आगे बढ़े थे और नोएडा अथॉरिटी ने इस प्रोजेक्ट को पास कर दिया था तो हक़ीक़त तो यह कि कोई आना ही नहीं चाहता था। ढोल-नगाड़े बजाने पड़े दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास, बंबई में लोगों को बताना पड़ा कि नोएडा में फिल्म सिटी आने वाली है – आईये, आईये, अप्लाई करिये। कोई आने को राजी नहीं था। नोएडा को लोग कहते थे नो आईडिया, यूपी को लोग कहते थे उल्टा-पुल्टा। सोचिए, बहुत चोट पहुंचती थी और ऐसा लगता था कि लोग कितने नादान हैं, इनकी शिक्षा कितनी कमज़ोर है कि, ये लोग इस बात को भी नहीं समझ पा रहे हैं कि, आने वाले दिनों में ये एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट बन सकता है।
मुझे ख़ुद जाकर बंबई से, बोनी कपूर को, टूटू शर्मा को, एफसी मेहरा को लाना पड़ा। दिल्ली में मेरे दोस्त थे गुल्शन कुमार जी, जो म्यूजिक का काम करते थे, क्योंकि फिल्मों के साथ जुड़े हुए थे, उनको मैंने राजीऊ कर लिया था कि, आप आइए, आपको तो यहाँ पर आना ही पड़ेगा और वो बड़े खुश थे आकर। उन्होंने मेरे साथ हाथ बढ़ाया, बल्कि पहले थे वो, जिन्होंने मेरे साथ यहाँ पर प्रोजेक्ट में, अपना भी प्रोजेक्ट, अपनी भी एप्लिकेशन डाली। फिर पूरण चंद सरीन के साथ मिलकर, उन्होंने यहाँ एक प्लॉट अप्लाई किया।
जितेंद्र, जो हमारे चर्चित कलाकार हैं, उनके भाई, brother-in-law ने, apply किया। इस तरीक़े जो है फिल्मों का बनना शुरू हो गया और बड़े-बड़े चर्चित नाम जुड़ने शुरू हो गये। फिर इसी भीड़ में हम लोगों ने निवेदन किया यश चोपड़ा से, वो भी आ गए। विनोद पांडेय और डैनी दोनों ने मिलकर एक प्लॉट अप्लाइ कर दिया। इस तरह हम क़रीब 12 लोग हो गये थे, जिन लोगों को पहली अलॉट्मेंट हुई थी, और उसके बाद जब हवा बदली और देश भर में जब खबरें छपनी शुरू हो गई, तो सैकड़ों लोगों की लाइन लग गई। उसी नोएडा अथॉरिटी में जहां कोई अंदर घुसना नहीं चाहता था, वहाँ कतारों में बड़े बड़े नामी-गिरामी फिल्म प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एक्टर्स खड़े हो गए और मुझे याद है, अशोक ठकरिया, इंद्र कुमार, ऋषि कपूर, जैसे लोग लाइन में रहे, जो चाहते थे कि उन्हें भी अलॉट्मेंट हो। लेकिन तीन साल का समय दिया गया कि आप तीन साल के अंदर अपने भवन तैयार कर लेंगे और प्रोडक्शन में आ जाएंगे, ये मेरा सौभाग्य था।
मुझे लगा कि क्योंकि मेरा प्रोजेक्ट है, मैं फाउंडर कहला रहा हूँ तो मुझे सबसे पहले रेडी कर देना चाहिए और चारदिवारी बनाने के बाद और एक स्टूडियो पूरा तैयार करने के बाद हमने 10 मार्च 1991 को, क्योंकि 1988 में अलॉट्मेंट हुई और तीन साल का वक्त मिला और हमने मार्च 1991 के अंदर उत्तर-भारत के पहले प्रोफ़ेशनल फ़िल्म स्टूडिया का उद्घाटन कर दिया। 10 मार्च 1991 को हमारा उद्घाटन हुआ और बहुत सारे लोग बंबई से नोएडा पहुँचे। दो हजार से भी जादा लोग उस पूरे सेंटर में हमारे मारवाह स्टूडियो के प्रांगण में आ गए। एक हज़ार, जिन्हें बुलाया गया था, एक हजार वो जिन्हें अंदर नहीं बुलाया गया था; और भी बहुत सारे लोग वहाँ पर पहुँच गए। जब हम स्टूडियो बना के तैयार हो गए, एक बहुत बड़ी इनॉग्रेशन हुई तो बहुत सारे लोगों को ये यकीन हो गया कि अब फिल्म सिटी यहाँ आएगी और बहुत सारी फ़िल्मों व टीवी मीडिया एवं आर्ट-कल्चर का काम होगा। हमारी ख़ुद की अपनी जो प्रेस थी मीडिया वो भी लगी हुई थी। धड़ाधड़ किसी ना किसी तरीके से नेगटिव न्यूज़ बनाने में। शायद उन्हें मज़ा आता होगा। उस नेगटिव न्यूज़ बनाने का और मुझे कई बार जो पेपर नेगटिव लिखते थे, उसे बुलाकर उसे सीधी बात बताने पड़ती थी कि, आप फ़िल्म और टीवी मीडिया की बात कर रहे हैं तो, समझिए कि रातों-रात कोई जादू की छड़ी नहीं है कि, यहाँ पर लाइन लग जाएगी। मेहनत करनी पड़ेगी और बहुत मेहनत करनी पड़ी। दिन-रात एक करना पड़ा। लेकिन मुझे इतना पता है कि जब हमारी इनॉर्गरेशन थी तो उसमें मैं टेलीविज़न सीरियल दूरदर्शन का एक कमिशन प्रोग्राम था, उस पूरे सीरियल को मैं मारवाह स्टूडियो में ले के आया। उसकी पूरी शूटिंग वहीं हुई। क्योंकि मेरे पास ही ज़िम्मेदारी थी तो उसके अंदर हम लोगों ने प्रेम की जो शूटिंग थी, संजय कपूर को लेकर, वो वहां से शुरू की। पहला सेट लगा उस सेट को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे कि, फ़िल्म स्टूडियो क्या होता है। लोग उसे देखने के लिए वहाँ पर आते थे। वो एक चहल-पहल का कारण बन गया था। करते-करते वो और बात है कि हम लोगों ने मारवाह स्टूडियो से फिर से एक बार एक अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर लिया। मज़े की बात है कि तक़रीबन साढ़े चार हजार टेलीविज़न प्रोग्राम पचास से भी ज़्यादा चैनल के लिए करीब पांच हजार ट्रेनिंग फिल्मों का हमने निर्माण किया। करीब एक सौ बीस फ़ीचर फिल्मों के साथ हम जुड़े इंडोर-आउटडोर को मिला कर और और मेरी प्रोड़क्शन कंपनी ने यहां से करीब 3500 शॉर्ट फिल्मों का निर्माण किया।
इस तरह हम लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कोई दिन ऐसा खाली नहीं छोड़ा जब हमने दिन-रात मेहनत न की हो। क्योंकि पूरे उत्तर-भारत के अंदर फिल्म-टीवी मीडिया का कोई कल्चर नहीं था। लोगों को ध्यान ही नहीं था। दूरदर्शन की चारदिवारी को छोड़कर और ऑल इंडिया रेडियो को छोड़कर, किसी को कुछ पता ही नहीं था कि, फ़िल्म, टीवी, मीडिया में कैसे क्या हो सकता है। क्योंकि उन दोनों में जो एडवरटाइजिंग कंपनी थी, वो भी बंबई जाय करती थी और कोई अगर पैसा कमा लेता था तो फिल्म बनाने भी बंबई ज़ाया करता था। जिसे बहुत ज़्यादा लालसा होती थी, फ़िल्मों में काम करने की, किसी भी तरीके से, वो भी बंबई जाया करता था। तो एक बहुत बड़ा जो पर्पज़ लेकर हम चले थे कि, हमें यहाँ फ़िल्म-सिटी इस्टैबिलिश करनी है, फिल्म, टीवी, मीडिया का काम इस्टैबिलिश करना है, ताकि जो लोग उत्तर-भारत से इधर-उधर काम ढूंढने के लिए जाते हैं, उन्हें यहीं काम मिले। दिल्ली और आसपास के लोगों को पता चले। यहाँ एक बहुत बड़ा अट्रैक्शन सेंटर बने और उत्तर-भारत के लोगों को यहाँ काम करने का मौका मिले। इतना ही नहीं, यह भी कि दुनिया भर से जो भी लोग फ़िल्म की बात करते हैं, उन्हें भी यहाँ आने का मौका मिले। शुरू-शुरू में मानना ही था कि ऐसा हो सकता है आने वाले समय में कुछ होगा। आज देखिये 33 साल तो स्टूडियो को हो गए। जितनी मेहनत हमने की, ऐसा लगता है कि परमात्मा ने हमें उसका फल भी दिया है।


संदीप मारवाह जी को पूरा पढ़ा।काफी विस्तार से उन्होंने अपने सारे परिश्रम, सारी मेहनत का खाँचा खींच
दिया। मन में लगन हो और हौसला हो तो इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता।
उनके स्वप्न को, लगन को ,परिश्रम को सभी को सादर प्रणाम। सफलता उनके कदम चूमे।