Wednesday, April 8, 2026
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संपादकीय – तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय

इस संपादकीय किस्से के साथ मिस्ट्री जुड़ी है, तो आपको भी कुछ प्रतीक्षा तो करनी होगी। वरना क्या मज़ा आया कि पहले ही आप पर राज़ खोल दूं कि अंदर का मामला क्या है… मगर इस संपादकीय को पढ़ने के बाद आप जागरूक पाठकों को बताना होगा कि इस विषय पर आपकी क्या राय है। इस संपादकीय के अंत में थोड़ा खुल कर आपकी राय पूछूंगा।

इस सप्ताह आपके साथ एक ऐसी घटना साझा करने जा रहा हूं, जिस पर कहानी भी लिख सकता था। मगर ना जाने क्यों संपादक का निर्णय कहानीकार की सोच से अधिक मज़बूत साबित हुआ और यह मज़ेदार घटना आपके साथ संपादकीय लेख के तौर पर साझा कर रहा हूं। मगर बेचारा संपादक भूल गया कि लिखने वाला तो कहानीकार ही है। वो चाहे तो किसी भी रचना में कथा तत्व भरने की कुव्वत रखता है। 
इस घटना के माध्यम से आपको यह भी अंदाज़ा हो पाएगा कि पश्चिमी देशों में कानून व्यवस्था कुछ अलग किस्म की होती है। मैं एक दावा यह भी कर सकता हूं कि आज के कहानीनुमा संपादकीय पर एक बढ़िया सी फ़िल्म भी बनाई जा सकती है। मगर हमारे फ़िल्म निर्माता-निर्देशकों के पास ढंग का कुछ पढ़ने का समय कम ही निकल पाता है। वे उन्हीं घिसे-पिटे मुद्दों पर करोड़ों रुपये स्वाहा कर देते हैं। 
क्योंकि इस संपादकीय किस्से के साथ मिस्ट्री जुड़ी है, तो आपको भी कुछ प्रतीक्षा तो करनी होगी। वरना क्या मज़ा आया कि पहले ही आप पर राज़ खोल दूं कि अंदर का मामला क्या है… मगर इस संपादकीय को पढ़ने के बाद आप जागरूक पाठकों को बताना होगा कि इस विषय पर आपकी क्या राय है। इस संपादकीय के अंत में थोड़ा खुल कर आपकी राय पूछूंगा।
यह घटना फ़्रांस के एक शहर टुलूस की बताई जा रही है। फ़िलहाल टुलूस शहर का महत्व यही रहा है कि वहां एअरबस इंडस्ट्री अपने विमानों का निर्माण करती है। और इन्हीं विमानों ने अमरीका की बोइंग कंपनी को टक्कर देते हुए विश्व में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। फ़िलहाल टुलूस की इस विचित्र घटना ने पूरे विश्व का ध्यान इस शहर की ओर केंद्रित कर दिया है। 
ऐसी घटनाएं हर शहर में आमतौर पर होती रहती हैं। टुलूस में भी हुई। इस घटना के केन्द्र में तीन व्यक्ति थे। पहले व्यक्ति का नाम है ज्यां-डेविड ई. (Jean-David E) और अन्य दो व्यक्ति हैं दो चोर जिन्होंने ज्यां-डेविड का पर्स (Wallet) चुराया था। दरअसल उन्होंने ज्यां-डेविड का पीठ पर लादने वाला बैग ही चोरी कर लिया था जिसमें उसके काग़ज़ात और बैंक कार्ड रखे थे। 
यहां तक की घटना तो हर दूसरे शहर में घटती ही रहती है। इसके बाद जो कहानी में ट्विस्ट आया वो तो बॉलीबुड की किसी मर्डर मिस्ट्री में भी नहीं आ सकता। पहला काम तो ज्यां-डेविड ई. ने किया कि मामला पुलिस को रिपोर्ट किया। मगर अचानक उसे अपने मोबाइल फ़ोन में दिखाई दिया कि चोरों ने उसके कांटैक्टलेस क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल एक दुकान पर किया है जिसका नाम हे – Tabac des Thermes (इसे ब्रिटेन में न्यूज़ एजेंट्स कहा जाता है जहां समाचारपत्र, डबलरोटी, अंडे, सिगरेट, बिस्कुट, चॉकलेट और लॉटरी टिकट आदि ख़रीदे जा सकते हैं। 
यह दुकान ज्यां-डेविड ई. के घर से बहुत दूर नहीं थी। वह सीधा उस दुकान पर जा पहुंचा और उसने दुकानदार से पूछा कि उसका कार्ड किसने इस्तेमाल किया था। दुकानदार ने चेक करके बताया कि दो होमलेस दिखाई देने वाले लड़कों ने यह कार्ड इस्तेमाल किया था। उन्होंने करीब चालीस पाउंड यानी कि करीब चार हज़ार रुपये की ख़रीददारी की थी। मगर इस ख़रीददारी में एक अलग सी चीज़ भी ख़रीदी गई जिसे कहते हैं – स्क्रैच कार्ड !
स्क्रैच कार्ड
ज़ाहिर है कि पुरवाई के पाठकों ने शायद स्क्रैच कार्ड का नाम नहीं सुन रखा होगा। एक तो लॉटरी का टिकट होता है सीधा सादा जिसमें पैसे दिये जाते हैं और टिकट ख़रीद लिया जाता है। फिर लॉटरी का नतीजा निकलता है। यदि आपके नंबर आ गये तो आप करोड़पति वरना रोडपति तो आप हैं ही। मगर यह स्क्रैच कार्ड एक अलग किस्म की लॉटरी है।
इस कार्ड पर कुछ हिस्से या शब्द छपे रहते हैं जिन्हें हम किसी सिक्के से खुरचते हैं और नीचे से कुछ राशि उभर कर आती है जिससे पता चलता है कि आपकी लॉटरी निकली या मामला टायं-टायं फिस है। 
चोरों की किस्मत ने ऐसा ज़ोर मारा कि उन्होंने जो स्क्रैच कार्ड ख़रीदा था उसमें से चार लाख पाउंड से अधिक यानी कि चालीस करोड़ रुपये से अधिक की लॉटरी निकल आई। अब उनके लिये परेशानी कि वे इस राशि को क्लेम कैसे करें। उन्होंने तो चोरी के क्रेडिट कार्ड से स्क्रैच कार्ड ख़रीदा था। और दूसरी तरफ़ ज्यां-डेविड ई. ने इस बारे में पुलिस को रिपोर्ट भी लिखवा दी थी।
अब चोर भी परेशान कि लॉटरी के पैसे कैसे वसूल किये जाएं और ज्यां-डेविड ई. भी इस सोच में कि उसे क्या करना चाहिये। उसे जानकारी मिल चुकी थी कि चोरों ने स्क्रैच कार्ड उसके क्रेडिट कार्ड से ही ख़रीदा है। ज्यां-डेविड ई. के वकील पिरये डेबुइसन ने स्थिति को समझाते हुए बताया कि, “चोर लॉटरी जीतने के चक्कर में इतने ख़ुश थे कि वे दुकान से ख़रीदी हुई सिगरेट और अपना सामान वही भूल गये और पागलों तरह व्यवहार करते दुकान से बाहर चले गये।”
ज्यां-डेविड ई. का मानना है कि यदि चोर स्वयं जीत का पैसा लेने का दावा करते हैं तो उन्हें गिरफ़्तारी का पूरा डर है। यह संभव है कि पुलिस उनसे पूरी रकम ही ज़ब्त कर ले। क्योंकि वस्तुस्थिति यह है कि पुलिस ने स्क्रैचकार्ड जारी करने वाले राज्य के लॉटरी ऑपरेटर फ़्रेंकेज़ दि ज्यूक्स (FDJ) को चोरी के बारे में पहले ही सचेत कर दिया था। 
ज्यां-डेविड ई. ने स्पष्ट रूप से इस बात को स्वीकार किया है कि उन चोरों के बिना वह लॉटरी नहीं जीत सकते थे और चोर उनके क्रेडिट कार्ड के बिना स्क्रैचकार्ड ख़रीदने की स्थिति में नहीं थे। ऐसी अनहोनी घटनाएं जीवन में रंग पैदा करती रहती हैं। स्थिति एकदम अविश्वसनीय लगती है मगर है मज़ेदार! सच तो यह है कि ज्यां-डेविड ई. का वकील यहां तक कह रहा है कि जैसे हालात उभर कर सामने आए हैं उनके कारण उनका मुवक्किल अब चोरों पर केस ना करने के बारे में सोचने लगा है। सच तो यह है कि ज्यां-डेविड ई. प्रसन्न है कि उसका क्रेडिट कार्ड चोरी हुआ और उसके कार्ड से ख़रीदे गये स्क्रैच कार्ड से लॉटरी निकल आई है। 
वकील का मानना है कि जीत के पैसे इतने हैं कि इन दो चोरों का पूरा जीवन बदल सकता है। हम उन्हें एक ऐसा प्रस्ताव दे रहे हैं, जिसमें उनका भी लाभ है और मेरे मुवक्किल का भी। ना उन्हें जेल की हवा खानी पड़े और ना ही हमारे मुवक्किल का ही कुछ नुक़सान हो। हमारा प्रस्ताव यह है कि चोर उस लॉटरी से मिलने वाले पैसे मेरे मुव्वकिल के साथ आधे-आधे- बांट लें। मेरा मुवक्किल उनके विरुद्ध लिखवाई गई शिकायत पुलिस से वापिस ले लेगा और उन पर कोई कानूनू कार्यवाही नहीं करेगा। इससे दोनों पक्षों की बल्ले-बल्ले है। 
अब समस्या यह है कि फ़्रांस के नियम इस मामले में ख़ासे सख़्त हैं। स्क्रैच कार्ड खुरचने और लॉटरी निकलने के तीस दिनों के भीतर अवधि समाप्ति की तिथि आ जाएगी। उसके बाद ये पैसे ना तो चोरों को ही मिलेंगे और ना ही ज्यां-डेविड ई. को। ज़ाहिर है, इस से नाराज़ ज्यां-डेविड ई. उन चोरों पर कानूनी कार्यवाही भी करेगा और अपना चुराया हुआ सारा माल भी वापिस मांगेगा। चोरों को प्रस्ताव मीडिया के ज़रिये भेजा गया है। लॉटरी बोर्ड के अनुसार अभी तक किसी ने लॉटरी राशि के लिये संपर्क नहीं किया है। देखना यह है कि चोर क्या निर्णय लेते हैं।
पुरवाई के पाठक भला क्या सोचते हैं… चोरों को ज्यां-डेविड ई. का प्रस्ताव मान लेना चाहिये या सारे पैसों के साथ-साथ अपना भविष्य भी डुबा देना चाहिये?
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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63 टिप्पणी

  1. जेल जाना तो हर हाल में होना चाहिए : न्यायव्यवस्था मजबूत साबित हो : यानी चोर ऑफर भी स्वीकार करे और जेल भी जाना पड़े-

  2. संपादकीय – तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय काफी मौजूं संपादकीय है। आज का यह संपादकीय अलग तरह का है। इसे एक कथात्मक संपादकीय भी कह सकते हैं जो सत्य घटना पर आधारित है। ज्यां डेविड ई नाम के व्यक्ति का दो चोर पूरा बैग चोरी कर लेते हैं।चोर उसके स्क्रेच कार्ड से लाटरी जैसा टिकट खरीद लेते हैं। उस टिकट से चार करोड़ की लाटरी लग भी जाती है पर उस लाटरी का पैसा न तो अकेले ज्यां महोदय निकाल सकते हैं और न ही वे चोर। ऐसी बात वहां का कानून कहता है। अखबार में इश्तहार देकर ज्यां चोरों से समझौता करके पैसा निकाल लेना चाहते हैं। इसके बाद कहानी नेपथ्य में चली जाती है। बाद के घटनाक्रम को संपादक महोदय जी ने पाठकों पर छोड़ दिया है कि क्या वे आपस में मिल बैठकर पैसे बांटेंगे या नहीं। जबकि इससे पहले ज्यां ने पर्स चोरी की रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखवा दी है।
    भाई हम फ्रांस को नहीं जानते हैं और न वहां के चोरों की आदत के बारे में जानकारी रखते हैं। हम तो भारतीय है। मैं चोरों के स्थान पर होता तो सबसे पहले ज्यां से गर्मजोशी से मिलता, और कहता कि भाई ज्यादा लफड़े में मत पड़ो (तुमने जो रिपोर्ट लिखा दी है)हम साथ-साथ चलते हैं। और चलकर आधा-आधा पैसा बांटते हैं। ट्विस्ट यहां पर भी आ सकता है कि ज्यां पैसे निकालकर उन्हें पुलिस के हवाले कर सकता है।
    खैर इसकी क्या फिकर। पहली बार जेल थोड़े गए हैं जो उस अदने से आदमी से डरें। जेल की चिंता नहीं है। फिर एक कहावत है -‘ No risk No gain’ । भाई बहुत कुछ पाने के लिए खतरे तो उठाने ही होंगे। झूठ न बोल रहे,खतरा उठा लेंगे।
    क्या बात है सर ! एकदम नई तरह का संपादकीय लिखा है आपने।इसके लिए तेजेन्द्र सर जी को हार्दिक बधाई।

  3. समय और वक्त की नज़ाकत देखते हुए निर्णय लेना मुश्किल है की जेल भेजना है की रूपयों का बंटवारा करना है, क्या जेल जाने के बाद भी कर चोरी करना बंद कर देगा शायद नहीं किसी भी देश का कानून कितना भी कड़क क्यों ना हो वहां पर भी वारदातें होती ही रहती हैं, इंसान को जीने के लिए अपनी जरूरत है पूरी करने के लिए सबसे ज्यादा धन की आवश्यकता होती है धन की कमी ही इंसान को कर बनती है तो सबसे बेहतर होगा की खुली हुई लॉटरी का रुपया 50-50 करके दोनों पार्टियों को पार्टी मनाना चाहिए। तुम भी खुश हम भी खुश जियो और जीनेदो।

    डॉ प्रियंका सोनी “प्रीत” जलगांव

  4. स्थिति तो बहुत रोचक है। चोरों को प्रस्ताव ज़रूर मान लेना चाहिए चाहे कुछ दिन जेल में क्यों न बिताने हों। हां! आत्मसमर्पण करने से पहले ये निश्चित कर लेना चाहिए कि आधी राशि उन्हें मिलेगी ही, अन्यथा…
    ‘माया मिली ना राम’ वाली स्थिति होगी।
    इससे यह भी अनुभव हुआ कि लक्ष्मी की कृपा चोरी से भी प्राप्त हो सकती है। यानी समदर्शी हैं मां लक्ष्मी, चोरों और सज्जनों के साथ, तो कृपा पाने के लिए………….
    आगे क्या कहूं? आप सभी समझदार हैं।

  5. आनंद आ गया सर आज तो
    देखिए अगर मैं चोर होती तो उनका प्रस्ताव जरूर मान लेती और अगर मेरा क्रेडिट कार्ड चोरी हुआ होता तो मैं उन चोरों से कुछ न लेती सिर्फ उन पर कानूनी कार्रवाई करती ….क्रेडिट कार्ड जरूर मेरा होता लेकिन किस्मत तो चोरों की ही है….
    ये संपादकीय सच में बॉलीवुड पढ़ लें तो एक बेहद शानदार सस्पेंस फिल्म तैयार हो जाएगी

  6. तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय! नए ढंग का रोचक संपादकीय लिखा है आपने तेजेंद्र जी।
    मेरे विचार से तो सभी यह लिखेंगे कि चोरों को उनका प्रस्ताव मान लेना चाहिए।
    ज्यां डेविड ई को पुलिस से केस वापस ले लेना चाहिए और चोरों से मिलकर आधा- आधा पैसा बांट लेना चाहिए! इंसाफ तो यही कहता है।

    • यह एकदम प्रेक्टिकल तरीका है सोचने का। मगर एक ही डर है कि कहीं दोनों पक्षों में से कोई एक गड़बड़ ना कर दे…

  7. सम्पादकीय पढ़ कर कहानी का मजा आ गया , लेकिन जो बहस आपने छेड़ी है वह पाश्चात्य देशों में ही संभव है हमारे यहाँ तो तफ़सीस करने वाला पुलिस इंस्पेक्टर ही मिल मिला कर, सेटिंग करके लाटरी का इनाम पॉकेट कर लेता

  8. कुल मिलाकर इस रोचक सम्पादकीय का लब्बोलुआब ये है कि इन चोरों और हमारे देश के कुछ नेताओं में ज़्यादा फ़र्क नहीं। मुम्बईया बोली में इसको कहते हैं माण्डवली करते हैं ना भिड़ू

  9. वाह! ग़ज़ब किस्सागोई। फिल्म तो बनेगी ही इस पर। भारत में अगर ऐसा हुआ होता तो अब तक चोर और पुलिस दोनों मिलकर खेल कर चुके होते।

  10. अपना सिगरेट और समान वहीं भूल गये और पागलों की तरह व्यवहार करते चले गये…
    अनायास मिली सम्पति के बाद मानसिक संतुलन बिगड़ने की घटनाएँ पहले भी सुनते रहे हैं।
    मीडिया से खबर देने के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला।
    सबसे पहले ज्यां को चोरी की रिपोर्ट वापस ले लेनी चाहिए।कार्ड को ब्लॉक करा दें और माया के जाल से निकल के खुद को पागल होने(अवसाद में जाने) से बचा लें।

  11. डूब जाने से बेहतर है सन्धि कर लेना.. मुझे तो ऐसा ही लगता है सर

  12. बहुत मज़ेदार सम्पादकीय जितेन्द्र भाई: आपने पूछा है कि चोरों को क्या करना चाहिये। कुछ भी कहने से पहले इन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है।
    1. ज्यां-डेविड ई (JDE) ने घटना की रिपोर्ट पुलिस में लिखवा दी।
    2. पुलिस ने लॉट्री टिकट के बारे में FDJ को ख़बर दे दी है।
    3. लॉट्री का टिकट अभी कैश नहीं हुआ है।
    4. सब हालात को जानते हुए भी क्या सरकार JDE के वकील को उसकी पुलिस में जो शिकायत लिखी है उसको वापस लेने की इजाज़त देगी।
    5. आख़िर फ़्राँस के अपने भी तो कुछ कानून हैं।
    यदि चोरों तक JDE का पब्लिक मीडिया पर भेजा मैसेज मिल भी गया तो वो तो यही चाहेंगे कि अगर आपस में इस रकम को आधा आधा बाँट ले तो उसी में फ़ायदा है। सब से पहले तो उन्हें JDE से सम्पर्क करने में बहुत डर लगेगा, फिर भी अगर हिम्मत करके अगर उन्हों ने JDE से कॉन्टैक्ट किया भी तो चोरों को शायद ऊपर लिखे हालात का अन्दाज़ा न भी हो। उन्हें शायद तीस दिन की मुहल्लत का भी पता न हो। इसी चक्कर में अगर तीस दिन बीत गए तो JDE और चोरों को कुछ नहीं मिलेगा। जहाँ तक JDE का उन चोरों पर कानूनी कार्यवाही करने का सवाल है तो अगर वो कामयाब हो भी गया तो उसको केवल उसका बस्ता ही मिल जाएगा, जीती हुई रकम नहीं।
    आपके सवाल का जवाब है कि चोरों को JDE का प्रस्ताव मान लेना चाहिए लेकिन यह मामला इतना सीधा नज़र नहीं आता जितना दिखता है। इस में बहुत सारे दाँव पेच हैं।

  13. पहली बात तो ये है सर. . . ये संपादकीय केवल नाम का (शुरू की कुछ बातों को छोड़ दे तो) ही है। ये तो पूरी तरह ‘कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा’ के कथा कौशल की बानगी है जिसे हम पहली बार किसी संपादकीय के ज़रिए पढ़ रहे हैं; बहरहाल बात करते हैं मुद्दे की।
    इस केस को हमें फ़्रांस के स्तर पर ही देखना होगा (क्योंकि भारत में तो क़ानूनी स्तर किसी केस को मनचाहा रूप दे देना कोई बड़ी बात नहीं है) जहाँ कानूनी तौर पर कुछ हेर-फेर करना बहुत कठिन होगा। इस केस में मेरी नजर में दो ही ऑप्शन है और दोनों ऑप्शन उन चोरों के पास ही हैं; पहला ऑप्शन यही है ‘तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय’ लेकिन इसे करने के लिए उन्हें उसी शॉपकीपर (रिस्क तो लेना ही होगा, क्योंकि पैसा मिलने के बदले सजा मिलने के चांसेस ज़्यादा हैं) के ज़रिए किसी ‘डील’ को करने की कोशिश करें, और फाइनल होने के बाद सामने आएं और दूसरा ये कि वह उस स्क्रेच कार्ड को हमेशा के लिए भूल जाएँ और अपने पहले जीवन की ओर लौट जाएँ। वैसे इस पूरे घटनाक्रम में एक बात तो साफ नज़र आ रही है कि, स्क्रेच कार्ड की पेमेंट किसी को भी मिलना संभव नजर नहीं आ रहा क्योंकि, प्राइज देने वालों के नजरिए से देखे तो स्क्रेच कार्ड का वास्तविक विजेता होने का दावा घटनाक्रम में शामिल कोई भी व्यक्ति नहीं कर सकता।
    आपके इस इंट्रेस्ड संपादकीय कम कहानी के लिए ढेरों बधाईयाँ तेजेन्द्र सर।

  14. अत्यंत रोचक! मेरे विचार में चोरों को आत्मसमर्पण कर लेना चाहिए और अवश्य जीती हुई राशि भी बँट जानी चाहिए… हो सकता है कि चोर इसके बाद चोरी करना छोड़ दें।
    पर कानून के हिसाब से और एक जिम्मेदार नागरिक के हिसाब से… डेविड को केस करके अपनी चोरी की गई धनराशि ही वापस ले लें….

    धन्यवाद

  15. हां अखबारों में यह खबर आई थी। आपने विस्तार से बता दिया। हमारे तो लाटरी के अनुभव इतने खराब हैं कि जहां भी लाटरी का नाम तक आ जाता है मैं विमुख हो जाता हूं। बहरहाल देखते हैं आगे क्या होता है।

    • अरविंद भाई, मैं एक बार भगवान से शिकायत कर रहा था कि मेरी लॉटरी नहीं लगती। उसने बहुत प्यार से कहा, “बेटा, पहले लॉटरी का टिकट ख़रीदो तो सही…”

  16. कहानी भी, नाटक भी फ़िल्म भी रोचक, विस्मयकारी ,संदिग्ध जैसी कहानी
    कमाल की उलझन है ।
    Dr Prabha mishra

  17. रोचक संपादकीय। संपादकीय की हेडिंग में ही उत्तर छिपा है। ज्यां-डेविड ई. चोरी की रिपोर्ट वापस लेकर समझौता कर लेना चाहिए वरना कोर्ट के चक्कर में एक महीने का समय बीत जायेगा।
    तभी दोनों पक्षो की जय हो पायेगी।

  18. पुरवाई के अद्यतन अंक में प्रकाशित संपादकीय को देखकर भारतीय संस्कृति के दो काल जयी रचनाओं और पात्र एक साथ सामने आ गए।
    इनमें से एक तो है विष्णु गुप्त द्वारा लिखित या रचित सही अर्थों में पंचतंत्र की कहानी और दूसरा बेताल पच्चीसी।
    आदरणीय संपादक और अग्रज तेजेंद्र शर्मा ने अब की बार समूचे पाठकों जिनमें भारतीय जनमानस से लेकर वैश्विक जनमानस के लोग शामिल हैं उनके सामने बड़ी ही व्यावहारिकता को सामने रखकर चतुराई से प्रश्न रख दिया है ।ठीक बेताल की तरह से , कि बोलो राजा विक्रमादित्य, अगर सत्य जानते हो तो समाधान दो समाधान दोगे तो मैं पेड़ पर उड़कर वापस चला जाऊंगा ।
    सत्य जानते हो समाधान नहीं दोगे तो तुम्हारे सर के 100 टुकड़े हो जाएंगे ठीक वैसा ही संपादकीय लिखा गया है।
    चोरों ने एक व्यक्ति के क्रेडिट कार्ड चुराई,चोरी किए गए क्रेडिट कार्ड से सामान खरीद लिया।यह संयोग है कि उसमें 40 करोड़ पाउंड की लॉटरी निकल आई।
    अब यदि व्यावहारिकता को सामने रखें और भौतिकता को सर्वोपरि माने तो चोरों का साथ देने की बात बनती है ताकि जीवन यापन बहुत अच्छे तरीके से हो जाए ।
    कब्र का मुनाफा कहानी याद आ रही है।
    यदि हम भारतीय मूल्य या वैश्विक नैतिक मूल्यों की बात करते हैं कि संसार से कुछ भी साथ लेकर नहीं जाएंगे जिस प्राकृतिक अवस्था में आए थे उसी प्राकृतिक अवस्था में रखकर भेजा जाएगा तो फिर सत्य का साथ देने की बात आती है ।
    फिलहाल बहुत ही शानदार संजीव जीवंत संपादकीय के लिए संपादक महोदय को हृदय से बधाई

    • भाई सूर्यकांत जी आपने तो मुझे भी चंदामामा के विक्रम और बेताल की याद दिला दी। कितनी मज़ेदार बात है कि पढ़ने वाला किसी भी रचना को कितनी ख़ूबसूरती से बयान कर सकता है। आपका स्नेह अमूल्य है।

  19. संपादकीय बहुत ही प्रभावशाली है। निश्चित रूप से अगर बॉलीवुड/हॉलीवुड फ़िल्म बनाई गयी तो इंटरेस्टिंग होंगी जिन्हें अंत के दृश्यों को किन्हीं और एंगल्स से फिल्माया जाएगा। पर दोनों की एप्रोच और स्टोरी लाइन अलग होगी।

  20. सच्ची घटना पर आधारित बहुत मजेदार संपादकीय तुम्हारी भी जय जय ।मुझे लगता है चोरों को समझौता कर लेना चाहिए किंतु यह इतना आसान नहीं होगा क्योंकि चोरी की रिपोर्ट भी लिखवाई जा चुकी है और अखबारों में भी प्रकाशित हो चुका है । अब निर्भर करता है कि फ्रांस की सरकार और कानून क्या निर्णय लेते हैं ।

  21. सचमुच इस बार का संपादकीय पढ़कर आनंद आ गया.।आगे क्या होगा इसकी उत्सुकता बनी हुई थी कि कहानी ‘ब्रेक के बाद ‘फिर मिलते हैं कि तर्ज पर रुक गई और मस्तिष्क की उधेड़बुन शुरू हो गई….वैसे मुझे लगता है चोरों को ज्या डेविड ई की बात मान लेनी चाहिए और फिर उन पैसों से कुछ अच्छा काम शुरू कर देना चाहिए।…जया तो जय के पक्ष में ही रहेगी।

  22. अदरणीय तेजेन्द्र जी।

    यह संपादकीय अजब- गजब टाइप लगी।
    इस संपादकीय ने सबके दिमाग के जासूसी विभाग को सक्रिय कर काम पर लगा दिया।

    अगर प्रथम दृष्ट्या सोच पर अपनी बात कहें तो पुलिस से कंप्लेंट वापस लेकर दोनों को सहमति से पैसे आधे-आधे बाँट लेना चाहिये।यही ख्याल मन में आया।
    पर प्रश्न यहाँ और भी भी है-
    हिस्से 2या 3? यह प्रश्न भी जायज़ है।यहाँ थोड़ी विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।यह समझौते की बैठक के समय तय होगा और अगर शांतिपूर्ण ढंग से सब हो जाये तो सब ठीक वरना बात बिगड़ भी सकती है। पैसा अच्छा है, जरूरी है, जरूरत है; पर बहुत बुरी भी है ।उसके साथ बहुत सी बुराइयाँ भी जुड़ी हैं।जिसके पास कुछ नहीं होता उसे जब बहुत मिलता है तो विवेक नष्ट हो जाता है। उसकी सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह किसी भी तरह के पाप करने के लिए भी तैयार हो सकता है। जैसा कि उतावलापन नजर आया कि जो सामान खरीदा था वह भी छोड़ गये दोनों चोर।

    क्योंकि बड़ी रकम है और किसी का भी भविष्य बदलने में सक्षम‌ तो सोच भी बदलने में सक्षम है। चोरों को दुबारा चोरी करने की जरुरत नहीं पड़ेगी यह भी सही। बशर्ते उन्हें पैसा मिल जाए।या मिलने की गैरेंटी हो।

    फिर – जो लोग लॉटरी निकालते हैं उनके अपने भी कोई नियम होते होंगे।उसे भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। चोरी के पैसों से कार्ड खरीदा गया हैऔर स्क्रैच कार्ड खुला है यह खबर तो सभी तक भी पहुँच गई है। किसके पैसे से कार्ड खरीदा गया!किसने खरीदा!

    ऐसी स्थितियों में रिपोर्ट वापस लेना संभव है या नहीं यह तो पुलिस फ्रांस अपने नियमों के तहत तय करेगी।सिर्फ रिपोर्ट लिखाने वाले के रिपोर्ट वापस लेने से काम नहीं चलेगा जबकि एक बड़ा अप्रत्याशित सच सबके सामने है? इस सिचुएशन में रिपोर्ट वापस लेने का अधिकार रिपोर्ट लिखाने वाले को है या नहीं यह तो पुलिस स्वयं तय करेगी।

    चोरी तो चोरी ही है और फिर चोर भी चोर।
    सामने आने पर चोर का पकड़ा जाना तो पक्का है। पुलिस पुराने रिकॉर्ड भी देखती है कि किसी पुरानी चोरी के तहत उसका नाम तो नहीं है। अगर यह सच है तो चोर कभी सामने नहीं आएँगे क्योंकि वे यह भी जानते हैं कि इस अपराध के लिए बच भी जाएँ तो भी पिछले अपराधों के लिये पकड़ा जाना स्वाभाविक है।
    और अगर ऐसा है तो चोर कभी भी सामने नहीं आएँगे।

    बैंक गवाह है जिसके क्रेडिट कार्ड से टिकट खरीदी गई। ईनाम उसी को देना चाहिये और चोरों के सामने आने पर उन्हें जेल।चोरी तो आखिर चोरी है।पहली बार संपादकीय चार-पाँच बार पढ़ा हमने पर दिमाग चकरघिन्नी हो रहा है परिणाम को लेकर।
    सभी पशोपेश में हैं।वह जिसका बाग गया, दोनों चोर भी ,वहाँ की सरकार भी, जिसे लॉटरी के पैसे देने हैं वे भी, और पुलिस भी। बाकी दुनिया को रिजल्ट का इंतजार है।
    वैसे एक बात हमारे दिमाग में आ रही है कि जब भी इस तरह के कामों का कोई क्रियान्वयन होता है , उसमें विवाद की स्थिति संभावित होती है, तो जो नियम होते हैं उनमें एक नियम यह भी होता है कि किसी तरह का विवाद उपस्थित होने पर–(न्यायालय के स्थान का नाम-)—वहाँ निराकरण होगा।
    कुछ इस टाइप से।
    तो सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और यह सिर्फ न्यायालय के ऊपर डिपेंड करता है। कि न्यायालय का ऊँट किसी भी करवट में बैठ सकता है।
    विक्रमादित्य वही ही है क्योंकि उसी का निर्णय मान्य होगा।
    यह भी सत्य है कि अपने देश में यह घटना होती तो अभी तक निर्णय हो चुका होता। और शायद किसी को पता भी ना चलता।
    इस संदर्भ में एक छोटी सी कहानी याद आ रही है-दो बिल्लियों को एक रोटी मिली दोनों में उसे रोटी के लिए झगड़ा हो रहा था इतने में एक बंदर आया और उसने कहा -मैं बराबर -बराबर बाँट देता हूँ।
    बंदर तराजू ले आया उसने रोटी के आधे- आधे टुकड़े करके दोनों पलड़े पर रखे। हर बार किसी एक टुकड़े का वजन ज्यादा होता और वह पलड़ा झुक जाता फिर बंदर उसमें से थोड़ी रोटी तोड़कर खा लेता। अंत में पूरी रोटी बंदर खा गया।
    वह तीसरा कौन है जिसे यह फायदा पहुँचने वाला है यह तो राम जाने लेकिन अगर समझौता हो जाता है तो तुम्हारी भी जय-जय हमारी भी जय-जय निश्चित है।न तुम हारे न हम जीते।

    बिल्ली के भाग से छींका टूटा है इसका लाभ तीनों को मिल जाए तो अच्छा।
    इस बार हर शख्स के दिमाग को परीक्षित करने के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का डबल आभार।
    अब एक माह तक का इंतज़ार सबको रहेगा।

    • नीलिमा जी, मैं तो पुरवाई के सेवा की ऑफ़र भी कर रहा हूं। पुरवाई इस लॉटरी के पैसों में से एक तिहाई का भार उठाने को तैयार है। इससे हम हों ना हों… पुरवाई सब को महसूस होती रहेगी…

  23. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने इस बार के संपादकीय में पाठकों के सामने एक शानदार चुनौती रखी है कि वे अपने बुद्धि कौशल से तय करें कि फ्रांस के एक छोटे से शहर में हुई चोरी के पीड़ित को क्या करना चाहिए और हाँ, इसके साथ ही पाठकों को फ्रांस के नियमों को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है। निस्संदेह यह पहेली कुछ उसी तरह से उत्तर की मांग करती है कि पहले मुर्गी आई या अण्डा। हालांकि वैज्ञानिकों ने इस प्रश्न का उत्तर इसी साल ढूंढकर बता दिया है कि पहले मुर्गी ही आई थी। कुछ विद्वान पाठक इसकी तुलना भारत की सुप्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य और बेताल की कथा से जोड़ कर देख रहे हैं, जिसमें बेताल कहानी सुनाने के बाद दो उत्तर रखता था जिसमें गलत जवाब देने पर विक्रमादित्य के सर के सौ टुकड़े होने की पूरी गारंटी दी जाती है। संपादक महोदय की चुनौती कुछ ऐसी लग भले रही हो, लेकिन इसके गलत जवाब से संपादक जी बेताल बनकर न तो हमारे सर के सौ टुकड़े करने वाले हैं न ही इससे चोरों और पीड़ित के अलावा किसी का कोई नफ़ा नुकसान होने वाला भी है।
    मैं अपनी सीमित बुद्धि से इसके तीन उत्तर देख पा रहा हूँ। पहला उत्तर नैतिकता से जुड़ा हुआ है, जिसमें पीड़ित एक अच्छे शहरी होने का परिचय देते हुए दोनों चोरों को पुलिस से पकड़वाकर सजा दिलवाए लेकिन ऐसा होना नामुमकिन है क्योंकि पीड़ित के वकील ने चोरों से अपील कर दी है कि वे उससे मिलें और तीनों लोग लॉटरी की जीती हुई धनराशि को आपस में बाँट लें। इसलिए इसका दूसरा उत्तर यह उचित है कि करोड़ों रुपए को यूँ ही लॉटरी कंपनी को वापस लौटाने से बेहतर होगा कि फ्रांस के नियमानुसार एक माह के भीतर चोर पीड़ित के पास आएँ और पीड़ित उनके खिलाफ पुलिस शिकायत वापस लेकर तीनों लोग लॉटरी ऑफिस जाकर पीड़ित के हस्ताक्षरों से पूरा पैसा अपने कब्ज़े में लें। इसके बाद पीड़ित ईमानदारी से चोरों को आधी रकम दें। यही नहीं, चोर भी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करें कि इतनी बड़ी रकम हासिल करने के बाद वे आगे से कभी भी चोरी नहीं करेंगे। तीसरी बात यह हो सकती है कि पीड़ित चोरों से स्क्रैच कार्ड हासिल कर लेने के बाद इन्हें चोरी के लिए भले माफ़ कर दे लेकिन उन्हें लॉटरी की रकम न देकर उन्हें सजा भी दे लेकिन यह मेरे विचार से उचित नहीं होगा, इसलिए मध्यम मार्ग अर्थात् दूसरा उत्तर ही श्रेयस्कर होगा। रोचक घटना पर बेहतरीन संपादकीय लिखने के लिए पुरवाई के यशस्वी संपादक आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।

    • पुनीत भाई आप हर संपादकीय पर ना केवल इतनी बेहतरीन टिप्पणी करते हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर साझा भी करते हैं। आप बहुत स्पेशल हैं।

  24. Thank you,Tejendra ji,for your interesting Editorial.
    Very complicated case.
    The scratch card providing the clue to the thieves n the latter in a fix as to whether they should confess their theft n secure the lottery money even if it is divided equally between them n Jean David, the owner of the wallet.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  25. फिल्मी कहानी ही है।
    ऐसी विशेष कहानियाँ विश्व प्रसिद्ध विदेशी लेखकों की पढ़ती रही हूँ।

    अब निर्णय तो बड़ा अबूझा है. देखिए, ऊंट किस करवट बैठता है.

  26. ऐसी अनोखी स्थितियां बहुत बार हमारे सामने भी आती है चोरी का नहीं परंतु विषम परिस्थिति होती है। कुछ समझ में नहीं आता। उसे छोड़ ही देना चाहिए लालच में क्या रखा है।

  27. आदरणीय तेजेंद्र जी आपका संपादकीय हमेशा कोई न कोई नवीन विषय प्रस्तुत करता है इस बार के संपादकीय में आपने एक अनूठे मामले का उल्लेख किया है तथा पुरवाई परिवार इस बारे में क्या सोचता है उसका मत भी अपने आमंत्रित किया है। परिवार के अनेक सदस्यों ने अपने-अपने तरीके से समाधान ढूंढ़ने का प्रयत्न किया है किंतु नीलिमा करैया जी ने केस के किसी पहलू को नहीं छोड़ा है। वह हर बात की तह तक जाती हैं।
    मेरी राय में अब चूँकि क्रेडिट कार्ड खोने की रिपोर्ट लिखवाई जा चुकी है अतः चोरों का लॉटरी क्लेम करने के लिए जाना उचित नहीं होगा। वह अभी तक भी रोड पति थे यदि वे लॉटरी क्लेम करने जाते हैं तो हो सकता है कि उन्हें जेल की हवा खानी पड़ जाए।अतःउन्हें ज्याँ डेविड ई का सामान वापस कर देना चाहिए और यदि वह ईमानदारी से आधे पैसे देते हैं, तो उसे लेकर आगे का जीवन ईमानदारी से जीना चाहिए।
    संपादकीय के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  28. सम्पादकीय अरे नहीं नहीं…बल्कि कहानी में जटिल और उलझी स्तिथि बन जाने से मजा तो बहुत आया पर सही रास्ता नहीं मिल रहा है। वैसे अपने देश में तो हल यही होता कि चोर से ज्यां-डेविड ई. समझौता कर लेते। तेरी भी जय जय मेरी भी जय जय।
    सम्पादक जी की भी जय जय
    अगली कहानी इंतजार रहेगा सर।

  29. तेजेन्द्र जी!
    बहुत् रोचक घटना और उस पर उतना ही रोचक संपादकीय !
    वैसे तो हमेशा ही अंग्रेज़ी फिल्मों की नकल करके फिल्में बनाने की कोशिश की जाती रही है फिर भी वह बात पकड़ में नहीं आ पाती ,दर्शक देखते भी हैं और अपनी टिप्पणी भी देते रहते हैं |
    क्या यह संभव नहीं कि आप इस कहानी नुमा रुचिकर संपादकीय को तथा सब पाठकों की प्रतिक्रिया को इंडस्ट्री में भेजें और इसका निर्णय निर्देशक पर छोड़ें |
    मुझे तो पूरा विश्वास है कि इस पर फिल्म खूब मजेदार बनेगी और दर्शकों के सामने नियम,कानून भी प्रस्तुत किए जा सकेंगे |कितनी ही सच्ची घटनाओं पर फिल्में बनी हैं और उन्हें पसंद भी किया गया है |इसमें से तो बहुत बारीक बातें निकलकर आएंगी |हो सकता है कोई ऐसा परिणाम निकल आए जो सबके लिए हितकर हो और कानून के तहत कुछ नया नियम भी बन सके |आपको बहुत साधुवाद !

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