भारत और पाकिस्तान एक मामले में बहुत समान रवैया रखते हैं और वह है विदेशियों के प्रति नज़रिया। विदेशों में वे भारतीय एवं पाकिस्तानी मूल के लोगों की उपलब्धियों पर गर्व करते दिखाई देंगे, मगर अपने देश में विदेशी को कभी देसी नहीं मानेंगे।
जब ऋषि सुनक, प्रीति पटेल, विरेन्द्र शर्मा, लॉर्ड पोपट, कमला हैरिस जैसे नाम और उनकी उपलब्धियों की बात होती है, तो हर भारतीय सोचता है कि जैसे यह उसकी अपनी निजी उपलब्धियाँ हों। ठीक वैसे ही हर पाकिस्तानी को लगता है जैसे सदीक ख़ान, शबाना हबीब या ब्रिटेन के तमाम पाकिस्तानी मूल के काउंसलर पाकिस्तान का मान बढ़ा रहे हैं।
मेरी पहचान का एक पाकिस्तानी मूल का दोस्त पाकिस्तानियों की ब्रिटेन में उपलब्धियों की बात कर रहा था। बात-बात में उसने कहा, “सर जी, यहाँ के लोग अपने मज़हब के पक्के नहीं हैं। इनके चर्च बिक रहे हैं और हम उन्हें ख़रीदकर वहाँ मस्जिदें बना रहे हैं।”
मैंने बहुत धीमी आवाज़ में उस मित्र से पूछा, “बंधुवर, यह बताओ कि पाँच हज़ार ब्रिटिश ईसाई पाकिस्तान सरकार को या फिर 56 इस्लामी देशों की सरकारों को अपनी अर्ज़ी भेजें, जिसमें वे गुज़ारिश करें कि उन्हें उस इस्लामिक देश में रहने की अनुमति दी जाए और साथ ही उन्हें अपने लिए चर्च बनाने की इजाज़त भी चाहिए… क्या आप ऐसी रिक्वेस्ट स्वीकार कर लेंगे?”
उसके चेहरे की रंगत बदल गई और उसने अविश्वसनीय आवाज़ में मुझसे पूछा, “कैसी बातें करते हैं सर जी! ऐसे थोड़ी ही होता है!”
मैं एक बार फिर अपनी जन्मभूमि भारत के बारे में सोचने लगा। मेरे पास ओ.सी.आई. यानी कि ओवरसीज़ सिटिज़नशिप ऑफ़ इंडिया का सर्टिफ़िकेट है। मुझे भारत जाने के लिए वीज़ा नहीं लेना पड़ता। मैं भारत में जाकर नौकरी भी कर सकता हूँ। मगर मैं चुनाव में वोट नहीं डाल सकता और न ही भारत में चुनाव लड़ सकता हूँ। पाकिस्तान इस मामले में भारत से अलग है। वहाँ दोहरी नागरिकता का प्रावधान है। वहाँ के नागरिक एक ही समय में पाकिस्तान और किसी भी एक अन्य देश के नागरिक हो सकते हैं। और दूसरे देश की नागरिकता होने के बावजूद वे पाकिस्तान में चुनाव लड़ भी सकते हैं और वहाँ के सांसद या मंत्री बन सकते हैं।
‘पुरवाई’ के पाठक शायद हैरान हो रहे हों कि आज हमारा संपादक क्या कथा-पुराण ले बैठा है। भला इससे हमें क्या फ़र्क पड़ता है कि हमारा संपादक भारत में चुनाव लड़ सकता है या नहीं। हम तो चाहते ही नहीं कि वह चुनाव लड़ने के चक्कर में अपना संपादकीय लिखना भूल जाए। चुनावी राजनीति से हमारा संपादक दूर ही रहे तो अच्छा है।
दरअसल, बात कुछ ऐसी है कि ब्रिटेन में इन दिनों हम दो प्रकार की स्थितियों से दो-चार हो रहे हैं। एक तरफ़ तो लंदन में अवैध प्रवासियों के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन हो रहे हैं, दूसरी तरफ़ ग्रेट ब्रिटेन के ही एक अन्य देश स्कॉटलैंड में संसदीय चुनावों के नियम इस प्रदर्शन के पूरी तरह विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
शनिवार, 16 मई को एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन द्वारा एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसका नाम दिया गया- “यूनाइट द किंगडम”। यानी कि उनका मानना है कि इस समय ‘यूनाइटेड किंगडम’ नाम सही नहीं है। आवश्यकता से अधिक लीगल और इल-लीगल प्रवासियों ने देश को मुश्किल हालात में खड़ा कर दिया है। उनके इस प्रदर्शन में साठ हज़ार से अधिक लोगों ने भाग लिया। कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे सेंट्रल लंदन में इंसानों का एक बड़ा-सा हुजूम एकत्रित हो गया हो। यह ज़ोरदार प्रदर्शन प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की सरकार की अप्रवासी-तुष्टीकरण नीति के विरोध में किया गया था।
जुलूस में बहुत से लोगों ने यूनियन जैक के झंडे उठा रखे थे, तो किसी-किसी ने लाल रंग की टोपी पहन रखी थी, जिन पर लिखा था- “Make England Great Again (MEGA)”, यानी कि इंग्लैंड को फिर से महान बनाया जाए। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के विरुद्ध नारे लगाए जा रहे थे- “स्टार्मर को बाहर निकालो!”
रॉबिन्सन ने लोगों से मतदान के लिए पंजीकरण कराने और किसी राजनीतिक दल में शामिल होने सहित राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों के हुजूम से प्रश्न किया, “क्या आप ब्रिटेन की लड़ाई के लिए तैयार हैं? 2029 में चुनाव हैं। हम किसी से भी बाहर जाकर लड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं, लेकिन यह हमारी पीढ़ी के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षण है।”
टॉमी रॉबिन्सन ने अमेरिकी अरबपति एलॉन मस्क द्वारा रैली के सार्वजनिक समर्थन की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “अगर यह एक व्यक्ति न होता, तो आज कुछ भी संभव नहीं होता। ग्रेट ब्रिटेन की ओर से एलॉन को धन्यवाद।” उनके इस कथन पर भीड़ में मौजूद हज़ारों लोग “एलॉन-एलॉन” के नारे लगाने लगे।
लंदन के लिए तो जैसे शनिवार के दिन शनिदेव पूरी तरह से अपना प्रकोप दिखा रहे थे। टॉमी रॉबिन्सन की रैली के विरोध में शनिवार को ही फ़िलिस्तीन के समर्थन में एक रैली का आयोजन किया गया।
फ़िलिस्तीन समर्थक रैली के आयोजकों ने, जो साउथ केंसिंग्टन से शुरू होकर वाटरलू प्लेस की ओर बढ़ी, बताया कि उसमें 25 से 30 हज़ार लोग शामिल हुए। सांसद डायन एबॉट भी उपस्थित लोगों में शामिल थीं और उन्होंने प्रदर्शनकारियों से कहा कि जो लोग इकट्ठा हुए हैं, उनका सामना “अति-दक्षिणपंथी” विचारधारा से है। उन्होंने आगे कहा, “वे घोर दक्षिणपंथी, घोर नस्लवादी, अश्वेत-विरोधी, मुस्लिम-विरोधी और घोर यहूदी-विरोधी हैं। हमें एकजुट होना होगा… नस्लवादियों से लड़ने के लिए, फ़ासीवादियों से लड़ने के लिए, यहूदी-विरोधियों से लड़ने के लिए।”
टकराव की आशंका को देखते हुए राजधानी में 4,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया। वे दोनों रैलियों को आमने-सामने आने से रोकने के लिए लगाए गए थे। अधिकारी ड्रोन, घोड़ों और कुत्तों के ज़रिये चप्पे-चप्पे पर नज़र रख रहे थे। बख़्तरबंद वाहन भी तैयार रखे गए।
प्रदर्शनों से पहले, मेट्रोपोलिटन पुलिस जेम्स हरमन ने कहा कि इस पुलिसिंग अभियान पर पुलिस बल को 4.5 मिलियन पाउंड का ख़र्च आएगा। मेट्रोपोलिटन पुलिस ने कहा कि जोखिमों को देखते हुए उन्हें “उच्चतम स्तर की नियंत्रण व्यवस्था” लागू करनी पड़ी, जिसमें विरोध-प्रदर्शन के दौरान पहली बार लाइव फ़ेशियल रिकग्निशन कैमरों का उपयोग भी शामिल था। मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इसे पिछले कई वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण पुलिस अभियानों में से एक बताया।
इसके विपरीत भारत के दो 23 वर्षीय युवकों ने ब्रिटेन के इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया है। पहला नाम है काउंसलर तुषार कुमार का जिसने 23 वर्ष की आयु में एलस्ट्री एण्ड बोरहमवुड क्षेत्र का मेयर बनने का गौरव हासिल किया है। तुषार का जन्म हरियाणा (भारत) के शहर रोहतक में हुआ था और वे दस वर्ष की आयु में अपने परिवार के साथ ब्रिटेन में आ बसे थे। तुषार ने किंग्स कॉलेज, लंदन से पढ़ाई की और बीस वर्ष की आयु में लेबर पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ कर काउंसलर बने। ब्रिटेन के इतिहास में तुषार सबसे युवा मेयर बनने का रिकॉर्ड बना चुके हैं।
हम कई बार पहले भी ‘पुरवाई’ के पाठकों को बता चुके हैं कि ग्रेट ब्रिटेन में तीन देश शामिल हैं- इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड। जहाँ एक ओर इंग्लैंड में यह सब चल रहा था, वहीं स्कॉटलैंड में संसद के चुनाव हो रहे थे। स्कॉटलैंड की संसद ने नियमों में और ढील देते हुए विदेशों से पढ़ने आए छात्रों को न केवल वोट डालने का अधिकार दिया, बल्कि चुनाव लड़ने का हक़ भी प्रदान कर दिया।
इस नीति का लाभ उठाते हुए भारतीय मूल के (तमिल) एक ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन ने ब्रिटेन की ग्रीन पार्टी की ओर से स्कॉटिश संसद का चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया। स्कॉटलैंड की प्रवासी नीति का कमाल कहा जाएगा कि मणिवन्नन को ग्रीन पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया और स्कॉटलैंड की जनता ने यह जानते हुए कि उनका प्रत्याशी एक ट्रांसजेंडर है, उसे विजयी बनाया।
विजयी होने के बाद मणिवन्नन ने अपने भाषण में कहा, “मेरा नाम डॉ. क्यू. मणिवन्नन है। मैं एक ट्रांसजेंडर तमिल अप्रवासी हूँ। मेरे लिए ‘वे/उनका’ सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।” मणिवन्नन ने अपने समर्थकों के बीच खड़े होकर यह बात कही। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अंग्रेज़ी में ‘he’ या ‘she’ के स्थान पर ‘they/them’ का प्रयोग किया जाता है।
मणिवन्नन ने आगे कहा, “इस देश में कुछ लोगों के लिए मैं वह सब कुछ हूँ जिससे नफ़रत करने वाले लोग घृणा करते हैं, और मैं आज यहाँ स्कॉटिश संसद के सदस्य के रूप में पूरी सावधानी के साथ खड़ा हूँ। कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं की कला है, लेकिन मैं कहूँगा कि यह देखभाल की राजनीति उन सभी के लिए संभावनाओं का विस्तार करती है, जिन्हें पीछे छोड़ दिया गया है, बाहर कर दिया गया है या जिन्हें कभी आमंत्रित नहीं किया गया है।”
एक मज़ेदार स्थिति यह है कि एक विद्यार्थी ब्रिटेन में फ़ुल-टाइम नौकरी नहीं कर सकता, मगर सांसद या काउंसिल का चुनाव जीतना नौकरी नहीं, बल्कि सेवा माना जाता है। इसलिए अब मणिवन्नन आराम से 77 हज़ार पाउंड, यानी लगभग 99 लाख रुपये प्रतिवर्ष के मानदेय का आनंद उठा सकेंगे।
स्कॉटलैंड में नियम परिवर्तन होने के कारण ही यह संभव हो पाया। नए नियमों के अनुसार, अल्पकालिक वीज़ा पर रहने वाले या स्थायी निवास वाले लोगों को भी स्कॉटलैंड में चुनाव में भाग लेने के योग्य बनाया गया है। आप्रवासन पर अंकुश लगाने के लिए अभियान चलाने वाले माइग्रेशन वॉच ने कहा कि राजनेताओं को ब्रिटिश चुनावों में राष्ट्रमंडल नागरिकों के स्वतः मतदान के अधिकार और गैर-ब्रिटिश नागरिकों के चुनाव लड़ने की क्षमता समाप्त करनी चाहिए।
ऐसा नहीं है कि मणिवन्नन के चुनाव को अप्रवासन-विरोधी आवाज़ों की आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा। उनके चयन पर बहुत से सवाल उठाए गए। स्कॉटलैंड में रहने वाले कुछ विदेशी नागरिकों को चुनाव लड़ने की अनुमति देने वाले नियमों पर भी सवाल उठाए गए। आप्रवासन-विरोधी रिफॉर्म यूके के पूर्व टोरी मंत्री और अब शैडो चांसलर रॉबर्ट जेनरिक ने कहा, “डॉ. मणिवन्नन एक अच्छे युवा व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन मैं ऐसे देश में नहीं रहना चाहता जहाँ छात्र वीज़ा पर रहने वाले लोग राष्ट्रीय संसदों में निर्वाचित प्रतिनिधि बन सकें।”
मेरे प्यारे पाठकों, अब आपको समझ आ गया होगा कि इस संपादकीय की शुरुआत में मैंने भारत और पाकिस्तान का मुद्दा क्यों उठाया। क्योंकि अंत में हमें इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की स्थिति को उसी परिप्रेक्ष्य में समझना था। यह तो सच है कि मणिवन्नन ने इतिहास रच दिया है। तमिलनाडु में पैदा हुए मणिवन्नन मात्र 23 वर्ष के हैं। उन्होंने दिल्ली के पास सोनीपत स्थित ओ.पी.जिंदल यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और 2021 में स्कॉटलैंड गए। वहाँ वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंट एंड्रूज में इंटरनेशनल रिलेशंस में पीएचडी करने पहुँचे थे।

शानदार संपादकीय, पुनः एक महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आपका आभार।
हार्दिक धन्यवाद सुषमा जी।
यही आपके लेखन की खासियत है कि हमेशा की तरह बहुत कुछ लिखा आपने। खूब शुभकामनाएं
धन्यवाद प्रगति जी। आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
महत्वपूर्ण जानकारी है, जिस पर भारतीय मीडिया का ध्यान नहीं है।
हार्दिक धन्यवाद बिपिन भाई।
इंग्लैण्ड और स्कॉटलैंड के संसदीय प्रणाली की बेहतरीन जानकारी तथा भारत और पाकिस्तान के अप्रवासी नीति की जानकारी अच्छी लगी। ट्रांसजेंडर को He/She के बदले they/them कहकर संबोधित करने की प्रथा लाजवाब है।
हमेशा की तरह इस बार का संपादकीय जानकारियों से भरपूर रहा। हार्दिक धन्यवाद।
भाई जयंत कर शर्मा जी, इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
पुनः एक रोचक संपादकीय पढ़ कर ज्ञान बढ़ा। लंदन आज के लंदन में राजनीतिक हलचल, आंदोलनों तथा वेल्स और स्कॉटलैंड के बारे में वह पता चला जो मुझे पहले ज्ञात न था।
शुक्रिया पुरवाई
शुक्रिया तेजिंदर जी
एक बार फिर से महत्वपूर्ण जानकारी देता शानदार ज्ञानवर्धक सम्पादकीय पढ़ने को मिला। यह आपकी लेखनी का कमाल ही तो है। साधुवाद तेजेंद्र जी।
हार्दिक धन्यवाद सुदर्शन जी।
बढ़िया उम्दा और आईना से मुद्दों का समूह है इस बार का संपादकीय। भारत पाकिस्तान की सोच को तौलता और विचारोत्तेजक अंदाज़ से हमें आईना पेश करता है कि आप क्या हैं एक दोगलेपन की मानसिकता के सतत वाहक। पाकिस्तान का दुष्टता पर्याय है तो सज्जन भारतीय भी नहीं!
अब अगर ग्रेट ब्रिटेन या यूनाइटेड किंगडम तो स्कॉटलैंड वालों की लन्दन वाली से कभी नहीं बनीं और नतीज़ा ग्रेट ब्रिटेन अब आने वाले समय में बेमानी हो जायेगा?;?
अब यह भी प्रकृति का न्याय है कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे।हिन्दू और मुस्लिम को धर्म के नाम पर बाँटा ,,,दो मुल्क बनाये और विश्व की त्रासदी झेलने को मजबूर किया। वही पाकिस्तान का दंभी जन समूह अब वोटिंग बैंक बना और आज अंग्रेजों की स्थिति सभी के सामने है। याद आती है,,,,माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोहे एक दिन ऐसा होगा मैं रुड़ूंगी तोहे
अब स्कॉटलैंड में ट्रांसजेंडर का चुनाव लड़ना और जीतना उस समाज की सहिष्णुता और सकारात्मक रुख को रेखांकित करता है।
यह संपादकीय एक व्यवहारिक उदाहरण और सीख दोनों ही है शोषण करने वाले देश और दो भ्रमित देशों के लिए।
बधाई हो ,,,साफगोई से संपादकीय हेतु।
प्रिय भाई सूर्य कांत जी आपने तो पूरे संपादकीय की चीर फाड़ कर डाली है।… बल्ले बल्ले।
क्या कहने uk की राजनीति का पोस्ट मार्टम अच्छा किया है साधुवाद
जय हो कपिल भाई।
पुरवाई के पाठक के रूप में हम कतई हैरान नहीं है। संपादक महोदय प्रत्येक अंक में देश विदेश की घटनाओं पर लिखते रहते हैं। लेकिन हर बार एकदम अलग विषय पर लेखनी चलाना, यह पाठकों के लिए रोचक जानदार प्रदान करता है। आपको शत शत प्रणाम है सर!
संगीता जी ऐसी टिप्पणी किसी भी संपादक के लिये ख़ुराक का काम करेगी। हार्दिक धन्यवाद।
इस बार पुरवाई के सम्पादकीय में दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों के नीतिगत और व्यावहारिक सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को सूक्ष्मता पूर्वक सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने उजागर किया है । कई राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वैविध्य को संदर्भित करते हुए बदलती दुनिया की प्रगति और अवनति दोनों पहलुओं को को दर्शित किया गया है ।
सम्पादक के “कथा-पुराण “ में बहुत सारे मत मतांतरों के बीच वैश्विक स्तर पर राजनीतिक , सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक दृष्टिकोण उभरते हैं । इसलिए सम्पादकीय के केंद्रीय चिंतन में
भारतीय मूल के एक ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन के स्कॉटिश संसद बनने के तथ्य का से ज़िक्र प्रमुखता से किया गया है ।उस सांसद के लिए
राजनीति , संभावनाओं की कला मात्र नहीं बल्कि
“देखभाल की राजनीति से संभावनाओं का विस्तार “ है । बदलते परिवेश और परिदृश्य के ऐसे उदाहरणों से आज के वैज्ञानिक युग में सामाजिक परिवर्तन को देखा जा सकता है ।
इस अंक के अन्य स्तंभ और साहित्यिक विधाएँ पठनीय हैं ।
व्यावहारिक जीवन के मुद्दों को उठाने वाले प्रख्यात कहानीकार और सम्पादक
श्री तेजेंद्र शर्मा को बहुत बधाई ।
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मीनकेतन प्रधान
भारत
भाई मीनकेतन जी, हमेशा की तरह आपकी टिप्पणी हमारे लिये मार्गदर्शन का भी काम करती है। हार्दिक आभार।
सादर नमस्कार सर….. बहुत ही ज्ञानबर्धक संपादकीय है…
सभी बड़े बड़े देशों में क्या कुछ नहीं हो रहा है…. इससे किसीको कोई मतलब नहीं होता… पर हमारे देश में… विषय हो या न हो…. विषय बनाया जाता है…. और यथा संभव राजनीति बनती ही है…..
बहुत ही सुंदर संपादकीय हेतु साधुवाद….
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय…
आदरणीय भाई, सादर प्रणाम।
आपके संपादकीय के नित नूतन विषय के संबंध में जितना भी कहें कम होगा। इस बार भारत और पाकिस्तान के चिर परिचित राजनीतिक परिदृश्य और सामाजिक संदर्भों की तुलना ब्रिटेन के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र और महत्व से करते हुए आपने सर्वथा नवीन बिंदुओं पर अपनी बात कही है। आपने लिखा -“वहीं स्कॉटलैंड में संसद के चुनाव हो रहे थे। स्कॉटलैंड की संसद ने नियमों में और ढील देते हुए विदेशों से पढ़ने आए छात्रों को न केवल वोट डालने का अधिकार दिया, बल्कि चुनाव लड़ने का हक़ भी प्रदान कर दिया।
यह बात और भी आश्चर्य जनक लगती है जब इस नीति का लाभ उठाते हुए भारतीय मूल के (तमिल) ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन ने ब्रिटेन की ग्रीन पार्टी की ओर से स्कॉटिश संसद का चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया। तब स्कॉटलैंड की उदार प्रवासी नीति के अनुसार मणिवन्नन को ग्रीन पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया और स्कॉटलैंड की जनता ने उसे विजयी बनाया।
भारत में जहां ट्रांसजेंडर के मुद्दे पर कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है वहां स्काटलैंड ने यह अवसर दिया यह एक सराहनीय प्रयास था। यद्यपि बदलाव अपने देश में भी हो रहा है नीतियां बदली हैं और मत देने का अधिकार भी दिया जा रहा है।वहीं पाकिस्तान में हिन्दू मुस्लिम के विभाजन करने वाले तर्कों के आधार पर अभी भी कूप मंडूक है।
मणिवन्नन ने शपथ-पत्र लेते हुए अपने भाषण में आगे कहा, “इस देश में कुछ लोगों के लिए मैं वह सब कुछ हूँ जिससे नफ़रत करने वाले लोग घृणा करते हैं, और मैं आज यहाँ स्कॉटिश संसद के सदस्य के रूप में पूरी सावधानी के साथ खड़ा हूँ। कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं की कला है, लेकिन मैं कहूँगा कि यह देखभाल की राजनीति उन सभी के लिए संभावनाओं का विस्तार करती है, जिन्हें पीछे छोड़ दिया गया है, ।
बहुत सुंदर सार्थक और सामयिक प्रेरक संदेश देता हुआ संपादकीय बहुत अच्छा लगा। भारत इस संदर्भ में पाकिस्तान की अपेक्षाकृत अधिक उदार व सहिष्णु रवैया अपनाता है। सवाल राजनीतिक परिदृश्य का हो या वर्तमान सामयिक संदर्भ का ब्रिटेन की वैश्विक उदारता स्वागत योग्य है।
एक बार फिर से सारगर्भित सार्थक संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई और अशेष शुभ कामनाएं।पुरवाई ने मुझे राजनीति को थोडा बहुत समझने लायक बनाया है।आभार भाई।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा तुम्हारी टिप्पणी से अभिभूत हूं। कितनी गहराई से परिपूर्ण है और अर्थपूर्ण टिप्पणी लिखी है तुम ने। स्नेहाशीष!
किसी सामयिक विषय के विश्लेषण में हर बार की तरह एक और संपादकीय जिस से पाठकों को नई जानकारी मिलती है। आभार। संपादकीय के कई पहलू हैं। एक तो जब कभी विकसित पश्चिम देशों में भारत या पाकिस्तान मूल का कोई व्यक्ति किसी बड़े मुकाम पर अपनी प्रतिभा और प्रयत्नों के बल से पहुंचता है, हम बेवजह, शायद अपने पिछड़ेपन की हीनभावना से ही प्रेरित हो, उनकी सफलता में और उन पर उनके उद्गम देशीय भागीदारी का पूरा हक जताना शुरू कर देते हैं। जहां तक अप्रवासियों को चुनाव प्रक्रिया में शामिल करने या सरकार का हिस्सा बनाने की बात है, ऐसी नीतियों पर हर देश अपनी सुरक्षा स्थिति के गहरे अध्ययन के पश्चात निर्णय लेने को सक्षम है। जिस देश को अप्रवासी अपनाते हैं, अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए, उन्हें सामाजिक सौहार्द के लिए, वहां के रीति रिवाजों के सम्मान करना चाहिए न कि वे किसी प्रकार के अतिक्रमण का रवैया अपनाएं जैसे कि अभी यूरोप के कुछ देशों जैसे यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी में देखा जा रहा है। मैं दो दशक पहले जमैका में पोस्टेड था, जो अप्रवासियों का देश है जिनका आदर्श वाक्य है: आउट ऑफ मैनी, वन पीपल। चाहे वहां का क्राइम रेट बहुत ज्यादा था, मगर उन्होंने सामाजिक सौहार्द धार्मिक सद्भाव सदैव से बनाए रखा है।
बिमल भाई आपके कैरियर का अनुभव आपकी टिप्पणी को और अधिक पुख़्ता बनाता है। हार्दिक धन्यवाद।
आपकी लेखनी से वह सारी जानकारी प्राप्त होती है, जिससे आम आदमी अनभिज्ञ होता है। सबसे बड़ी बात ये है कि मूल कहीं का भी हो वे अपने देश के प्रति संवेदनशील होते हैं लेकिन गलत बातों के लिए तब भी नहीं।
सटीक और निष्पक्ष जानकारी के लिए साधुवाद।
रेखा जी, आपकी टिप्पणी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है।
इस बार का संपादकीय भारतीय मूल के दो विद्यार्थियों के स्काॅटिश संसद में चुनाव जीतने पर केंद्रित है। यह सच है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोग विदेशों में कोई कारनामा करते हैं तो यहां के लोगों को फख्र महसूस होता है। जो सदियों से दबाए गए हों, उन्हें जरा सी आक्सीजन मिल जाती है तो वे बड़ी राहत महसूस करते हैं।
उस देश का जैसा कानून है, मुझे नहीं लग रहा है कि विश्व में अन्य कोई ऐसा देश है जो बाहरी लोगों को संसद में भेजता हो। यद्यपि वहां के कुछ लोग इन नियमों से खुश नहीं है पर वहां की सरकार एवं जनता योग्य प्रत्याशी को सर आंखो पर बैठा लेती है। हम पिछली शताब्दियों में अंग्रेजों द्वारा शासित रहे हैं। आज जब हम वहां की शासन व्यवस्था में भागीदार होते हैं तो एक दिली खुशी मिलती है।
अंग्रेज बहादुर ऐसे ही नाम नहीं पड़ा है उनका। वे आज भी बहादुर हैं। इस संपादकीय ने सिद्ध कर दिया है।
भारत समेत अन्य देशों में यदि ऐसा कोई नियम लागू हो जाए तो हाय-तौबा मच जाएगी। हो सकता है कि सरकारें ही उखाड़कर फेंक दी जाएं।
इस उपमहाद्वीप के लोग जहां भी जाते हैं वे अपनी जुगत पहले बना लेते हैं। जुगत क्या है? मेरे हिसाब से ये ज्यादा बड़ी चीज तो नहीं है पर धार्मिक जुगत के बिना ये जीवित नहीं रह सकते हैं। ये लोग इसे जीवन का सबसे बड़ा काम मानते हैं। ये दूसरों के यहां जुगत भिड़ाते रहें पर जब यही बात इनके लिए कही जाए तो सांसें अटक जाती हैं।अटक क्या जाती है,मुश्किल से लौटती हैं। वह चाहे संपादक जी का पाकिस्तानी मूल का मुस्लिम मित्र हो या इनकी ही कहानी ‘गुरुजी’ का महेश उर्फ स्वामी महेश्वरानंद जी ।
इस संपादकीय में 23 वर्षीय ट्रांसजेंडर डॉ क्यू मणिवन्नन ने सबसे अधिक प्रभावित किया। ट्रांसजेंडर जीवन की वैश्विक विडंबना पर जो उद्गार व्यक्त किए हैं वह व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक सच्चाई बन जाती है -” कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं की कला है, लेकिन मैं कहूँगा कि यह देखभाल की राजनीति उन सभी के लिए संभावनाओं का विस्तार करती है, जिन्हें पीछे छोड़ दिया गया है, बाहर कर दिया गया है या जिन्हें कभी आमंत्रित नहीं किया गया है।”
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति वही है जो हाशिए के लोगों को प्रतिनिधित्व दे सके। स्काॅटिश संसद इसमें अग्रणी भूमिका निभा रही है।
आपकी स्कॉटिश संसद पर टिप्पणी आपकी सोच को परिलक्षित करती है। हार्दिक धन्यवाद।
आपके वृहद ज्ञान को नमन है l आपने ये साबित कर दिया कि आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैँ l
साहित्य सेवा के साथ-साथ आप समाज या देश में हो रही अन्य गतिविधियों को भी उतनी ही तवज्जो देते हैं और पुरवाई के पाठकों भी इस जानकारी से अवगत कराते हैं l
धन्य है आप और आप की प्रबुद्ध ज्ञान धनराशि l
माँ सरस्वती की कृपा आप पर बनी रहे l
उषा
आपकी टिप्पणी के लिए मनन उषा जी।
आदरणीय ,आपका यह संपादकीय बहुस्तरीय वैचारिकी का प्रतिमान है,जिसके अंतर्गत नागरिकता, प्रवासन, वैश्विक राजनीति, सांस्कृतिक तथा सामाजिक स्वीकार्यता जैसे महत्वपूर्ण और यक्ष प्रश्नों को अत्यंत रोचक और संवादात्मक शैली में पाठकों के समक्ष चिंतन हेतु प्रकट किया है। विभिन्न देशों जैसे भारत पाकिस्तान इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की राजनीतिक नीतियों व सामाजिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए व्यक्ति की पहचान आखिर किस आधार पर मान्य होगी उसकी जन्म भूमि नागरिकता संस्कृति अथवा सामाजिक सहभागिता द्वारा जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को भी इसलिए के माध्यम से प्रस्तुत किया है। सचमुच यह विडंबना ही है, कि हम विदेशों में सफल अपने भारतीय मूल के नेताओं पर तो गर्व करते हैं,किंतु अपने देश के विदेशियों को सहजता से स्वीकार नहीं करते। टॉमी रॉबिंसन के नेतृत्व में अप्रवासन विरोधी प्रदर्शन तथा स्कॉटलैंड की उदार लोकतांत्रिक नीति का उल्लेख कर अपने ब्रिटेन की वर्तमान परिस्थितियों का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है जिसके अंतर्गत भारतीय मूल के ट्रांसजेंडर छात्र
मणिवन्नन की सफलता को एक ऐसे बदलाव के रूप में देखा है, जहाँ समाज के हाशिए पर मौजूद लोग भी मुख्यधारा में आते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अधिक समावेशी हो जाती है।
व्यंग्यात्मक टिप्पणियों ,ज्ञानाधारित महत्वपूर्ण प्रसंगों, प्रश्नों, प्रामाणिक तथ्यों का संस्मरणों और संवादात्मक पुट के साथ प्रस्तुतिकरण ही आपके लेखन का वैशिष्ट्य है।इस अनूठे संयोजन ने इस संपादकीय को नीरस राजनीतिक चर्चा से ऊपर उठाकर एक जीवंत और वैचारिक विमर्श का रूप प्रदान किया है।
वैचारिक निष्पक्षता इस संपादकीय का मुख्य आकर्षण है,जिसमें अप्रवासन, सांस्कृतिक व धार्मिक असुरक्षा, लोकतंत्र और लैंगिक विविधता का संतुलित समावेश है वहीं किसी एक विचारधारा का पक्ष लिए बिना पाठकों में स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देता है।
इस प्रकार “भारतीय विद्यार्थी -स्कॉटिश सांसद” समसामयिक संदर्भ में बेहतरीन और विचारोत्तेजक संपादकीय लेख है,जो बौद्धिक विमर्श को प्रोत्साहित करता है। जिसके द्वारा नागरिकता के बदलते आयामों ,वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य और सामाजिक स्वीकार्यता के प्रश्नों को बड़ी गहनता से रेखांकित किया गया है जो आपके सामाजिक सरोकारों, व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण और अद्वितीय लेखन शैली का प्रमाण है एक उत्कृष्ट संपादकीय के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएँ।
ऋतु जी आपको संपादकीय पसंद आया और आपने इतनी सार्थक और अर्थपूर्ण टिप्पणी की है कि पुरवाई टीम धन्यवाद करने के लिये मजबूर है। स्नेह बनाए रखें।
बेहतरीन संपादकीय माध्यम से महत्वपूर्ण जानकारी देने हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद
धन्यवाद संगीता।
जितेन्द्र भाई: आपके इस बार के सम्पादकीय से बहुत सी नई नई बातों की जानकारी मिली। पाकिस्तान और भारत के लोगों के सोचने की जन्मपत्री जहाँ मिलती है वो कहने तो तो मामूली सी बात है लेकिन इस में सचाई भरी हुई है। इधर दूसरी तरफ़ अपने पाकिस्तानी मूल के दोस्त से सवाल करना और उसका पलटकर जवाब देना पाकिस्तानीयों के चरित्र नामी सिक्के का दूसरा हिस्सा दिखाता है। MEGA वाली कैप पहनकर लगता है एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन ट्रम्प के MAGA की नकल कर रहे हैं। MAGA का आइडिया कहाँ तक सफ़ल हुआ है यह बात किसी से छुपी नहीं है। तुषार कुमार और ट्रांसजैन्डर विद्यार्थी मणिवन्नन की कहानी पढ़कर बहुत अजीब सा लगा। हालाँकि मैं इन दोनों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ फिर भी एक सवाल जो ज़हन में उठता है वो है इनकी क्वालिफ़िकेशण। क्या ये दोनों अपनी उस ज़िम्मेदारी को संभाल पाएंगे जिसके लिए इनको गद्दी मिली है?
विजय भाई, हमेशा की तरह सार्थक प्रश्न उठाती और सही जवाब देती आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
अद्भुत ,आपके संपादकीय समसामयिकता में से भी कुछ नया
विचार दे ,अपनी सोच को उस रोशनी में जाँचने को प्रेरित करते हैं।धन्यवाद इस mind twister के लिए ।
नीहार जी, इस प्यारी सी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
भारतीय विद्यार्थी – स्कॉटिश सांसद संपादकीय में आपने भारत और पाकिस्तान की मानसिकता की तुलना अन्य देशों से करते हुए जो कहा वह अक्षरश सत्य है। मेरे विचार से इसका कारण है हम भारतीय जिस देश में जाते हैं, वे उस देश की भाषा और संस्कृति को अपना लेते हैं किन्तु दिल से अपने देश से जुड़े रहते हैं जबकि विदेशी भारत को कभी अपना नहीं मानते।
इसके साथ ही न केवल भर वरन अन्य देशों की सरकारों की तुष्टिकरण की नीति हर देश की डेमोग्राफी बदलने लगी है। शायद यही कारण है कि एक्टिविस्ट टॉमी रॉबिन्सन के द्वारा “यूनाइट द किंगडम” रैली का आयोजन किया गया क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि बाहरी देशों के लोग उनके देश में आकर उनके लिए परेशानी का सबब बन रहे हैं।
आपके संपादकीय के द्वारा यह जानना दिलचस्प है कि जहाँ एक ओर लंदन में अप्रवासियों के विरुद्ध रैली का आयोजन हो रहा है वहीं यू. के. के ही एक भाग स्कॉटलैंड की संसद ने नियमों में और ढील देते हुए विदेशों से पढ़ने आए छात्रों को न केवल वोट डालने का अधिकार दिया, बल्कि चुनाव लड़ने का हक़ भी प्रदान कर दिया। इस नीति के अंतर्गत भारतीय मूल के ट्रांसजेंडर विद्यार्थी क्यू मणिवन्नन को ग्रीन पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया और स्कॉटलैंड की जनता ने यह जानते हुए कि उनका प्रत्याशी एक ट्रांसजेंडर है, उसे विजयी बना दिया।
यह जानना भी रोचक रहा कि ट्रांसजेंडर को ‘वे’ कहा जाता है। इसके साथ ही भारतीय मूल के एक अन्य छात्र तुषार कुमार 23 वर्ष की आयु में ही एलस्ट्री एण्ड बोरहमवुड क्षेत्र का मेयर बन गये।
इस सन्दर्भ में आपके पाकिस्तानी मूल के दोस्त का आपसे यह कहना अतिश्योक्ति नहीं थी कि यहाँ के लोग अपने मज़हब के पक्के नहीं हैं। इनके चर्च बिक रहे हैं और हम उन्हें ख़रीदकर वहाँ मस्जिदें बना रहे हैं।
कई नई जानकारी देने के साथ ब्रिटेन में चल रही गतिविधियों से परिचित कराने के लिए साधुवाद।
सुधा जी, आप पुरवाई पत्रिका की नियमित पाठक हैं और हर बार अपनी सार्थक टिप्पणी भेज कर हमारा उत्साह बढ़ाती हैं। आपका स्नेह हमारे लिये अमूल्य है। हार्दिक आभार।
आदरणीय सर,
सादर प्रणाम।
‘पुरवाई’ के इस अंक में ‘भारतीय विद्यार्थी – स्कॉटिश सांसद’ शीर्षक से लिखा गया आपका संपादकीय समसामयिक वैश्विक हलचलों के बीच एक बेहद विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्धक विमर्श खड़ा करता है। यह आलेख केवल कुछ प्रवासियों की राजनीतिक सफलताओं का विवरण मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने समाज और पश्चिमी समाज के बीच के वैचारिक अंतर्विरोधों को पूरी साफगोई से आईना दिखाता है। आपने जिस गहराई से इस विषय को छुआ है, वह पाठकों को अपनी खुद की संकुचित रूढ़ियों को नए सिरे से जाँचने के लिए मजबूर करता है।
लेख की शुरुआत में ही आपने भारत और पाकिस्तान की प्रवासियों के प्रति उस आत्ममुग्ध मानसिकता को पकड़ा है, जो अक्सर देखने को मिलती है। हम विदेशों में ऋषि सुनक या कमला हैरिस जैसे नामों की उपलब्धियों पर तो इस कदर इतराते हैं जैसे वह हमारी राष्ट्रीय विजय हो, मगर अपनी ज़मीन पर किसी बाहरी को अपनाने का वैसा हौसला कभी नहीं दिखा पाते। पाकिस्तानी मूल के मित्र के साथ आपके उस संक्षिप्त संवाद ने उस कड़वी हकीकत को पूरी तरह सामने ला दिया है, जो दूसरों की खुली हवा में अपने अधिकारों की वकालत तो करती है, पर अपनी ज़मीन पर दूसरों को सांस लेने की सहूलियत देने से भी कतराती है।
पूरे आलेख का सबसे दिलचस्प और पैना हिस्सा वह है, जहाँ आपने एक ही साम्राज्य के भीतर बहने वाली दो विपरीत वैचारिक धाराओं का सजीव चित्रण किया है। एक तरफ लंदन का सेंट्रल इलाका है, जहाँ टॉमी रॉबिन्सन के नेतृत्व में साठ हज़ार से अधिक मूल निवासियों का हुजूम ‘MEGA’ के नारों के साथ अप्रवासी-विरोधी उबाल पर है और सरकार को सुरक्षा के लिए लाखों पाउंड फूंकने पड़ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ उसी ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा स्कॉटलैंड है, जिसकी संसद नियमों को इस हद तक लचीला बना रही है कि वहां पढ़ने आए विदेशी छात्र न केवल मतदान कर सकते हैं, बल्कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में जनप्रतिनिधि भी चुने जा सकते हैं। इस प्रशासनिक और सामाजिक अंतर्विरोध को आपकी पैनी दृष्टि ही इस रूप में रेखांकित कर सकती थी।
इसके बाद जब आप रोहतक के तुषार कुमार और तमिलनाडु के डॉ. क्यू. मणिवन्नन के मील के पत्थरों का ज़िक्र करते हैं, तब यह लेख एक सामान्य राजनीतिक चर्चा से ऊपर उठकर मानवीय अस्मिता का संवेदनशील दस्तावेज बन जाता है। मणिवन्नन के भाषाई सर्वनाम (they/them) और उनके विजयी भाषण के इस मर्मस्पर्शी अंश को साझा करना कि—”यह देखभाल की राजनीति उन सभी के लिए संभावनाओं का विस्तार करती है, जिन्हें पीछे छोड़ दिया गया है”—गद्य को एक नई दार्शनिक ऊंचाई देता है।
यह विमर्श अपनी सहज-सरल और संवादात्मक शैली में रॉबर्ट जेनरिक जैसी रूढ़िवादी आवाज़ों की चिंताओं को भी पूरा स्थान देता है, जो इस संतुलन को और अधिक प्रामाणिक बनाता है। अंततः यह आलेख हमें इस बात पर आत्ममंथन करने के लिए विवश करता है कि लोकतंत्र की वास्तविक परिभाषा क्या भौगोलिक सीमाओं और संकीर्णताओं से ऊपर उठकर एक समावेशी समाज का निर्माण करना ही है? एक ही समय में वैश्विक राजनीति के कई चेहरों को इतनी सहजता से एक सूत्र में पिरो देना इस संपादकीय की वास्तविक ताकत है।