1- याद रखने के लिए
याद रखने के लिए
भूलना चाहता हूँ स्वयं को,
प्राण-वायु से रिक्त इस देह से
हवा के बहने को भोगना चाहता हूँ,
ठोस बने रहने के संकल्प ने
मेरे निस्तेज शरीर को पिघलाकर
मोम की माफिक छितरा दिया है
इस नरक से उस स्वर्ग तक,
ठगे-ठगे से यमराज विलोक रहे हैं मुझे
एवरेस्ट-सरीखे भीमकाय आश्चर्य से,
अब कैसे बटोरकर ले जाएंगे
मुझे यमलोक तक वे,
चित्रगुप्त भी हतप्रभ होंगे
कि जिसमें कभी जीवन रहा ही नहीं
उसे दंडित-पुरस्कृत कैसे कर पाएंगे,
जो मरा ही नहीं उसकी आत्मा को
कहाँ से उठाएंगे
किस परमेश्वर में विलय कराएंगे
या जो निराकार वस्तु (जीव नहीं)
आकार पाने के जद्दोज़हद में
होने और न होने के बीच दोलित होता रहा
उसे पाप-पुण्य के किस बही-खाते में निपटाएंगे,
मैं स्मृतियों में सहेजने के लिए
भूलने के दंड से स्वयं को दंडित कैसे करूं,
उफ्फ! कुछ नहीं सोच पा रहा हूँ
सोचने के जद्दोज़हद में
***
2 – यही मेरा निर्वाण है
मैं विकट उलझनों तले
सहज-सुकून से कितना बेचैन हूँ,
द्वार पर संकुचाती खड़ी हवा से
क्या उपालंभ करूं-
कि यह आंदोलित जीवन
जीवन-शून्य है,
सजी-धजी सोलहो शृंगार-रत इच्छाएं-
तन-मन में समाकर
मुझे क्या बनाना चाहती हैं,
मैं यह सब जानने से
अंजान रहना चाहता हूँ,
पर, मैं उन्हें अपने भौतिक-अभौतिक में
प्रवेश से निषेध कर रहा हूँ,
खिड़कियों से घुसपैठ कर चुकी बीमार रोशनी को
धकिया कर भगौने में बंद कर रहा हूँ,
मैं हवा, इच्छा और रोशनी से
दरकिनार करते हुए
देह-कुकर में उबलती भावनाओं की भभक को
बरदाश्त कर रहा हूँ,
अब मैंने ठूंस दिया है एक योगी को
नहीं-नहीं एक बुद्ध को
स्वयं में,
स्थितियां बड़ी हवादार हैं
क्योंकि मौत की खिड़की से हवाएं भीतर आ रही हैं
और मैं मरने के लिए जीने को उतावला हो रहा हूँ,
क्या यही मेरा निर्वाण है
जीवन का उत्स है?
***
3 – जीवन स्त्री-शून्य रहा
तुम्हारे परिधान में से
कदाचित ही किसी नारी को
रू-ब-रू होते देखा है,
तुम्हारे अंग-प्रत्यंग को समेकित कर
मैं नहीं बना पाया हूँ एक नारी,
मेरा कलाकार मन बार-बार, अनवरत बार
स्मृति-पटल पर नहीं उकेर पाया है
कोई रूपसी नारी,
तुम्हारी गंध में यात्रा करते हुए
तुम कई बार प्रविष्ट हुई हो मेरी घ्राणेंद्रियों में,
पर, खेद है
उस गंध से एक भी स्त्री साकार नहीं हो पाई,
मेरे सोचने की विवशता थककर मरणासन्न है
बार-बार कुछ कहते-मांगते हुए जीभ पथरा गई है,
होठों पर बरफबारी हो गई है
कि कहो कि –
मन फूट कर छितर गया है
कि सोचो कि-
कहाँ से कोई स्त्री पैदा होगी
जिसे अपनी भार्या कह सकूंगा?
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4 – अंखियों के कोर
बहुत वाचाल हैं
अंखियों के कोर,
कितना मचाती हैं शोर
कि मन के कान के पर्दे फटने लगते हैं
क्रंदन करती अंखियां
लजियाती हैं तो
क्रंदन को अपने कोरों में छुपा लेती हैं,
अंखियों में भावों-अनुभावों की उमड़ती भीड़
अचानक किस खोह में लुक-छिप जाती हैं–
कौन जाने?
हाँ, मैं जानूं
उन दालानदार कोरों को
बहटियाने के परदे के पीछे
छुप-छिप कर भी लुक-छिप नहीं पाती हैं,
जैसे झीनी सारी पहनी कजरी
राग खमाज गुनगुनाती हुई
बरसात की भरी जवानी में
उरोज छुपा नहीं पाती है
और नुकीली उरोज पर बार-बार
बदतमीज़ नज़र थम ही जाती है,
इच्छाओं की अल्हड़ चांदनी में
मिलने-जुलने लगती हैं
ऐसे हैं अंखियों के कोर
बरजो कि वे छोड़ दें
भाव-भावनाओं को छुपाने का जोर
***
5 – भुइयां बैठकर
बबुनी भुइयां बैठ
जमीन से जुड़ जाती है,
सल्मा-सितारे वाली लहंगा फैलाकर
माई मनरखनी की स्मृतियों में विचरने लगती है
भुइयां बैठते ही
बेसरम चींटियां नितम्ब से यात्रा करते हुए
उरोज तक घुसपैठ कर जाती हैं,
भुइयां बैठने का ख़ामियाज़ा
बबुनी कुछ ऐसे भुगतती है
कि नाखूनदार अंगुरियों से खुजाते-खुजाते
जींस पैंट से टी-शर्ट तक
ख़ुद को लहूलुहान कर देती है
भुइयां बैठने का रिवाज़
बस्स, बबुनी ही निभा रही है
वरना, छोरियां तो कैफे जाकर
पिज़्ज़ा-बर्गर ही भकोसती है
भुखियाई बकरी की तरह चभर-चभर
कहो उनसे कि
टेबल पर चूची झुलाते हुए
ऐसे बिलायती खाने को तिलांजलि दे दें,
भुइयां बैठें लिट्टी-चोखा चांभें
दुपहरी की झपकियों में नहीं,
सपने में भी नहीं
बस्स, खुरदरी ज़िंदग़ी में
कविताएँ सहजता से समझ नहीं पाए सर! भागों में ही उलझ कर रह गये। बस आखरी कविता को ही समझ पाए अच्छी लगी।