Thursday, May 14, 2026
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कस्तूरी द्वारा शौर्य पर्व का आयोजन

*दिनांक – 3 जनवरी 2026*
कस्तूरी द्वारा नववर्ष का पहला आयोजन शौर्य पर्व के रूप में 3 जनवरी 2026 को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में सुप्रसिद्ध कथाकार वंदना यादव द्वारा सम्पादित पुस्तक “सैनिक पत्नियों कथा और व्यथा” पर पुस्तक–परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह संग्रह ग्रंथ प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
वंदना जी की रचनाओं के केंद्र में अक्सर महिला पात्र और उनकी सामाजिक-मानसिक स्थितियां होती हैं वे महिलाओं के संघर्ष, उनके अधिकारों और समाज में उनकी बदलती भूमिका को संवेदनशीलता से चित्रित करती हैं उनकी रचनाओं में कोरी कल्पना के बजाय जमीनी हकीकत और यथार्थ का चित्रण अधिक मिलता है

कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर अनिल राय जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर संध्या वात्स्यायन उपस्थित रहीं। मुख्य वक्ता के रूप प्रवक्ता शिक्षा निदेशालय अजय तिवारी जी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप मे दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर वेद प्रकाश वत्स जी उपस्थित रहे। साथ ही कवि एवं समीक्षक आदेश गोयल जी का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला–अध्येता विशाल पाण्डेय जी ने कुशलता से किया।
आदेश गोयल जी ने पुस्तक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह अनदेखे और अनछुए शब्दों की कथा है। इसमें फौजी पत्नियों के जीवन, हाशिए पर खड़े सैनिकों के परिवार, घर और उनसे जुड़ी अनिश्चितताओं की कहानी को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। सैनिकों का साहस, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता तथा सुख–दुःख—ये सभी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें यह पुस्तक प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।
विशिष्ट अतिथि वेद प्रकाश वत्स जी ने कहा कि वंदना जी ने इस पुस्तक में जीवन के विविध रूपों और अनुभवों को अत्यंत सलीके से आकार दिया है। सैनिकों और उनके परिवारों के माध्यम से जीवन को तपस्या के रूप में जीने की अनुभूति प्रस्तुत की गई है। विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष, त्याग, वेदना और मानसिक द्वंद्व की यह कथा साहित्य में सैनिक पत्नियों की व्यथा को अभिव्यक्त करने का एक कठिन किंतु सराहनीय प्रयास है।
मुख्य वक्ता अजय तिवारी जी ने कहा कि वंदना जी ने इस पुस्तक में जामवंत जैसा महान कार्य किया है। सैनिक पत्नियों पर लेखन करना एक अत्यंत कठिन कार्य है, किंतु उन्होंने जिस शौर्य-ग्रंथ की रचना की है, उसमें मार्मिक बिंदुओं का सशक्त और संवेदनशील चित्रण किया गया है। ऐसी पुस्तक हिंदी साहित्य में गर्व का भाव उत्पन्न करती है। उन्होंने वंदना जी के संपादकीय दायित्व की भी सराहना की और उसे अत्यंत प्रभावशाली बताया।
मुख्य अतिथि संध्या वात्स्यायन जी ने कहा कि सेना का नाम लेते ही राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की भावना जागृत हो जाती है, लेकिन युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं जाता—उसके पीछे उसकी पत्नी भी होती है जो होती है सेना के पिछे की असली ताक़त वह उसे घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर निश्चिंत करती है। उन पत्नियों के त्याग, प्रार्थना और साधना का गहन भाव इस सत्य को और भी गहराई से उजागर करता है।

सम्पादकीय उद्बोधन में वंदना जी ने बताया कि इन कहानियों को आकार देने के लिए उन्हें बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के काउंसलिंग जैसी संवेदनशील भूमिका निभानी पड़ी। उन्होंने सैनिक परिवारों के अकेलेपन के भाव को भी साझा किया। साथ ही यह भी कहा कि ये सभी कहानियाँ उनके लिए गर्व का विषय हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में अनिल राय जी ने कहा कि वंदना जी एक युवा लेखिका हैं उन्होंने पुस्तक में हुए सहयोगात्मक लेखन का उल्लेख करते हुए सेना से अपने संबंधों के बारे में भी बताया। उन्होंने वंदना जी की काव्यात्मक प्रतिभा, संवेदनशीलता और एक बेहतरीन संपादक के रूप में उनकी भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि सेना के अनुभव आम जनजीवन से भिन्न होते हैं, जिसकी भाषा-शैली और कार्यप्रणाली भी अलग होती है। सेना की अपनी एक विशिष्ट अनुशासनात्मक संरचना (हाइरार्की) होती है, इसलिए यह पुस्तक आम पाठकों के लिए अत्यंत पठनीय है और साहित्य के एक नए, अब तक अनछुए पक्ष को उजागर करती है।
समापन में उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, विद्वानों, श्रोताओं को हार्दिक आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार, आलोचक, संपादक, वक्ता, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह आयोजन न केवल साहित्यिक विमर्श का मंच बना, बल्कि कहानी और जीवन के पारस्परिक संबंधों को समझने का एक सुंदर अवसर भी सिद्ध हुआ।
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