“भोर के समय का काला दूध” – पॉल सेलान की एक कविता की यह पंक्ति पहले अजीब लगती थी। अभी भी थोड़ी अटपटा लगती है। हाँ, इनका रचनासंसार बहुत ख़ास है। पर धीरे धीरे समझ में आती है कि गहराई बहुत है इसमें। सेलान मेरे जैसे अपने जन्मस्थान छोड़कर यहाँ बसने लगे पेरिस में। क्या बताऊँ, हो सकता है कि इनको पहले अच्छा लगा होगा यहाँ, शादी भी की बेटा भी हुआ जिन के साथ वह फ्रेंच में बात करते थेजो न इनकी मातृभाषा थी न इन की रचनाओं की भाषा।
कविता पहले फ्रेंच अनुवाद में पढ़ने को मिला हमें। वैसे जर्मन में लिखते थे। थोड़ा अजीब है पेरिस में रहते हुए भी जर्मन में क्यों लिखते थे। उस वक़्त के रोमानिया के चेर्नोविट्स शहर में इनका जनम हुआ जहाँ जर्मन खूब चलती थी। द्वितीय महायुद्ध के बार पूरा आँचल यूक्रैन का एक हिस्सा बना जहाँ आजकल रूस का आक्रमण होता है। कौन समझेगा कि इंसान इंसान और वतन और वतन के बीच लड़ाई क्यों होती रही हमारी २१वीं सदी में भी। और वह हमारी आखों के बिलकुल सामने हो रहा है यूरोप में जो पूरी दुनिया खासकर सभ्य और विकसित समझती है।
खैर, पॉल सेलान की यह कविता की कभी भी अचानक याद आती है। मालूम नहीं कि क्यों, हो सकता है कि अकेलापन का यही परिणाम है। दिमाग ख़राब हो जाने का परिणाम। डाक्टर से बात हुई, कहते हैं कि अगर अपने आप से ठीक नहीं हो रहा है तो देखेंगे। हाल ही में गोली मैं नहीं लेना चाहता हूँ।
समझ में भी ठीक से नहीं आती वह पंक्ति। शायद काले दूध का मतलब है विषैली पीयूष। जिस तरह से पूतना भगवान कृष्ण को दूध पिलाने से मारने को थी। मृत्यु का रंग काला होता है। दूध सफ़ेद होता है कि नहीं? हाँ बचपन में दूध जब किसान से आता था तो कभी लाल-सा या पीला भी हो सकता था। दूधवाला समझा समझा कर बेचता था लोगों को। हम बच्चे मानने के लिए तैयार हुए, पिताजी भी कहते थे कि छोड़ दो कोई नुकसान नहीं। दूधवाला सीधा-साधा आदमी था, साईकिल से गांव से आकर दूध बेचता था, हफ्ते में दो तीन बार आते थे। मालूम नहीं कि अभी ज़िंदा है कि नहीं। एकदम पतला-दुबला आदमी, पूरे बचपन के साथी थे, पर नाम भी नहीं मालूम, उस वक़्त भी। हम इन्हें “चाचा” और बड़े लोग इन्हें बस “दूधवाला” कहते थे। अभी भी मेरे सामने देखता हूँ पसीने पसीने में अपनी काली मज़बूत साईकिल पर। जब पुरानी हवेली-सी छोड़कर गोमती में बसने लगे तो दूधवाला हमारी ज़िन्दगी से बस गायब हो गए। किसी ने सोचा भी नहीं इनके बारे में।
उस वक़्त के जिस मकान में मैंने बचपन के पहले साल बिताया था उसकी ख़ूब याद आती है आजकल। हम इसे हवेली कहते थे। मज़ाक में। इतना बड़ा तो नहीं था। हाँ टॉयलेट बाहर। चार पांच लगभग एक ही उम्र के बच्चे थे हम लोग। हमको लगा कि काफ़ी जगह है कोई कमी नहीं। लेकिन बड़े लोग इस से खुश नहीं थे। खासकर चाची और माँ शिकायत करती थीं। बड़े लोगों में आपस में कभी झगड़ा भी होता था। दो मन्ज़िलवाला मकान था, परदादा ने बनवाया इसे।
परदादा मेरी पैदाइश से बहुत पहले चल बसे लेकिन जैसे कि इनकी रूह अभी भी गूँजती थी उसी जगह पर। दादा बहुत कहानियां बताते थे। उर्दू में इनके नज़्म की छपी हुई किताब थी घर में बहुत पुराने किस्म की। शुरू से अंत तक उर्दू हुरूफ़ में। मेरे समझ में तो नहीं आती। लेकिन किसी ने हाथ से परदादा का नाम और किताब का शीर्षक तथाकथित अंग्रेजी अक्षरों में भी नोट किया। “तथाकथित” कहता हूँ क्योंकि यहाँ पेरिस में ठीक से मेरे समझ में आई कि अंग्रेजी ज़ुबान की लिपि वास्तव में लैटिन की लिपि है। पर रोमांस के आगमन से पहले कोई लिपि-सी नहीं थी इंग्लैंड में। जो भी सभ्य है विदेश से “अँगरेज़” कहने की आदत है हमारे वतन में। हाँ, अभी भी भारत को अपना वतन समझता हूँ। फ्रांस के साथ। वतन आप छोड़ सकते हैं, पर वतन आपको नहीं छोड़ेगा – इस में कुछ सत्य है।
किताब का नाम: “क़दीम लखनऊ में इश्क़-ए सादग़ी”। पहले मुझे अजीब लगा। वैसे क़दीम लखनऊ अपनी सादग़ी के लिए कब से मशहूर है। हो सकता है कहने का मतलब यही है, पुराने ज़माने में ऐश के साथ सादग़ी भी होती थी अनजाने। किसी दिन किसी से पूछना है जिसको उर्दू आती है। आजकल बहुत कम लोग उर्दू जानते हैं। मुसलमानों को भी नहीं आती। एक कश्मीरी पंडित इधर उर्दू की एक स्कूल चलते हैं। चचेरा भाई का दोस्त है। वह भी कहता है की उर्दू ख़तम हो रही है। इधर पेरिस में पाकिस्तान से आए हुए एक साथी है। किताब उधर से लेकर इनसे पूछूंगा। तब पता चलेगा।
दादा कभी कभी ग़ज़ल सुनाते थे और कहते थे कि तुम्हारे परदादा की है यह। ग़ज़ल लिखने की आदत थी इनको, क़सीदा भी लिखते थे। मुझे पूछना था की “क़सीदा” का मतलब क्या है। दादा बस यही जानते थे कि एक किस्म की लम्बी कविता थी उस वक़्त की। एक डिब्बे में उर्दू की बहुत-सारी किताबें थीं। घर में दादा ही थे जो पढ़ सकते थे और वह भी मुश्किल से।
कहते थे कि आज़ादी से पहले ही उर्दू धीरे धीरे ख़तम हो रही थी। पर तुम्हारे परदादा बहुत मानते थे। बहुत अच्छे थे पर थोड़े ज़िद्दी किस्म के भी। अंग्रेज़ों को बहुत मानते थे। कहते थे वतन बर्बाद हो रहा है जब से अँगरेज़ चले गए। मैं – यानी दादा – उन दिनों छोटा था, झंडा लगाने का बड़ा शौख था, मुश्किल से तुम्हारे परदादा के सामने चुप होता था।
पर अपनी आस्था के पक्के रहे। मंगल का व्रत आखिरी दिनों तक नहीं छोड़ा तुम्हारे परदादा ने। और शनिवार को शनि को तेल लगभग कानूनी ढंग से चलता था। घर में उस वक़्त पूजा स्थल थी था जहाँ अब भी चबूतरा है न वहां। परदादा के चले जाने के बाद जब पूजा के सिलसिले में हम लोग अपने अपने काम में मग्न होकर ढीले हो गए तो किसी दिन मूर्ति को गोमती में विसर्जन करने का फैसला हुआ। और पूजास्थल ख़तम हुआ।
मुंशी थे परदादा, अंग्रेज़ों की सेवा में। कहते थे कि इनके पिता – यानी परपरदादा – दोनों फ़ौज में थे अंग्रेज़ों के ज़माने में। पर किसी को पक्का नहीं मालूम कि वह सच है कि नहीं। यह भी कहा जाता है कि महायुद्ध में अंग्रेज़ों के साथ यूरोप के रणक्षेत्र में लड़ते थे पर ज़िंदा निकले।
ख़ैर परदादा ने शादी के कुछ साल बाद यही मकान बनाया। लगता है कि अंग्रेज़ों की सेवा में वेतन ख़राब नहीं था। दादा कहते थे कि पहले भी इस से और भी पुराना मकान था लखनऊ में। वहां इनके कुछ भाई-बहनों की पैदाइश हुई, कहीं पुराने शहर में, पर खुद इधर आने के बाद दुनिया पर आए थे। वहां ख़ानदान कब से रहता था और मकान किस मोहल्ले में और किधर था अब किसी को मालूम नहीं। दादाजी कहते थे कि हम लोग वज़ीर अली शाह के ज़माने के पहले से लखनऊ में बसने लगे। कहाँ से आए थे इस से पहले वह भी नहीं मालूम।
ख़ैर, हमारे बचपन की तथाकथित हवेली को “नया घर” भी कहते थे। मेरे लिए वह नया तो नहीं था, पुराना था। दादाजी यह कहते थे कि इस मकान को नहीं बेचना जब तक हम ज़िंदा है। पहले से कुछ लोग ज़मीं को अपने कब्ज़े में लेना चाहते थे। और जब तक दूसरा जनम लेना है तब तक यहाँ रहूँगा। और सचमुच ऐसा हुआ। दादी पहले से चल बसे, पर दादा के देहांत के बाद ही दूसरा मकान लेने की हिम्मत हुई मेरे पिताजी को। कहते हैं कि ज़मीं की बिकाई अच्छे दाम पर हुई। पर आज अगर वह ज़मीं अब तक हमारे हाथ में होती तो करोड़पति बनते। शहर के बिलकुल अंदर है।
बाद में उसी जगह पर चार मंज़िल वाली ईमारत आ गयी। अब सुना कि और भी बड़ी और शानदार कुछ बन रही है। विकास कौन रोकेगा सब का। पेरिस में बैठकर मैं तथाकथित हवेली की बहुत याद करता हूँ, पहले से बहुत ज़्यादा मालूम नहीं क्यों। बहुत दुःख है कि कोई फ़ोटो नहीं है। स्मार्ट फ़ोन का ज़माना बहुत बाद में शुरू हुआ। छोड़ने पर किसी यह नहीं सोचा कि कुछ यादगारों को साथ लेना है कम से कम। कुछ भी नहीं रहा उस मकान से। बस यादें जो उम्र के साथ ज़्यादा रोमांचक बन जाती हैं। कम से कम मेरे साथ। घर के बाक़ी लोगों को मेरी यह दिलचस्पी थोड़ी अजीब लगती होगी। जब छुट्टी पर अपने लोगों से मिलता हूँ तो बड़े बूढ़ों से पूछने की आदत हो गई मेरी। हंसी–मज़ाक के साथ जवाब देते हैं। खुश तो हो रहे हैं और बताते ज़रूर हैं, पर साथ में इनके चेहरों पर चिंता-सी दिखने लगती है। क्या तुम उपन्यास लिखोगे उस ज़माने पर? अपने ज़माने को मत भूलो बेटा। बुढ़ापे में जब अपने बच्चे नहीं तो हालात क्या होगी। ज़रा सोचो। लड़की अगर वहां नहीं मिलेगी तो इधर से लेने में क्या नुक़सान?
ख़ैर, रही दूधवाले के लाल-से दूध की बात। बाद में किताब से पता चला कि दूध तब लाल हो जाता है जब थन से थोड़ा खून निकलता है दूध के साथ। बड़ी हैरानी हुई पढ़कर, हम लोगों का शुद्ध भोजनालय होता था, खासकर माँ में इसमें थोड़ी–बहुत सख्ती है। पिताजी ने तसल्ली दी कि कोई बात नहीं। बचेरा भी पीती है और क़त्ल का खून बिलकुल अलग किस्म का खून होता है।
द्वितीय महायुद्ध में पॉल सेलान का पूरा ख़ानदान मिट गया। यहूदी थे, जर्मन फौजियों ने सबों को कंसंट्रेशन कैंप भेजा। फिर गैस से या मालूम नहीं किसी दूसरे तरीक़े से क़त्ल हुआ। संयोग से पॉल सेलान पकड़ते वक़्त घर पर नहीं थे और निकला। फिर भी इसे अपना सौभाग्य मानने से खुश नहीं हुआ। लगता है कि आजीवन तक सोचते थे कि फिसलने से बेहतर था कि मैं इन लोगों के साथ मर गया होता।
मेरी भी कभी कभी यही सोच होती है कि अच्छा होता कि मैं नहीं होता। हाँ, मेरा तो बहुत फ़ायदा है कि खानदान अभी भी है। आभारी हूँ कि अकेला नहीं हूँ। ख़ैर, बहुत दूर तो हैं सब। सब पूछते हैं कैसे हो वग़ैरह व्हाट्सएप्प पर। माँ प्रार्थना करती हैं। खून का रिश्ता खून का रिश्ता होता रहेगा कि नहीं। कभी कभी किसी की शादी पर या किसी कॉलेज में दाखिला होने पर फ़र्ज़ है कि कुछ पैसे भेजो उधर से। और मैं भेजता ज़रूर हूँ। आखिर में मेरा सौभाग्य है कि कमाई ख़राब तो नहीं है यहाँ। साल में एक बार जाने की आदत है। अब डेढ़ साल हुए। माँ को फ़िक्र है, कहती है कि दिवाली पर ज़रूर आना नहीं तो मैं कुछ नहीं खाऊँगी। माँ तो माँ है। बूढ़ी होती जा रहा हैं वह भी सोचना है। कुछ वक़्त पहले इनके दो दांत निकालने थे डॉक्टर के हुक्म पर। पिताजी से पूछा कि पैसे भेजूं पर पिताजी ने मना किया। कहते थे कि इस पैसे से घर आने की टिकट ले लो। तुम्हारी माँ बहुत चाहती हैं।
मैं कहता हूँ कि मुँह में ख़ाली जगहों पर ट्रांसप्लांट करवा दो। पर अम्माँ मना करती है। कहती है कि पैसे बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है। कुछ ही साल बाक़ी है, बाक़ी दांत जो हैं इनसे काम चलेगा। पर वास्तव में ट्रीटमेंट से डरती है इसलिए मना करती है।
काले दूधवाली कविता की पंक्ति पॉल सेलान की „टोडेसफुगे” से हैं — मैं जर्मन जुबां थोड़े ही जानता हूँ पर यह लफ्ज़ सीख लिया हूँ। फ्रेंच में “Fugue de mort” कहते हैं। हिंदी में इस का मतलब लगभग “मृत्यु-धुन” बनेगा। एक ऐसी कविता, जो पहली बार तब सुनने को मिली जब मैं फ्रांस आया था। न केवल शब्दों की भयावह सुंदरता से चकित था, बल्कि इस बात से भी कि यह कविता फ्रांस की उसी नदी के किनारे बसे शहर में गूँजती रही है, जहाँ अब ख़ुद टहलना है — सेन नदी के किनारे।
उस दिन भी आकाश गुलाबी था। पर्यटक नावों की कतारों में कैमरों की क्लिकिंग हो रही थी, पुलों पर सेल्फी स्टिकें आसमान की ओर उठी थीं। मगर निगाहें पानी पर टिकी थीं, उस लहराती हुई सतह पर जहाँ अतीत की परछाइयाँ बहती हैं। पेरिस में पूरी दुनिया से टूरिस्ट्स आते हैं, ख़ासकर गर्मियों में पुराना शहर टूरिस्टों का अड्डा बना। इधर के लोग इस पर इतने खुश नहीं हैं, खूब शिक़ायतें होती हैं कि सारे स्मृतिस्थल उन लोगों के हाथ में कैसे आए हैं। यह भी एक शिक़ायत है कि बाहर के लोगों को अक्सर फ्रेंच नहीं आती।
रेलिंग पर हाथ रखे हुए अपने भीतर के ठहराव को सुना। “मैं बह नहीं रहा,” मैंने सोचा, “मैं ठहरा हुआ हूँ। जैसे कोई बूँद, जो गिरने से पहले ही जम गई हो।”
अच्छा, अपना नाम बताना भूल गया। नाम अनुराग शुक्ला। हमारे परिवार में हम लोग अपने नाम को दीर्घ आ से लिखते हैं, हाँ। पिताजी से पूछा कि ऐसा क्यों तो मुस्कराहट आई इनके चेहरे पर। कहते थे कि मेरा बेटा ऐसे वैसे सवाल पूछना कभी बंद नहीं करेगा। पर पूछो ज़रूर बेटा। पुराने कागज़ात निकालने लगे उसी संदूक से जहाँ उर्दू की किताबें पड़ी हुई रहती हैं। इस से पता चला कि परदादा अपने को “शुकल” लिखते थे, दादा के साथ ही “शुक्ला” लिखना मानक हो गया। पिताजी का बड़ा अच्छा स्वभाव होता है, पूछने पर धीरज से समझाता है। कहते थे कि तुम्हारे दादा “शुक्ला” लिखते थे, इसलिए तू भी यों ही कर बस।
लखनऊ की तंग गलियों में जन्मा। तब तक पुराना मकान था, तथाकथित हवेली। चाचा चाची लोग साथ में थे। माँ को अच्छा लगा कि बहुत लोग थे, पिताजी इतने खुश नहीं थे। जब नाराज़ हुए तब इनका स्थायी राग होता था कि यहाँ सुकून नहीं है। बाथरूम ठीक नहीं था, सीढ़ियां बहुत सांकड़ी थीं। पहले पिताजी दादा के चले जाने के बाद भी इसे छोड़ना नहीं चाहते। आखिर में जब मैं ऐसे ११-१२ साल का था तब गोमती में हमने बड़ा–सा फ़्लैट लिया और दूसरे लोगों से अलग रहने लगे। माँ इसे पसंद नहीं करती थीं, पर क्या करें। मेरी तरफ से नई जगह ठीक थी। ज़्यादा खामोश थी कोई मुझे डिस्टर्ब नहीं करता। अपना एक छोटा सा कमरा था वहां। माँ बुलाती थी जब खाना खाना था या दूसरा कुछ था, बाक़ी इनको मालूम था कि स्कूल का काम करना था, शांति चाहिए लड़के को। इनको पहले से यह भी मालूम था कि मैं दूसरे बच्चों से थोड़ा अलग था।
पुराने शहर के बच्चे मुझे अब कुछ भोले-से लगे। रास्ते में हम लोग वहां और यहाँ भी ख़ूब क्रिकेट खेलते थे। हर दिन। जैसे कि दूसरी कोई मस्ती नहीं। इधर फ़्रांस में कोई क्रिकेट नहीं खेलता। पहले बहुत अजीब लगा। वैसे स्कूलिंग की वजह से मामूली हिंदुस्तानी से मेरी जानकारी फ़्रांस पर कुछ ज़्यादा थी। कुछ फ़्रेंच भी सीख ली थी जो मुझे उन दिनों बेकार लगी। ला मर्टिनियैर लखनऊ में बहुत मशहूर है। एक फ्रेंच ने इसे शुरू किया अंग्रेज़ों के ज़माने में। पिताजी कहते हैं की हमारे स्कूल में उस ज़माने में सारे इम्तिहान फ़्रेंच में ही देने पड़ते थे। मालूम नहीं कि यह सही है की नहीं। मैं आजकल फ़्रेंच बहुत पसंद करता हूँ।
पिता रिटायर्ड बैंक कर्मचारी थे, माँ जिनकी दिनचर्या घर के काम के साथ तुलसी के पौधे में जल देना और रामचरितमानस का पाठ करना था। परिवार ब्राह्मण था—परंपराओं से बँधा हुआ, लेकिन शिक्षा को लेकर उदार और स्वप्नशील। शिक्षा और आधुनिकता के द्वार उनके लिए खुले थे।
खुशनसीब ने मुझे स्कूल के बाद दिल्ली के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान तक पहुँचा दिया। नामांकन की खबर आते ही मिठाई बाँटी गई। माता-पिता की आँखों में भविष्य की चमक थी, माता-पिता गर्व से भर उठे। मगर उसी रात, जब सब सो रहे थे, अनुराग ने चुपचाप अपनी डायरी में लिखा: “मैं कहीं जा रहा हूँ, लेकिन खुद से दूर।” मन में पहले से ही एक अनकहा खालीपन घर कर चुका था—जैसे किसी और की कहानी में वह केवल एक पात्र भर हो।
कॉलेज जीवन में जिस ऊष्मा और उत्साह की कल्पना की थी, वह कहीं खो गया था। सहपाठी मुझसे ज़्यादा शहरी थे, बोलने में मुझसे चतुर, दिखावे में मुझसे माहिर थे। धनी थे, आत्म-प्रस्तुति में पारंगत थे। किसी तरह से इन्हीं के साथ मेरा उठना-बैठना हुआ। हाँ, इनसे कुछ गरीब परिवारों के बच्चे भी थे पर इनके साथ दोस्ती नहीं हुई। अब मैं अपने से पूछता हूँ कि ऐसा क्यों, पर उस वक़्त मुझे यह सब सही लगा। मैं इन सब लोगों से कुछ अलग था लेकिन हो सकता है कि मुझे इसलिए स्वीकार करते थे इनके बीच में क्योंकि मैं कुलीन परिवार का हूँ। जनेऊ रखना मैंने इधर बंद किया, पर उस वक़्त ज़रूर रखता था। हालाँकि पूजा पाठ तो लगभग नहीं करता था दिल्ली में। लोग देखते थे कि मैं पढ़ाई का पक्का था, इसपर कभी कभी मज़ाक चलाते थे पर प्रभावित भी हुए। कुछ पुराना और अजीब मैं किस्म का ब्राह्मण का बच्चा लगता था। अक्सर खुद को कैंटीन से दूर, लाइब्रेरी के किसी कोने में पाता। लगता, ज्ञान अब केवल एक सीढ़ी है — नौकरी पाने की। विचार, आत्मा, संवेदना — इनकी वहाँ कोई जगह नहीं थी।
अंदर अंदर कॉलेज के दिनों में भी अपने को अकेला समझता था। दोस्त तो थे, पर लगता था जैसे कि कोई सही दोस्त नहीं। पसंदीदा लड़कियां की कमी नहीं थी पर अंदरूनी ख्वाहिशें उभरने नहीं देता। या बहुत कम। सोचा कि माँ क्या सोचेंगी। हाल ही में गड़बड़ मत करो। रिश्ता अब नहीं बनाना है। जॉब एक बार मिल गया तो बात अलग होगी। यही तसल्ली है और होती रहेगी। और बस लखनऊ की अपनी जात की एक लड़की से शादी करनी होगी बस। दूसरा कोई रास्ता कहाँ दिखेगा।
ज्ञान से प्रेम था लेकिन वह प्रेम अब व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में दबता जा रहा था। उपन्यास-कहानियां पढ़ता था लगातार, दिल्ली में कभी कभी साहित्यिक प्रोग्राम्स या किसी कविसम्मलेन में शामिल था। साहित्यिक गोष्ठियों में भी संवाद केवल नेटवर्किंग और ‘सीवी‘ बनाने की रणनीतियाँ होती। डायरी में एक पंक्ति बार-बार लौटती थी: “क्या निर्वासन केवल भूगोल से जुड़ा होता है?” एक दोपहर, जब कैम्पस के पीछे जामुन के पेड़ों की छाया में वह बैठा था, अपने आपसे पूछा था: क्या यह भी एक किस्म की निर्वासन है — जहाँ तुम अपने ही समाज में अपरिचित बन जाओ?
चार साल बीते, पढाई का सिलसिला पूरा हुआ। चार साल दिल्ली महानगर के जंगल में। दीवाली-शिवरात्रि पर ज़रूर ट्रेन से घर जाना था, और कभी कभार दोस्तों के साथ गोवा या दूसरी जगहें देखने का मौक़ा जब मिलता तो पकड़ लेता। बाक़ी वक़्त अपने आप में एक तरह से खुश थे।
फिर कई जगहों पर जॉब मिलने के लिए आप्लिकेशन लिखने का वक़्त आया। अमरीका-कैनाडा सब जाना चाहते थे। हमारी क्लास से कुछ लोगों का चुनाव वहां से हुआ। बड़े खुश हुए। बाक़ी लोग कुछ नाराज़ भी हुए कि हमारा चुनाव क्यों नहीं हुआ। सब लोग विदेश में सेवा करने के बड़े शौक़ीन थे पहले से। दिल्ली में कुछ था लेकिन इस से खुश नहीं थे।
मेरे सामने सवाल थोड़ा अलग था। वैसे विदेश जाने से इंकार नहीं करता था, कोशिश भी करता था। लेकिन अपने ख़ानदान से बहुत दूर बसना भी ठीक नहीं समझता था। कुछ डर भी था मेरे अंदर। पहले से मालूम था कि विदेश में दोस्त कहाँ मिलेंगे, खाना भी अलग है, मौसम भी ठीक नहीं है वग़ैरह। माता पिता की वजह से लखनऊ में भी कोशिश की पर दिल से नहीं। प्लेसमेंट के दौरान जब पेरिस की एक मल्टीनेशनल कंपनी से ऑफर मिला, तो घर में मानो दिवाली आ गई हो। माँ ने कहा, “देखो, हमारा बेटा विदेश जाएगा!” पिता ने धीरे से अख़बार मोड़ते हुए कहा, “मालूम था, एक दिन बहुत ऊँचा जाएगा।”
विदेश तो है, और फ्रांस की राजधानी। बहुत बड़ा शहर। किसको ख़ुशी नहीं होगी इसपर? सहपाठी भी शुभ कामनाएं देते थे। मुस्कुरा दिया, लेकिन भीतर जैसे कोई चुप्पी जम गई थी—एक अज्ञात देश में, एक अपरिचित भविष्य की ओर वह बढ़ रहा था, लेकिन किसके लिए?
पेरिस। एक सुंदर, चमकता हुआ, पर शीतल शहर। प्रारंभिक दिन भारी थे — फ्रेंच भाषा, अजनबी चेहरों की भीड़, और दफ्तर में सतही बातचीतें। लोग स्कूली अंग्रेज़ी ज़रूर बोलते, पर आपस में फ़्रेंच चलती थी जिसपर शुरू में ताज्जुब हुआ। पेरिस में ज़िंदगी नई थी, सुंदर भी, लेकिन एकदम अजनबी। शुरुआती महीनों में भाषा सबसे बड़ी बाधा थी। कंपनी ने फ्रेंच सिखाने की व्यवस्था की थी, लेकिन लगता था जैसे हर शब्द एक दीवार है, हर वाक्य एक दूरी। ऑफिस के लोग फ्रेंडली थे, लेकिन सतही। बातचीत मौसम, वाइन और छुट्टियों तक सीमित रहती। उन्हें भारत से बेहद दिलचस्पी थी — बॉलीवुड, योग और मसालों से — लेकिन जब किसी असली बात की ओर मुड़ता, तो वे मुस्कुरा कर विषय बदल देते।
मौसम, छुट्टियाँ, वाइन — यही विषय रहते। ‘भारत‘ का ज़िक्र आते ही सहकर्मी उत्साहित हो जाते—”ओह! योगा!” “बॉलीवुड!” “स्पाइसी फूड?”
एक बार योगा-क्लास जॉइन की। वहाँ की चमचमाती मैट्स, फैशनेबल योग-पैंट्स और “नमस्ते” बोलने वाली आवाज़ों में आत्मा की तलाश नहीं मिली। सब कुछ बनावटी लगा—एक उपभोक्तावादी अनुष्ठान। ‘ओम‘ के उच्चारण फैशन की तरह दोहराए जाते। वहाँ नहीं लौटा।
कभी-कभी ‘हरे कृष्णा‘ मंदिर चला जाता। आरती में शामिल होता, लेकिन मन नहीं जुड़ता। भजन दोहराव से भरपूर लगते, बातचीतें सतही। प्रवचन कुछ नाटकीय। धर्म के प्रचारक हैं हरे कृष्णावाले। कुछ अजीब किस्म के। संस्कृत की प्रशंसा करते हैं और उसी वक़्त उनमें से ऐसे बहुत कम हैं जिन्हें कुछ संस्कृत आती है। ख़ैर, संस्कृत सीखना आसान काम नहीं है, मेरी भी भर्ती हुई एक ऑनलाइन क्लास में पर कुछ महीने बाद छोड़ दिया। जब काम से घर आता हूँ तो संस्कृत की क्लासेस में मन लगाना मुश्किल है। खाना बनाना है, घर की सफाई का काम है, खरीदारी, दोस्तों से मिलना है कभी कभी, बाहर घूमने का शौक़ है, किताब पढ़ने का शौक़ भी है और कभी कभी बस टीवी देखनी है।
वैसे माँ खुश है जब मंदिर जाने की बात करता हूँ फ़ोन पर। हरेकृष्णा का है या जो भी है। माँ को ख़ुशी होती थी इसलिए खूब बताता। माँ कहती थी कि कितना अच्छा है कि उधर पूरी दुनिया में आजकल लोग हरि का नाम लेकर सत्य के पथ पर हैं। विदेश है तो और भी मुश्किल है गुण दुगुना है। वैसे मुझे थोड़ा नाटकीय लगता था हमेशा पर वह नहीं बताता। लेकिन खाने में घर की याद आ जाती—पूड़ी, खिचड़ी, हलवा। घर में अब भी ज़्यादातर शाखाहारी और हमारे यहाँ का खाना बनाता हूँ, या कम से कम मसाला डालता हूँ। हाँ सही, अंडा खाने की आदत बनी। कभी कभी हमारे एक बंगाली दोस्त आता है, अभी भी जनेऊ पहन लेता है पर बंगालियों की तरह बहुत मज़ेदार ढंग से मछली बनती है जब वह आता है। इनका नाम है सत्यजीत और मैं इनको “सत्यजीत राय” बोलता हूँ मज़ाक में। खूब हांसी-मज़ाक होती है जब हम मिलते हैं। मन हल्का हो जाता है। हर बार मुझे मछली का सर खिलाने की कोशिश करता है पर वह मैं नहीं खा सकता। और हम लोग आसानी से बोतल ख़तम करते हैं जब मिलते हैं। बाहर अक्सर कुछ भी खा लेता। याद आता, कैसे बचपन में नवरात्रि में माँ नींबू के पत्तों से थाल सजाती थी, और कैसे उसके दादी ने एक बार कहा था: “भोजन ही तो संस्कृति का सबसे गहरा स्पर्श है।”
कुछ हफ्ते पहले पिताजी एक बार फ़ोन पर गंभीर होने लगे और जैसे कि अपनी हिम्मत सँभालते हुए कहने लगे कि बेटा मेरी एक बात मानो। मैं जानता हूँ वहां की ज़िन्दगी ठीक से मेरी समझ से दूर है। तुमको अपना रास्ता खुद ढूँढ निकालना होगा। पर एक बात सुनो। मीट खाना ठीक नहीं है। तंदुरुस्ती बर्बाद हो रही है। मुझे देखो। अभी भी रात को ही छोटी सी एक ही गोली लेता हूँ। अब साइंस भी दिखाता है कि मीट नहीं खानी है। शाखाएं खाने में गुण है।
बेटा हम लोग गोश्त नहीं खाते। दादा, परदादा और उस से पहले पूर्वज जो थे। आजकल सब कुछ बदल रहा है और वह तेज़ी से। स्वागत है, लेकिन अपनी पहचान भी है न। और शराब न पीना ज़बरदस्ती से ज़्यादा। – मैं इस पर हाँ जी कहता पंजाबी अंदाज़े से जो मैंने दिल्ली में अपनाया। वैसे दिल्ली में कैंटीन में वेज तो ज़रूर कहते, पर हम लोग सनीचर को अक्सर बाहर नॉन वेज खाने जाते थे। वैसे मीट का आदी कभी बना नहीं। अभी भी बहुत कम खाता हूँ। माँ ज़्यादा नहीं पूछती, मैं खुद इनको तसल्ली देने के लिए कहता हूँ कि फ़िक्र मत करो वग़ैरह। अगर वह झूठ है तो माफ़ी मांगता हूँ। माँ की चिंता दूर करने की सोच है इसीलिए। और सचमुच गोश्त बहुत कम खाता हूँ। पर बाहर अलग सी बात है।
ऐसे ही एक शाम, बारिश के बाद की ठंडी हवा में भीगता हुआ, सेंट-सल्पिस चर्च में जा पहुँचा। भीतर अंधकार, मोमबत्तियाँ, और एक स्थिर मौन। उस मौन में जैसे कोई उत्तर छिपा था—कोई अव्यक्त संवाद। वहाँ का सन्नाटा, धीमे जलती मोमबत्तियाँ और बेंच की लकड़ी की ठंडक में अजीब-सी शांति मिली। चर्च की दीवारों से कोई भाषा नहीं चाहिए थी—सिर्फ मौन। आजकल हफ़्ते में एक दो बार ज़रूर जाता हूँ। कुछ नहीं करता, बस बैठता, जैसे अपने भीतर किसी गहरी आवाज़ की प्रतीक्षा में।
फ्रांसीसी नागरिक बना। एक सुंदर बालकनी वाला फ्लैट, नौकरी स्थिर, फ्रेंच में बातचीत भी हो जाती। मगर फिर भी, भीतर एक रिक्तता, जैसे कोई दरार जिसे कोई संवाद, कोई रिश्ता भर नहीं पा रहा है।
भारत लौटने का विचार मन में नहीं आता। कौन लौटेगा? बराबर की नौकरी कहाँ मिलेगी? लोग कहेंगे कि वहां अपनी कोई ज़िन्दगी बनाने में असमर्थ हैं, बड़े बेवकूफ़ है। छुट्टी पर तो ठीक है पर अब वह देश स्वप्न की तरह – भारत में लोग विदेश का सपना देखते हैं, और इधर भारत का सपना। बहुत कम लोग जहाँ रहते हैं वहां खुश हैं। ज़्यादातर आगे बढ़ना चाहते हैं या खानदान के लोग बेक़सूर बच्चों को धकेलकर विदेश तक पहुंचा देते हैं।
मुझे बहुत याद है लखनऊ की और दिल्ली की भी। कभी ख़ुशी से कभी ग़म से, जब दिल्ली की ट्रैफिक जैम की याद आती है। बहुत भीड़ है और हवा एकदम प्रदूषित। फिर भी अभी तक जीता रहा शहर। और बढ़ता अभी भी है। अपरिभाषित। मित्र सफल निकाले — कंपनियाँ, विवाह, अमेरिका। लगता कि मैं किसी और मार्ग का यात्री है, जिसका नक्शा अब तक अधूरा है।
माता-पिता जब मिलने आए, तो उनके लिए एक झूठा सामाजिक जीवन रचना था। दोस्तों के साथ डिनर, कृत्रिम हँसी, तैयार किए गए उत्तर। ऑफिस के कुछ सहकर्मियों को डिनर पर बुलाया, किराए के दोस्तों जैसे। अगले दिन माता-पिताजी को मॉंमार्त्रे की पहाड़ियों पर घुमाया, जहाँ कलाकार सड़कों पर स्केच बनाते थे, और माँ ने कहा, „यहाँ की हवा में भी कला है” – पिता चुप थे, बस शहर में हवेलियों की छाया खोजते रहे। माँ ने पूछा, “बेटा, शादी का कुछ सोचा?” मुस्कुरा दिया और कुछ झेंपकर कहा “यहाँ लड़की मिलती है, मैं खुद ही देख लूंगा।” मैंने यह कभी नहीं बताया कि कोशिशें कई बार हुई पर सफलता नहीं मिली। सभी प्रयास विफल रहे। कुछ बातचीत तक सीमित रही, कुछ डेट्स में अर्थहीन हँसी-ठिठोली, और अधिकतर में एक अनकही दूरी थी जिसे भाषा नहीं पाट सकती थी। हकीकत यह है कि हर कोशिश अधूरी रह जाती—संवाद शुरू होने से पहले ही जैसे कोई दीवार खड़ी हो जाती।
छुट्टी में सेन नदी के किनारे पर और शहर के ऐतिहासिक केंद्र के अंदर घूमने की आदत होती रही। „भोर के समय का काला दूध “ – यह पंक्ति क्यों दिन दिन गूंजती रहती है? कैसे समझाऊं किसी को? क्या भाषा ही अंततः निर्वासन का सबसे गहरा रूप नहीं होती? वह भाषा, जिसमें तुम रो नहीं सकते, जिसमें प्रार्थना अधूरी रह जाती है। – हाँ, आजकल कभी कभी हिंदी के कवि बनने के बारे में सोचता हूँ।
एक वृद्धा फूलों की टोकरी लेकर गुज़रती है, एक बच्चा पिता की उंगली पकड़कर हँसता हुआ दौड़ जाता है। जीवन बह रहा है, रुक रुककर मैं बस गवाही करता हूँ शामिल कभी पूरी तरह से नहीं होता। शायद जीवन का अर्थ किसी उत्तर में नहीं, किसी धार्मिक अभ्यास या करियर में नहीं, बल्कि इन क्षणों की मौन उपस्थिति में है—इन अप्रकाशित, अव्यक्त, अपरिभाषित पलों में।
बस आगे चलता हूँ। एक तरह से एक पहुंचा हुआ आदमी हूँ। किसी तरह से मतापितजी मेरी हालात समझते हैं, बाक़ी लोगों में कौन समझेगा? चलता हूँ — धीरे, स्थिर कदमों से — जैसे कोई कविता भीतर ही भीतर आकार ले रही हो, और उसका शीर्षक अभी बाकी हो। डायरी धीरे-धीरे अकेलेपन की स्याही से भरती गई जिसे कोई और समझ नहीं पाता था। वह अक्सर लिखता—”मैं हूँ, लेकिन मेरा होना किसी को नहीं दिखता।”
समय अपनी गति से बहता रहा। बालकनी वाले अपार्टमेंट में कोई नुकसान नहीं। नौकरी, स्वास्थ्य बीमा, एक अच्छी कॉफी मशीन, फ्रेंच नागरिकता, कुछ किताबें जिनमें से अधिकतर अनपढ़ थीं। लेकिन दिल के अंदर एक ही सवाल गूंजता है, जो शायद हर इंसान के अंदर है लेकिन लगता है कि मेरे अंदर में खासकर सशक्त है।: “इस सबका क्या मतलब है?” ग्लोबल वार्मिंग, जंगलों की कटाई, नदियों की सूखती धाराएँ—वह सब उसे विचलित करते, लेकिन खुद को उनमें लाचार पाता। किसी विशाल मशीन का एक छोटा सा पुर्जा बन चुका हूँ, जो चलते-चलते थक गया है लेकिन रुकने का विकल्प नहीं है।
सेन नदी के किनारे टहलने निकला हमेशा की तरह। आसमान गुलाबी था, पर्यटक नावों की भीड़ में हमेशा की तरह बेवकूफ़ी ढंग से तस्वीरें खींच रहे थे। याद आया—पॉल सेलान, जिसने यहीं कूदकर जान दी थी। रुका, रेलिंग पर हाथ रखा। „भोर के समय का काला दूध” की पंक्ति हमेशा की तरह गूँजती रही अंदर। मैं क्यों बेकार एक अजीब सी कविता की एक अजीब सी पंक्ति महामंत्र की तरह दुहराता रहता हूँ। और वह भी बेसमझ। छोड़ दो। पानी बह रहा था, जैसे समय बहता है। आँखें बंद कीं और सोचा — „मैं बह नहीं रहा, मैं ठहरा हुआ हूँ। पर यह जीवन… क्या यह मेरा है?”
हाँ, मेरी ज़िन्दगी और मैं, हमारे बीच में दोस्ती नहीं बन पाई। पहले से। कौन समझेगा यह? आखिर में मेरा क्या महत्त्व है? बूँद की तरह हूँ सागर में। हाँ, सागर को पार करने की बात कितनी बार सुनी, दूसरे किनारे पर पहुँचने की बात। माँ खूब बोलती है इस तरह से चौपाइयां लेकर। आराम सी तब मिलती है जब हम अपने को भूल जाते हैं और उसी जगह पर बाहर की दुनिया की सोच आती है, दूसरों का सुख-दुःख। मममेरी को अहंकार को हउमैं को छोड़नी है क्या सारे पीर-फ़क़ीर यह नहीं सिखाते?
पिताजी कहते हैं कि अंग्रेजी को लेकर पूरी दुनिया में काम चलेगा। वैसे हम लोग आपस में देशी जुबां में यानी हमारी लखनवी हिंदी में बात करते हैं। जब कोई बात बहुत अहम समझते हैं तो इसे अंग्रेजी में दोहराते हैं। दादा कभी कभी फ़ारसी की एक पंक्ति भी लेते थे अपनी बात पर ज़बरदस्ती डालने के लिए। अवधी समझ में आती है पर ठीक से बोल नहीं पाता। पिताजी को थोड़ी-बहुत आती है। दादा-दादी अवधी बोलते थे। परदादा फ़ौज़ में थे, प्रथम महायुद्ध में यूरोप के रणक्षेत्र में लड़ते थे, अंग्रेज़ों के राज में खिदमत करते थे पर अंग्रेजी नहीं जानते। उर्दू के बड़े ज्ञानी थे। मैं पूछता हूँ कि पक्के शाखाहारी होते हुए भी वह फ़ौज में अपनी इच्छा से दाखिला कैसे हुए। एक फौजी को दूसरे इंसान को गोली मारना है कि नहीं।
इस सवाल पर पिताजी परेशां हुए और डाटने लगे कि तुम्हारी सोच पहले से अलग क्यों है। व्हाट्सएप्प पर कई बार इस पर बात हुई। पिताजी कहते हैं कि फ्रांस ने क्या किया तुम्हारे साथ। अगर कोई मुसीबत है तो सीधी बात करो। मैं तुम्हारे पिता तो हूँ। तुम्हारी माँ कहती है कि… इसपर मैं इनकी बात काटता कि कोई मुसीबत नहीं, आप लोग फ़िक्र न करें। इसपर कहते हैं कि जब मैं तुम्हारी उम्र में था तो दो बच्चों की ज़िम्मेदारी लेनी थी, वही अच्छा है। हाँ इधर भी आजकल शादी करने में मुसीबत होती है, अरे क्या ज़माना हो गया है … इस तरह से कभी कभी हमारी बातचीतें चलती हैं। पिताजी बहुत समझदार हैं। फिर भी आजकल अपने से पूछता हूँ कि हमारे बीच में समझदारी होती रही कि नहीं।
दुनिया कहाँ जा रही है? लोग अपने को प्रगतिवादी समझते हैं, देश-विदेश जाते हैं, मस्ती में मकान, गाड़ी, सब कुछ खरीदते हैं। पर अबोहवा का हाल बिगड़ता रहता है। दिल्ली में हवा बहुत खराब है, लखनऊ में भी जब माँ से व्हाट्सएप्प पर बात होती है तो बहुत शिकायत करती है। बहुत बुरा हाल है पूरी इस दुनिया का। पिताजी सही कहते हैं कि पेरिस में थोड़ा ठीक है, खुश क्यों नहीं हो बेटा? माँ शायद सही कहती है कि बस शादी करो जल्दी फिर सब ठीक ही होगा। डाक्टर गोली वाली लेने को कहता है। क्या करूँ?
देर तक वहीं सेन के पुराने पुल के नज़दीक खड़ा रहा। अजनबी भाषा में आते-जाते लोगों की आवाज़ें जैसे किसी संगीत की तरह उस पर से बहती रहीं। हो सकता है कि जर्मन थी। इसपर पॉल सेलान की याद आई फिर एक बार। क्या मैं इन लोगों से पूछूं कि क्या आप पॉल सेलान को पसंद करते हैं? शायद ही जानते होंगे। मैंने सुना कि जर्मन लोग भी कम जानते हैं पॉल सेलान को। ये लोग कुछ ही दिन तक पेरिस में बिताकर वापस घर जाते हैं और अपने मामूली ज़िन्दगी में पहले की तरह मग्न होंगें। एक बुढ़िया पास से गुज़री, जिसके हाथ में ताजे फूलों की टोकरी थी। एक बच्चा हँसता हुआ अपने पिता की उंगली पकड़ कर चला गया। जीवन में अर्थ शायद किसी उत्तर में नहीं, बल्कि इन मौन क्षणों की उपस्थिति में छुपा है।
“मैं बह नहीं रहा,” मैंने सोचा ज़िद्दी अंदाज़े में, “मैं ठहरा हुआ हूँ। जैसे कोई बूँद, जो गिरने से पहले ही जम गई हो। एक बूँद काले दूध की।” और अगले पल वापस चल पड़ा — धीरे, स्थिर कदमों से — जैसे कोई नई कहानी भीतर ही भीतर जन्म ले रही हो, और उसका पहला वाक्य अभी तय होना बाकी हो।