Monday, February 23, 2026
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रेणु गुप्ता की कहानी – रूह से महसूस करो

गुड मॉर्निंग मैम।
गुड मॉर्निंग किड्स।
 “हैप्पी टीचर्स डे मैम,” और मनस्वी की क्लास के सभी बच्चे अपनी-अपनी सीट से उठकर उसे अपने लाए  हुए फूल देने के लिए एक साथ बढ़े, जिसे देख कर मनस्वी  चिल्लाई, “चिल्ड्रेन, आप लोग इकट्ठे इधर आएँगे तो मैं किसी से  फूल नहीं ले पाऊँगी। आप लोग सब अपनीअपनी सीट पर जाइए। मैं  हर स्टूडेंट के पास आकर  फूल ले लूँगी।
ओके, ओके मैम,” सभी बच्चे समवेत स्वरों में चिल्लाए, और पाँच मिनट में ही क्लास में पूरी तरह से व्यवस्था और शांति का आलम छा गया।
मनस्वी हँसते-मुस्कुराते  पहली बेंच से शुरू कर हर बच्चे से उसके लाए फूल लेने लगी। तभी उस  की फेवरिट स्टूडेंट  रिया  उसे एक बड़ा सा चटख नीले, नारंगी  और बैंगनी रंगों के फूलों का बेहद खूबसूरत  गुलदस्ता थमाते हुए अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को गोल-गोल घुमाते  हुए उससे बोली, “मैम यह आपके लिए।
 वह गुलदस्ता  इतना आकर्षक था कि वह उसकी अपूर्व सुंदरता  में खो-सी  गई। उसने उसे सूँघने  के लिए अपना चेहरा  उसमें गड़ाया ही था कि तभी उसने अपनी आँखों की कोरों से देखा, क्लासरूम के बड़े से दरवाजे से एक लंबी तड़ंगी आकृति उसके सामने आई। वह बुरी तरह से हड़बड़ा गई, और उसने चौंक कर बुके पर झुका हुआ अपना चेहरा ऊपर किया। अपने सामने एक छह फूटिया  सुदर्शन नौजवान  को देखकर उसके हृदय की धड़कनें तनिक तेज हो आईं । उसकी तरफ देखते हुए अपनी दिलकश  मुस्कुराहट बिखेरते हुए वह युवक हौले से मुस्कुरा दिया।  
तभी क्लास के बच्चे चिल्लाए, “गुड मॉर्निंग सर, हैप्पी टीचर्स  डे।
हैप्पी टीचर्स डे चिल्ड्रेन। यह क्या हो रहा है? अभी तक आप लोगों ने स्टडीज़ शुरू नहीं की?  वेरी बैड, वेरी बैड। चलिए, अपनी-अपनी बुक निकालिए,” यह कहकर वह युवक बिना उस पर नज़र डाले  बड़े-बड़े डग भरता हुआ वहाँ से चला गया।
उस युवक की शख्सियत इतनी सम्मोहक  थी कि उसके वहाँ से चले जाने के बावजूद वह जल्दी से सामान्य नहीं हो पाई। अभी तक उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था मानो बाहर निकल पड़ेगा।               कुछ देर में संयत होकर उसने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन  उस दिन वह रोज की तरह उसमें पूरी तरह से कॉसंट्रेट नहीं कर पाई। रह-रहकर एक अनूठी मासूमियत से भरपूर उस युवक का खुशनुमा मुस्कुराहट से खिला-खिला चेहरा उसकी आंखों के सामने आ रहा था, कि तभी पीरियड खत्म हुआ और चैन की साँस लेते हुए वह क्लास छोड़ कर बाहर आई। 
 तभी उसे उसकी करीबी सहेली अंजुम उसकी ओर आती दिखाई दी। उसके हाथों में ऑर्किड्स का खूबसूरत बुके देख अंजुम चिल्लाई,  “वाह, इतना सुंदर बुके!” 
किसने दिया तुझे यह? अरे ये तो ऑर्किड्स हैं। ये  तो बहुत महँगे होते हैं। तुझे यहाँ स्कूल में इतने महँगे फूल  देने वाला कौन मिल गया यार?”
 “यह बुके मुझे फ़िफ़्थ क्लास की रिया ने दिया।
फ़िफ़्थ क्लास की रिया ने दिया तुझे? ओ वाओ! तुझे आइडिया है, यह रिया  कौन है?”
नहीं तो! कौन है भई? मैं नहीं जानती।
सच में नहीं जानती?”
अरे बोला ना, नहीं जानती।
  फिर मनस्वी  ने उसे रिया  के उसे बुके देते वक्त अपनी क्लास में आए उस अनजान युवक के बारे में बताया, जिसे सुनकर वह उससे बोली, “वह लंबा तड़ंगा  लड़का इस स्कूल के ओनर का बेटा है। हाइली क्वालिफ़ाइड है। अमेरिका से एजुकेशन में ऊंची डिग्री लेकर आया है। अब यूनिवर्सिटी से पी.एच.डी कर रहा है।   जब भी  फ्री होता है  तो स्कूल में चक्कर काटता रहता है। वैसे पूरा जेंटलमैन है। मैंने  हमेशा उसकी निगाहें नीची  ही देखीं  हैं। मेरी क्लास में भी कई बार आया है, लेकिन बोला कुछ नहीं। तुझसे कुछ बोला?”
नहीं, नहीं, एक शब्द भी नहीं। बस मुझे देख कर मुस्कुरा भर रहा था।
 “वाओमुस्कुरा रहा था। फिर तो जरूर दाल में कुछ काला है। यह फ़िफ्थ  क्लास की रिया  उसकी क्लोज़ रिलेटिव है। अब अगर उसने तुझे इतना महंगा बुके  दिया है, तो जरूर इसका कुछ मतलब होगा।
तू तो पागल है। यूं ही उल जलूल जो मन में आए सोचती रहती है। अरे पैसे वाले लोग हैं। इनके लिए ऑर्किड्स खरीदना क्या बड़ी बात है? रिया  ले आई होगी घर से यूँ ही मुझे देने के लिए। अब तू  खामख्वाह कहानी बुनना  बंद कर,” मनस्वी  ने अंजुम से तनिक झुँझलाते  हुए कहा और अगली क्लास में चल दी, लेकिन  उस दिन न जाने क्यूँ  वह  अपनी टीचिंग में कॉन्संट्रेट नहीं कर पाई। रह-रहकर वह हैंडसम, मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी आंखों के सामने आता रहा।
                                                                 मनस्वी  बायो केमिस्ट्री में पीएचडी कर रही थी । उसकी पीएचडी का दूसरा वर्ष  था। दिनभर थीसिस लिखते-लिखते बोर हो जाती। स्कूल में पढ़ाने के बहाने कुछ घंटों के लिए घर से बाहर निकलेगी, बच्चों के साथ समय बिताएगी, तो थोड़ा  जी बहलेगा, यह सोचकर उसने घर के पास के स्कूल में नौकरी की थी। उसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। 
उसी दिन शाम को उसके घर उसके स्कूल के बुज़ुर्ग मालिक अपने इकलौते बेटे के साथ उसके घर आए और उसकी मां से अपने बेटे के लिए उसका हाथ मांगा।
स्कूल के मालिक ने मनस्वी  की मां से कहा कि उन्हें और उनके बेटे को मनस्वी  बेहद पसंद आई थी। 
मनस्वी  की विवाह योग्य उम्र हो आई थी। उसकी मां उसके लिए उपयुक्त रिश्ता तलाश कर ही रही थीं।                   राजुल  में कोई कमी न थी। उच्च शिक्षा प्राप्त था। दौलतमंद परिवार की इकलौती औलाद था।
 सो  लड़के वालों के घर से जाने के बाद मां बेटी ने इस रिश्ते के बारे में चर्चा की, और फैसला लिया कि कुछ दिन मनस्वी  और राजुल एक दूसरे के साथ फोन और व्हाट्सएप पर बातें और चैटिंग कर अपनी कंपैटिबिलिटी परखेंगे और अगर दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लगा तो बात को आगे बढ़ाएँगे।
दोनों ने फ़ोन और व्हाट्सएप पर संपर्क किया और वक्त के साथ दोनों की दोस्ती रफ़्ता-रफ़्ता  रफ़्तार  पकड़ने लगी और अब वे दोनों फोन से  आगे बढ़कर गाहे-ब-गाहे मिलने भी लगे। अमूमन शनिवार और रविवार वे दोनों साथ-साथ बिताने लगे। 
इस तरह दोनों को मिलते जुलते पाँच छह माह बीत चले। दोनों की प्रगाढ़  होती दोस्ती देख मनस्वी  की मां और राजुल के पिता उन दोनों पर सगाई करने का दबाव बनाने लगे, और आखिरकार एक  दिन शुभ मुहूर्त में दोनों की सगाई हो गई और पांच छह माह  के बाद उनके विवाह की तिथि निश्चित  की गई। 
                                                         
                              इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं। नियत वक़्त पर पायल छनकाती सुर्ख जोड़े में मनस्वी राजुल के घर आ गई। 
विवाह के मात्र एक वर्ष बाद एक दिन राजुल स्कूल के काम से अपने पिता के साथ अपनी गाड़ी से  देहली जा रहा था कि उसकी गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हो गया. उस एक्सीडेंट में दोनों प्राणी बहुत गंभीर रूप से जख्मी हो गए। डॉक्टरों ने अपने भरसक प्रयासों से राजुल की जान तो बचा ली, लेकिन वह उसके पिता की जान नहीं बचा पाए। उधर राजुल एक्सीडेंट के अगले ही दिन कोमा में चला गया।
दोनों परिवारों पर गाज गिर पड़ी थी। 
                                  राजूल के पिता के दाह संस्कार के बाद उसके सभी पास दूर के रिश्तेदार अपने-अपने घर वापस लौटने का उपक्रम करने लगे। राजुल की मां की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी। किसी तरह राजुल के मेडिकल इंश्योरेंस के कागज़ात ढूंढ इंश्योरेंस के तहत मनस्वी ने राजुल के अस्पताल का रोज़ाना का भारी खर्चा मैनेज किया। 
 
                                
राजुल को कोमा में गए हुए एक  माह हो चला था। इस एक महीने भर वह डॉक्टर्स की निगरानी में आईसीयू में वेंटिलेटर पर था। 
उसके आवश्यक परीक्षण के बाद उसके डॉक्टर्स की टीम इस निर्णय पर पहुंची कि अब राजुल के कभी भी सामान्य होने की संभावना बिलकुल नहीं है। अतः टीम के सबसे सीनियर डॉक्टर ने उससे कहा, “मिसेज़ मनस्वी, आपके हस्बैंड के ठीक होने की पौसिबिलिटी ना के बराबर है। अतः हम चाहते हैं कि उनका लाईफ़ सपोर्टिंग सिस्टम हटा दिया जाये।”
“क्या? उनका लाईफ़ सपोर्टिंग सिस्टम हट जाएगा तो क्या वो सामान्य रहेंगे?”
“नो मैम, आई एम अफ़्रेड, नो। अभी उनकी जो हालत है, मेडिकल साइंस के हिसाब से वह कभी ठीक नहीं होंगे। तो अगर आप चाहें तो लीगलली हम उनका लाईफ़ सपोर्टिंग सिस्टम हटा कर उन्हें उनके पेन से मुक्त कर सकते हैं। यह उनका गरिमा के साथ मृत्यु पाने का मौलिक एवं संवैधानिक अधिकार है।” 
यह सुनते ही मनस्वी डबडबा आई आँखों और भर्राए गले से चीख पड़ी, आप ऐसा कह भी कैसे सकते हैं? मैं उनका लाईफ़ सपोर्टिंग सिस्टम हटाने की पर्मीशन कभी नहीं दूँगी। कभी नहीं।” 
मनस्वी न जाने किस  धातु की बनी हुई थी। दृढ़ इच्छाशक्ति की स्वामिनी थी। उसने अपनी इस खूबी के चलते अभी तक जो सोचा  था, वह हासिल किया था। साथ ही वह एक बेहद भावुक और संवेदनशील युवती थी। प्यार को जीवन की आखिरी साँस तक एक निष्ठा से निभाने में विश्वास रखती। उसे अपने ऊपर, अपनी किस्मत पर और सबसे ज्यादा ईश्वर पर अटूट आस्था थी, और अपने इसी भरोसे के दम पर उसने फैसला लिया, कि ‘चाहे जो भी हो, वह राजुल से जुड़ा रिश्ता अपनी आखिरी साँस तक निभाएगी।’
एक वर्ष के सुखद वैवाहिक जीवन में राजुल ने उसे अपनी पलकों पर रखा था। दोनों जब भी साथ होते, उन्हें किसी तीसरे की जरूरत न होती। एक दूसरे के प्रति समर्पित दोनों ही एक दूसरे के सानिध्य को भरपूर एन्जॉय करते। जहाँ बैठते, जंगल में मंगल कर लेते। 
 पिछले एक वर्ष  में मनस्वी राजुल को इस हद तक चाहने लगी थी कि उसके बिना अपना जीवन बिताने की कल्पना मात्र से वह खौफ़ से भर जाती, लेकिन दुर्घटना में कोमा में जाने के बाद सभी डॉक्टर्स ने उसे एक ही जवाब दिया था, कि ‘वह ताजिंदगी कोमा में ही रहेंगे।’ 
                                                             यह सब देख सुन मनस्वी  की माँ ने बहुत सोच विचार कर दबी जुबान से उससे कहा, “बेटा, राजुल के कोमा से निकलने की पॉसिबिलिटी निल है।  तेरे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है। तू मेरी इकलौती बेटी है। मैं तुझे जानते बूझते ऐसे इंसान के साथ हमेशा के लिए बंधे हुए नहीं देख सकती, जिसकी जिंदगी तक का कोई भरोसा नहीं। प्लीज़ उसका लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाने के लिए हाँ कर दे बेटा, मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ।”
माँ की यह बात सुन वह फूट-फूट कर रो पड़ी और उनसे बोली, “माँ, आप ऐसा कैसे कह सकती हो? राजुल के साथ मेरा जन्म जन्मांतर का रिश्ता है। वह अब मेरी ज़िम्मेदारी है और मैं उसे मरते दम तक निभाऊंगी। आज तो आपने यह बात कह दी, आइंदा ऐसी बात कभी मत कहना।”
                       कुछ दिनों बाद राजुल की हालत स्टेबल हो गई। उसे वेंटिलेटर से हटा दिया गया और डॉक्टर्स ने उसे घर ले जाने की अनुमति दे दी, यह कहते हुए कि “अब कोई चमत्कार ही उसे इस कोमा से निकाल सकता है।” मनस्वी के अनुरोध पर उन्होंने उसे राजुल के साथ कुछ ऐसे तरीके अपनाने की सलाह दी जिनके जरिये रिवर्सिबल कोमा के मरीजों को कोमा से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह भी कहा कि उन तरीकों को अपनाने के बावजूद उसके कोमा से बाहर आने की संभावना नहीं के बराबर है। 
उस दिन राजुल  को अस्पताल से डिस्चार्ज करवाने का दिन था। मनस्वी उसके साथ अपनी ससुराल चली गई। उसकी माँ भी उसके साथ रहने के लिए चली गईं। 
अब मनस्वी का एक-एक पल पति के नाम लिख गया था। डॉक्टरों की सलाह के अनुसार वह घंटों राजुल से अथक बातें करती। उसे अपनी कोर्टशिप के दौरान उससे हुई मुलाकातों की याद दिलाती। हर दम उसे सहलाती  रहती। म्यूज़िक सिस्टम पर उसके पसंदीदा गाने उसे सुनाती, और हमेशा उसकी फेवरिट परफ्यूम लगाकर उसके पास बैठती। उसने राजुल की परिचर्या में अपनी मदद के लिए दिन और रात के लिए दो नर्सें भी रख लीं। जब नर्स उसका ध्यान रखती, वह उसके पास बैठ अपनी पीएचडी की थीसिस लिखने का काम भी पूरा करती। 
वक्त का पहिया अपनी ही चाल से उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहा था। मनस्वी का पोर-पोर  हर क्षण  जीवनसाथी  की सलामती  की मंगल कामना करता।  उसके मुंह पर हर पल ईश्वर का नाम रहता। सोते जागते, उठते बैठते वह ईश्वर से राजुल के ठीक होने की दुआ मांगती, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आ रहा था। जब भी वह डॉक्टर्स से उस के बारे में पूछती, वह  मात्र एक ही बात दोहराते, ‘अब कोई चमत्कार ही उन्हें कोमा से बाहर निकाल सकता है।’
                                    यूँ ही करते-करते दिन बीत चले। आज उसकी और राजुल के विवाह की दूसरी वर्षगांठ थी। उस दिन  सुबह से ही मनस्वी बेहद निराशा का अनुभव कर रही थी। आज के दिन को लेकर मन ही मन उसने न जाने कितने सुनहरे सपने संजोए थे। राजुल को पलंग पर अविचल लेटे देख उसका कलेजा मुँह को आ रहा था। पूरे दिन वह अवसाद ग्रस्त रही। 
मां के सोने के बाद उसने रात की पारी की नर्स को दूसरे कमरे में जाने के लिए कह दिया और खुद राजू के पास पलंग पर बैठ गई, और उसका शिथिल हाथ अपने हाथों में थामते हुए उससे बोली, “राजुल, मुझसे रूठ कर यूँ इतनी दूर क्यों चले गए? तुम्हें अंदाजा भी है तुम्हारे बिना मैं कितनी अकेली, कितनी अधूरी हो गई हूं। कितना छटपटा रही हूँ? लौट आओ राजुल, मेरे पास लौट आओ। अब तुम्हारे बिना नहीं रहा जाता,” कहते-कहते उसके आँसू धार-धार बहने लगे। तभी भावनाओं के ज्वार में बहते हुए वह राजुल के पार्श्व में लेट गई और उसे अपनी बाँहों के घेरे में बांधते हुए सुबकियां लेती उससे बोली, “तुम ठीक होते तो आज अपनी दूसरी एनिवर्सरी पिछले साल की तरह धूमधाम से मन रही होती। और वह पागलों की तरह उसके चेहरे को अपने हाथों में ले उसे चूमती रही। देर रात तक वह उसकी और अपनी धड़कनों की जुगलबंदी महसूस करती रही। बंद कमरे में उससे अपने अंतर्मन की बातें साझा करती रही। उसे जल्दी से होश में आने के लिए उसकी चिरौरी करती रही। 
पिछले कुछ दिनों के त्रासद घटनाक्रम से उपजा संताप कतरा-कतरा आंखों की राह बह रहा था और वह जीवनसाथी को अपनी बाँहों में घेरे-घेरे क्लांत तन-मन नींद के आगोश में समा गई।
अगले दिन सुबह सवेरे बेटी को रोने से सूजी गुड़हल-सी लाल आँखों  के साथ राजुल  के कमरे से निकलते देख मां बेटी के मन की अनकही व्यथा समझ गई, और उन्होंने उससे कुछ भी न कहा। वह अच्छी तरह से समझ गई थी कि उनकी बेटी जिस राह पर चल पड़ी थी, वहां से उसे लौटाना अब नामुमकिन था। 
 प्रारब्ध शायद मनस्वी की परीक्षा ले रहा था। पति के सामान्य होने की आस लिए कई महीने  गुज़र गये।  लेकिन वह न जाने किस मिट्टी की बनी हुई थी उसके चेहरे पर शिकन नहीं आती। 
यह नहीं था कि वह कभी मायूस नहीं होती। जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा था, कभी-कभी उसकी हिम्मत जवाब देने लगती। हताशा के दंश मानो  उसके अंत:स्थल को डंसने लगते और रात के एकांत  में वह कभी-कभी पलंग पर अविचल निःशब्द लेटे राजुल से लिपटकर जार-जार रोती। उसके सीने में  मुंह गड़ा किरच-किरच बिखर-बिखर जाती। लेकिन अगले ही क्षण उसका अनन्य जुझारूपन  उसकी निराशा  पर भारी पड़ जाता  और सुबह के उजाले में रात की मलिनता का नामोनिशान न दिखता। 
 इसी तरह आशा-निराशा के हिंडोले  में झूलता  समय बीत चला। उस दिन रात के अंधेरे में मनस्वी राजुल के निश्चल हाथों को अपनी हथेलियों से जकड़े हुए उसके करीब लेटी पड़ी थी, कि उसे लगा था, उसकी उंगलियों में हरकत हुई। वह  सिहर कर उठी और उसने लाइट जलाई। राजुल की उंगलियाँ वाकई में हिल- डुल  रही थीं। एक चीत्कार के साथ हँसते-रोते वह मां के कमरे की ओर भागी, “मम्मी, मम्मी,  जल्दी आइए। देखिए राजुल की उंगलियाँ हिल रही है।
राजुल की मम्मी दौड़ी-दौड़ी उसके कमरे में आईं, और उन्होंने अपने फ़ैमिली डॉक्टर को फोन किया। 
तभी सब ने देखा, राजुल ने आँखें खोलीं और वह शून्य  में देखते हुए करीब पाँच मिनट तक कॉन्शस रहा। तभी डॉक्टर आ गए। 
उन्होंने उसे कुछ दवाइयाँ और इंजेक्शन दिये। लेकिन डॉक्टर के आते ही वह वापस अचेत हो गया। यह देखकर डॉक्टर उन सब से बोले,  “फ़िक्र की कोई बात नहीं है। कोमा के मरीज पहली बार इतनी देर ही होश में रहते हैं। बहुत जल्दी यह फिर से कॉन्शस होंगे  और अब से कुछ ज्यादा देर तक कॉन्शस  रहेंगे।
यूं अनपेक्षित रूप से राजुल को ठीक होने की राह पर देखकर मनस्वी और उसकी मां के आँसू धार-धार  बह रहे थे। उन सब की वह रात आंखों ही आंखों में कटी।
अगले दिन राजुल  ने पहले दिन से कुछ अधिक देर तक आँखें खोली और होश में रहा। तीसरे दिन वह कुछ और  अधिक देर तक कॉन्शस   रहा और उसी दिन रात को वह करीब एक घंटे तक जगा रहा। अगले दिन उसने मनस्वी और उसकी माँ को पहचान कर उनसे बातें भी कीं।  अपने पिता के बारे में पूछने पर मनस्वी और उसकी माँ  ने उसे बहुत घबराते-घबराते डाक्टर की मौज़ूदगी में उसके पिता की मृत्यु के बारे में बताया। उनके देहांत  की खबर के सदमे से वह कहीं वापस कोमा में न चला जाये, इसके लिए  डाक्टर ने उसे यह खबर देने से पहले कुछ ट्रैंक्युलाइज़र्स के इंजेक्शंस दिये, जिनके प्रभाव से वह पिता की मृत्यु के बारे में जानने के बाद भी सो गया। कुछ दिन उसे ट्रैंक्युलाइज़र्स के प्रभाव में रखा गया, और उसके बाद निरंतर उसकी दशा में सुधार होता गया और एक  माह में  वह एकदम सामान्य हो अपने पैरों पर खड़ा हो गया। 
उस दिन दोनों की नई उम्मीदों के चाँद तारों से टंकी सपनों भरी हसरतों की रात थी।
                              एक मुद्दत की तपस्या के बाद वे आमने-सामने थे। तभी राजुल ने मनस्वी से कहा “आखिर तुम मुझे लौटा ही लाई। अब मेरी एक-एक साँस तुम्हारे नाम मन। एक बात तो बताओ। इस पूरे एक साल में तुमने  कभी हिम्मत नहीं हारी? तुम्हें कभी नहीं लगा कि मैं वापस तुम्हारे पास लौट कर कभी नहीं आऊँगा या फिर तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ कर चला जाऊँगा?”
नहीं, कभी नहीं।
मुझ पर इतना भरोसा,” राजुल ने सवालिया निगाहों से अर्धांगिनी की ओर देखा।
अपने आप से भी ज्यादा।
लव यू मन।” 
लव यू टू राजुल।
आगे बढ़ कर राजुल ने मनस्वी की गहरी आँखों में झांकते हुए उसके कपोल पर हौले से एक मयूरपंखी स्नेह चिह्न अंकित कर दिया और उसे अपनी बाँहों में बाँध लिया। 
 पार्श्व में कहीं गीत बज रहा था।
 “हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू।
 सिर्फ एहसास है यह रूह से महसूस करो।

श्रीमती रेणु गुप्ता सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका (वॉरेन अकादमी, जयपुर) तथा स्वतंत्र लेखिका हैं। एम.ए. (अंग्रेज़ी), बी.एड. एवं सी.लिब. शिक्षित रेणु गुप्ता कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य, ब्लॉग, उपन्यास व वेब सीरीज़ जैसी विविध विधाओं में सक्रिय हैं। उनके प्रमुख प्रकाशित कार्यों में लघुकथा संकलन ‘आधा है चंद्रमा’ (2023), उपन्यास ‘अंजुरी भर नेह’ (2024), कहानी संकलन ‘कैसी पहेली ज़िंदगानी’ (2025) तथा ई-बुक ‘एहसास–ए–जुनून’ शामिल हैं। लगभग तीन सौ रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब पोर्टलों पर प्रकाशित/प्रसारित हो चुकी हैं, जिनमें आकाशवाणी से प्रसारण भी शामिल है। साहित्य क्षेत्र में उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें हिन्दी गौरव सम्मान, लघुकथा श्री सम्मान, कादंबरी सम्मान सहित विभिन्न साहित्यिक पुरस्कार उल्लेखनीय हैं। संपर्क: [email protected] |
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