Wednesday, February 11, 2026
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वरिष्ठ साहित्यकार अवधेश प्रीत को विनम्र श्रद्धांजलि

कथाकार एवं पत्रकार अवधेश प्रीत के 12 नवम्बर 2025 को पटना में हृदयाघात से हुए निधन ने साहित्य-जगत को गहरे शोक में डुबो दिया। जनपद के भांवरकोल क्षेत्र के तरांव गाँव में 13 जनवरी 1958 को जन्मे अवधेश प्रीत ने बचपन की उजली पगडंडियों से लेकर कुमाऊँ विश्वविद्यालय (उत्तराखंड) में उच्च शिक्षा तक हर पड़ाव पर जिजीविषा, संवेदना और अध्ययनशीलता को अपना सहचर बनाए रखा। साहित्य और रंगकर्म की उनकी शुरुआत उधम सिंह नगर की सांस्कृतिक मिट्टी में हुई, पर उनकी पहचान देशभर में एक ऐसे लेखक के रूप में बनी जिनकी दृष्टि तीक्ष्ण, भाषा सहज और संवेदना गहरी थी।
कई दशक तक दैनिक हिंदुस्तान, पटना में सह-संपादक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि जनसरोकारों का दायित्व माना। सेवानिवृत्ति के पश्चात वे समर्पित साहित्य-साधक की तरह लेखन में रमे रहे।
उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में ‘अशोक राजपथ’, ‘रूई लपेटी आग’ (उपन्यास), तथा ‘हस्तक्षेप’, ‘नृशंस’, ‘हमजमीन’, ‘कोहरे में कंदील’, ‘चाँद के पार एक चाभी’, ‘अथ कथा बजरंगबली’ जैसे कहानीसंग्रह शामिल हैं। उनकी कहानियाँ देश की प्रतिष्ठित पत्रपत्रिकाओं में निष्ठा से पढ़ी और सराही जाती रहीं। कई रचनाओं का अनुवाद उर्दू, अंग्रेज़ी, मराठी और गुजराती में हुआ, जो उनकी व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
रंगकर्म से उनका रिश्ता विशेष था,‘नृशंस’ (एन.एस.डी.), ‘बाबूजी की छतर’, ‘ग्रासरूट’, ‘हमजमीन’, ‘तालीम’ और ‘चाँद के पार एक चाभी’ जैसी कहानियों के सफल मंचन ने उन्हें रंगमंचीय यथार्थ का भी प्रामाणिक लेखक सिद्ध किया। ‘अली मंज़िल’ और ‘अलभ्य’ पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफ़िल्में बनना उनके कथानक वैविध्य का सुंदर प्रमाण है।
उन्हें बनारसी प्रसाद भोजपुरी कथा-सम्मान, सुरेंद्र चौधरी कथा-सम्मान, विजय वर्मा कथा-सम्मान, तथा फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान जैसे गौरवपूर्ण अलंकरण प्राप्त हुएI ये पुरस्कार उनके लेखन की गूँज और प्रभाव का मौन स्वीकार हैं।
अवधेश प्रीत अपने व्यक्तित्व में अद्भुत सरलता, विनम्रता और सहज संवाद–कौशल लिए हुए थे। उनकी शालीन मौन-हँसी, धीरता और लोगों से लगाव उन्हें केवल बड़ा लेखक नहीं, बल्कि बड़ा मनुष्य बनाती थी।
उनकी कहानी कला की शक्ति उनके यथार्थ-बोध, पात्रों की भीतरी परतों को टटोलने की क्षमता और सामाजिक संरचनाओं को सूक्ष्मता से उघाड़ने में निहित थी। वे शब्दों को प्रयोग नहीं करते थे, उन्हें जीते थे Iइसी कारण उनकी कहानियाँ पढ़ने वाले के भीतर कहीं गहरे तक उतर जाती हैं।
अवधेश प्रीत के आकस्मिक निधन से हिंदी साहित्य की एक सशक्त आवाज़ मौन हो गई है। यह क्षति अपूरणीय है, क्योंकि ऐसे लेखक समय के साथ नहीं, समय से आगे चलकर अपनी छाप छोड़ते हैं। उनके लिखे शब्द, उनका सौम्य व्यक्तित्व और उनकी साहित्यिक विरासत लंबे समय तक उनके चाहने वालों  का मार्गदर्शन देती रहेगी। पुरवाई  परिवार उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके परिवार को इस दुःख की  घड़ी में सांत्वना देते हैं।
कुछ मित्रों ने अवधेश प्रीत जी के श्रद्धांजलि संदेश भेजे हैं –
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अवधेश जी से मैं पहली बार संगमन जमशेदपुर में मिली थी। उसके बाद पटना आने पर। एक ऊर्जा, स्नेह और सकारात्मकता से भरे लेखक। चाहे वे पत्रकार की भूमिका में हों या कथालेखक की उनके सरोकार ज़मीन से जुड़े थे।
अवधेश जी का जाना हिंदी कथाजगत की एक बड़ी क्षति है। उनके जैसी ऊर्जा और विनम्रता दुर्लभ मिलती है साहित्य में।
हंस में जब भी उनकी कहानियां छपती मैं तुरंत पढ़ती और फोन करती थी। नृशंस कहानी पर हमने लंबी बात की थी।
वे अनूठी कहानियां ‘सीखने’ के लिए बहुत कुछ देती थीं। न केवल आयरनीकल कथानक का चयन बल्कि उसका ट्रीटमेंट भी। उनका उपन्यास ‘रुई में लिपटी आग’ भारत के परमाणु परीक्षण के परिणामों पर केंद्रित था। जो कि परमाणु शक्ति को “रुई में लिपटी आग” के रूप मेंछ प्रस्तुत करता था। लीक से हट कर सोचना, नया करना उन्हें प्रिय था।
हरदम मुस्कुराते, अपने ख़राब स्वास्थ्य में भी जीवंत दिखते अवधेश प्रीत जी के लिए श्रद्धांजलि लिखते उंगलियां भी विरोध कर रहीं हैं। आप अपने लिखे हर शब्द और साथी लेखकों पाठकों की स्मृति में मुस्कुराते रहेंगे।
– मनीषा कुलश्रेष्ठ
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उनसे पहला सीधा परिचय कोई बाईस साल पहले एक पोस्टकार्ड के मार्फ़त हुआ था जो उन्होंने कथादेश में छपी मेरी पहली कहानी की तारीफ़ में लिखा था। अपनी बहुचर्चित कहानी ‘नृशंस’ के बाद वे एक स्टार कथाकार बन चुके थे। लाज़िमी था कि बमुश्किल दस वाक्यों के उस मुख़्तसर सी चिट्ठी ने मुझे कुछ दिनों के लिए बौरा दिया था। फिर सारनाथ में संगमन के आयोजन में हम तीन दिन साथ रहे। एक विलक्षण रचनाकार होने के साथ-साथ वे एक बेमिसाल मनुष्य थे। यारबाश, गप्पबाज़, निर्लिप्त और हैरतअंगेज़ रूप से समावेशी और आत्ममुक्त। अपने पत्रकार को उन्होंने अपने कथा-लेखन में जितने संयमित तरीके से इस्तेमाल किया, हिंदी में उसकी मिसाल दुर्लभ है।
अपनी वैचारिक स्पष्टता और पक्षधरता के कारण उन्होंने हिंदी को ‘नृशंस, अली मंज़िल, अम्मी, हमज़मीन, चांद के पार की चाभी, कोहरे में कंदील और लव जिहाद जैसी नायाब कहानियाँ दीं। अपनी जादुई भाषा और लोकेल के कारण उनकी कहानियों में एक अद्भुत पठनीयता थी। उनकी कहानियाँ अपने केंद्रीय विषय से कभी नहीं भटकती थीं, चाहे वे विषय राजनीतिक हों या सामाजिक-सांस्कृतिक। वे गंभीर लेखक थे लेकिन उनको पढ़ना रोचक था।
वे ग़ज़ब के पढ़ाकू थे। कथेतर विषयों में भी उनकी गहरी पैठ थी। धैर्य के साथ अपने बाद की पीढ़ी को सुनने की उनकी ख़ूबी हमेशा याद रखी जाएगी।
दैनिक हिंदुस्तान के दफ़्तर में उनकी टेबुल पर हमेशा मजमा लगा रहता था। वे सभी पीढ़ियों के साथ मित्रवत थे। सबको चाय पिलाते और जेब से सिगरेट निकाल कर ऑफर करते। पटना जब भी जाना हुआ तो उनसे मिले बिना लौट कर यही महसूस किया कि प्रवास का प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ।
कोरोना के बाद वे सेहत में ऐसे उलझे कि अमूमन घर से न के बराबर निकल पाते थे। लेकिन महफ़िलें तब भी सजती रहीं, गप-किस्से और हँसी-ठहाके चलते रहे, और दोस्तों से शामें शादाब होती रहीं।
उनकी जिजीविषा अद्भुत थी। वक़्त ने देह पर लाख सितम ढाए, लेकिन उनके चेहरे की जीवंतता और होंठों की हँसी छीन पाने में हमेशा नाकाम रहा।
जब भी उनसे मिलने जाता था, वे अपनी बालकनी में बैठे इंतज़ार करते मिलते। लगता, जैसे परिवार का मुखिया किसी सदस्य के देर से घर लौटने पर बेसब्र हो रहा हो। उनका दूर से वह हाथ हिलाना स्मृतियों में स्थायी रूप से टंग गया है।
उस आदमी को और कैसे याद कर सकता हूँ जिसे भूल पाना मुमकिन नहीं।
– प्रभात मिलिंद
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अवधेश प्रीत हमारे समय के एक संजीदा कथाकार थे। उनकी तमाम रचनाओं को ध्यान में रखते हुए, अगर हम बात करें तो सीधे तौर पर सामाजिक सरोकार की कथाकार रहे हैं ।हाल ही में प्रकाशित उपन्यास अशोक राजपथ काफी चर्चित रहा ।इससे पहले आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने कथा की दृष्टि से श्रेष्ठ रचना अली मंजिल को बताया था। अवधेश प्रीत से हमारा संबंध काफी पुराना रहा है ।वे हर कोई से बहुत ही सहजता से बिना किसी घमंड का मिला करते थे। एक रचनाकार की ऐसी स्थिति होनी चाहिए। विवेक और चेतन के स्तर पर।सामाजिक रूप से काफी मिलकर रहे । हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं। जहां सुखचैन और शांतिपूर्वक रहे। कहानियों में मुझे जो अच्छी लगती है वह कहानी है- अम्मी । एक मुस्लिम और हिंदू परिवार एक ही ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं। यात्रा में उसमें दोनों अनजान है। वहां मम्मी की जगह हिंदू के परिवार ने उसकी मम्मी को उतरते वक्त अम्मी कह दी। यह दो शब्द ही हमारी अच्छाइयों को प्रदर्शित करता है। ऐसा बहुत कम श्रेष्ठ कृतियों में मिलेगा । विनम्र श्रद्धांजलि
– अरुण शीतांश
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अधूरे सपने
सन् २०१७ की बात है, लेख्य-मंजूषा में लघुकथा की पहली प्रतियोगिता थी! यूँ तो परिणाम लघुकथा के पुरोधा डॉ. सतीशराज पुष्करणा भी दे सकते थे। चूँकि वे गुरु थे तो उनके ही विचार से परिणाम उनके मित्र अवधेश प्रीत देंगे तय हुआ। गुरु ने ही सभी लघुकथाओं के प्रति को ले जाकर उन्हें दिया और परिणाम लेकर भी आए। परिणाम देने के लिए गोष्ठी रखी गई और बतौर निर्णायक और वरिष्ठ अतिथि अवधेश प्रीत आए। उस दिन वह हमारी पहली भेंट थी। वरिष्ठ साहित्यकार-कहानीकार के चेहरे पर बच्चों सी मुस्कान थी। मुझे स्तब्धता इस बात की थी कि इतने वरिष्ठ ऐसे सरल कैसे हो सकते हैं…! तभी पता चला था कि वे हिन्दुस्तान अख़बार में लघुकथा प्रकाशित करते थे। व्हाट्सएप्प के अनेक समूहों में वे लघुकथा पर बेबाकी से अपने विचार दिया करते थे। उनका बेबाकी से विचार देना मेरे बेबाकी से बोलने को मज़बूती देता गया। एक शहर में होने के नाते अक्सर साहित्यिक गोष्ठी-कार्यक्रमों में उनसे भेंट हो जाती। बेहद सहजता से कुशलक्षेम पूछते। उनके घर पर दो बार जाने का मौक़ा मैं निकाल पायी थी, एक बार गुरु पुष्करणा जी के संग, दूसरी बार भाई मधुरेश नारायण, मो. नसीम अख़्तर, डॉ. ध्रुव कुमार और एकता कुमारी। तब भी वे अस्वस्थ चल रहे थे। जुलाई २०२५ को मैंने उन्हें व्हाटसएप्प पर सन्देश दिया, “कैसे हैं? पुरवाई में आपकी लिखी कहानी ’मुन्ना मोटिवेशनल’ दिखी है, क्या उसे मैं चर्चा और साहित्यिक स्पन्दन अक्टूबर-दिसम्बर अंक २०२५ पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए ले सकती हूँ?”
“तबीयत तो ठीक नहीं है। Msg कर लिया करें। मुन्ना मोटिवेशनल का उपयोग कर सकती हैं। हाँ, पत्रिका उपलब्ध कराएंगी तो अच्छा लगेगा। चर्चा की रिपोर्ट देंगी उम्मीद है।”
अब अवधेश प्रीत नहीं रहे। भयावह सच्चाई है! लेकिन जो कृतियों में जीवित होते हैं वे स्वर्गीय नहीं होते और ना उन्हें मैं श्रद्धांजलि देती हूँ! हाँ श्रद्धा से शब्दांजलि देने का प्रयास करती हूँ। वे हमारे आस-पास हैं भले अपने घनिष्ठ मित्र डॉ. सतीशराज पुष्करणा से गले मिल लिए होंगे!
– विभा रानी श्रीवास्तव
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अवधेश प्रीत नहीं रहे।पहला परिचय हिंदुस्तान के दफ्तर में हुआ था। संपादक त्रिविजय सिंह ने इनके पास भेजा था।पहली मुलाक़ात में ही इन्होंने हमको अपना लिया ।बच्चों- सा सरल हृदय। अत्यंत भोले- भाले। हमारे पहले कविता संग्रह ‘ अँजुरी ‘ की समीक्षा लिखी और हिंदुस्तान में छापा। बाद में मिलने की आवृत्ति भले ही मद्धिम रही हो लेकिन अपनेपन की तीव्रता और मिठास बनी रही। एक बार घर पर बुलाया।अकेले ही थे घर पर। पहले गंगा घाट घुमाया। फिर घर आए। अपने हाथों से चाय बनाई। हमने चाय पी। ढेर सारी बातें हुई। उस समय वह एक उपन्यास लिख रहे थे। उसके कथानक और पात्रों की विस्तार से चर्चा की। हम दोनों उसके रस में डूबते जा रहे थे। कहानी अपने मुकाम की तलाश में थी। एक अबोध बच्चे- सी सरलता उनके चेहरे पर खेल रही थी। कहानी का अंत कैसे हो – हमारी राय पूछी। हमने भी उसी रौ में अपना सुझाव दे दिया। मेरे सुझाव के भीतर से झाँकती संवेदना की उन्होंने सराहना की। हमारा विचार उन्हें पसंद आ गया था। हमने भी उन्हें दस ब्लॉगर्स की रचनाओं का साझा संग्रह ‘ सबरंग क्षितिज ‘ भेंट की। इस पुस्तक का मैं प्रधान संपादक था।
फिर एक बार हमारा तत्कालीन सहायक सॉलिसिटर जेनरल माननीय राजेश वर्माजी ( वर्तमान न्यायमूर्ति पटना उच्च न्यायालय ) के घर जाना हुआ। प्रीत जी का घर उनके बगल में ही था। हमारी उनसे मिलने की इच्छा हुई। वर्माजी भी साथ हो लिए। प्रीत जी के घर गए। लेकिन वह घर पर नहीं थे। मुलाक़ात नहीं हो सकी। फिर हमारी बदली हो गई। दिल्ली आ गए। बाद में उनका उपन्यास पूरा हुआ और प्रकाशित भी हुआ – रूई लपेटी आग। आज उनकी यादों की मुलायम रूई में लिपटे हम उनके विरह के आग की तपिश में भीग रहे हैं। नमन प्रीत जी! अलविदा!!!
– विश्वमोहन कुमार
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कल सुबह एक मनहूस खबर ने व्यथित कर दिया। कल सुबह ही 5 बजे मैं पटना से निकला था। ट्रेन में सफर के दौरान कहानीकार शिवदयाल जी के एक पोस्ट से इस मनहूस खबर की जानकारी मिली कि अवधेश प्रीत अब हमारे बीच नहीं रहे। बहुत सारी यादें हैं उनके साथ की। दूरदर्शन बिहार के अनगिनत साहित्यिक कार्यक्रमों में उनका साथ मिला। जब भी मैंने उन्हें याद किया, कभी उन्होंने ना नहीं कहा। पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की सेवा में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। जब भी वे मेरे बुलावे पर दूरदर्शन आते थे, निमंत्रण देकर जाते और अगली मुलाकात हिंदुस्तान के दफ्तर में होती। चाय की चुस्कियों के साथ ढेर सारी बातें होती। उनकी सरलता का मैं कायल था। गाहे-बगाहे किसी-न-किसी आयोजन में भी मुलाकात हो जाती। 2014 में मेरी कहानी की पुस्तक “जनता दरबार” का लोकार्पण CRD के पुस्तक मेला में होना था। रत्नेश्वर जी से अरुण नारायण के माध्यम से बात हो गई थी। उसी सिलसिले में मैं पुस्तक मेला गया था। अवधेश प्रीत जी से मुलाकात हुई। बात ही बात में पुस्तक लोकार्पण की बात आई। छूटते ही उनके शब्द थे ‘मैं भी हूं कि नहीं।’ अब इतनी सरलता की उनसे उम्मीद नहीं थी। मैं झेंप गया, लेकिन मेरी तो मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई थी। एक बात और याद आ रही है एक किसी आयोजन में मिला था। बात-ही-बात में उन्होंने मेरी कहानी ‘खेल खेल में’ की तारीफ की। साथ ही यह भी जोड़ दिया कि मुझे अपने-आप पर अफसोस हो रहा है कि ‘यह बिषय मुझसे कैसे छूट गया।’ ऐसी स्वीकारोक्ति आसान नहीं होती। खासकर एक रचनाकार के लिए। ऐसी ढेर सारी यादें हैं। किन-किन बातों की चर्चा करूं। अफसोस सिर्फ इस बात की है कि पिछले बीस दिनों से मैं पटना में था, लेकिन मात्र चार घंटा पहले मैं पटना से निकल गया और उनका अंतिम दर्शन नहीं कर पाया। कासिम खुर्शीद के असमय जाने से अभी हम उबर भी नहीं पाए थे कि इस खबर ने झकझोर कर रख दिया। बहुत याद आएंगे मित्र। आपकी रचनाएं, आपका व्यवहार आपको कभी भूलने नहीं देगा। ॐ शांति।
— शम्भु पी सिंह
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अवधेश प्रीत,
तुम्हारी मृत्यु में भी एक व्यवस्था थी,
एक आयोजन था।
तुमने मृत्यू का वरण किया,
दिन पहले छोड़ दिया खाना तुमने,
मानो शरीर से संवाद समाप्त हो गया हो तुम्हारा।
मित्रों को बुलवा- बुलवा कर भेंट किया ऐसे,
कि विदा नहीं,
कोई वादा हो।
तुम्हारे किताबों के कमरे से
निकली तुम्हारी अंतिम यात्रा,
कि मानो कोई पुस्तक
एक पुस्तकालय से निकल
दूसरे पुस्तकालय जा रहा हो।
तुम्हारे जीवन में शामिल नहीं रहा,
शामिल रहा, तुम्हारी अंतिम तस्वीर में
यह तुम्हारी अंतिम इच्छा थी,
कि एक तस्वीर हो सबके साथ
तुम्हारे निंद्रीत तन का।
हमज़मीन,
तुम्हारे बिना यह शहर,
यह ‘अशोक राजपथ’
अब प्रीत रहित है, अवधेश प्रीत।
………………….
अफसोस कि उन्होंने दो बार फोन करके कहा आकर मिलो, और में कल के भरोसे बेकार कामों में उलझा रहा और अब क्या….वो कल कभी नहीं आयेगी, अब बस अलविदा।
– कृष्ण समिधा
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एक शख़्स का यूं चले जाना
आज बेहद दुखद ख़बर मिली। ये ख़बर बिल्कुल नहीं आनी चाहिए थी। मेरे स्नेही मित्र श्री अवधेश प्रीत जी के निधन की ख़बर।
मिलना जुलना यदाकदा ही होता पर दिल से गहरा जुड़ाव। उनकी शिकायत रहती कम मिलने की। पटना आने पर भी बिना मिले वापस चले जाने पर व्हाट्सएप पर संदेश भेजते, “क्यों भई, मुझसे ऐसी भी क्या नाराजगी? आइए न। मुद्दत हो गई साथ बैठे हुए।”
मुझे वो खुशगवार दोपहरी याद आती जब मैं उनके घर पहली बार गया था। उनका घर गंगा के किनारे रानीघाट मोहल्ले में है। वे गली के मुहाने पर मुझे रिसीव करने के लिए खड़े थे।
साफ सुथरा बड़ा सा घर। कुछ काम भी चल रहा था। एक चौकी पर किताबों के स्टैक रखे हुए थे और उनके स्टडी रुम में बढ़ई काम कर रहा था। वे बोले, “बुक सेल्फ बनवा रहा हूँ।पहले किताबें इधर उधर विभिन्न आलमारियों में रहती थीं। बुक सेल्फ बनते ही इसे सजाऊंगा।”
किताबों से ही बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था। उनके उपन्यास “अशोक राजपथ” पर लंबी चर्चा हुई थी। उपन्यास में वर्णित अशोक राजपथ के कई ऐसे उद्धरण थे जिनसे जुड़ाव महसूस हुआ था क्योंकि चौहत्तर के दशक में छात्र आंदोलन के दौरान पटना विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज से इसी राजपथ से जुड़ी छोटी मोटी तमाम गलियों से गुजरते हुए मैं घर से कॉलेज और कॉलेज से घर आया जाया करता था।
फिर वे अपने घर के पीछे वाले हिस्से में ले गए जहां छोटा किंतु सुंदर बागीचा है। वहां आम्रकुंज में बैठ हमने चाय पी थी। फिर बाउंड्री के पास खड़े हो कर देर तक हम दोनों ने गंगा निहारा था।
दूसरी दफ़ा उनके घर मैं अपने एक साहित्यिक मित्र शाह नवाज़ के साथ गया था। बुक सेल्फ बन कर तैयार हो चुका था और सफ़ेद पेंट से रंगा जा चुका था। किताबें करीने से सजी हुई थीं।
फिर कंप्यूटर पर लिखे जा रहे अपने आगामी उपन्यास “रुई लपेटी आग” के एक हिस्से को उन्होंने पढ़ कर सुनाया। सुनाते वक्त उनके चेहरे पर बिखरी आभा देखते बनती थी। यह रचनाकार की सृजनता की आभा थी। लिख पाने का संतोष था।
अभी उनके जाने की उम्र नहीं थी। अभी न जाने कितनी रचनाएं, कहानियां,लेख, समीक्षाएं आदि उनकी कलम से निःसृत होने बाक़ी थे। क्रूर काल का यही कारोबार है। किसी के सपने को पूरा होने के पहले ही उसे मार देना। पर साहित्यकार परास्त होने वाला जीव नहीं होता। उसकी सृजनता, उसकी लिखी कहानियां जीवित रहती हैं। कहानियां यदि मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत हों तो कालजयी हो जाती हैं और फिर सरहद पार भी उसकी खुशबू चली जाती है। अवधेश जी की कहानी “अली मंजिल” ऐसी ही एक कहानी है। यह कहानी पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुई और दूरदर्शन द्वारा प्रसारित भी।
एक अत्यंत प्रिय कथाकार आदरणीय अवधेश प्रीत जी हमारी स्मृति में सदैव रहेंगे।
ईश्वर उन्हें सद्गति प्रदान करें।
– सुधांशु शेखर
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12 नवंबर को सुबह-सुबह कमलेश जी का फोन आया – प्रीत सर नहीं रहे!
जब से वह बीमार थे, उनका हाल -चाल जानती रहती थी। लेकिन इस मनहूस खबर के लिए…
कुछ देर तक तो कुछ समझ नहीं आया।
उनकी ओजपूर्ण वाणी, उनका स्नेह- सब अनंत में विलीन हो गया। उनके साथ मेरे संबंध ऐसे थे कि मैं बेहिचक, कभी भी संपर्क कर सकती थी, मन में कोई द्वंद हो, कोई सवाल हो, किसी भी समय उनको फोन लगा लिया – अरे भई, सिनीवाली बोलो तो!
विश्वास, आश्वासन और अपने वरिष्ठ का स्नेह! हमें पनपने के लिए और क्या चाहिए।
‘‘गुलाबी नदी की मछलियां’’ पढ़कर उन्होंने बिना मुझे बताए समीक्षा लिखी और प्रभात खबर में प्रकाशित हो गयी। पत्रिकाओं में छपी कहानियों को पढ़कर फोन पर बातें करते, प्रोत्साहन देते।
हेति के बारे में उन्होंने कहा था – ‘‘खुशी हो रही है यह देखकर कि युवा पीढ़ी भी इतनी लगन से अपना कर रही है।’’
पटना पुस्तक मेला में जब गयी तो अवधेश प्रीत सर को पहली बार सामने से देख रही थी। पर उन्होंने एक पल के लिए ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि उनसे पहली बार मिली हूं। खूब बातें हुईं और अगले दिन सुबह के नाश्ते का निमंत्रण मिल गया। बुलाते हुए जोर देकर उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई साथ हो तो उन्हें भी जरूर ले आना।
“नहीं सर मैं अकेली आई हूं।”
अगली सुबह मैं उनके घर पहुंच रही थी और वो दरवाजे पर खड़े इंतजार कर रहे थे। उस समय उनकी पत्नी के पैर में बहुत चोट लगी थी और उन्हें चलने में भी दिक्कत हो रही थी। फिर भी जिस स्नेह से उन्होंने खिलाया कि वो स्वाद हमेशा याद रहेगा।
उनका घर-आंगन, उनकी किताबें, उनकी बातें, वो प्यार-दुलार सब साथ रहेगा।
वो चले गए लेकिन जाकर भी वो क्या कभी जा सकेंगे! हमारे भीतर हमेशा जीवित रहेंगे।
सादर नमन
Siniwali
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अवधेश प्रीत
संजीदा कथाकार और जनसरोकारी पत्रकार अवधेश प्रीत की हमारे बीच अनुपस्थिति लंबे समय तक चुभती रहेगी। वह आठवें दशक के उन चर्चित कथाकारों में शुमार रहे हैं, जिनकी कहानियों को शीर्ष आलोचकों से लेकर सुधी पाठकों तक ने खुले दिल से सराहा है। वह अपने समय और समाज के ज़रूरी सवालों से टकराते रहे हैं। देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ, समीक्षाएँ, लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी कई कहानियों के उर्दू, अंग्रेज़ी, मराठी, गुजराती आदि में अनुवाद हो चुके हैं। कुछ कहानियों के मंचन भी हुए हैं।
अवधेश प्रीत की ‘नृशंस’, ‘अलीमंज़िल’, ‘बाबू जी की छतरी’, ‘तालीम’, ‘तीसरी औरत’, ‘हमज़मीन’, ‘चाँद के पार एक चाभी’ जैसी अनेक कहानियाँ उल्लेखनीय हैं, जो अपने बेबाकपन और कहन की विशिष्टता के कारण काफी चर्चित रही हैं। वह ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी कथा सम्मान’, ‘सुरेन्द्र चौधरी कथा सम्मान’, ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’, ‘फणीश्वरनाथ रेणु कथा सम्मान’ से सम्मानित हुए। ऐसे अविस्मरणीय सृजनधर्मी को विनम्र श्रद्धांजलि।
– रंजिता सिंह

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अवधेश जी से मेरा परिचय उनकी रचनाओं के माध्यम से हुआ। उनकी कहानियाँ पत्रिकाओं में पढ़ती आयी थी। एक बेहद शानदार और वरिष्ठ कथाकार की छवि बनी हुई थी। उनकी हमजमीन, नयका पोखर, अली मंजिल और भी बहुत सी कहानियाँ पसंदीदा बनीं। फिर व्हाट्सएप का दौर आया और देशज, दस्तक आदि ग्रुप्स में उन्हें साथ पाकर सुखद आश्चर्य हुआ। उनसे संवाद को लेकर एक स्वाभाविक सी झिझक थी लेकिन जब मैंने उन्हें समूह के सदस्यों की रचनाओं पर आत्मीयता से प्रतिक्रिया देते हुए पाया तो बहुत हैरानी हुई।
हैरानी इसलिये कि आमतौर पर वरिष्ठ लेखक महानता की झीनी ओट में रहते हैं। उनका पाठकों या नए लेखकों से संवाद भी सीमित होता है और यदि होता है तो सार्वजनिक तो बहुत कम ही होता है। उसमें भी पहल की गुंजाइश सबसे कम होती है। लेकिन अवधेश जी के मामले में ये सारी धारणाएं मिथक साबित हुईं।
उन्होंने हमेशा रचनाओं पर प्रतिक्रिया दी। केवल सराहना ही नहीं, ऐसा भी हुआ जब सब सराहना कर रहे होते वे आलोचना का उस बिंदु पर बात करने से भी नहीं झिझकते जो बाकी लोगों से भिन्न होता। लेकिन नए लोगों के प्रति उनमें कुछ उदारता अवश्य थी इसलिये उनसे भरपूर सीखने को मिलता। उनका व्यवहार दोस्ताना रहता था लेकिन इतना शालीन और सौम्य कि आप झिझकने की बजाए ये भूल जाते कि इतने वरिष्ठ स्थापित कथाकार से संवाद हो रहा है। उनकी जगह तो कभी भर ही नहीं सकती। उनके असमय चले जाने से आज अपने प्रिय कथाकार की ये सारी बातें याद आ रही हैं। उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।
– अंजू शर्मा
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स्मृतियों की वह लंबी, चमकती लहर जो हमेशा बहती रहेगी
कोरोना के बाद उनकी तबीयत कभी स्थिर नहीं रही। साँस की तकलीफ़ बढ़ती गई और हमारी बातचीत जैसे थोड़ी-थोड़ी कम होती चली गई। पहले तो घंटों बातें हो जाया करती थीं, लेकिन पिछले साल के बाद कभी-कभार एक छोटा-सा मैसेज भेज देती थी और बस उसी पर उनका लौटकर आता स्नेह भरा संदेश… “आप हालचाल लेती रहती हैं, यही बहुत है।” उनके शब्दों में जो अपनापन था, वह आज भी कानों में तैरता है। कॉल हिस्ट्री देख रही थी जुलाई 2025 के शुरुआत में उनसे टेलीफोन पर बात हुई थी।
मुझे आज भी याद है, मेरी ‘घोषा’ कहानी पढ़ने के बाद उन्होंने फोन किया था। उनकी आवाज़ में जो उत्साह था, वह शायद ही कभी किसी वरिष्ठ लेखक में देखा हो। मेरे साथ-साथ सभी युवा लेखकों को वे जिस तरह प्रोत्साहित करते थे, वह कमाल की बात थी उनमें कोई दूरी नहीं थी, कोई औपचारिकता नहीं। हर बार लगता था, जैसे किसी अपने बड़े से बात हो रही हो।
पटना पहुँचकर उनसे मिलना… उस दिन जैसे समय ठहर-सा गया था। पीछे बहती गंगा, उसकी शांत लहरें, और सामने अवधेश प्रीत जी अपने उसी सहज, अपनत्व से भरे अंदाज़ में। घंटों बातें हुई थीं लेखन, जीवन, संघर्ष, हँसी, किस्से… और बीच-बीच में उनका वही मोहक ठहराव, जैसे बात को और गहरा कर देता हो।
उनका जाना मेरे लिए सिर्फ साहित्यिक क्षति नहीं… एक निजी शून्य है। ऐसा लगता है जैसे गंगा के किनारे बैठी वे बातें अब हवा में कहीं बिखर गई हैं, पर उनमें बसने वाली गर्माहट, उनका स्नेह वह नहीं जाएगा।
अवधेश प्रीत जी जैसे लोग वास्तव में दुर्लभ होते हैं बड़ों जैसा मार्गदर्शन, बराबरी का सम्मान और छोटों को बेहिसाब प्यार देने वाले। उनकी मुस्कान, उनकी संवेदनशीलता, और उनकी सहज मनुष्यता इन्हें भुलाया नहीं जा सकता। आज केवल एक खालीपन बाकी है, और स्मृतियों की वह लंबी, चमकती लहर… जो गंगा की तरह मेरे भीतर लगातार बह रही है।
– विनीता परमार
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अवधेश प्रीत मेरे लिए केवल एक वरिष्ठ कथाकार नहीं थे, वे मेरे साहित्यिक अभिभावक थे—ऐसे अभिभावक, जिनकी निष्पक्ष और ईमानदार राय हर बार मुझे भीतर तक आलोकित करती रही। व्हाट्सऐप समूह में हुआ पहला परिचय धीरे-धीरे एक गहन आत्मीयता में बदल गया। विचारधाराएँ भिन्न थीं, फिर भी संवाद का सेतु कभी टूटा नहीं। महीनों बात न हो, तब भी जब संवाद शुरू होता तो साहित्य से लेकर घर–परिवार की धूप-छाँह तक, हर दिशा में हमारी बातें घंटों बहती चली जातीं।
दिल्ली यात्रा में उनसे मिलना, स्नेह भाभी और उनके परिवार से परिचय पाना—ये सब स्मृतियों में आज भी उजास की तरह दर्ज है। ‘आईना सच नहीं बोलता’ उपन्यास पर उन्होंने और भाभी ने मातृभारती पर जो स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया दी, वह मेरे लेखन-pथ की अमूल्य निधि है। अपनी बिटिया के विवाह की व्यस्तताओं के बीच भी वे अहमदाबाद से फोन कर मेरे द्वारा लिए जा रहे इंटरव्यू के प्रश्नों के उत्तर लिखवा रहे थे—इतनी सहजता, इतनी आत्मीयता और इतनी निष्ठा मैंने कहीं और विरल ही देखी।
बीते 8 अक्टूबर को हुई हमारी अंतिम बातचीत आज भी कानों में गूँजती हैI
“नीलिमा शर्मा जी के साथ पटना कब आओगी? घर पर ही ठहरना होगा, इतना बड़ा घर है… हम दोनों ही तो रहते हैं। बेटियाँ अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। तुम आओगी तो हम साथ में पंजाबी खाना खाएँगे, और तुम्हें बिहारी स्वाद का भोजन खिलाएँगे।”
अवधेश सर…
हम पटना तो अवश्य आएँगे, भाभी संग भोजन भी करेंगे,
पर मेरे लिए वह साहित्यिक अभिभावक अब कहाँ लौटकर आएगा?
उसके बाद चाह कर भी आपको कॉल नहीं कर सकीं और आप हमेशा के लिए दूर चले गए I
हर नई लिखी कहानी के साथ आपकी स्मृति मेरे पास चली आएगीI धीमी, कोमल और बेहद निजी।
स्नेह-भाभी और बेटियों को मेरी ओर से हृदय-भर सांत्वना और शक्तिI
क्योंकि आपने जो उजाला छोड़ा है, वह हम सबके भीतर सदैव उजला रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि
– नीलिमा शर्मा नीविया
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2 टिप्पणी

  1. https://www.thepurvai.com/a-tribute-to-awadhesh-preet/

    अवधेश प्रीत सर पर लिखी सारी टिप्पणियाँ अभी पढ़ीं। एक अच्छे इंसान के जाने का दुख महसूस हुआ
    साहित्य के आकाश से एक तारा ध्रुव तारे की तरह तरह स्वयं को स्थापित कर अपनी चमक छोड़कर गुम हो गया।

    अवधेश प्रीत नाम हमारे लिये भी अनजाना नहीं था, किन्तु परिचय भी नहीं था।
    पुरवाई सहित कई समूह में जब उनके बारे में पढ़ा तो उनके व्यक्तित्व की उच्चता का अहसास हुआ। और यह महसूस हुआ कि वाकई एक अच्छा इंसान धरती पर कम हो गया।
    कुछ लोग संसार में ऐसे होते हैं जो संसार में न भी रहें तब भी संसार उनकी महक से गमकता रहता है।

    ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें।

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