Wednesday, February 11, 2026
होमलेखआलोक शुक्ला का लेख - ब्रह्मांड और हम

आलोक शुक्ला का लेख – ब्रह्मांड और हम

इस ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी का अस्तित्व महज़ एक धूल के कण के बराबर है और ऐसे अनेकों धूल के कण अवश्य होंगे जहां जीवन भी निश्चित रूप से होगा। ऐसे में हमारा अस्तित्व इस धूल के कण में कितना होगा जिस पर हम इतराए या लड़ें झगड़े? सोचिएगा ।  इस आलेख के अंत में एक राज़ की बात भी आपको पता चलेगी।
एक आंकलन के अनुसार ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब वर्ष पुराना और 93 अरब प्रकाश वर्ष के व्यास में फैला एक अत्यंत विशाल, रहस्यमयी विस्तार है जिसमें 200 अरब से अधिक आकाशगंगाएँ हैं। आंकलन ये भी बताता है कि ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है और आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, यहां तक कि ये एक लय के साथ फैलता और संकुचित हो रहा है जैसे ये सांस ले रहा है।  हम जो कुछ भी देखते हैं (तारे, ग्रह), वह ब्रह्मांड का मात्र 4% है। शेष 96% रहस्यमयी ‘डार्क मैटर’ और ‘डार्क एनर्जी’ से बना है जिसके बारे में हम अधिक नहीं जानते हैं।ये उसी तरह है जैसे हम हमारे मस्तिष्क के ज़्यादातर हिस्से को नहीं जानते हैं । जैसे हम इस बात को जानते हुए भी नहीं समझते हैं कि हमारी आकाश गंगा में सूर्य एक सामान्य तारा है और पृथ्वी, आकाशगंगा के सेजिटेरियस आर्म में स्थित एक छोटा सा ग्रह है। हम (मनुष्य) इस ब्रह्मांड के एक नगण्य हिस्से, यानी मिल्की वे (आकाशगंगा) के सौरमंडल की पृथ्वी पर निवास करते हैं, जो एक विशालकाय और विस्तारित होते ब्रह्मांड के सामने बहुत छोटा है। हम मनुष्यों का अस्तित्व इस विशाल ब्रह्मांड में क्षणभंगुर है, फिर भी हम ऐसे जीते हैं जैसे हम शाश्वत हैं। ( शरीर की बात कर रहा हूं आत्मा की नहीं)
ब्रह्मांड जिसका विस्तार हमारी कल्पना से भी परे है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं कि ब्रह्मांड कितना बड़ा है, बल्कि यह कि हम उसमें कहाँ खड़े हैं? पृथ्वी, जो सूर्य की परिक्रमा करने वाले आठ ग्रहों में से एक है, ब्रह्मांड के अनुपात में एक धूल कण से भी छोटी इकाई है। फिर भी इसी धूल कण पर जीवन फलता-फूलता है, विचार जन्म लेते हैं, सभ्यताएँ बनती हैं, कला और विज्ञान विकसित होते हैं, और मनुष्य अपने ही अस्तित्व की पड़ताल करता है। यही विरोधाभास मानव को विशिष्ट बनाता है। हम छोटे हैं, पर प्रश्न विशाल हैं; हम क्षुद्र हैं, पर जिज्ञासा अनंत।
वैज्ञानिक दृष्टि से, मानव शरीर उन्हीं तत्त्वों से बना है जिनसे तारे बने हैं,हाइड्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन। इस अर्थ में हम ब्रह्मांड से अलग नहीं, बल्कि उसी का विस्तार हैं। तत्वों की यात्रा अरबों वर्षों की है। सुपरनोवा विस्फोटों से लेकर जीव कोशिकाओं तक। यह यात्रा बताती है कि ब्रह्मांड हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर भी है।
दार्शनिक दृष्टि से ब्रह्मांड और मनुष्य के बीच संबंध और भी जटिल है। ब्रह्मांड शायद अनदेखा और उदासीन है, पर मनुष्य उसे अर्थ और रूप देता है। मौन अंतरिक्ष को कविता मनुष्य देता है, और समय की गूढ़ता को भावना। ब्रह्मांड को समझने का प्रयास मनुष्य के आत्म-समझ का भी प्रयास है।
आधुनिक विज्ञान ने यह संभावना भी उठाई है कि कहीं और भी जीवन हो सकता है शायद हमारी तरह, शायद हमसे बिल्कुल भिन्न। ऐसी संभावना हमारी विनम्रता बढ़ाती है, क्योंकि यह बताती है कि हम अकेले नहीं हो सकते, और ना ही अंतिम।फिर भी एक सत्य स्पष्ट है।ब्रह्मांड का विस्तार भले अनंत लगे, लेकिन उसके लिए हमारी समझ सीमित है हालांकि  मनुष्य का मूल स्वभाव ही खोज है। यही खोज हमें अंतरिक्ष में भेजती है, दूरबीनों के माध्यम से अरबों वर्ष पुराने प्रकाश को पकड़ने देती है, और मशीनों के भीतर ब्रह्मांड का अनुकरण कराती है।
अंततः ब्रह्मांड और हमारा संबंध यह है कि हम ब्रह्मांड के दर्शक ही नहीं, उसके प्रतिभागी भी हैं। हम उससे बने हैं, उसमें रहते हैं, और एक दिन फिर उसी में विलीन हो जाने वाले हैं। इसी चक्र में शायद अर्थ छिपा है कि ब्रह्मांड को समझते हुए हमें स्वयं को समझने की आवश्यकता है ।
 एक राज़ की बात ये है कि ब्रह्मांड से एक लयबद्ध स्वर निकलता है जिसे ॐ का स्वर कहा जाता है यानि जब आप ॐ का उच्चारण करते हैं, ध्यान करते हैं तो पूरे ब्रह्मांड से आप अपने अंदर के ब्रह्मांड का तादात्म्य स्थापित करते हैं । तभी जब आप लगातार ॐ का उच्चारण करते हैं तो एकबारगी लगता है जैसे सारा वातावरण प्रतिध्वनित होने लगा है तो ध्यान में सबसे पहले काला फिर उसमें सूर्य सरीखी रोशनी और फिर नीला रंग और फिर अंतरिक्ष जैसा दिखता है। इस अवस्था में आप जिससे चाहें या जो चाहें मानसिक संवाद कर सकते हैं या मांग या दे सकते हैं ।ये आपको चमत्कारिक परिणाम भी दे सकती है लेकिन ये लगातार अभ्यास से ही संभव हो पाता है।
आलोक शुक्ला
वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखक, निर्देशक एवं पत्रकार 
नई दिल्ली 
9999468641


RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. https://www.thepurvai.com/an-article-by-alok-shukla-2/

    आलोक जी!

    ब्रह्माण्ड को लेकर आपके इस लेख से हम काफी कुछ सहमत है।
    ब्रह्माण्ड की अदृश्य शक्ति से सृष्टि प्रभावित व संचालित है।कितना सही कितना गलत नहीं पता।लेकिन कहा जाता है कि 3 से साढ़े तीन के बीच यह ऊर्जा सक्रिय होती है उस समय की साधना निरंतरता से सिद्ध होती है। जो इसे मानते हैं, वे नियमित उस समय उठकर योग साधना करते हैं।

    आपके इस लेख को पढ़कर कई वर्ष पूर्व गिरिजा कुमार माथुर की पढ़ी हुई एक कविता याद आ गई कि ब्रह्मांड के अनुपात में आदमी कितना तुच्छ है, लेकिन फिर भी मिलकर नहीं रह पाता है। घृणा और अविश्वास की दीवारें अपने चारों तरफ खड़ी कर अकेला रहता है। और वहाँ भी स्वामी और सेवक के झगड़े के साथ। छोटी सी कविता लेकिन अर्थ बहुत महत्वपूर्ण है।कविता पढ़ने योग्य है। आपके लेख का भाव भी लगभग यही है।

    *आदमी का अनुपात*

    कमरा है घर में
    घर है मुहल्ले में
    मुहल्ला नगर में
    नगर है प्रदेश में
    प्रदेश कई देश में
    देश कई पृथ्वी पर
    अनगिन नक्षत्रों में
    पृथ्वी एक छोटी
    करोड़ों में एक ही
    सबको समेटे है
    परिधि नभ गंगा की
    लाखों ब्रह्मांडों में
    अपना एक ब्रह्मांड
    हर ब्रह्मांड में
    कितनी ही पृथ्वियाँ
    कितनी ही भूमियाँ
    कितनी ही सृष्टियाँ
    यह है अनुपात
    आदमी का विराट से
    इस पर भी आदमी

    ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वासलीन संख्यातीत शंख-सी दीवारें उठाता है
    देशों की कौन कहे
    एक कमरे में
    दो दुनियाँ रचाता है
    अपने को दूजे का स्वामी बताता है।

    (गिरिजा कुमार माथुर)

    इस लेख के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest