Tuesday, July 16, 2024
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अरविंद ‘कुमारसंभव’ की पर्यटन-चर्चा – उत्तराखंड के अल्पज्ञात खूबसूरत पहाड़ी स्थल

बारिश के दो महिने छोड़ कर पूरे साल आप हिमालय की खूबसूरती निहारने जाइये. कुछ दिन पहाड़ के किसी शांत छोटे से कस्बे में ठहरिये, आस पास के नयनाभिराम दृश्यों का अवलोकन कीजिए, वहां के स्थानीय भोजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों से साक्षात्कार कीजिए और एक नयी ऊर्जा और संतुष्टि प्राप्त कीजिए.
आईये मैं वहाँ के कुछ बेहतरीन इलाकों से आपको परिचित कराता हूँ जहाँ मैं लगभग 7-8 वर्ष पूर्व तक नियमित जाता रहता था.
1. *पौड़ी गढ़वाल*- कोटद्वार लैंसडाउन शहरों के नजदीक पहाड़ की वास्तविक संस्कृति को झलकाता एक शहर. एक रास्ता ऋषिकेश कोटद्वार लैंसडाउन वाला और दूसरा रास्ता ऋषिकेश देवप्रयाग श्रीनगर वाला. यहाँ आपको ठेठ देशी गढ़वाली संस्कृति के दर्शन होंगे.
2. *घिरसू* – पौड़ी से लगभग 22 किमी दूर पौड़ी श्रीनगर मार्ग से हटकर एक खूबसूरत गांव है घिरसू। यह अब नये पर्यटन स्थल के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है। यहां जंगल, पहाड़ और बर्फीली चोटियों के नयनाभिराम नज़ारे दिखाई देते हैं।  यहां गढ़वाल पर्यटन विकास निगम का गेस्ट हाउस तथा महिला कापरेटिव सोसाइटी द्वारा संचालित बासा नाम से एक होम स्टे है। चार पांच छोटी दुकानें तथा दो चाय – भोजन के रेस्टोरेंट हैं। वन विभाग का एक बड़ा जंगल पार्क भी है।  नैसर्गिक सौंदर्य एवं एकांत का सुख लेने वाले पर्यटकों के लिए यह एक उत्तम स्थान है।
3. *यमकेश्वर और सतपुली बाजार*- पौड़ी के निकट दो छोटे कस्बे जहाँ आप शांति से कुछ दिन ठहर सकते हैं. पहाड़, नदी, घास के मैदान, जंगल, मंदिर, बाजार, बकरी, भेड़, सभी कुछ यहाँ  देखने को मिलेगा.
4. *बागेश्वर*- अल्मोड़ा के नजदीक एक धार्मिक- पर्यटन कस्बा. नदी, पहाड़, मंदिर के बहुत सुंदर दृश्य. यहाँ दशहरे के आसपास मेला भी भरता है.  यहीं से आप बैजनाथ और कौसानी भी जा सकते हैं.
5. *पिथौरागढ़*- एक रास्ता टनकपुर रेलवे स्टेशन से और दूसरा रास्ता अल्मोड़ा से. पिथौरागढ़ भारत चीन सीमा पर भारत का अंतिम जिला मुख्यालय है और कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख पड़ाव भी .ऊंची ऊंची  पहाड़ियाँ और दूर बर्फ से लदी चोटियाँ यहाँ से साफ दिखाई देती है. अल्मोड़ा से यह लगभग 110 किलोमीटर है.
6. *धारचुला*- पिथौरागढ से लगभग 80 किलोमीटर दूर  कैलाश मानसरोवर यात्रा  मार्ग का भारत की तरफ का अंतिम बड़ा कस्बा. काली नदी के इस ओर भारत वाला धारचुला और नदी के झूला पुल को पार करके सामने वाला नेपाल का दारचुला. चारों तरफ के इलाके दारमा  पट्टी, ब्यांस पट्टी और जुहार पट्टी के नाम से जाने जाते हैं. यहाँ ज्यादातर भोटिया लोगों की आबादी है. यहीं से एक पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ पगडंडी और कच्ची सड़क 90 किलोमीटर दूर भारत तिब्बत बोर्डर  लिपुलेख दर्रे तक जाती है.  अब कुछ हिस्से में सड़क भी बन गयी है. सर्दियों में धारचुला में बडा़ भारी मेला भी लगता है.  धारचुला से पहले काली और गोरी नदियों का संगम पड़ता है जिसे जौलजीबी कहते हैं. यहाँ भी बहुत भारी मेला भरता है. धारचूला  से आगे जाने पर पंचचूली जगह आती है जहां से हिमाचल की पांच चोटियां हाथ लगाने भर की दूरी जैसे प्रतीत होती हैं। यही रास्ता आगे गुंजी  होकर आदि कैलाश और ओम् पर्वत तक जाता है।
7. इसके अलावा आप रोमांच के शौकीन हैं तो अल्मोड़ा पिथौरागढ़ मार्ग से थोड़ा हट कर गंगोलीहाट और लोहाघाट कस्बे के विहंगम दृश्य देखने भी जा सकते हैं.  अल्मोड़ा कौसानी मार्ग से थोड़ा हट कर  आपको जागेश्वर मंदिर समूह भी देखने को मिलेगा।
8. आपको केवल प्रकृति और शांति का सानिध्य ही चाहिए तो आप तीन दिन बिनसर में रूकें. यहाँ चीड़ देवदार के घने जंगलों के साथ साथ अपर हिमालय की बहुत सी बर्फीली चोटियाँ साफ साफ दिखाई देंगी. लगातार चलती ठंडी हवायें आपको कंपकंपा देंगी. यह भी अल्मोड़ा के नजदीक ही है.
9. *देवप्रयाग*- ऋषिकेश से 70 किलोमीटर दूर बद्री केदार मार्ग पर प्राचीन तीर्थ और भागीदारी अलकनंदा का पवित्र संगम. यहीं से भागीरथी का नाम करण गंगा हुआ था. छोटा सा सुंदर कस्बा  जहां केवल बद्रीनाथ के पंडों की बस्ती है और पुराने मंदिर हैं.  पंडों में ध्यानी,भट्ट और जोशी गोत्र के लोग यहां रहते हैं। प्राचीन काल में पैदल यात्रियों का यह प्रमुख विश्राम स्थल था. सीढ़ियों से बहुत नीचे उतर कर संगम में लोहे की जंजीर पकड़ कर स्नान किया जा सकता है. रघुनाथ जी का अति प्राचीन मंदिर भी यहां है।
आज से 30- 35 वर्ष पूर्व देवप्रयाग में खाने के नाम पर केवल मुख्य सड़क पर एक छोटा सा ढ़ाबा था जिसमें एक पंडित जी चूल्हे पर रोटी सेक कर आलू चावल दाल और टमाटर की चटनी के साथ जमीन पर बोरियों पर बैठा कर खाना खिलाते थे. यात्री बहुत कम रुकते थे. आज भी नहीं रुकते हैं. क्योंकि सड़क मार्ग से आगे निकल जाते हैं. अब तो मुख्य सड़क पर पर्यटकों के लिए लगभग एक दर्जन दुकानें खुल गयी हैं। पर्यटन विभाग का मोटल भी है।
मैने ये वो स्थल बताये हैं जो अभी भी पर्यटन की दृष्टि से अछूते और भीड़भाड़ से रहित हैं. बस यात्रा पहाड़ी होने से कुछ तकलीफ देह है किंतु बस की जगह यदि निजी टैक्सी कार से जाया जाये तो परेशानी नहीं होती है या कम होती है. होटल सब जगह मिलेंगे और अल्मोड़ा और बिनसर को छोड़ दें तो बाकी जगह बहुत ही सस्ती रेट पर मिल जाते हैं. यह तो आप सब जानते ही हैं कि अल्मोड़ा आने के लिये आपको पहले हलद्वानी या काठगोदाम रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा और फिर बाकी सारा सड़क मार्ग ही है. अल्मोड़ा से वापस लौटते वक्त आप वहाँ की मशहूर मिठाई बाल मिठाई लाना न भूलें. यह एक महिने तक बगैर फ्रिज के भी खराब नहीं होती है.
आप कहीं नहीं जाकर केवल अल्मोड़ा में भी रूक सकते हैं किंतु सुंदर और ठंडा पहाड़ी शहर होने के बावजूद भी वहाँ इतनी स्थानीय भीड़ है और दर्शनीय स्थल इतने कम हैं कि दो दिन में ही आप बोर हो जायेंगे. इससे बेहतर तो आप नैनीताल जाकर रहें. हालांकि वहाँ भी आजकल गर्मी काफी पड़ने लगी है.
10. *चमोली* यह कर्णप्रयाग से आगे  बद्रीनाथ मार्ग से थोड़ा सा हट कर  है. यहाँ से कुछ दूरी पर गोपेश्वर यहाँ का मुख्य कस्बा है जहाँ से हिमालय की खूबसूरती निहार सकते हैं.  हिमालय की अधिकांश ऊंची चोटियाँ चमोली जिले में ही पड़ती हैं. नंदा देवी की 12 वर्ष में एक बार निकलने वाली  विश्व प्रसिद्ध  जात यात्रा नौटी से आरम्भ होकर चमोली जिले में नंदादेवी के आधार पर ही समाप्त होती है.
11.*गुप्त काशी*  केदार मार्ग पर यह एक बहुत छोटा सा कस्बा है जहाँ सर्दियों में केदारनाथ के पंडे निवास करते हैंं. यहाँ से आप त्रियुगीनारायण मंदिर की ओर भी चढ़ाई कर सकते हैं. यहीं से चोपता होकर तुंगनाथ भी यात्री जाते हैं.
12. *मुक्तेश्वर*  यह नैनीताल से लगभग 50-55 किमी एक बेहद खूबसूरत स्थान है जहां भगवान शंकर का मुक्तेश्वर नाम से एक छोटा सा बेहद प्राचीन मंदिर है।  यह लैण्ड एण्ड वाला स्थान है और नीचे गहरी खाईयां तथा  मौसम साफ़ रहने पर सामने और दोनों साइड में हिमाच्छादित महान हिमालय की चोटियों के दर्शन होते हैं। देवदार के विशाल वृक्षों से आच्छादित इस बेहद शांत स्थल में ठहरने के लिए कुछ छोटे होटल बने हुये हैं। यहां आने के रास्ते में सैलानियों को चाय और सेब के बागान भी मिलेंगे जहां से वो इन्हें खरीद भी सकते हैं।

अरविंद ‘कुमारसंभव’
संपर्क – [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. अरविंद जी! आपका कुमारसंभव उपनाम बहुत अच्छा लगा। कालिदास का कुमार संभवम् की याद आ गई।हिमालय क्षेत्र में पर्यटन के लिए जाने वालों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण जानकारी है।
    बहुत-बहुत शुक्रिया आपका।

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