Wednesday, February 11, 2026
होमलेखडॉ. चैताली सिन्हा का लेख - प्रवासी स्त्री साहित्य : रचना शिल्प

डॉ. चैताली सिन्हा का लेख – प्रवासी स्त्री साहित्य : रचना शिल्प

‘शिल्प’ का शाब्दिक अर्थ है निर्माण अथवा गढ़न के तत्त्व l “शिल्प विधि के लिए अंग्रेज़ी में अनेक शब्दों – Mechanics, Setting, Artistry, Design, Construction Technique आदि का प्रयोग होता है, परंतु इनमें व्यापक स्वीकृति ‘Technique’ को ही मिली है l अभिव्यक्ति के प्रकार के रूप में शिल्प का महत्व अक्षुण्ण है l” वास्तव में ‘शिल्प’ कला संबंधी वह कर्म है, जिसके निर्माण के लिए ज्ञान के अतिरिक्त कौशल और निरंतर साधना की आवश्यकता होती है l किसी रचनाकार द्वारा अपनी रचनाओं में प्रयुक्त की जाने वाली विशिष्ट भावाभिव्यक्ति, जो शैली से अधिक व्यापक मानी जाती है, शिल्प की श्रेणी में आती है l 
आर्नल्ड बेनेट के अनुसार : “एक कलाकार को मुख्य रूप से प्रस्तुति में दिलचस्पी होनी चाहिए, न कि प्रस्तुत की गई चीज़ों में l उसे तकनीक के प्रति लगाव, शैली के प्रति गहरा प्रेम होना चाहिए l” असल में शिल्प ही वह औजार है, जिससे रचनाकार अपने विषयों का अन्वेषण और उसका विकास करता है l उसे आकार देता है l कथानक की पृष्ठभूमि का निर्माण करता है l एक कहानीकार शिल्प के माध्यम से ही अपने अनुभवों को सम्यक और कलात्मक अभिव्यक्ति देने में सफल तथा समर्थ होता है l इस संदर्भ में शांति स्वरूप गुप्त लिखते हैं कि “प्रत्येक महान कलाकार आवश्यक रूप से अपने निज की शैली बनाता है l” 
मोहन राकेश की मानें तो : “कहानी या उपन्यास की शिल्प-विधि का विकास लेखक की प्रयोग-बुद्धि पर इतना निर्भर नहीं करता जितना उसके मैटर की आंतरिक अपेक्षा पर l” 
प्रवासी स्त्री रचनाकारों की कहानियों को पढ़ते हुए उनके शिल्प को देखा जा सकता है l कथा कहन की जो शैली है वह उनकी अपनी बनाई शैली है l उनकी कहानियों में जो शिल्प है वह बिलकुल नया शिल्प है l उदाहरण के लिए रेखा राजवंशी की कहानियों को देख सकते हैं l उनकी कहानियों में प्रतीकात्मक भाषा और बिम्बों का सुंदर प्रयोग मिलता है l घर, आँगन, खिड़की, आईना, दरवाज़े  इत्यादि प्रतीकों का उपयोग कर वे स्त्री-जीवन की परिस्थितियों और उसके मनोभावों को दर्शाती हैं l उनके बिंब सहज होते हैं लेकिन उनमें गहरी अर्थवत्ता होती है l उनकी प्रसिद्ध कहानी है ‘ब्यूटी पार्लर’ l इस कहानी में भी जो शिल्प है वह उनका अपना शिल्प है l कहानी को पढ़ते हुए हमारी आँखों के आगे बिंब उभरकर आने लगते हैं, वह लिखती हैं : “मैं सैर पूरी करके घर पहुंची l घर में बिखरी चीज़ों को समेटा, एक कप ब्लैक टी के साथ टोस्ट बनाया l कंप्यूटर पर रिलैक्सिंग मेडिटेशन म्यूजिक लगा मैं बाहर पड़ी कुर्सी पर आ बैठी l”  इन पंक्तियों को पढ़कर लेखिका की सुंदर रचना कौशल का सहज ही अनुमान लग जाता है l रेखा राजवंशी की एक अन्य कहानी है ‘फेयरवेल’ l इस कहानी में जो आंतरिक तनाव है, प्रवासी जीवन का यथार्थ है l वही इसका भाव-बोध भी है और शिल्प भी l कहानी में दर्ज घटनाएं एक नये रूपक का निर्माण करती हैं l वह लिखती हैं : “गार्डन बिजली के बल्बों से जगमगा रहा था l लोग फूलों के गुलदस्ते और गिफ्ट लेकर आ रहे थे l यूँ तो सब मुस्करा कर आपस में मिल रहे थे, पर फिर भी माहौल में एक अजीब-सी चुप्पी थी l”  
प्रत्येक लेखक की अपनी शैली होती है, अपनी पद्धति होती है l कथा कहने की भिन्न शैली ही किसी रचना को विशिष्ट बनाती है l उस रचनाकार को भी अन्य लेखकों से अलगाती है जिनकी शैली सबसे जुदा होती है l इसका सबसे सुंदर उदाहरण है उनकी हैरान करनेवाली कहानी ‘गोरी डायन’ l इस कहानी का कथानक इतना भिन्न है कि पढ़कर आत्मा सिहर गई l कहानी की नायिका के ऊपर अपने ही पति को पेट्रोल छिड़क कर जलाने के आरोप है l वह अपने पति की बेवफाई से इतनी परेशान हो जाती है कि पति के लिंग पर पेट्रोल डाल देती है l उसे इस बात का एहसास नहीं था कि आग उसके पति को निगल जायेगी l देखते ही देखते यह बात आग की तरह फ़ैल जाती है और वह गिरफ्तार हो जाती है l यह पूरी घटना एक नाटकीय ढंग से व्यक्त होती है कहानी में और इसी को नाटकीय शिल्प विधि की श्रेणी में भी रखा जाना चाहिए l शिल्प की पाँच विधियों में से एक विधि है नाटकीय शिल्प विधि (Dramatic Technique). इस कहानी में उक्त घटना भी पूरी तरह से नाटकीय शैली में चित्रित हुआ है l वैसे देखा जाए तो किसी चरित्र की सफलता या असफलता किसी शिल्प-विधि पर निर्भर नहीं करती l वह उसकी कथा-प्रवाह पर निर्भर करती है l इसीलिए विलियम फील्डिंग ने लिखा कि “मैं स्वतंत्र हूँ कि कोई नियम बनाऊं जो इसके उपयुक्त हो l” यह सत्य है कि शिल्प के बिना किसी भी रचना में वह परिपक्वता नहीं आती, जो शिल्प के प्रयोग से आती है l कोई भी कृति तभी प्रभावी और तार्किक बन पाती है जब उसमें विधि अनुसार तकनीकों का प्रयोग किया जाता है l शिल्प को ‘Technique’ के अनुवाद के रूप में स्वीकार किया गया l अंग्रेज़ी के इस शब्द को ‘Craft, Form और  Structure, इन तीनों शब्दों से अभिहित किया गया एवं यह कहा गया कि ‘कथा-वस्तु’ वह है जिसके द्वारा एक वस्तु तैयार होती है l ‘रूप’ वह है जो इसको नवीन बनाता है l ये रूप केवल आकार नहीं है वरन् आकार बनाने वाली विधा है l
उषा राजे सक्सेना की कहानी-संग्रह ‘वाकिंग पार्टनर’ मूलतः प्रवास में रह रही स्त्रियों की अस्मिता और अस्तित्व को बचाये रखने की कहानियाँ हैं l संग्रह में निहित ‘वाकिंग पार्टनर’ कहानी, अपने रचना-कौशल एवं भाषा-सौष्ठव के साथ चरम पर पहुँच कर पाठकों की संवेदनाओं को झकझोरती है और पाठकों से ही यह सवाल भी करती है कि “आखिर, क्यों औरत को ही अपनी सहूलियत, अपनी मजबूरियों के लिए बुरी औरत के खिताब से नवाजा जाता है …!” उषा राजे सक्सेना की कहानियों की ताकत है उनकी सार्थक भाषा-शैली l रचना की कुशलता कहानियों की कहन और उसकी अनोखी शिल्प से तय होती है l उषा जी अपनी कहानियों में हर कहीं लाउड नहीं हैं बल्कि चुप्पी का सहारा भी लेती हैं और उस चुप्पी के माध्यम से बड़ी-से-बड़ी बात कह जाती हैं l वे अपनी कहानियों में सकारात्मक रुख को भी अपनाती हुई दिखती हैं l 
प्रवासी स्त्री कहानीकारों में हंसा दीप की कहानियों का शिल्प भी अपने आपमें नया और अद्भुत है l उनकी कई कहानियां ऐसी हैं जो मनुष्यता पर सवाल उठाती हैं, उनपर विचार-विमर्श करने पर विवश करती हैं, विश्लेषण करने की भूख जगाती हैं l चाहे कहानी ‘घुसपैठ’ हो, ‘कॉफी में क्रीम’ हो, ‘अम्मी और मम्मी’ हो या ‘उल्का पिंड’ हो l इन सभी कहानियों का शिल्प नितांत नया और भिन्न है l ‘कॉफी में क्रीम’ कहानी प्रवास में रह रहे लोगों की उस मानसिक पीड़ा को व्यक्त करती हैं जो नस्लभेद और रंगभेद के शिकार होते हैं परंतु इस कहानी में इसकी शंका नायिका को उस वक्त मिटती हुई दिखाई पड़ती है जब लीवी नामक पात्र नायिका के लिए पिज्जा लाना नहीं भूलते l नायिका लीवी के इस आत्मीय व्यवहार को देखते हुए मन ही मन बहुत खुश होती हैं l कृष्ण बिहारी पाठक जी की मानें तो साहित्यकार की संवेदनशील, भावसंपन्न दृष्टि इन विसंगति-विडंबनाओं को न केवल यथावत उजागर करती है अपितु एक आशाभरी राह भी दिखाती है l हंसादीप की कहानियाँ सहज लगती अवश्य हैं परंतु सहजता में भी एक गंभीर विषय को छुपाये रखती हैं l वे समाज के ज्वलंत मुद्दों को अपने कथा-शिल्प में पिरोती हैं, जिससे उनकी कहानियाँ जीवन के यथार्थ को प्रभावी ढंग से उजागर करती हैं l उनकी कहानियों के संवाद स्वाभाविक होते हैं, जो पात्रों की मानसिकता और सामाजिक परिवेश को उभारने में सहायक होते हैं l 
हंसादीप की कहानियों के पात्रों के चरित्रों की मनःस्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण उनकी कहानियों को और अधिक सजीव बनाता है l वे अपनी कहानियों में प्रतीकों और बिंबों का सुंदर प्रयोग करती हैं, जिससे कथा अधिक सशक्त और प्रभावशाली बन जाती है l प्रायः कहानियों में ‘अँधेरा’, ‘खालीपन’, और ‘गहराई’ जैसे बिंबों का प्रयोग कर मानसिक स्थिति को चित्रित करने का सुंदर प्रयास दीखता है l ‘कॉफी में क्रीम’ कहानी की संवाद-शैली मन को भीतर तक उद्वेलित कर जाते हैं ; “गर्म हथेलियों की तपन ने इवा के जमे हुए आंसुओं को बहा दिया l शाम का धुंधलका अपने चरम पर था l काले बादलों का झुण्ड, सफ़ेद बादलों के साथ एकाकार होते, डूबते सूरज की लालिमा में विलीन हो रहा था l न दिन था, न रात, सिंदूरी शाम थी l” उक्त कहानी में जो एक शांत वातावरण दीखता है वह मानो जीवन के शांत और थिर जाने का समय-संकेत हो l 
 हंसादीप की एक और महत्वपूर्ण कहानी है ‘मैटरनिटी लीव’ l इस कहानी में शीजू एक कामकाजी महिला है, जिसकी मातृसुलभ भावनाओं को उसकी कुर्सी कल्चर ने निगल लिया है l इस कहानी में मातृत्व ग्रहण करने के बाद एक कामकाजी महिला की जो वास्तविक चिंता और स्थिति होती है, उसी को उजागर करती है ये कहानी l शीजू के माध्यम से लेखिका ने उन तमाम माँओं की चिंता को व्यक्त किया है l “दूध और डायपर के बीच शीजू को अपनी दिनचर्या याद आने लगी l वह आरामदेह मेज-कुर्सी, वे घनघनाते फ़ोन और वे मीटिंग l काम का आनंद, पैसा और कुर्सी की सुख सुविधाएं, दिमाग़ के दरवाजे पर हौले से दस्तक देते तो मन कुलबुलाने लगता l साल भर की छुट्टी (मैटरनिटी लीव) से अगले प्रमोशन की तारीख साल भर आगे खिसक जायेगी l” 
समाज चाहे कहीं का भी हो परंतु यह सत्य है कि मातृत्व ग्रहण करनेवाली स्त्री का शिशु के प्रति जो दायित्व है और उसका जो भार है, सर्वाधिक स्त्री ही वहन करती है l पिता का साहचर्य केवल उतने ही भर का रहता है जब तक कि शिशु का जन्म न हो जाए l उसके बाद की सारी सेवा केवल और केवल उस माँ के लिए है जिसने जन्म दिया l उनकी कहानियों में स्त्री अस्मिता और स्त्री-जीवन की गहरी संवेदना स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है l हंसा दीप कई बार अपनी कहानियों में खुले अंत (open ended) का प्रयोग करती हैं, जिससे पाठक खुद कहानी का निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित होता है l 
प्रवासी स्त्री कहानीकारों का शिल्प उनकी संवेदनशील दृष्टि, गहरी मानवीय समझ और सामाजिक यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है l उनकी भाषा सरल होने के बावजूद प्रभावशाली होती है, संवाद स्वाभाविक होते हैं और कहानियों का अंत पाठकों को झकझोर कर रख देता है l इनकी कहानियों में प्रवासी भारतीयों के संघर्ष और उनकी जड़ों से कटने की पीड़ा को भी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं l कोई भी कलाकार अपनी अनुभूति में जितना संवेदनशील और व्यापक होगा वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए रूपाकार का सहारा लेगा, जैसे कि : Language, style और Form. ‘Form’ कहानी का एक प्रकार से शरीर है l मोहन राकेश की मानें तो “कहानी या उपन्यास की शिल्प-विधि का विकास लेखक की प्रयोग-बुद्धि पर इतना निर्भर नहीं करता, जितना उसके मैटर की आंतरिक अपेक्षा पर l” 
अस्तु ! ये कि आंतरिक अपेक्षा पाठक को चौंकाने की भी हो सकती है और चिंतन करने देने की भी l फिर भी लेखक जो रचता है उसमें ये उद्देश्य तो अवश्य निहित रहता है कि पाठक को कुछ नया और ताज़ा मिले l ऐसा जो अब तक किसी ने भी कहा नहीं, बताया नहीं या फिर लिखा नहीं l ऐसे में शिल्प को नये सिरे से गढ़ने के लिए वह परिश्रम तो अवश्य ही करता है l चाहे वह स्वेच्छा से हो या अनायास ही हो l अपनी कहानी में नया प्रयोग करना ही नये शिल्प का निर्माण समझा जाना चाहिए, नहीं तो कहानी के छह तत्त्वों में से शिल्प निर्माण का तत्त्व भी लेखक की अपनी ही शैली है l कहानी का मैटर ही कहानी का शिल्प बनाता चलता है l विषयवस्तु और संवेदना के स्तर पर किसी रचना प्रक्रिया का आरंभ होता है और यही प्रक्रिया कहानी के भीतरी रूपाकार को धीरे-धीरे शिल्प में परिणत कर देता है l 
प्रवासी कथाकारों में ज़किया ज़ुबैरी जी की कहानियों का शिल्प भी बहुत ही भिन्न और नयापन लिए हुए प्रतीत होती हैं l उनकी कहानियों का औरा भारत से लेकर पाकिस्तान और फिर लंदन तक की पृष्ठभूमि तक फैला हुआ है l ‘दोनों आसमानों के रंग’ नमक कहानी में ज़किया जी लिखती हैं “बेटा खून तो दोनों ओर का बहा है और दोनों के खून का रंग भी लाल ही था l हाथ-पैर, कान-नाक, रंग-मिज़ाज, खाना-पीना सभी तो एक ही जैसा था l” (यहाँ कबीरदास सहज ही याद आ जाते हैं, जिन्होंने मनुष्य मात्र को समान समझा और दोनों के रक्त का रंग लाल बताया l) 
उक्त पंक्तियाँ तुलनात्मक शिल्प-विधि का सुन्दर उदाहरण है l द्विभाषिकता और सांस्कृतिक मिश्रण प्रवासी जीवन की दोहरी पहचान और भाषाई संक्रमण को दर्शाता है l इन कहानियों की भाषा में जो प्रवाह है, वह भावनात्मक गहराई के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता को भी इंगित करती है l यहाँ हर वाक्य में अनावश्यक क्लिष्टता से बचने और पाठकों से सीधा संवाद करने की कोशिश समाहित होती है l प्रवासी स्त्री कहानीकारों की कहानियाँ प्रायः आत्म-कथात्मक स्वर लिए होती हैं l वे अपने व्यक्तिगत अनुभवों को कई बार कथा के रूप में भी प्रस्तुत करती हैं l इनकी कहानियों में दो संस्कृतियों के बीच जीने का तनाव, पहचान का संकट, अपने जड़ों से कट जाने की तकलीफ़, नस्लीय भेदभाव और अकेलेपन के दंश को झेलने की पीड़ा को प्रमुखता से देखा जा सकता है l घर और परदेश का अंतर इन कहानियों में भलीभांति महसूस किये जा सकते हैं l प्रवासी जीवन की चकाचौंध से चौंधियाई आँखें उस वक्त पनीली हो जाती हैं जब भौतिकतावादी दृष्टि संबंधों पर हावी होने लगती हैं l एक तरफ़ घर जहाँ मातृभूमि, बचपन, अपनापन और सुरक्षा का प्रतीक है, वहीं परदेश की मिट्टी अजनबीपन, संघर्ष और अस्तित्व के संकट का प्रतीक है l प्रवासी जीवन की ठंडक अकेलापन और भावनात्मक दूरी को दर्शाते हैं वहीं समुद्र और हवाई जहाज जड़ों से काटने और प्रवास के प्रतीक होते हैं l “बर्फ़ की सफेदी ने जैसे सब कुछ ढक लिया था – शायद उसकी पहचान भी …l” 
ज़किया ज़ुबैरी, हंसा दीप, सुधा ओम ढींगरा और उषा राजे सक्सेना की कई कहानियाँ तो ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद एहसास होता है कि नायिका अपनी पहचान और संतुलन की तलाश में रहती हैं l “वह लौटना चाहती थी, लेकिन क्या सच में वहाँ भी अब उसका घर बचा था?” 
सुधा ओम ढींगरा की एक कहानी है ‘अबूझ पहेली’ l इस कहानी की सूत्रधार स्वयं लेखिका हैं l अजीबोग़रीब घटना पर आधारित यह कहानी वास्तव में एक सच्ची घटना पर केन्द्रित है- वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर में हुए हमले को लेकर l कहानी की नायिका को एक सपना हमेशा आता है कि कहनी कोई जहाज टकरा रहा है, कोई बड़ी दुर्घटना होनेवाली है और इस बात को लेकर वह काफ़ी परेशान भी रहती है l बेटे और पति अक्सर उसे मानसिक रोगी करार देने पर आमादा रहते हैं और उसका इलाज करवाना चाहते हैं l पढ़ी-लिखी होते हुए भी इस तरह की बातें करना किसी के गले नहीं उतरता और उसे हैलूसिनेशन और डे-ड्रीमिंग का शिकार समझते रहते हैं l स्वयं आर्यन की माँ (नायिका) को भी यही लगता रहता है परंतु वास्तव में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो जाता है जो उसकी शंका को सच साबित कर देता है l इस कहानी में भी स्त्री की उपेक्षा को दिखाया है सुधा जी ने l कैसे घर की मालकिन होते हुए भी उसके मन की शंका और उसकी दुविधा को बेटे और पति दोनों समझने में अक्षम थे l यह कहानी उस हृदय-विदारक घटना को केंद्र में रखकर अवश्य लिखी गई है परंतु कहानी का ताना-बाना वह प्रभाव नहीं छोड़ पाई जो अमूमन पाठक उम्मीद करते हैं l अतः कहानी का शिल्प यहाँ कमज़ोर प्रतीत होना स्वाभाविक है l 
शिल्प किसी भी कृति का अलंकार होता है l कथा कहने और गढ़ने की विशिष्ट शैली ही उसमें नयेपन का रंग भरता है l शिल्प का कमज़ोर होना रचना कौशल को प्रभावित करता है परंतु हर बार यह आवश्यक भी नहीं l कई बार कहानी और उसमें निहित घटनाएँ इतनी प्रभावी हो जाती हैं कि शिल्प की भूमिका अपने-आप गौण लगने लगती है l कथानक कितना दमदार है ये लेखक की कलम पर निर्भर करता है l    
   
संदर्भ-सूची
______________________________________________________________
  1. गुप्त शांति स्वरूप, ‘उपन्यास : स्वरुप, संरचना और शिल्प’, लोधी ग्रंथ निकेतन 9679/19 बाग़ रावजी, दिल्ली – 110006 : संस्करण : 1980 : पृष्ठ : 117
  2. वही
  3. वही, पृष्ठ : 118
  4. त्यागी दीपक प्रकाश, ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास की शिल्पविधि का विकास’, (राजेन्द्र यादव, ‘एक दुनिया समानांतर’ (भूमिका, पृष्ठ : 69)), ई-पुस्तकालय, पृष्ठ : 38
  5. http://gadyakosh.org
  6. वही
  7. Johns tom, ‘I Am at liberty to make what laws I please therin’, P. 69
  8. [email protected]
  9. setumag.com/2025/0:
  10. त्यागी दीपक प्रकाश, ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास की शिल्पविधि का विकास’, (राजेंद्र यादव, ‘एक दुनिया समानांतर’, भूमिका, पृ. 69), ई-पुस्तकालय, पृष्ठ : 41
  11. ज़ुबैरी ज़किया, ‘दोनों आसमानों के रंग’, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 2023 : पृष्ठ : 88
डॉ.चैताली सिन्हा 
सहायक प्राध्यापक, शहीद भगत सिंह (सांध्य)
महाविद्यालय, (दिल्ली वि.वि.)
क/ओ. धर्मपाल गौतम, म/सं.401/1 सी.डी.,
मुनिरका बुद्ध विहार, लैंड मार्क-जोहरी मेडिकोज
बाबा गंगनाथ मार्ग, नई दिल्ली -110067


RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest