Wednesday, March 25, 2026
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डॉ. चैताली सिन्हा का लेख – विविधवर्णी तुलसी के राम

“जो आनंद सिंधु सुखरासी l सीकर तें त्रैलोक सुपासी l
   सो सुखधाम राम अस नामा l अखिल लोकदायक विश्रामा l”
(अर्थात् ये जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि है, जिसके एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उनका नाम राम है, जो सुख का भवन और संपूर्ण लोकों को शांति देनेवाला है l )
तुलसीदास भक्तिकाल के रामभक्ति शाखा के सगुण काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं l भक्तिकाल के उदय के संबंध में प्रसिद्ध कथन है : 
“भक्ति द्राविड उपजी, लाये रामानंद
प्रकट किया कबीर ने सात द्वीप नौ खंड l” 
दक्षिण में आलवार संत-भक्तों द्वारा जिस भक्ति का अलख जगाया गया उसे पूरे भारत में प्रज्ज्वलित करने का श्रेय रामानन्द से लेकर कबीर, सुर, तुलसी और मीराबाई सबको दिया जा सकता है l हिन्दी साहित्य के इतिहास में, विशेषकर पूर्व मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन मूलतः एक धार्मिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के रूप में भारतीय समाज के सामने आता है l मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के व्यापक प्रभाव के कारण ही रामविलास शर्मा ने इसे ‘लोक-जागरण’ का काल कहा था l रामविलास शर्मा की मानें तो भक्तिकाल के पुरोधा लोक की चिंता से जुड़े थे, उसकी शक्ति और ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी लोक था, शास्त्र या वेद नहीं और यह बात कई मायनों में सत्य भी प्रतीत होता है l रामविलास शर्मा की तर्ज पर मुक्तिबोध भी कहते हैं लेकिन थोड़ी भिन्नता लिए हुए l मुक्तिबोध के अनुसार जिस वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और संप्रदाय से परे मनुष्य सत्य की उद्घोषणा करते हुए भक्ति-आंदोलन का उदय हुआ था, उच्च वर्गों के हाथों में जाने से वह अंततः सिकुड़कर रह गया l कुछ हद तक इस बात से सहमति जताई जा सकती है l हालाँकि ‘रामचरितमानस’ को पढ़ते हुए ये धारणा टूटती है l कारण कि तुलसीदास को अपने सामाजिक और धार्मिक आदर्शों के साथ जो व्यापक जन-समर्थन प्राप्त है, साधारण जन के हृदय और मस्तिष्क में उनका जो गहरा प्रभाव है, पहुँच है, उसके कारणों के मूल में ये मानुष-सत्य ही तो है l 
“यद्यपि जग दारुण दुख नाना l
सब ते कठिन जाति अवमाना l”
अध्यात्म रामायण में ‘राम’ नाम का बड़ा ही रोचक अर्थ दिया गया है : “तं गुरु: प्राह रामेति रमणाद् राम इत्यपि l” यानी ज्ञान द्वारा अज्ञान के नष्ट हो जाने पर मुनिजन, जिनमें रमण करते हैं, जो भक्तजनों के चित्त को आनंद प्रदान करते हैं, वही ‘राम’ हैं l वशिष्ठ मुनि ने राम को इस रूप में देखा और यथोचित देखा l वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से इतर तुलसी के राम की बात ही कुछ और है l 
अस्तु ये कि तुलसी के ‘रामचरितमानस’ को भारतीय समाज में आज भी एक धार्मिक ग्रन्थ के रूप में ही अधिक पढ़ा जाता है l जिस दिन साहित्यिक दृष्टि से बहुतायत में पढ़ा जाएगा उस दिन इसकी व्याख्या और भी व्यापक और नवीन होगी l तुलसी के मानस में केवल सामाजिक और धार्मिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक चेतना भी ज़बरदस्त है l आदर्श राम राज्य की परिकल्पना में उन्होंने हर उस शासक को संदेश दिया है जो प्रजा-हितैषी नहीं हैं l 
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी l 
सो नृप अवसि नरक अधिकारी ll”   
पूर्व मध्यकाल यानी भक्तिकाल के राम काव्य धारा के सशक्त कवि तुलसीदास जी की भक्ति-भावना दास्य भक्ति-भावना है और इसीलिए उनके राम प्रभु श्री राम हैं l सूरदास के कृष्ण की तरह यहाँ राम तुलसी के सखा नहीं वरन् आराध्य हैं l तुलसी के राम यहाँ कबीर के राम की तरह भी नहीं हैं जो राम से तर्क करें बल्कि तुलसी के राम मर्यादाओं में रहनेवाले पुरुषों में उत्तम और प्रजा-हितैषी राम हैं l तुलसी अपने राम से सवाल नहीं करते कबीर की तरह, वह तो बस राम का अनुसरण और राम की आज्ञाओं का पालन करते हैं l तुलसीदास लिखते हैं मैं केवल रघुवीर अर्थात् राम का सेवक हूँ और मेरे दरबार में रहने का अनुबंध राम के साथ लिखा हुआ है l अब मैं किसी नश्वर राजा का अधिकारी बनकर क्या करूंगा l
“हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार l”
अब तुलसी का होहिंगे, नर के मनसबदार ll”    
तुलसीदास के राम पर बात करते हुए हमें भारतीय एवं भारतीयेतर रामायण की पृष्ठभूमि पर संक्षिप्त प्रकाश डालने की आवश्यकता है l यह सर्वविदित है कि रामायण की संख्या तीन सौ से लेकर एक हज़ार तक बताई जाती है जो भिन्न-भिन्न रूपों में मौजूद हैं l परंतु इन सब में सर्वाधिक प्राचीन आर्ष रामायण यानी आदि कवि वाल्मीकि के ‘रामायण’ को माना जाता है l वाल्मीकि ने इसकी रचना संस्कृत में की l संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, कन्नड़, असमिया, उड़िया, उर्दू, अरबी, फ़ारसी, गुजराती, बांग्ला (कृत्तिवास रामायण), मराठी, तेलेगु, मलयालम, नेपाली (आदर्श राघव, सुन्दरानंद रामायण) इत्यादि भाषाओं में राम कथा लिखी गई है l भारत से इतर देशों में, जैसे कि कंबोडिया, जावा, बर्मा, तिब्बत, इंडोनेशिया एवं थाईलैंड इत्यादि देशों में भी रामायण की रचना की गई है l कंबोडिया में ‘रामकर’, इंडोनेशिया में ‘ककबिन रामायण’, जावा में ‘सेरतराम’, ‘रामकेलिंग’, ‘पातानीरामकथा’ एवं ‘सैरीराम’, बर्मा में ‘राम वथ्थु’, ‘महाराम’ एवं ‘यूतोकी रामयागन’, थाईलैंड में ‘रामकियेन’ नाम से अनेक ग्रन्थ रचे गये हैं जो रामाख्यान पर आधारित है l यहाँ तक कि बौद्ध परंपरा में भी ‘दशरथ जातक’, ‘अनामक जातक’ तथा ‘दशरथ कथानक नामक’ तीन जातक कथाएँ मिलती हैं l जैन साहित्य में भी विमलसूरी कृत ‘पउमचरियं’, रविषेण कृत ‘पद्मपुराण’ एवं स्वयंभू कृत ‘पउम चरिउ’ इत्यादि पुस्तकें लिखी गयीं ( जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम ‘पद्म’ था ) l 
भारत से इतर कुछ विद्वान राम-काव्य की समानता पाश्चात्य साहित्य के अंतर्गत ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य ‘इलियड’ तथा रोम के कवि नोनस की कृति ‘डायोनीशिया’ से भी मानते हैं l राम-काव्य को भिन्न-भिन्न नामों से चरितार्थ करने का प्रयास आदिकाल से ही रहा है l परंतु यदि वास्तव में देखा जाए तो इन सब में सर्वाधिक ख्याति वाल्मीकि के बाद तुलसी के ‘रामचरितमानस’ को ही मिली l एक अकेले राम और राम के जीवन पर आधारित रचनाओं का बाहूल्य यह बताता है कि ‘राम’ का अस्तित्व कितना विराट और अनुकरणीय है l इसमें कोई संदेह नहीं कि राम की छवि ने पूरे संसार को अपनी ओर आकर्षित किया l यह आकर्षण केवल शारीरिक सौंदर्य का नहीं बल्कि कार्मिक सौन्दर्य का भी है l मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने समस्त जगत को एक राजा के कर्म और कर्तव्य का अर्थ प्रेषित किया l एक राजा को कैसा होना चाहिए, एक पुत्र का क्या धर्म होना चाहिए, एक पति का अपनी पत्नी के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए, एक भाई का अपने से छोटे भाइयों के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए, एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति क्या सम्मान-भाव होना चाहिए तथा केवट जैसे सेवक और शबरी जैसी माता का किस प्रकार आदर-सम्मान होना चाहिए ; इन सभी बातों की ओर भगवान् राम हमारा ध्यान खींचते हैं l एक पुरुष में इतने सारे गुणों का समाहार क्या किसी चमत्कार से कम नहीं लगता ! राम ने जो जीवन-मूल्य समाज में स्थापित किये थे, वह आज धूमिल हो चुके हैं l हमारे समाज में सर्वाधिक ह्रास यदि किसी चीज़ का हुआ है तो वह है नैतिक जीवन-मूल्यों का l आज पिता-पुत्र का संबंध, भाई-भाई का संबंध, पति-पत्नी का संबंध, मित्र-मित्र का संबंध सब कुछ केवल दिखावे भर का रह गया है l प्रत्येक संबंधों में स्वार्थ अपने चरम पर है l आज गुरु-शिष्य के संबंध भी वैसे नहीं रह गए जैसा कि पहले था, इनमें भी विकृति आ गई है l ऐसे में राम के विचारों को आत्मसात करना कितना आवश्यक हो जाता है ; तुलसीदास इसी ओर हमें ले जाते हैं l
तुलसीदास ने अपने ‘रामाख्यान’ (रामचरितमानस) की शुरुआत सोलहवीं सदी में की l अवधी में रचित यह महाकाव्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम को समर्पित है l तुलसी के रामाख्यान को सर्वाधिक स्थान उत्तर भारत में मिला l रामचरित मानस का पाठ आज भी लोग प्रतिदिन अपने घरों-मंदिरों में करते हैं l प्रायः सभी घरों में इसे एक पवित्र ग्रन्थ के रूप में (पूजा-घर में) रखा जाता है और रामचरित मानस के चौपाइयों का सस्वर वाचन भी किया जाता है l भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है ‘रामचरितमानस l’ तुलसीदास ने जिस राम का चरित्र मर्यादाओं के भीतर गढ़ा है उस मर्यादा वाली छवि को आद्यंत बनाये रखना तुलसीदास की विवशता भी है क्योंकि यहाँ राम राजपुत्र होते हुए भी संघर्ष करते हैं और उस संघर्ष की अवधि में वह न जाने किन-किन परिस्थितियों का सामना करते हैं l तुलसी ने जिस ‘रामचरितमानस’ का सृजन स्वांतः सुखाय के लिए किया था वह कब दूसरों के कंठ का हार बना पता ही नहीं, सर्वजन सुखाय बना उन्हें ज्ञात नहीं l कहा भी जाता है कि कोई रचना लेखक की तभी तक होती है जबतक वह लेखक के पास है परंतु समाज के बीच आते ही, वह समाज की हो जाती है l प्रो.गोविंद प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्ति है : “मैं नहीं था लिखते समय…” वही बात यहाँ भी लागू होती है l रचनाकार कुछ भी रचते समय किसी अन्य स्थिति में रहते हैं और रचने के बाद स्वयं उससे मुक्त भी हो जाते हैं l प्लूटो के शब्दों में कहें तो दैवीय शक्ति विराजमान होती हैं उस समय जब कवि कविता कर रहे होते हैं l बिना दैवीय शक्ति के कवि स्वयं कुछ नहीं रच सजते l हालाँकि अरस्तु इसे अनुकरण का अनुकरण मानते हैं l  
मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी संघर्ष-पुरुष हैं राम l तभी तो अब्दुल बिस्मिल्लाह जी कहते हैं कि : “राजा का पुत्र राजा नहीं बनता, जंगल चला जाता है, सीता माध्यम बनती हैं रावण जैसी प्रवृत्ति के नाश में l वह सिद्ध करता है कि अगर आपको कुछ पाना है तो संघर्ष करना होगा l” इसीलिए मैंने कहा कि राम संघर्ष-पुरुष राम हैं l राम के संघर्ष की गाथा हमें निराला की ‘राम की शक्ति-पूजा’ में भी मिलती है, उससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है राम के संघर्षशील होने का ! निराला अपने ‘स्व’ का लोप राम में कर देते हैं l राम का दुःख निराला का अपना भी दुःख है l वह लिखते हैं : 
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध 
 धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध 
 जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका ;
 वह एक मन रहा राम का जो न थका ; 
 जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय 
 कर गया भेद वह माया वरण प्राप्त कर जय l”  
निराला की उक्त काव्य-पंक्तियाँ राम के साथ-साथ निराला के स्वयं के जीवन-संघर्ष को भी दर्शाता है l कहते हैं कि निराला को ‘रामचरितमानस’ के प्रति आकर्षण पत्नी मनोहरा देवी के कारण हुआ क्योंकि वह प्रतिदिन इसका पाठ किया करती थीं l वाल्मीकि रामायण से भी अधिक ‘रामचरितमानस’ को हमारे देश में ख्याति मिली l कारण तुलसीदास की अद्भुत कल्पना शक्ति और सुंदर समन्वय की भावना को कह सकते हैं l इसी ग्रन्थ में उन्होंने कई परंपरागत चीज़ों को नहीं अपनाया l मसलन अध्यायों के नाम जो ‘काण्ड’ के रूप में हमारे समक्ष हैं l तुलसीदास ने अध्याय शब्द का प्रयोग न कर ‘काण्ड’ शब्द का प्रयोग किया है जबकि हम जानते हैं कि ‘कांड’ शब्द की ध्वनि नकारात्मकता का बोध कराती है l संस्कृत में काण्ड का अर्थ होता है घटना l ऐसे में तुलसीदास की मौलिक दृष्टि का अनुमान लगाया जा सकता है l ‘काण्ड’ शब्द का प्रयोग उनकी अपनी निजी उपज है l
तुलसीदास के मानस को पढ़ते हुए उनकी दूरदर्शिता पर आश्चर्य होता है l तुलसीदास ने रामचरितमानस में कलयुग के लिए जो-जो अनुमानित किया था क्या आज वे सब घटित नहीं हो रहीं ! 600 साल पहले जो वह कह गए आज वे सभी फलीभूत होते देख सकते हैं l जैसे कि “गुरु सिस अंध बधिर कै लेखा, एक नहि सुनै एक नहि देखा l” यानी अभी ऐसा समय है कि गुरु बोल रहे हैं और शिष्य हैं कि अपनी मस्ती में मोबाइल फ़ोन चला रहे हैं l एक (गुरु) को दिख नहीं रहा है दूसरा (छात्र/छात्राएं) सुन नहीं रहे हैं l इतना ही नहीं आज संबंधों के भीतर जो प्रदूषण फैला है, जो आमूल-चूल परिवर्तन दिखाई देते हैं वे सभी सच सिद्ध हो रहे हैं l प्रायः अख़बारों के पन्ने ऐसी सूचनाओं से पटे पड़े होते हैं जहाँ कभी पिता-पुत्री का अनैतिक संबंध तो कभी भाई-बहन का अनैतिक संबंध, गुरु-शिष्य का अनैतिक संबंध और कभी-कभी तो एक-दूसरे की हत्या तक की घटनाएं भी सुनने में आता है l 
“कलिकाल बिहाल भये मनुजा, 
नहिं जानत कोउ अनुजा तनुजा l”
रामचरितमानस में तुलसी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी वह थोड़ा-थोड़ा उस समय तक तो था भी परंतु जिस कलयुग की भविष्यवाणी उन्होंने की वह सत्य सिद्ध हो रहे हैं l कलयुग में राम को प्राप्त करना सरल भी है और कठिन भी l कठिन इसलिए कि आज मनुष्य के कथनी और करनी में अंतर है l आज मनुष्य कहता कुछ और है करता कुछ और है, इसीलिए वह दुखी भी है जबकि तुलसी ने रामराज्य में किसी के भी दुखी न रहने की बात कही थी :
 “दैहिक दैविक भौतिक तापा l रामराज्य काहूहि नहीं व्यापा l”  
मनुष्य के कथनी करनी में आज जो अंतर है उसका एक कारण उनका अपना चुनौतियों भरा जीवन भी हो सकता है, आज की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां भी और उनका जीवन-संघर्ष भी l तो क्या तुलसीदास के जीवन में संघर्ष नहीं था? उनके जीवन में उनका अपना संघर्ष था, चुनौतियाँ थीं l जैसे कि समाज में एक वक्त ऐसा भी आया जब तुलसी के लोग विरोधी हो गए और स्वयं तुलसी भी ब्राह्मणों के खिलाफ़ हो गए l तुलसी सामंत विरोधी थे परंतु सामंतवादी विरोधी नहीं थे l तुलसी ने स्वयं के जीवन में नाना कष्ट सहे, जीवन के अंतिम दिनों में भी उन्होंने दारुण दुःख झेला है l हनुमान बाहुक इसका प्रमाण है l तुलसीदास पत्नी वियोग सहकर राम नाम के उपासक बन गए, त्याग का इससे सुंदर उदाहरण भला और क्या होगा l 
आलोचक नामवर जी के अनुसार “तुलसी के राम में आदर्श राज्य की कल्पना है, उसमें कोई जाति-पाती नहीं है, जो राम का भक्ति वाला आदर्श राज्य है l ऐसा है कि समाज के बीच एक व्यवस्था लोक के लिए है, वह अलग है l लेकिन राम के आदर्श राज्य में इस तरह की कोई जाति-पाती की बात नहीं है l एक ही आदर्श है – भक्ति l” 
तुलसीदास के रामराज्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष को हमें नहीं बिसराना चाहिए और वह है उनके मानस में निहित प्राकृतिक संतुलन का अद्भुत समन्वय l मानस की एक विशेषता यह भी है कि रामराज्य में प्रकृति भी अनुकूल होती थी l जैसे समय पर वर्षा, अनुकूल मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का अभाव इत्यादि l वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने लिखा हैं : 
“दामिनी दमक रही घन माहीं l 
खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं l” 
(अर्थात् बादलों में बिजली की जो चमक है वह दुष्टों की अस्थिर प्रीति से कहीं अधिक टिकाऊ है जबकि खल यानि दुष्ट लोगों की प्रीति क्षणिक है) l इसी प्रकार तुलसीदास ने अलग-अलग ऋतुओं का बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायी चित्रण किया है l चित्रकूट का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है :       “राम वास वन संपत्ति भ्राजा l
  सुखी प्रजा जनु पाय सुराजा l”
अर्थात् वन की संपन्नता और उसकी सुंदरता राम के वन में आने से और भी बढ़ गयी है l प्रजा और वनवासी सभी सुराज का अनुभव कर रहे हैं l इसी प्रकार शरद ऋतु के विषय में वह लिखते हैं :
“सरदातनु रजनी तम घेरा l निज प्रभु जाना जानी घनेरा l”
यहाँ कवि ने शरद ऋतु की रात में चंद्रमा की शोभा और उसकी शीतलता का वर्णन किया है l यह विदित है कि शरद ऋतु का जो चाँद होता है, वह अत्यंत मनभावन होता है l उसकी छितराई हुई रोशनी आँखों में एक अलग चमक पैदा करती हैं l तुलसीदास ने न केवल राम के जीवन संघर्षों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया वरन् मनुष्य को प्रकृति से भी प्रेम करना सिखाया है l भारतीय साहित्य और संस्कृति में तो प्रकृति का सानिध्य आद्यंत रहा है l अशोक वाटिका का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने लिखा है : 
 “फूले तरु बन चहू दिसि सोभा l गावत कृपानिधान रघुराई l”
अर्थात् यहाँ चारों दिशाओं में फूले हुए वृक्षों और उनकी शोभा का वर्णन है, जो भगवान राम की कृपा से और भी बढ़ गई है l उक्त सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में प्रकृति का सुंदर और मनोहारी चित्रण किया है, जो पाठकों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम और सौंदर्य उत्पन्न करता है l तुलसीदास ने जिस प्रकार प्रकृति-चित्रण के अंतर्गत भिन्न-भिन्न ऋतुओं का वर्णन किया है उसकी छटा हम जायसी के बारहमासा में भी देख सकते हैं l विशेषकर विरह-वेदना का वर्णन नागमती के वियोग खंड में देखने योग्य है l जायसी लिखते हैं : 
“लागेउ माघ परै अब पाला l बिरहा काल भएउ जड़ काला l”
दरअसल ‘बारहमासा’ एक काव्य शैली है जिसमें वर्ष के बारह महीनों के माध्यम से नायक-नायिका के वियोग का वर्णन किया जाता है l वियोग का यह जो दर्शन है वह तुलसी के मानस में उस रूप में नहीं है जिस रूप में मैथिली शरण गुप्त के साकेत में है l तुलसीदास की सीता और मैथिली की उर्मिला के विरह में ज़मीन-आसमान का अंतर है l असल वियोग देखा जाए तो उर्मिला का ही रहा सीता तो जहाँ रहीं पिया संग रहीं l दरअसल तुलसीदास की स्त्री दृष्टि पितृसत्ता के ढर्रे के अनुसार है, पारंपरिक है और मैथिली शरण गुप्त की अत्याधुनिक l तुलसीदास स्त्री को अनुशासित और नियंत्रण में रखने के पक्षधर हैं l उन्होंने स्त्रियों को आदर्श-कुलशील, समर्पित परंतु पराधीन भूमिका में समाज में प्रस्तुत किया है l हालाँकि यह दृष्टिकोण तत्कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति को प्रतिबिंबित करता है l परंतु मैथिली शरण गुप्त ने उर्मिला के वियोग को आज की नारी के संदर्भ से जोड़ा है l मैथिली शरण गुप्त उर्मिला के विषय में लिखते हैं :
“दोनों ओर प्रेम पलता है l
सखि, पतंग भी जलता है, हा ! 
दीपक भी जलता है !”
और तुलसीदास की सीता कहती हैं :
“हे सखि! मैं सुकुमारी हूँ, वन के योग्य नहीं हूँ l
 मेरे लिए भोग ही उचित है, तपस्या नहीं l”
कितना अंतर है दोनों के विरह में l वास्तव में वनवास का जीवन उर्मिला ने जीया; सीता ने नहीं l उर्मिला ने व्यक्तिगत सुखों का त्याग किया और समाज सेवा की l एक ने अनिच्छित दुःख को गले लगाया और एक ने इच्छित दुःख को अपनाकर पति के साथ खुद को धन्य माना l हाँ एक पक्ष यह ज़रूर है कि सीता ने अशोक वाटिका में जो कठिन समय बिताया, वह देखा जाए तो वास्तव में वियोग का गहन हृदय विदारक रूप है l सच तो यह है कि तुलसीदास और मैथिली शरण गुप्त की नायिकाओं की तर्कातीत बात है क्योंकि सीता और उर्मिला; दोनों का चरित्र-चित्रण समय के भिन्न-भिन्न पड़ावों में हुआ है इसलिए दोनों की तुलना भी उचित नहीं l यहाँ तुलसी की सीता भी राम के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है और लक्ष्मण के साथ-साथ मैथिली की उर्मिला भी l  
अतः तुलसी ने अपने मानस के राम के माध्यम से ना जाने कितने ऐसे प्रसंगों को भारतीय जनमानस के बीच लाकर प्रेम और सौहार्द का सुख प्रदान किया है l अवधी भाषा एवं दोहा-चौपाई शैली में रचित यह ग्रन्थ आज भारतवर्ष का सिरमौर है l भक्ति प्रधान होते हुए भी इसमें श्रृंगार और अलंकारों का सुंदर सामंजस्य मौजूद है l तुलसी ने स्वयं को अज्ञानी बताकर भी जीवन का ज्ञान और उस जीवन का सार समस्त संसार को समझा दिया है l 
“राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार l
तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उजियार ll” 
संदर्भ-ग्रंथ
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  1. सिंह मनोज, ‘मैं रामवंशी हूँ’, प्रभात प्रकाशन प्रा.लि., 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली -110002, प्रथम संस्करण : 2024 : पृष्ठ : 182
  2. यादव लक्ष्मण, ‘तुलसीदास : आज के आलोचकों की नज़र में’, स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 2014 : पृष्ठ : 171
  3. वही, पृष्ठ. 220
  4. यादव लक्ष्मण, ‘तुलसीदास : आज के आलोचकों की नज़र में’, स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 2014 : पृष्ठ. 148
  5. पाठक वाचस्पति (प्रस्तुतकर्ता), ‘प्रसाद, निराला, पन्त, महादेवी की श्रेष्ठ रचनाएँ’, लोकभारती प्रकाशन, पहली मंज़िल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गाँधी मार्ग, इलाहाबाद-211001, तेइसवां संस्करण : 2015 : पृष्ठ.124
  6. यादव लक्ष्मण, ‘तुलसीदास : आज के आलोचकों की नज़र में’, स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 2014 : पृष्ठ. 151
  7. वही, पृष्ठ. 150
  8. यादव लक्ष्मण, ‘तुलसीदास : आज के आलोचकों की नज़र में’, स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002, प्रथम संस्करण : 2014 : पृष्ठ. 27
डॉ.चैताली सिन्हा
सहायक प्राध्यापक, (हिन्दी विभाग)
शहीद भगत सिंह (सांध्य) म.वि.
शेख सराय, दिल्ली विश्वविद्यालय
(7042813184)


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