Monday, April 20, 2026
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सूर्यकांत शर्मा की कविता – युद्ध

युद्व की भीषणता
का बढ़ता जा रहा
शैतानी आकार।
दिन पर दिन
बारूदी सतह का
होता जा रहा
विस्तार।
हिंसा -हमला
घात- प्रतिघात
सुरसा मानिंद
बढ़ाते जा रहे
अपना हिंसक
व्यवहार।
साँसों पर
युद्ध जनित प्रदूषण
का शेषनागी अवतार
ज़कड़ता जा रहा
हलाहल विष सा
धिक्कार।
तिस पर भी
सत्ता-लिप्सा औ
लोलुपता-लम्पटता का
दिन दूना,रात चौगुना
बढ़ता जा रहा
अय्यारी अवतार ।

सूर्यकांत शर्मा
संपर्क – [email protected]
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6 टिप्पणी

  1. हमारे आस पास कई देशों में हो रहे युद्धों की विभीषिका से आज सारा संसार और सारी मानव जाति प्रभावित है। युद्ध जो अपने आप में समस्या होते हैं किसी समस्या का हल नहीं हो सकते। आपने इस सामयिक चिंतन को विचारोत्तेजक शब्द दिए हैं।

  2. युद्ध की विभीषिका पर दृष्टिपात करते हुए आपने अच्छी कविता लिखी है ।वाकई वर्चस्व और अधिकार की लड़ाई में आम जनता का नुकसान होता है। आम जनता बेकार ही मारी जाती है पर्यावरण का नुकसान होता है। जन-धन हानी होती है।
    युद्ध कभी भी किसी समस्या का हल नहीं रहा।
    लेकिन इस बात से उच्च पदों पर बैठे हुए लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि स्थितियाँ चाहे जो बने उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाल न उनके घर का कोई सदस्य मरने वाला है और न ही आर्थिक रूप से उन पर कोई विपदा आने वाली है।

  3. आदरणीया आपने मेरी रचना के मर्म को मनोयोग से पढ़कर इतनी सहज सरल विवेचना की है।
    वर्तमान में तो अभी मिडिल ईस्ट से लौटा था और
    युद्ध की विभीषिका से मन बहुत दुखी है।बस उसी को दो रचनाओं यथा युद्ध और धमाके में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
    आपको हृदय से आभार।

  4. युद्ध की विभीषिका को वही समझ सकता है, जिसने इसे सहा हो, जो प्रभावित हुआ हो। बड़े लोग क्या जाने आम जनता हर तरह से पिसती है। भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

  5. जी माफ़ी चाहता हूँ कि आपके अमूल्य विचारों का प्रत्युत्तर देने में विलंब हुआ।यह रचना, खाड़ी देश के कई शहरों में भ्रमण के बाद सृजित हुई।
    प्रयास यही था कि वही भयावहता रचना में प्राण प्रतिष्ठित हो।
    आपके कमेंट्स हेतु हृदय से आभारी हूँ।

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