भौतिक जगत का निर्माण ऊर्जा द्वारा होता है। प्रकृति की दृश्यमान सत्ता के पीछे ऊर्जा की शक्ति होती है। जीवन का निर्माण भी ऊर्जा के माध्यम से होता है। पृथ्वी में जीवन का निर्माण भी बीज रूपी प्राण ऊर्जा से संभव होता है। जीवन का स्फुलिंग ऊर्जा में और ऊर्जा का केंद्र बीज में होता है। यह सत्, बीज, वीर्य या परागकण सबमें जीवन का स्फुलिंग है। इस लौकिक जगत में प्रत्येक जीवन के पीछे एक ही शक्ति होती है। जहां जीवन है वह शक्ति है। जहां शक्ति है, वहां देवी है। प्रकृति में जीवनदायिनी ऊर्जा या रस है, जिस कारण वह शक्ति है। वह गतिमान है, चंचल है और भौतिक है, जिस कारण माया है।
पांच तत्वों से संसार बना है उसी से मनुष्य बना है। इस प्रकार मनुष्य प्रकृति का अंग है। उससे अलग उसकी सत्ता नहीं है। हमारी सत्ता और हमारा व्यक्तित्व सभी का निर्धारण हमारे विचार से होता है। जैसा विचार है, वैसा मन होगा और वैसा ही शरीर बनता जायेगा। विचार सात्विक है तो मन भी शुभ और शिव तत्वों से पोषित होगा तथा हमारे कमों और उसको उत्प्रेरक ऊर्जा भी सत् तत्वों से रूपांतरित होगी। हमारे कर्म सदैव उच्च जीवन ऊर्जा से रूपांतरित हो, इसके लिए प्रकृति के विधान का अनुसरण करने भर से सफलता मिलेगी।
भौतिक जगत का निर्माण ऊर्जा द्वारा होता है। प्रकृति की दृश्यमान सत्ता के पीछे ऊर्जा की शक्ति होती है। जीवन का निर्माण भी ऊर्जा के माध्यम से होता है। पृथ्वी में जीवन का निर्माण भी बीज रूपी प्राण ऊर्जा से संभव होता है। जीवन का स्फुलिंग ऊर्जा में और ऊर्जा का केंद्र बीज में होता है। यह सत्, बीज, वीर्य या परागकण सबमें जीवन का स्फुलिंग है। इस लौकिक जगत में प्रत्येक जीवन के पीछे एक ही शक्ति होती है। जहां जीवन है वह शक्ति है। जहां शक्ति है, वहां देवी है। प्रकृति में जीवनदायिनी ऊर्जा या रस है, जिस कारण वह शक्ति है। वह गतिमान है, चंचल है और भौतिक है, जिस कारण माया है।
शक्ति के द्वारा ही निखिल ब्रह्मांड संचरणशील है। जैसे जगत का विकास होता है, मूलशक्ति अपने विविधि रूपों को धारण करती है। कथा है कि ऋषि भृंगी शिव की परिक्रमा करने की इच्छा प्रकट करते है तो माता पार्वती उनको रोक देती है। वह कहती है कि हम दोनों की परिक्रमा करो, क्योंकि दोनों के मिलन से ही पूर्णता है। भृंगी नहीं मानते है और अकेले शिव की परिक्रमा करने की हरेक प्रयास करते हैं लेकिन असफलता मिलती है। और वह ऊर्जा यानी प्राणविहीन हो जाते हैं। शक्ति के बिना शिव शव के समान है। शिव के बिना शक्ति निराधार हो जाती है। कृष्ण माता राधा के साथ परमात्मा होते हैं। कृष्ण के बिना गोपियों की स्थिति ऐसी हो जाती है कि उनके शरीर में आत्मा ही नहीं है। अपने बायें अंग के बिना कृष्ण के जीवन में रस और उमंग नहीं वरन् कर्म और दायित्व की प्रधानता हो जाती है।

