Monday, July 22, 2024
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डॉ. मयंक मुरारी का लेख – सृष्टि में शक्ति

भौतिक जगत का निर्माण ऊर्जा द्वारा होता है। प्रकृति की दृश्यमान सत्ता के पीछे ऊर्जा की शक्ति होती है। जीवन का निर्माण भी  ऊर्जा के माध्यम से होता है। पृथ्वी में जीवन का निर्माण भी बीज रूपी प्राण ऊर्जा से संभव होता है। जीवन का स्फुलिंग ऊर्जा में और ऊर्जा का केंद्र बीज में होता है। यह सत्, बीज, वीर्य या परागकण सबमें जीवन का स्फुलिंग है। इस लौकिक जगत में प्रत्येक जीवन के पीछे एक ही शक्ति होती है। जहां जीवन है वह शक्ति है। जहां शक्ति है, वहां देवी है। प्रकृति में जीवनदायिनी ऊर्जा या रस है, जिस कारण वह शक्ति है। वह गतिमान है, चंचल है और भौतिक है, जिस कारण माया है।

पांच तत्वों से संसार बना है उसी से मनुष्य बना है। इस प्रकार मनुष्य प्रकृति का अंग है। उससे अलग उसकी सत्ता नहीं है। हमारी सत्ता और हमारा व्यक्तित्व सभी का निर्धारण हमारे विचार से होता है। जैसा विचार है, वैसा मन होगा और वैसा ही शरीर बनता जायेगा। विचार सात्विक है तो मन भी शुभ और शिव तत्वों से पोषित होगा तथा हमारे कमों और उसको उत्प्रेरक ऊर्जा भी सत् तत्वों से रूपांतरित होगी। हमारे कर्म सदैव उच्च जीवन ऊर्जा से रूपांतरित हो, इसके लिए प्रकृति के विधान का अनुसरण करने भर से सफलता मिलेगी।
भौतिक जगत का निर्माण ऊर्जा द्वारा होता है। प्रकृति की दृश्यमान सत्ता के पीछे ऊर्जा की शक्ति होती है। जीवन का निर्माण भी  ऊर्जा के माध्यम से होता है। पृथ्वी में जीवन का निर्माण भी बीज रूपी प्राण ऊर्जा से संभव होता है। जीवन का स्फुलिंग ऊर्जा में और ऊर्जा का केंद्र बीज में होता है। यह सत्, बीज, वीर्य या परागकण सबमें जीवन का स्फुलिंग है। इस लौकिक जगत में प्रत्येक जीवन के पीछे एक ही शक्ति होती है। जहां जीवन है वह शक्ति है। जहां शक्ति है, वहां देवी है। प्रकृति में जीवनदायिनी ऊर्जा या रस है, जिस कारण वह शक्ति है। वह गतिमान है, चंचल है और भौतिक है, जिस कारण माया है।
शक्ति के द्वारा ही निखिल ब्रह्मांड संचरणशील है। जैसे जगत का विकास होता है, मूलशक्ति अपने विविधि रूपों को धारण करती है। कथा है कि ऋषि भृंगी शिव की परिक्रमा करने की इच्छा प्रकट करते है तो माता पार्वती उनको रोक देती है। वह कहती है कि हम दोनों की परिक्रमा करो, क्योंकि दोनों के मिलन से ही पूर्णता है। भृंगी नहीं मानते है और अकेले शिव की परिक्रमा करने की हरेक प्रयास करते हैं लेकिन असफलता मिलती है। और वह ऊर्जा यानी प्राणविहीन हो जाते हैं। शक्ति के बिना शिव शव के समान है। शिव के बिना शक्ति निराधार हो जाती है। कृष्ण माता राधा के साथ परमात्मा होते हैं। कृष्ण के बिना गोपियों की स्थिति ऐसी हो जाती है कि उनके शरीर में आत्मा ही नहीं है। अपने बायें अंग के बिना कृष्ण के जीवन में रस और उमंग नहीं वरन् कर्म और दायित्व की प्रधानता हो जाती है।

भारतीय दर्शन में माया और शक्ति को स्त्रैण यानी नारीत्व से परिपूर्ण माना जाता है। मानव शरीर के बायें ओर दिल का वास होता है, वह स्त्रीत्व है। इस प्रकार प्रकृति में जहां जीवन है, वहां माता है, शक्ति है। विष्णु भगवान है। सर्वव्यापक है, लेकिन माता लक्ष्मी सदैव उर्वरता और जीवन का आधार रूप में रहती है।  कभी प्रकृति कभी पृथ्वी के रूप में। शिव साक्षात प्रकृति है। शिवलिंग ब्रह्मांडीय चेतना का स्वरूप है लेकिन माता गौरी ही इस चेतना की शक्ति है। इस कारण देव को चेतना का स्त्रोत तो देवी को उसका शक्ति कहा गया। बीज आत्मा है, तत्व है मिट्टी। एक है पुरुष, दूसरा है प्रकृति। लेकिन दोनों में एक शक्ति यानी तत्व की प्रधानता है। स्वामी विवेकानंद कहते है कि देवता भी प्रकृति की शक्तियां हैं। प्रकृति की अव्यक्त अवस्था में कोई देवता नहीं था। उस कालावधि में कोई पृथक शक्तियां भी नहीं थी। यह देव के पूर्व का कालखंड है। प्रकृति की शक्तियां ही देवतागण है। समस्त प्रपंचों में विद्यमान एक शक्ति की धारणा को ऋग्वैदिक ऋषियों ने अनुभूत किया था। उस आदिम अवस्था में वात नहीं था मरुत् नहीं थे। मरुत् को कोई पैदा भी नहीं किया था। ये मरुत् इस द्युलोक में स्वधया तदेकं यानी अपनी शक्ति से उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्य शक्तियां भी उत्पन्न हुई। प्राण की भौतिक गति अवरुद्ध थी, परंतु उसका अस्तित्व तो था ही। आज जो भी अस्तित्व में है, वे असत काल में शांत हो जाती है। यह शक्ति है जो कभी प्रकट होकर प्रकृति बनती है और अप्रकट होकर शांत यानी असत् बनी रहती है।
सृष्टि में देवी का अर्थ क्या है ? ईश्वर को देवी कहने का भाव है कि जो शक्ति  प्रतिपल सृजन, पालन और संहार कर रही है, उसका स्वरूप स्त्रैण है। मैत्री, दाया, करुणा, प्रेम, श्रद्धा के भाव की प्रकृति स्त्रैण होता है। अगर पुरुष में भी इन गुणों का अभाव है तो वह शिखर की ओर आरोहण नहीं कर सकता है।  सात्विक स्त्रैण गुण से ही जगत और जीवन में उत्कृष्टता आती है। कला, विद्या, साधना और भावना का रूप स्त्रैण है। अतएव उत्कृष्टता का स्वरूप सृजन में दिखता है, पालन में स्थित रहता है और संहार में विराजता है। जो ब्रह्म है, उसमें सृजन, पालन और संहार की शक्ति के कारण ही महादेवी के रूप में अर्चन किया गया। परमात्मा का स्वरूप देवी का है क्योंकि उसकी शक्ति से सृजन का संसार बनता है। परमात्मा अगर देवी नहीं, तो सृजन के बाद उसका पालन, सेवा और जीव में विद्या और कला का ज्ञान कौन भरता ! शक्ति जब विध्वंस करती है तो ईश्वर अपने देवी स्वरूप को ही प्रकट करते हैं। आखिर शक्ति के बिना शिव भी शव बन जाते है।
भारतीय जीवन में देवी की महत्ता अवर्णनीय है। जीवन चक्र का काम त्रिदेव का है लेकिन उसको व्यवस्था देने और नियोजित तरीकें से बढ़ाने का जिम्मा देवियों की शक्ति पर होता है। ब्रह्मा को निर्माण की जानकारी देवी सरस्वती से मिलती है। माता लक्ष्मी का सहचर न मिले, तो विष्णु के लिए पालनकर्म का निर्वहन कठिन हो जाए। शिव इस जगत में संतुलन के लिए संहार की शक्ति एवं प्रेरणा माता गौरी से प्राप्त करते हैं। प्रकृति में ज्ञान का साकार स्वरूप माता सरस्वती है तो प्रकृति में धन, धान्य, रस और संपत्ति का प्रतिरूप माता लक्ष्मी है। माता गौरी की शक्ति ही प्रकृति के जीवन का आधार है। शक्ति सदैव शांत और अज्ञेय रहकर कार्य करती है। सक्रिय देव तत्वों को नियंत्रित करती है। ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर का बायां भाग नारी चेतना का और दायां भाग पुरुष चेतना का हिस्सा होता है। शरीर का दायां हिस्सा को सदैव बायें हिस्सा द्वारा नियंत्रित किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्रोध, गति, ऊर्जा और शक्ति रूपी मनोभाव पर नियंत्रण असंभव होता। यह करुणा, प्रेम, शांति और अहिंसा की स्त्रैण चेतना ही हमारे शरीर को संतुलन भाव में रखती है।
सृजन कर्म को सात्विक ऊजा से भरने और नकारात्मक भावों से शरीर को प्रभावित होने से बचाने के लिए शक्ति जरूरी है। शक्ति ही हमारी क्रियाआंे को स्पंदित रखती हैं। स्पंदन की गति और दिशा का निर्धारण शक्ति का स्वरूप निर्धारित करता है। स्पदंन को प्रभावी बढ़ाने के लिए आत्मा की शक्ति को बढ़ाना होता है। इसके लिए प्रकृति के संक्रमण काल उपयोगी माध्यम है, जब खुद प्रकृति के माध्यम से सृष्टि नवीनता के साथ सहभागी होने के लिए तैयारी करती है। इस हरेक संवत्सर में चार संक्रांति (वसंत, शरद, आषाढ और पौस यानी सूर्य के चार संपात जो मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर में आता है।) के माध्यम से हम खुद को बेहतर के लिए तैयार कर सकते हैं। इस संक्रमण के माध्यम से प्रकृति अपनी अचेतन लयबद्धता के साथ अपनी जीवन शक्ति को बांधती और खोलती रहती है। मौसम परिवर्तन के इन चार कालखंड में प्रकृति का सौंदर्य उत्कर्ष पर होता है, उसकी सृजन या धारण की शक्ति बढ़ जाती है, तब नवरात्र की अवधि आती है। जब सूर्य इक्विनाॅक्स यानी विषुवत् रेखा पर साल में दो बार मार्च और सितंबर में होती है, तब दिन-रात बराबर अवधि की होती है। उस समय वासंतीय और शारदीय नवरात्र मनाते हैं इसी प्रकार जब सूर्य विषवत रेखा से सबसे दूर यानी कर्म और मकर यानी साॅल्सिटस पर होती है, तब धरती के एक भाग में सबसे लंबी दिन तो दूसरे भाग में सबसे लंबी रात्रि होती है। यह स्थिति पृथ्वी पर आषाढ़ के समर साॅल्स्टिस और पौष माह के विंटर साॅल्स्टिस में आती है। दिन-रात की अवधि में असंतुलन के कारण इसे गुप्त नवरात्र के रूप में मनाते है। लेकिन शक्ति के संधान, तपस्या और अंतशक्ति के आरोहण के लिए य संक्रमण काल विशेष लाभकारी और जीवन के लिए उपयोगी होता है।
प्रकृति के इस संक्रमण काल में अंदर-बाहर यानी आंतिरक अंतःशरीर और भौतिक जगत में बदलाव होता है। मौसम के साथ तापमान में उतार-चढ़ाव रहता है। शरीर के प्रतिरोधक शक्ति के संुलतन, आंतरिक शरीर के स्वास्थ्य और आध्यात्मिक सशक्तिकरण के लिए जीवन में शक्ति के नौ गुणों को आत्मसात करना जरूरी होता है। ध्यान, मंत्र, व्रत, संकल्प, आराधना के माध्यम से हम आंतरिक जीवन को बाहर के ब्रह्मांडीय जीवन ऊर्जा के साथ संतुलन कायम करते हैं। इस नव दिन-रात के दौरान तीन दिन तक शरीर और प्राणवायु की शुद्धिकरण और सशक्तिकरण का कार्य करते हैं। यह स्थूल शरीर के पवित्रीकरण का कालखंड होता है। प्रकृति के स्थूल रूपों में परिवर्तन के साथ सौंदर्य और शक्ति का विकास होता है। प्रकृति खुद को सशक्त बनाती है। इसी प्रकार स्थूल शरीर भी हरे संक्रांति में बदलाव के लक्षण दिखते हैं। वैज्ञानिक भी बताते है कि करीब तीन महीने में सारे रक्तकोष नये हो जाते हैं। रक्त के जीवित अणुओं में जीवन और मृत्यु का चक्र कहीं अधिक गति से चलता रहता है। अंतःशरीर के हृास और वृद्धि में संतुलन के लिए संक्रमण के इन दिनों का उपयोग किया जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हरेक त्रैमासिक परिवर्तन शरीर के सारे ढांचे को पुनः नया बनाने में मनुष्य को एक अवसर प्रदान करता है। प्रकृति के इस आशीर्वाद को सकारात्मक दिशा देने का नवरात्र एक माध्यम बनता है।
नवरात्र के पहले तीन दिन स्थूल शरीर के संतुलन का होता है तो अगले तीन दिन में भावनाओं और विचारांें का आरोहण करते हैं। इस दौरान अपने सूक्ष्म शरीर का संयोजन करते हैं। सूक्ष्म शरीर यानी हमारे विचार, हमारी कामनाएं, हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान। इन सभी के एकीकृत स्वरूप का नाम सूक्ष्म शरीर होता है। इस सूक्ष्म यानी बीज को ही हम अपने जीवन की अगली यात्रा पर साथ ले जाते हैं। हमारी आत्मा का वास इस सूक्ष्म शरीर के साथ होता है। हमारी चेतना को ओजस्वी और तेजस्वी बनाने का भी नवरात्र उपयोगी समय होता है। नवरात्र के तीन दिनों में अपनी वासनाओं, इच्छाओं एवं कर्मों को शुभता से जोड़ना लक्ष्य होना चाहिए। सूक्ष्म शरीर की साधना इसलिए जरूरी होती है क्योंकि यह सूक्ष्म शरीर ही पुनर्जन्म का कारण बनता है। सूक्ष्म शरीर के संधान और साधना से ही पुरुष की यात्रा पुरुषोत्तम की ओर होती है।
फिर अंतिम दिन में समूचे व्यक्तित्व को सात्विक दिशा देते है ताकि वह शिवत्व से अपने को एकाकार कर सके। यह तीन दिन स्थूल और सूक्ष्म से आगे की यात्रा का समय होता है। मूलशक्ति के आहवान और जागरण का समय अंतिम दिन में किया जाना चाहिए। स्थूल और सूक्ष्म के बाद आत्मा यानी सत् का संधान जरूरी है। जड़ को सिंचित किया, पत्ते और टहनी को संचित किया, अब बीज को सशक्त करने का समय है। बाहर, एवं अंतर के बाद अनंत की ओर यात्रा के लिए कदम बढ़ाना ही सच्ची नवरात्र की साधना है। इस जगत में दिव्य शक्तियां चारों तरफ है। बाहर, भीतर, नीचे और ऊपर। यानी सर्वत्र। वैदिक मंत्रों में कहा गया है कि देवता और शक्तियों की मित्रता के लिए तप और साधना जरूरी है। तपस्वी को छोड़कर देवता किसी दूसरे के मित्र नहीं होते हैं। (ऋ0 4.13.31)। इसलिए नवरात्र में साधना, प्रार्थना और आराधना स अंतःकरण शुद्ध होता है। दैवी शक्ति की प्राप्ति होगी, धर्माचरण बढ़ेगा और जगत में शुभता बढे़गी।
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डॉ. मयंक मुरारी
संपर्क – [email protected]
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