जब भी कोई नया क़ानून या विनियम समाज में आता है, उसके साथ एक स्वाभाविक बहस भी जन्म लेती है। यह बहस किसी भी लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण होती है। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब बहस का आधार तर्क न होकर भय बन जाए—और वह भय भी उस क़ानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर हो। आज उच्च शिक्षा में लागू किए गए इक्विटी (Equity) आधारित यूजीसी विनियमों के विरोध में जो स्वर उठ रहे हैं, वे इसी भय की उपज हैं। यह भय न तो नया है और न ही निर्दोष।
सबसे पहले हमें यह मूलभूत तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि कोई भी क़ानून बुराई फैलाने के लिए नहीं बनाया जाता। क़ानून का उद्देश्य सदैव किसी मौजूदा या संभावित अन्याय को रोकना, कम करना या समाप्त करना होता है। यदि समाज में भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता जैसी स्थितियाँ मौजूद न होतीं, तो क़ानूनों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? क़ानून समाज की बीमारी का लक्षण नहीं होते, बल्कि उसके उपचार का प्रयास होते हैं।
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “इस क़ानून का दुरुपयोग होगा।” यह तर्क नया नहीं है। यही आशंका कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े POSH क़ानून के समय उठाई गई थी। यही तर्क घरेलू हिंसा, दहेज निषेध तथा अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के समय भी दिया गया था। प्रश्न यह नहीं है कि दुरुपयोग हो सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यौन उत्पीड़न होता नहीं है? क्या जातिगत उत्पीड़न कोई कल्पना है? क्या महिलाओं और वंचित समुदायों के अनुभव महज़ मनगढ़ंत कथाएँ हैं?
यदि किसी क़ानून को केवल इस भय से न लाया जाए कि उसका दुरुपयोग हो सकता है, तो फिर कोई भी क़ानून कभी अस्तित्व में ही नहीं आ पाएगा। चोरी और हत्या जैसे अपराधों के क़ानूनों का भी दुरुपयोग संभव है—तो क्या इन्हें भी समाप्त कर दिया जाए? सही तर्क यह नहीं है कि क़ानून न बनाए जाएँ, बल्कि यह है कि उनके साथ प्रक्रिया मज़बूत हो, जाँच निष्पक्ष हो और दुरुपयोग की संभावना न्यूनतम रखी जाए। यह कहना कि “दुरुपयोग हो सकता है, इसलिए क़ानून ही नहीं चाहिए”—न केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि गहरी असंवेदनशीलता को भी उजागर करता है।
आज जो विरोध सामने आ रहा है, वह प्रायः “समानता” (Equality) के नाम पर किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ये नियम “सामान्य वर्ग” के साथ अन्याय करेंगे। यह तर्क तभी दिया जा सकता है जब हम इक्विटी और इक्वैलिटी के अंतर को न समझें—या समझकर भी स्वीकार न करना चाहें। इक्विटी का आशय यह नहीं है कि सबको एक जैसा दिया जाए, बल्कि यह है कि असमान परिस्थितियों में खड़े लोगों को समान स्तर तक लाने के लिए अलग–अलग सहारा दिया जाए। हमारा समाज ऐतिहासिक रूप से समान नहीं रहा है। जाति, लिंग, विकलांगता और आर्थिक स्थिति जन्म से ही किसी व्यक्ति के अवसरों को प्रभावित करती हैं। यह मान लेना कि सब लोग एक ही रेखा से दौड़ शुरू कर रहे हैं, बौद्धिक ईमानदारी नहीं, बल्कि बौद्धिक बेईमानी है।
यूजीसी के इक्विटी विनियमों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएँ, दिव्यांगजन और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग—सभी को सम्मिलित किया गया है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या महिलाएँ केवल किसी एक जाति की होती हैं? क्या दिव्यांगता किसी वर्ग की जागीर है? और क्या EWS पूरा का पूरा तथाकथित “सामान्य समाज” नहीं है? यदि इन सभी समूहों को साथ लेकर चलने वाला विनियम भी “भेदभावकारी” कहा जा रहा है, तो स्पष्ट है कि समस्या क़ानून में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जो अपने विशेषाधिकार को सामान्य स्थिति मान चुकी है।
यहाँ एक गंभीर दोहरापन भी सामने आता है। जब EWS आरक्षण लागू किया गया, तब शायद ही किसी बड़े आंदोलन या “समानता” की दुहाई सुनाई दी। यदि आज उसके दुरुपयोग के आँकड़े सामने लाए जाएँ, तो यह स्पष्ट होगा कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग उसका लाभ ले रहे हैं जिन्हें वास्तव में नहीं लेना चाहिए था। फिर भी उस समय यह नहीं कहा गया कि क़ानून ही ग़लत है। इसके विपरीत, जब बात SC/ST या OBC की आती है, तो अचानक “मेरिट”, “समानता” और “अन्याय” के स्वर तेज़ हो जाते हैं। यह दोहरी सोच नहीं तो और क्या है?
एक साधारण–सा प्रश्न है—यदि कोई व्यक्ति भेदभाव नहीं करता, उत्पीड़न नहीं करता और सत्ता का दुरुपयोग नहीं करता, तो उसे जाँच या शिकायत तंत्र से डरने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? और यदि कोई यह सब करता है, तो उसके लिए कड़े नियमों का प्रावधान होना ही चाहिए। क़ानून प्रायः उन्हीं को असहज करते हैं जिनके व्यवहार में कहीं न कहीं अनुचित विशेषाधिकार या सत्ता का दुरुपयोग छिपा होता है। आज जो लोग सबसे अधिक शोर मचा रहे हैं, वे अनजाने में यह स्वीकार भी कर रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था उन्हें एक अदृश्य विशेषाधिकार प्रदान करती रही है।
अक्सर यह कहा जाता है कि समाज में परिवर्तन क़ानून से नहीं, चेतना से आना चाहिए। यह विचार आदर्श रूप से आकर्षक है, परंतु पूरी तरह व्यवहारिक नहीं। कुछ व्यक्तियों में विवेक और संवेदनशीलता हो सकती है, वे अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं और दूसरों को प्रेरित भी कर सकते हैं। लेकिन यदि व्यापक सामाजिक विवेक आना होता, तो वह अब तक आ चुका होता। सदियों की शिक्षा, आधुनिकता और विश्वविद्यालयों के बावजूद यदि भेदभाव बना हुआ है, तो यह मान लेना कि केवल नैतिक उपदेश से सब बदल जाएगा, एक भ्रम है। इसलिए सख़्त नहीं, बल्कि स्पष्ट और प्रभावी नियम आवश्यक हैं—ऐसे नियम जो यह संदेश दें कि भेदभाव अब सामान्य नहीं, बल्कि दंडनीय है।
यह भी कहा जा रहा है कि इक्विटी आधारित नियम समाज में खाई पैदा करेंगे। जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है। खाई पहले से मौजूद है। नियम उस खाई को उजागर करते हैं ताकि उसे पाटा जा सके। बीमारी का पता चलने पर दवा को दोष देना बुद्धिमानी नहीं होती। इक्विटी का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा को सुरक्षित करना है—और गरिमा किसी भी सभ्य समाज की न्यूनतम शर्त होती है।
इस प्रकार, यूजीसी का इक्विटी रेगुलेशंस कोई एक बड़ी क्रांति नहीं है, बल्कि एक सहज, सामान्य और आवश्यक सुधार की दिशा में उठाया एक ऐसा कदम है जो बहुत पहले उठा लिया जाना चाहिए था। शायद अब तक विश्वविद्यालयों के प्रांगणों में भेदभाव कम हो चुका होता। इसका विरोध केवल इस आधार पर करना कि “इनका दुरुपयोग हो सकता है”—न तो तर्कसंगत है, और न ही नैतिक। यदि हम वास्तव में समानता में विश्वास करते हैं, तो हमें पहले असमानता को स्वीकार करना होगा और यह भी मानना होगा कि भारतीय समाज की विशेषाधिकार प्राप्त जातियों में असमानता का बीज गहराई तक धंसा हुआ है। हाँ, इतना अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए—जैसा कि प्रत्येक क़ानून के साथ रखा जाना चाहिए—कि यदि कोई इसका दुरुपयोग करे, तो सिद्ध होने पर उसके लिए और भी कठोर दंड का प्रावधान हो।
अतः क़ानून समाज को असहज अवश्य करते हैं, परंतु तभी वे उपयोगी भी होते हैं। क्योंकि जो व्यवस्था सबको सहज लगती है, वह अक्सर किसी न किसी के लिए अन्यायपूर्ण होती है।
प्रोफ़ेसर प्रवीण कुमार अंशुमान
किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय