आज “स्वास्थ्य सेतु” जैसे अत्यंत सार्थक विषय पर बोलने का अवसर मिला है। मैं जानबूझकर ‘हेल्थ’ शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि शब्द केवल ध्वनि नहीं होते, वे दर्शन होते हैं, वे दृष्टि होते हैं। ‘हेल्थ’ कह दीजिए, तो उसका अर्थ प्रायः शरीर की फिटनेस तक सीमित हो जाता है; किंतु ‘स्वास्थ्य’ कहते ही एक गहरी भारतीय परंपरा, एक आध्यात्मिक संवेदना, एक व्यापक जीवन–दृष्टि हमारे सामने उपस्थित हो जाती है। यह शब्द हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल शारीरिक मजबूती का नाम नहीं है, बल्कि एक संतुलित existence है जहां शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य हो। उदाहरण के लिए, पश्चिमी संस्कृति में ‘हेल्थ’ को मापा जाता है BMI, ब्लड प्रेशर या कैलोरी काउंट से, लेकिन भारतीय दृष्टि में स्वास्थ्य एक आंतरिक शांति है जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
इसी संदर्भ में मुझे भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना स्मरण आती है। उनके प्रमुख गृहस्थ शिष्य विमलकीर्ति के पास एक बार किसी ने सहज भाव से पूछ लिया—“आपका स्वास्थ्य कैसा है?” आज भी लोग ऐसे ही पूछ लेते हैं, जैसे कि यह एक सामान्य अभिवादन हो। किंतु कहते हैं कि विमलकीर्ति इस प्रश्न पर अप्रसन्न हो गए। सामने वाला व्यक्ति सहम गया। प्रश्न साधारण था, परंतु उसमें निहित दृष्टि साधारण नहीं थी। क्या स्वास्थ्य कभी ‘खराब’ भी हो सकता है? यदि ‘स्वास्थ्य’ का अर्थ समझ लिया जाए, तो यह प्रश्न ही अपने आप में पुनर्विचार की मांग करता है। यह घटना हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य की अवधारणा में एक गहराई है। एक और उदाहरण लीजिए, महात्मा गांधी के जीवन से। गांधीजी हमेशा कहते थे कि सच्चा स्वास्थ्य शारीरिक नहीं, नैतिक और आध्यात्मिक होता है। वे अपने आश्रम में सादा भोजन, नियमित व्यायाम और ध्यान पर जोर देते थे, लेकिन उनका उद्देश्य केवल शरीर की मजबूती नहीं था, बल्कि आत्म–शुद्धि था। जब वे कहते थे कि “स्वास्थ्य ही धन है”, तो उनका मतलब केवल फिजिकल हेल्थ से नहीं था, बल्कि एक संपूर्ण जीवन से था।
आज हम ‘हेल्थ’ को लेकर इतने सजग हैं—जिम जाते हैं, दौड़ते हैं, सप्लीमेंट लेते हैं, दवाइयाँ खाते हैं, फिटनेस ऐप्स डाउनलोड करते हैं—परंतु क्या सचमुच हम ‘स्वस्थ’ हैं? ‘फिजिकल फिट’ शब्द भी बड़ा रोचक है। क्या कोई मनुष्य पूर्णतः ‘फिजिकली फिट’ हो सकता है? फिजियोलॉजी स्वयं एक अपूर्ण तंत्र है। शरीर में किस क्षण कितना सोडियम, कितना पोटेशियम, कितना कैल्शियम या एल्ब्यूमिन हो—यह एक निरंतर परिवर्तित होने वाली प्रक्रिया है। शरीर में बैक्टीरिया तो होते ही हैं; कब कौन–सा जीवाणु सक्रिय हो जाए, कौन–सी परिस्थिति उसे अनुकूल मिल जाए और वह हमें सर्दी, खांसी, जुकाम या कोई गंभीर रोग दे दे—यह निश्चित नहीं। उदाहरणस्वरूप, आज की व्यस्त जीवनशैली में लोग जिम में घंटों पसीना बहाते हैं, लेकिन काम के तनाव से उच्च रक्तचाप या डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। क्या यह फिटनेस है? या मात्र एक भ्रम? एक और तर्क: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि 70% से अधिक बीमारियां जीवनशैली से जुड़ी होती हैं, लेकिन यदि हम केवल शारीरिक व्यायाम पर फोकस करें, तो मन की अस्वस्थता अनदेखी रह जाती है, जो अंततः शरीर को भी प्रभावित करती है।
इसलिए पहली बात समझनी होगी कि ‘हेल्थ’ भी पूर्ण नहीं है। शरीर का संतुलन सापेक्ष है, क्षणभंगुर है। शरीर एक मेकैनिज्म है, और कोई भी मेकैनिज्म परफेक्ट नहीं होता। जो जन्मा है, वह क्षयमान है। जन्म लेते ही मृत्यु की संभावना साथ चलने लगती है। सौ वर्ष जी ले, तब भी एक–एक क्षण मृत्यु की ओर ही गमन है। यह सत्य हमें भारतीय दर्शन से मिलता है, जहां बौद्ध धर्म में ‘अनिच्चा’ (अनित्यता) का सिद्धांत है। सब कुछ बदलता है, शरीर भी। एक उदाहरण: प्राचीन काल में राजा जनक जैसे विद्वान राजा थे, जो शरीर की नश्वरता को जानते हुए भी राज–काज करते थे, लेकिन उनकी दृष्टि आत्मा पर टिकी थी। आज के समय में, हम देखते हैं कि सेलिब्रिटी या एथलीट कितनी मेहनत से फिट रहते हैं, लेकिन उम्र के साथ उनका शरीर भी ढल जाता है। यह तर्क देता है कि शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर रहना एक सीमित दृष्टि है।
अब आइए ‘स्वास्थ्य’ शब्द पर। यह शब्द यूँ ही नहीं बना। भारतीय भाषाओं—संस्कृत और हिंदी—में शब्द अर्थपूर्ण होते हैं। ‘स्वास्थ्य’ का संधि–विच्छेद करें तो ‘स्व’ + ‘स्थ’ से बनता है—अर्थात् जो ‘स्व’ में स्थित हो जाए, वही स्वस्थ है। ‘स्व’ का अर्थ है—स्वयं, आत्मा, आत्मतत्त्व। इसकी गहराई समझिए: ‘स्व’ वह है जो अपरिवर्तनीय है, जबकि शरीर परिवर्तनशील। इसलिए स्वास्थ्य का अर्थ है आत्मा में स्थिर होना। एक और उदाहरण: रामायण में राम का चरित्र देखिए, वे शारीरिक रूप से मजबूत थे, लेकिन उनकी असली ताकत उनकी आत्म–नियंत्रण और धैर्य में थी। यदि वे केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर होते, तो वनवास की कठिनाइयों में टूट जाते। आयुर्वेद में भी स्वास्थ्य की परिभाषा केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं है। प्रसिद्ध श्लोक है—
“समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमना: स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 15.48)
अर्थात् जिसके दोष, अग्नि, धातु और मल क्रियाएँ संतुलित हों, और जिसकी आत्मा, इंद्रियाँ और मन प्रसन्न हों—वही स्वस्थ है। यहाँ भी देखिए—केवल शरीर नहीं, आत्मा और मन की प्रसन्नता को भी स्वास्थ्य का अंग माना गया है। आयुर्वेद का तर्क यह है कि शरीर के तीन दोष—वात, पित्त, कफ—का संतुलन आवश्यक है, लेकिन यदि मन अशांत है, तो ये दोष असंतुलित हो जाते हैं। उदाहरण: आज की महामारी में, लोग शारीरिक रूप से ठीक थे, लेकिन लॉकडाउन के तनाव से मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ। एक और उदाहरण: चरक संहिता में कहा गया है कि स्वास्थ्य के लिए सात्विक आहार, नियमित दिनचर्या और ध्यान आवश्यक है, जो शरीर से आगे जाता है।
आज हम योग करते हैं। कुछ लोग उसे ‘योगा’ कहते हैं, मानो वह अंग्रेज़ी की कोई कसरत हो। किंतु ‘योग’ शब्द संस्कृत की गहरी परंपरा से आता है। महर्षि पतंजलि कहते हैं—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
(योगसूत्र 1.2)
योग का अर्थ है—चित्त की वृत्तियों का निरोध, आत्मा और शरीर, जीव और ब्रह्म के बीच की दूरी का मिट जाना। योग का लक्ष्य केवल लचीलापन या रोग–प्रतिरोधक क्षमता नहीं है। यदि योग केवल शरीर तक सीमित रह जाए, तो वह अधूरा योग है। योग के आठ अंगों—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—में आसन केवल तीसरा है। बाकी अंग मन और आत्मा से जुड़े हैं। उदाहरण: स्वामी विवेकानंद योग को जीवन की कुंजी मानते थे, और उन्होंने इसे पश्चिम में फैलाया, लेकिन उनका जोर आध्यात्मिक विकास पर था। आज लोग योग को वजन घटाने के लिए करते हैं, लेकिन यदि वे ध्यान नहीं करते, तो लाभ सीमित रहता है। तर्क: वैज्ञानिक अध्ययन दिखाते हैं कि योग से cortisol लेवल कम होता है, जो तनाव कम करता है, लेकिन सच्चा योग आत्म–जागरण करता है।
आज के समय में बहुत–से लोग योग को जिम की तरह करने लगे हैं—बीमारियाँ कम लगें, उम्र लंबी हो, बाल काले रहें, तनाव कम हो—ये सब उपयोगी बातें हैं, परंतु क्या संतों ने योग इसलिए दिया था? उन्होंने योग को शरीर से प्रारंभ अवश्य किया, क्योंकि क्रिया शरीर पर ही करनी थी; किंतु उसकी परिणति आत्मा में होनी थी। एक उदाहरण: आदि शंकराचार्य ने योग को आत्म–दर्शन का माध्यम माना। उनके अनुसार, शरीर एक वाहन है, लेकिन गंतव्य आत्मा है। आज की दुनिया में, कॉर्पोरेट योग क्लासेस लोकप्रिय हैं, लेकिन यदि वे केवल फिजिकल एक्सरसाइज तक रहें, तो योग का सार खो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥”
(गीता 2.23)
यह आत्मा न शस्त्र से कटती है, न अग्नि से जलती है, न जल से भीगती है, न वायु से सूखती है। वह अजन्मा है, अविनाशी है। यदि यह हमारा वास्तविक स्वरूप है, तो स्वास्थ्य का अर्थ केवल मरणधर्मी शरीर की देखभाल कैसे हो सकता है? गीता का तर्क है कि आत्मा अमर है, इसलिए स्वास्थ्य की खोज आत्मा में होनी चाहिए। उदाहरण: अर्जुन युद्धक्षेत्र में शारीरिक रूप से सक्षम था, लेकिन मन की दुविधा से अस्वस्थ था। कृष्ण ने उसे आत्म–ज्ञान देकर स्वस्थ किया। आज के संदर्भ में, लोग धन कमाने में लगे हैं, लेकिन आत्मिक शांति न होने से अस्वस्थ रहते हैं।
यह शरीर तो जन्म से ही मृत्यु की ओर अग्रसर है। जो वस्तु नश्वर है, उसके लिए जीवन भर की साधना क्यों? साधना उस चैतन्य के लिए है, जो शरीर के भीतर है, परंतु शरीर तक सीमित नहीं। एक और तर्क: विज्ञान भी कहता है कि शरीर की कोशिकाएं निरंतर मरती और बनती हैं, लेकिन चेतना स्थिर है। उदाहरण: संत कबीर कहते थे—“काया तो माटी की, आतमा परमात्मा की”—शरीर मिट्टी का है, लेकिन आत्मा ईश्वर की। जब मनुष्य अपने ‘स्व’ को जान लेता है, तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है। आज हम जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं—प्रदूषण, मिलावटी दवाइयाँ, रासायनिक खाद, जल और वायु का विषाक्त होना—इनका मूल कारण केवल बैक्टीरिया या वायरस नहीं है। मूल कारण है—स्वार्थ। जब व्यक्ति अपने को केवल शरीर मानता है, तब वह ‘सेल्फिश’ हो जाता है। वह सोचता है—मुझे लाभ हो, चाहे दूसरे का नुकसान हो। किंतु जब उसे आत्मज्ञान हो जाता है, तब ‘दूसरा’ बचता ही नहीं। उदाहरण: पर्यावरण संरक्षण में, यदि हम खुद को प्रकृति से अलग मानें, तो प्रदूषण बढ़ता है। लेकिन यदि हम समझें कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं, तो संरक्षण स्वाभाविक हो जाता है। एक और उदाहरण: कोरोना काल में, कुछ लोग मास्क नहीं पहनते थे, स्वार्थ से, लेकिन आत्म–जागृत व्यक्ति दूसरों की रक्षा को अपनी रक्षा मानता है। उपनिषद् का वाक्य है—
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
(ईशोपनिषद्, मंत्र 1)
और एक अन्य महावाक्य—
“तत्त्वमसि।”
(छांदोग्य उपनिषद् 6.8.7)
अर्थात् तू वही है। जब यह अनुभव हो जाए कि मैं और तुम भिन्न नहीं हैं, तब चोरी, बेईमानी, शोषण, प्रदूषण—ये सब अपने–आप समाप्त हो जाते हैं। उपनिषदों का तर्क एकता का है: सब कुछ ब्रह्म है। उदाहरण: मदर टेरेसा ने इसी भाव से सेवा की, क्योंकि वे हर व्यक्ति में ईश्वर देखती थीं। आज की राजनीति में, यदि नेता इस दृष्टि को अपनाएं, तो भ्रष्टाचार कम हो सकता है।
आज हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करते हैं—
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
(महाउपनिषद् 6.72)
परंतु यदि आत्मज्ञान नहीं है, तो यह केवल नारा रह जाएगा। जब तक ‘स्व’ की अनुभूति नहीं, तब तक ‘कुटुम्ब’ की अनुभूति कैसे होगी? उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण सम्मेलनों में यह नारा दिया जाता है, लेकिन क्रियान्वयन में स्वार्थ आड़े आता है। तर्क: आत्म–ज्ञान से वैश्विक एकता आती है, जो स्वास्थ्य की कुंजी है।
स्वास्थ्य सेतु का वास्तविक अर्थ यही है—शरीर से आत्मा तक एक सेतु बनाना। शरीर की उपेक्षा नहीं करनी है; किंतु उसे अंतिम सत्य भी नहीं मान लेना है। व्यायाम कीजिए, संतुलित आहार लीजिए, आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा—दोनों का विवेकपूर्ण उपयोग कीजिए; किंतु यह भी समझिए कि पूर्ण स्वास्थ्य ‘स्व’ में स्थित होने से आता है। उदाहरण: डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते थे कि शिक्षा स्वास्थ्य का हिस्सा है, क्योंकि यह मन को प्रसन्न रखती है। ध्यान, योग, आत्मचिंतन—ये सब केवल तकनीकें नहीं हैं; ये आत्मा तक पहुँचने की विधियाँ हैं। जब मनुष्य अपने भीतर झांकता है, अपने व्यवहार का निरीक्षण करता है, अपने विचारों का विश्लेषण करता है—तब वह धीरे–धीरे ‘स्वस्थ’ होने लगता है। एक उदाहरण: ध्यान के वैज्ञानिक लाभ—MRI स्कैन दिखाते हैं कि ध्यान से ब्रेन की संरचना बदलती है, शांति बढ़ती है।
और जब वह स्वयं में स्थित हो जाता है, तब उसके और उसके शरीर के बीच एक सामंजस्य स्थापित हो जाता है। तब शरीर साधन बनता है, साध्य नहीं। तब जीवन संघर्ष नहीं, साधना बन जाता है। तर्क: यह सामंजस्य सामाजिक स्वास्थ्य भी लाता है, जहां व्यक्ति दूसरों के लिए जीता है। अतः ‘हेल्थ’ से आगे बढ़कर ‘स्वास्थ्य’ की ओर चलना होगा। स्वास्थ्य केवल रोग–मुक्ति नहीं; वह आत्म–स्थिति है। वह आत्म–ज्ञान है। वह स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा है। उदाहरण: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में, नेता शारीरिक कष्ट सहते थे, लेकिन आत्मिक दृढ़ता से स्वस्थ थे।
जब यह सेतु बन जाएगा—शरीर और आत्मा के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, मनुष्य और प्रकृति के बीच—तभी हम सच्चे अर्थों में स्वस्थ समाज, स्वस्थ राष्ट्र और स्वस्थ विश्व की कल्पना कर सकेंगे। एक अंतिम उदाहरण: पृथ्वी दिवस पर हम पर्यावरण की बात करते हैं, लेकिन यदि व्यक्तिगत स्तर पर आत्म–जागरण न हो, तो प्रयास व्यर्थ हैं।