Wednesday, February 11, 2026
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प्रो. पुनीत बिसारिया का लेख – बुन्देलखण्ड का सिनेमा

बुन्देलखण्ड अपनी प्राकृतिक सुषमा, समृद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहर के लिए विश्वविख्यात है। यहाँ के नैसर्गिक जलप्रपात, नदियाँ, पहाड़ इत्यादि इसकी सुंदरता का आधार हैं, तो महर्षि वाल्मीकि, अगस्त्य, च्यवन, अपाला, गार्गी, चाणक्य, भवभूति, गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य केशव दास, ईसुरी, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, वृंदावनलाल वर्मा प्रभृति अनेक कवि मनीषी साहित्यकार इस पावन धरा की प्रखर सांस्कृतिक विरासत के अमूल्य संवाहक हैं, वहीं भगवान श्रीराम की वनस्थली चित्रकूट, मैहर स्थित ज्ञान की प्रतीक माँ शारदा का मंदिर, ओरछा में विराजे राम राजा सरकार जू, दतिया का माई पीतांबरा का शक्तिपीठ, उन्नाव बालाजी का सूर्य मंदिर, खजुराहो के चंदेलकालीन मंदिरों की शृंखला, देवगढ़ का दशावतार मंदिर, झाँसी का किला, राजा खेत सिंह खँगार का अजेय गढ़कुंडार दुर्ग, कालिंजर का किला, रनेह, छतरपुर के जलप्रपात, ककरावल, ललितपुर के जलप्रपात, सागर का राहतगढ़ जलप्रपात, पन्ना का पांडव जलप्रपात, चित्रकूट का शबरी जलप्रपात और गुप्त गोदावरी, युधिष्ठिर-यक्ष संवाद का प्रतीक सतना स्थित श्री परमहंस धाकुंडी आश्रम, महोबा का रहिला सागर सूर्य मंदिर, चंदेरी का किला, चित्रकूट के  अनेक धार्मिक स्थल आदि यहाँ की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता के द्योतक हैं।
जहाँ तक फिल्म जगत का प्रश्न है तो वास्तव में भारतीय सिनेमा की पौध बुन्देलखण्ड में ही रोपी गई थीं, लेकिन इसके लिए हमें कालप्रियनाथ अर्थात वर्तमान कालपी नगरी की ओर जाना पड़ेगा, जहाँ पर संस्कृत के महान कवि नाटककार भवभूति के अमर नाटकों  ‘उत्तररामचरितम्’ ‘मालती माधव’ और ‘महावीरचरितम्’ का प्रथम बार मंचन तब हुआ था, जब महाकवि भवभूति स्वयं कालप्रियनाथ नगरी पधारे थे। उत्तररामचरितम्’ की प्रस्तावना में भवभूति ने स्वयं इसका उल्लेख किया है कि कालप्रियनाथ मंदिर की रंगशाला में उनके उक्त नाटकों का मंचन हुआ था, किन्तु कालप्रियनाथ नगरी कहाँ थी, इसको लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं। यद्यपि यहाँ से फिल्मों की जड़ें देखी जा सकती हैं, लेकिन यदि बुन्देलखण्ड में और अधिक निकटस्थ सिनेमाई जड़ें खोजनी हों तो हमें महोबा जिले में स्थित बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहलाने वाले चरखारी नगर की ओर जाना होगा, जहाँ पर भारतीय फिल्म जगत के पूर्वज पारसी थिएटर के सूत्र प्राप्त होते हैं।
यह बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ का वह दौर था, जब आगा हश्र कश्मीरी के नाटकों की पारसी थिएटर में धूम हुआ करती थी और देश के कोने-कोने से लोग उनके द्वारा लिखे नाटकों का मंचन देखने के लिए उत्सुक रहते थे। कश्मीरी साहब स्वयं भी ‘द ग्रेट शेक्सपियर थिएटर कंपनी’ का संचालन कर रहे थे, जो उनके लिखे नाटकों का मंचन किया करती थी। ऐसे में तत्कालीन चरखारी नरेश महाराजा अरिमर्दन सिंह जू देव ने बुन्देलखण्ड की जनता को भी पारसी थिएटर का रसास्वादन कराने के उद्देश्य से चरखारी को पारसी नाटकों का केंद्र बनाने का निश्चय किया और उन्होंने चरखारी में ‘द रॉयल ड्रामाटिक सोसाइटी’ की स्थापना करते हुए यहाँ एक भव्य रंगशाला का निर्माण कराया और उस दौर के पारसी थिएटर के सबसे बड़े लेखक आगा हश्र कश्मीरी को भारी-भरकम रकम देकर चरखारी बुलाया और यहाँ पारसी नाटकों के मंचन कराए। यहीं रहकर कश्मीरी जी ने ‘सीता वनवास’ जैसा उस दौर का अत्यंत लोकप्रिय नाटक तथा ‘राम अवतार’ नाटक लिखे।
यही नहीं, महाराजा चरखारी ने कलकत्ता का मशहूर पारसी थिएटर ‘न्यू अल्फ्रेड कंपनी’ को उस जमाने में डेढ़ लाख की मोटी रकम देकर खरीद लिया था। उन्होंने  सन 1927 में आगा हश्र कश्मीरी के पंद्रह नाटकों के मंचन भगवान गोवर्धननाथ मंदिर के प्रांगण में कराए और 56 हेक्टेयर में विस्तीर्ण लेक व्यू पैलेस में एक भव्य रंगशाला का निर्माण कराया। यह उस जमाने में भारत का तीसरा सबसे बड़ा थिएटर था। यहाँ से बुन्देलखण्ड में भारतीय सिनेमा की पूर्वपीठिका की कहानी पूर्ण होती है। 
सन 1931 में पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ के प्रदर्शित होने के बाद धीरे-धीरे पारसी थिएटर का स्थान सिनेमा लेने लगता है और इस दौर में भी बुन्देलखण्ड भारतीय विशेषकर हिंदी सिनेमा जगत में अपनी छाप छोड़ना शुरू कर देता है। यह कहना अनुचित न होगा कि बुन्देलखण्ड में झाँसी इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ठिकाना बना। 
इसकी शुरूआत 29 सितंबर सन 1909 को झाँसी में एक कुलीन बंगाली हिंदू परिवार में जन्मे शशधर मुखर्जी ने सन 1939 में बॉम्बे टॉकीज के सहनिर्माता के तौर पर ‘कंगन’ फिल्म से की थी। बाद में उन्होंने सन 1943 में अपने साले फिल्म अभिनेता अशोक कुमार और निर्देशक ज्ञान मुखर्जी के साथ मिलकर ‘फिलमिस्तान स्टूडियो’ की स्थापना की और इसके बाद पचास के दशक में स्वतंत्र रूप से ‘फिल्मालय स्टूडियो’ की स्थापना की। उनके द्वारा निर्माता के तौर पर निर्मित फिल्मों में ‘कंगन’, ‘बंधन’, ‘झूला’, ‘सरगम’, ‘हम सब चोर हैं’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘बड़े सरकार’, ‘ज़माना’, ‘दिल दे के देखो’, ‘लव इन शिमला’, ‘हम हिन्दुस्तानी’, ‘एक मुसाफिर एक हसीना’, ‘आओ प्यार करें’, ‘लीडर’, ‘तू ही मेरी ज़िंदगी’, ‘हम कहाँ जा रहे हैं’, ‘तीसरी आँख’ और ‘संबंध’ शामिल हैं। सन 1956 में ‘जागृति’ फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म के  फिल्मफेयर सम्मान से अलंकृत किया गया था। उनके फिल्म जगत में अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने सन 1967 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया था, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि झाँसी में आज शशधर मुखर्जी को शायद ही कोई जानता हो, बल्कि उनके बड़े भाई रवींद्रमोहन मुखर्जी की पौत्री फिल्म अभिनेत्री रानी मुखर्जी को झाँसी के लोग इनसे अधिक जानते हैं।
अशोक कुमार, अनूप कुमार और किशोर कुमार की बहन सती देवी गांगुली इनकी धर्मपत्नी थीं। शशधर मुखर्जी के तीन पुत्र थे-शोमू मुखर्जी, जॉय मुखर्जी और देब मुखर्जी। इनमें जॉय मुखर्जी का जन्म 24 फरवरी सन 1939 को झाँसी में हुआ था। वे अपने समय के मशहूर रोमांटिक अभिनेता थे, जिनकी लोकप्रिय फिल्मों में ‘लव इन शिमला’, ‘हम हिन्दुस्तानी’, ‘एक मुसाफिर एक हसीना’, ‘फिर वही दिल लाया हूँ’, ‘आओ प्यार करें,’ ‘लव इन टोक्यो’, ‘शागिर्द’ और ‘एक बार मुस्कुरा दो’ प्रमुख हैं। इनके भाई शोमू मुखर्जी ने ‘छैला बाबू’, ‘फिफ्टी-फिफ्टी’, ‘पत्थर के इंसान’  और ‘संगदिल सनम’ जैसी फिल्मों की पटकथा लिखी थी तथा इनका निर्देशन भी किया था। शशधर मुखर्जी के तीसरे पुत्र देब मुखर्जी भी एक अभिनेता थे, जो ‘अभिनेत्री’, ‘संबंध’, ‘एक बार मुस्कुरा दो’, ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘कमीने’, ‘दलाल’ और ‘कराटे’ फिल्मों में अभिनय के लिए जाने जाते हैं।
देब मुखर्जी के बेटे अयान मुखर्जी ने अभी हाल ही में ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म का निर्देशन किया था। अयान मुखर्जी द्वारा निर्देशित अन्य महत्त्वपूर्ण फिल्मों मे ‘स्वदेश’, ‘वेक अप सिड’, ‘ब्रह्मास्त्र’ और  ‘टाइगर 3’ प्रमुख हैं। शोमू मुखर्जी ने शोभना समर्थ की बेटी और नूतन की छोटी बहन तनूजा से विवाह किया था, जिनकी बेटियाँ काजोल और तनिशा फिल्म जगत की प्रख्यात अभिनेत्रियाँ हैं। इसी परिवार से आने वाली शरबानी मुखर्जी हिंदी, तमिल, मलयालम और भोजपुरी फिल्मों की अभिनेत्री हैं। ‘बॉर्डर’ इनकी सबसे सफल हिंदी फिल्म रही है।   
  झाँसी में ही जन्मे शशधर मुखर्जी के छोटे भाई सुबोध मुखर्जी ने अपने भाई द्वारा निर्मित फिल्मों ‘मुनीम जी’ और ‘पेइंग गेस्ट’ का निर्देशन किया और इनके अतिरिक्त ‘प्रेम विवाह’, ‘जंगली’, ‘एप्रिल फूल’, ‘साज़ और आवाज़’, ‘शागिर्द’, ‘अभिनेत्री’, ‘शर्मीली’, ‘तीसरी आँख’ और ‘उल्टा सीधा’ जैसी अन्य बैनरों की फिल्मों का भी निर्देशन किया और इनमें से कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। इनके पुत्र सुभाष मुखर्जी ने ‘मिस्टर रोमियो’ नामक फिल्म का निर्देशन किया था।    
कुछ ब्रिटिश अभिनेता भी झाँसी में पैदा हुए थे और उन्होंने अनेक फिल्मों में अपनी प्रतिभा के दर्शन कराए थे। उनमें 04 दिसंबर, 1920 को जन्मे अभिनेता माइकल बेट्स की फिल्म ‘ए क्लॉक वर्क ऑरेंज’ को सन 1971 में चार श्रेणियों में ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया था। इनके अतिरिक्त झाँसी में जन्मे अभिनेता केविन स्टोनी ने ‘द सीजर्स’, ‘क्लाडियस’, ‘द एवेनजर्स’, ‘डॉक्टर हू’ जैसी बड़ी फिल्मों में अभिनय किया है। ये एक ब्रिटिश अभिनेता थे। 
8 जून, सन 1931 को टीकमगढ़ में जन्मे मशहूर हास्य  अभिनेता राजेन्द्र नाथ मल्होत्रा, जिन्हें हम राजेन्द्र नाथ के नाम से जानते हैं, ने कई फिल्मों में यादगार अभिनय किया है, जिनमें ‘दिल दे के देखो’, ‘हम सब चोर हैं’, ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘फिर वही दिल लाया हूँ’, ‘हमराही’, ‘पूरब और पश्चिम’ और  ‘प्रेमरोग’ प्रमुख हैं। उन्होंने टीवी धारावाहिक ‘हम पाँच’ में भी काम किया था। 
हिंदी फिल्मी गीतों की चर्चा इंदीवर का जिक्र किए बगैर पूरी नहीं हो सकती, जिनका मूल नाम श्यामलाल राय था। झाँसी के बरुआसागर में जन्मे इंदीवर के मशहूर फिल्मी गानों में ‘मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया’, ‘जो तुमको हो पसंद’, ‘जीवन से भरी तेरी आँखें’, ‘नफरत करने वालों के’, ‘कसमे वादे प्यार वफ़ा सब’, ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’, ‘चंदन सा बदन’, ‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले’, ‘होंठों से छू लो तुम’, ‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए’, ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’, ‘दुश्मन न करे दोस्त ने’, ‘जब कोई बात बिगड़ जाए’, ‘दुल्हन चली हाँ पहन चली’ के नाम लिए जा सकते  हैं। ‘अमानुष’ फिल्म के अमर गीत ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया था।  
सागर के विट्ठल भाई पटेल ने ‘बॉबी’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘संन्यासी’, ‘विश्वनाथ’ और कुछ अन्य फिल्मों के लिए कुल 55 गीत लिखे थे, जिनमें बॉबी फिल्म का ‘झूठ बोले कौवा काटे’ उनका सबसे मशहूर गीत रहा  है।    
एक और हास्य अभिनेता जगदीप, जिन्हें हम ‘शोले’ फिल्म के सूरमा भोपाली के नाम से जानते हैं, का जन्म दतिया में हुआ था। उन्होंने ‘आरपार’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘अंदाज़ अपना अपना’, ‘पुराना मंदिर’, ‘नगीना’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘शहंशाह’, ‘कुर्बानी’, ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘नागिन’, ‘जानी दुश्मन’, ‘सनम बेवफा’ समेत कई फिल्मों में अपने अभिनय के जौहर दिखलाए थे। ‘एक नारी एक ब्रह्मचारी’ फिल्म में बेहतरीन अभिनय के लिए सन 1972 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया था। 
राज राजेश्वर प्रताप सिंह जूदेव को हम फिल्मी दुनिया में राजा बुंदेला के नाम से जानते हैं। राजा बुंदेला का जन्म ललितपुर के एक राजघराने में हुआ था। वे एक मशहूर अभिनेता, लेखक, निर्देशक और राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने ‘भगत नरसी मेहता’ फिल्म में भगवान श्रीकृष्ण के किरदार से अभिनय की पारी का श्रीगणेश किया और ‘विजेता’, ‘मेरा घर मेरे बच्चे’, ‘अंकुश’, ‘ये वो मंजिल तो नहीं’, ‘मैं आज़ाद हूँ’, ‘स्वर्ग’, ‘शोला और शबनम’, ‘23 मार्च 1931 : शहीद’, ‘डू नोट डिस्टर्ब’, ‘दिल तो दीवाना है’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय प्रतिभा के दर्शन कराए हैं और सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास पर आधारित ‘मुझे चाँद चाहिए’ टीवी धारावाहिक तथा ‘प्रथा’ फिल्म का निर्देशन किया है। आजकल वे पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण के लिए संघर्षरत हैं तथा खजुराहो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एवं ओरछा लिटरेचर फेस्टिवल के संयोजक हैं। उनकी धर्मपत्नी और बुन्देलखण्ड की बहू सुष्मिता मुखर्जी भी फिल्म जगत में सक्रिय हैं। ‘करमचंद जासूस’ टीवी धारावाहिक  में किटी की भूमिका  से चर्चित सुष्मिता जी ने अनेक टीवी धारावाहिकों में अभिनय के साथ साथ ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ ‘प्रतिकार’, ‘घर जमाई’, ‘खलनायक’, ‘रुदाली’, ‘सर’, ‘क्या कूल हैं हम’, ‘गोलमाल’, ‘दोस्ताना’, ‘रक्तचरित्र, ‘कामसूत्र’, ‘1920 लंदन, ‘बत्ती गुल मीटर चालू’, ज़रा हटके ज़रा बचके, पटना शुक्ला जैसी फिल्मों में काम किया है और आज भी फिल्म, टीवी एवं ओटीटी जगत में सक्रिय हैं।  
आशुतोष राणा भी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सन 1967 में जन्मे सागर के आशुतोष राणा ने ‘शिकस्त’ टीवी धारावाहिक से अभिनय की शुरूआत की और ‘तहकीकात’, ‘आहट’, ‘आखिर कौन’, ‘फर्ज’, ‘स्वाभिमान’ समेत कई टीवी धारावाहिकों में अभिनय के बाद ‘दुश्मन’, ‘गुलाम’, ‘जख्म’, ‘संघर्ष’, ‘राज़’, ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’, ‘कलयुग’, ‘रामायण द एपिक’, ‘हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया’, ‘मुल्क’, ‘सिंबा’, ‘हंगामा-2’, ‘सम्राट पृथ्वीराज’, ‘पठान’, ‘फाइटर’ सहित अनेक फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और ओटीटी कार्यक्रमों में काम कर चुके हैं और अभी भी सक्रिय हैं। अभी हाल ही में उन्होंने कवि आलोक श्रीवास्तव द्वारा हिंदी में अनूदित किए गए रावण विरचित ‘शिवस्तोत्र’ का वाचन कर वाहवाही लूटी है। आशुतोष राणा की धर्मपत्नी टीवी कार्यक्रम ‘सुरभि’ फ़ेम  रेणुका शहाणे हैं, जिन्होंने ‘हम आपके हैं कौन’ में माधुरी दीक्षित की बड़ी बहन की भूमिका निभाई थी।  
दमोह में जन्मे सुनील लहरी मशहूर फिल्म अभिनेता और निर्माता हैं, जिन्हें हम टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ के लक्ष्मण के रूप में पहचानते हैं। उन्होंने ‘विक्रम और बेताल’, ‘हमारे राम आए हैं’, ‘जनम कुंडली’ और ‘लव कुश’ में काम किया है। 
इनके अलावा पुराने फिल्म निर्देशक निसार अहमद अंसारी और सिनेमॅटोग्राफर एम बी विजय कुमार ने भी बुन्देलखण्ड से जाकर सिनेमा को अपनी प्रतिभा के दर्शन कराए हैं। एनएसडी की प्रतिभा तथा दूरदर्शन के कार्यकारी निदेशक रह चुके अभिनेता मुकेश सक्सेना बच्चन ने भी बुन्देलखण्ड का नाम फिल्म और टीवी जगत में रोशन किया है।  
आजकल  ‘ड्रीम गर्ल’ फ़ेम लेखक और फिल्म निर्देशक राज शांडिल्य ने अनेक फिल्मों जैसे ‘विकी विद्या का वोह वाला वीडियो’, ‘ड्रीम गर्ल-2’, ‘जनहित में जारी’, ‘लव की अरेंज मैरिज’, ‘वेलकम बैक’, ‘फ्रीकी अली’, ‘भूमि’, ‘भैयाजी सुपरहिट’ और कॉमेडी सर्कस के सभी सीजन  का निर्देशन और इनमें से अधिकांश की पटकथा लिखकर हास्य को नई परिभाषा दी है तो पंछी जालौनवी के गीतों ने प्रेम की नई बयार बहाई है। उनके द्वारा ‘रावन’, ‘बागी-3’, ‘खाप’, ‘दस कहानियाँ’, ‘नहले पे दहला’, ‘टेन’, ‘लाहौर’, ‘एक से बुरे दो’, ‘संकट सिटी’ आदि के गीत लिखे गए हैं। ‘दस बहाने करके ले गई दिल’, ‘दीदार दे’, ‘माइंड ब्लोइंग माहिया’, ‘तू ही मेरे हमनवां’, ‘सुन ज़रा’ उनके कुछ प्रमुख लोकप्रिय फिल्मी गीत हैं।  
इनके अतिरिक्त सुधीर बैसाखिया (मेकअप विभाग-‘वीराना’, ‘मिस्टर नटवरलाल’, ‘आजमाइश’), खलनायक गोविंद नामदेव (‘सौदागर’, शोला और शबनम’, ‘सरदार’, ‘सत्या’, ‘कच्चे धागे’, ‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’, ‘पुकार’, ‘सरफ़रोश’, ‘सत्ता’ आदि), हिंदी, मलयालम, तेलुगु, तमिल फिल्मों के अभिनेता शरद सक्सेना (‘शान’, ‘दोस्ताना’, ‘बाक्सर’, ‘कर्मा’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘शहंशाह’, ‘त्रिदेव’, ‘अग्निपथ, ‘गुलाम’, ‘सोल्जर’, ‘फ़ना’, ‘कृष’, ‘बॉडीगार्ड’, ‘शेरनी’ आदि फिल्में और ‘महाभारत’, ‘कानून’, ‘मैं दिल्ली हूँ’ आदि टीवी धारावाहिक) और मुकेश तिवारी (‘चाइना गेट’, ‘गोलमाल अगेन’, ‘गंगाजल’, ‘रिफ़्यूजी’, ‘घात’, ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’, ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘कसक’, ‘मंगल पाण्डेय’ ‘अपहरण’, ‘गोलमाल’, गोलमाल रिटर्न्स’, ‘आल द बेस्ट’, ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘गोलमाल-3’, ‘दिल तो बच्चा है जी’, ‘खिलाड़ी 786’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘दिलवाले’, ‘मोहल्ला अस्सी’, ‘विकी विद्या का वो वाला वीडियो’), ‘रामायण’ टीवी धारावाहिक के अंगद बशीर खान, अभिनेता अनिल सक्सेना (‘रूप की रानी चोरों का राजा’, ‘लज्जा’, ‘चाइना गेट’, ‘जुदाई’, ‘खलनायक’), राठ मेंजन्मे हप्पू सिंह फ़ेम अभिनेता योगेश त्रिपाठी (‘भाभीजी घर पर हैं’, ‘हप्पू की उलटन पलटन’, ‘जीजाजी छत पर हैं’, एफआईआर), राजा बुंदेला के भाई और सह निर्देशक राम बुंदेला ( ‘रूप की रानी चोरों का राजा’, ‘प्रेम’, ‘हमारा दिल आपके पास है’), हिंदी, बुन्देली, तेलुगु, मलयालम फिल्म निर्देशक, लेखक और अभिनेता आदित्य ओम (निर्देशक-‘संत तुकाराम’, ‘मास्साब’, ‘बन्दूकराज’ ‘पवित्र’ फिल्में तथा अभिनेता-‘भागवत द रिवोल्ट’, ‘आदि पर्वम’, ‘पवित्र’, ‘बंदूकराज’, ‘धनलक्ष्मी आई लव यू’ ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ आदि), फिल्म अभिनेता और निर्देशक देवदत्त बुधौलिया (टीवी धारावाहिक-‘राजा की आएगी बारात’, ‘चिड़ियाघर’ ‘पीटरसन हिल’, ‘इश्क का रंग सफेद’ ‘तेरे शहर में’ ‘यहाँ हैं हम’, ‘सावधान इंडिया’, ‘महादेव’, ‘सिंहासन बत्तीसी’, ‘उतरन’, ज़िंदगी विंस’, ‘नाना नारंगी’; हिंदी फिल्में-‘गणपत’, ‘रावण’, ‘ज़िंदगी एक नशा’; बुन्देली फिल्में-‘ढरकोला, ‘बुन्देली डॉन’, ‘मकान आपको हमाए बाप को’), अभिनेता आरिफ़ शहडोली (टीवी धारावाहिक-‘चिड़ियाघर’, ‘देवों के देव महादेव’, ‘जोधा-अकबर’, ‘महाकुंभ’, ‘एक घर बनाऊँगा’, ‘कृष्ण कन्हैया’, ‘पीटरसन हिल’, ‘रज़िया सुल्तान’, ‘बाल कृष्ण’, हिंदी फिल्म-‘रावण’, ‘सन ऑफ फ्लॉवर’, ‘कजरी’, ‘बूंद-ए ब्लू डायमंड’, ‘गुठली लड्डू’, चकल्लसपुर’ आदि), अभिनेता, लेखक और निर्माता गौरव प्रतीक (‘मिशन रानीगंज’, ‘उफ़ तेरी क्या बात है’, ‘तुम मिले’), टीवी अभिनेता रणदीप राय ( ‘ओ गुजरिया’, ‘ये उन दिनों की बात है’, ‘बालिका वधू’), निर्माता कुलदीप सिन्हा (‘स्मिता’ और ‘फ्रॉम द लैंड ऑफ बुद्धिज़्म टू द लैंड ऑफ बुद्धा’), राम रावत (कास्टिंग निर्देशक-‘लॉस्ट लेडीज’), जय पाराशर (कास्टिंग निर्देशक-’युधरा’, ‘लाल सलाम’, रेयर), शहनवाज़ हुसैन (‘बेपनाह’), कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री कृतिका रवींद्र (‘भूमिगे बंधा’, ‘भगवंत’), अभिनेत्री अनुपमा प्रकाश (‘रिस्कनामा’ और ‘चुहिया’), अभिनेत्री अदिति साँवल (टीवी धारावाहिक ‘दीवानी’, ‘बालवीर’, ‘ए वतन मेरे वतन’, ‘वागले की दुनिया’, ‘कसौटी ज़िंदगी की’, ‘चन्द्रगुप्त मौर्य’, ‘सत्यमेव जयते’), फिल्म अभिनेता एवं सह निर्देशक सुरेन्द्र झा (अभिनेता एवं सह निर्देशक-‘मौका-ए-वारदात’, ‘नवरंगी रे’), अभिनेता और कला निर्देशक भरत चावला (‘जग्गा जासूस’, ‘रंगबाज़’, ‘लव इष्टोरी’, ‘बी फॉर बुन्देलखण्ड’), अभिनेता और निर्देशक शांतनु पाण्डेय (‘कटहल’, ‘लॉस्ट लेडीज’, ‘धड़क-2’, ‘मस्त में रहने दो’), अभिनेता सौरभ शांडिल्य (‘मधुमिता-2022’), अभिनेत्री चाहत पाण्डेय (‘सीआईडी’, ‘लाल इश्क’, ‘नथ जेवर या जंजीर’), पन्ना के अभिनेता इश्तियाक खान (‘फँस गए रे ओबामा’, ‘तमाशा’, ‘भारत’, ‘जॉली एलएलबी’, ‘लूडो’, ‘जनहित में जारी’, ‘अनारकली ऑफ आरा’, ‘द कपिल शर्मा शो’), निर्देशक विशाल मौर्य (‘दमन’, ‘बिजू’, ‘बी फॉर बुन्देलखण्ड’), अभिनेता नेमि चंद्र झा, (‘बी फॉर बुन्देलखण्ड’, ‘वध’), प्रमुख हैं। इनके अलावा ‘लल्लन टॉप’ फ़ेम हिमांशु द्विवेदी और ‘आजतक’ फ़ेम वीडियो पत्रकार ऋचा अनिरुद्ध ने भी फिल्म, टीवी, ओटीटी और वीडियो पत्रकारिता जगत से जुड़कर बुन्देलखण्ड की प्रतिभा के दर्शन कराए हैं। 

प्रो पुनीत बिसारिया
आचार्य एवं पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी
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12 टिप्पणी

  1. प्रोफेसर पुनीत बिसारिया जी का लेख – ‘बुन्देलखण्ड का सिनेमा’ पढ़कर आश्चर्य हुआ कि हमारे बुंदेलखंड के अभिनेताओं से बालीवुड भरा पड़ा है। सिनेमा के हर क्षेत्र में यहां के लोग मिल जाएंगे। लेकिन हम कितना जानते हैं उनको? बहुत कम। आपका यह आलेख बहुत ही शोध पूर्ण है। आपने तो उन जगहों के नाम भी लिख दिए हैं जहां वे जन्मे हैं। यह आपकी गवेषणा को दर्शाते हैं।
    हास्य अभिनेता जगदीप, आशुतोष राणा, हप्पू जी की अल्टन पल्टन वाले योगेश त्रिपाठी, राजा बुंदेला तथा गुठली लड्डू वाले अभिनेता भाई आरिफ शहडोली के अलावा एक दो लोगों को और जान पाए हैं। गीतकार हों या टीवी सीरियल के मुख्य पात्र, निर्माता, निर्देशक मतलब सभी ने बालीवुड को समृद्ध किया है।
    आपने इस लेख में बुंदेलखंड की प्राकृतिक सुषमा से लेकर यहां के किले मंदिर आदि को जगह दी है। इस क्षेत्र को न जानने वाले या कम जानने वाले लोग जब इसे पढ़ेंगे तो समूचा बुंदेलखंड उनके मस्तिष्क में साकार हो उठेगा। थियेटर की शुरुआत भी बुंदेलखंड के कश्मीर माने जाने वाले चरखारी से हुई है। बुंदेलखंड के लिए गौरवपूर्ण बात है।
    बहुत बढ़िया लेख है। पढ़ने की उत्सुकता जगाता है।

  2. मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में बुंदेलखंड के प्रदेय पढ़कर बहुत जानकारी मिली और इसके साथ विद्वान लेखक और अनुसंधाता को भी बहुत बधाई और शुभकामनाएं। विगत वेबिनार में आपने मराठी फिल्मों पर भी अपनी बात से सबको प्रभावित किया था!

  3. आदरणीय प्रोफेसर बिसारिया जी आपने बुंदेलखंड के फिल्मी इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी दी है। बहुत सारे कलाकारों के नाम और काम से तो मैं परिचित था, किंतु इन कलाकारों में से बहुतेरों के विषय में मुझे यह बिल्कुल भी पता नहीं था कि ये कलाकार/ फिल्मकार
    हमारे अपने बुंदेलखंड के ही मूल के हैं।
    रंगमंच / थिएटर के उद्भव और विकास में कालपी और चरखारी जैसे ऐतिहासिक स्थानों का योगदान निश्चित रूप से बुंदेलखंडवासियों के लिए गौरव की बात है।
    आदरणीय बिसारिया जी इसी तरह के एक और बुंदेलखण्ड के फिल्म अभिनेता के विषय में कुछ जानकारी आपसे साझा कर रहा हूँ…
    हमारे अपने सुरीलों के गाँव क्योलारी (जालौन)का फिल्म अभिनेता मेरा भतीजा इंदल सिंह (उपाख्य बाबी) बीते 25 सालों में अनेक फिल्मों में अभिनय कर चुका है। वर्तमान में इंदल सिंह काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे हैं।
    इंदल सिंह के फिल्मी सफर में प्रख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल की “समर”, शंकर की “नायक”, हंसल मेहता की “दिल पर मत ले यार”, गुड्डू धनवा की ‘शहीद’, रजत नैयर की ‘सिर्फ’, योगेश भारद्वाज की ‘सरगना’, विवेक अग्निहोत्री की “बुद्धा इन ए ट्रेफिक जाम”,”ज़िद” तथा “नेहो” आदि शामिल हैं।
    इसके अलावा इंदल सिंह ने कुछ टीवी सीरियलों के माध्यम से भी अपनी पहचान बनाई है। जिनमें ‘कुंती’ सीरियल में प्रमुख किरदार ‘हिम्मत’ के रूप में, “जीना मुश्किल है”, तथा “रिश्ते” सीरियल में फिल्म डायरेक्टर गुलशन कुमार की बेटी खुशाली के साथ हीरो की भूमिका में अभिनय कर चुका है।

  4. बहुत शोध पूर्ण और जरुरी आलेख के लिए साधुवाद. बुंदेलखंड की धरती वीरता और बर्दाश्त के साथ – साथ सिनेमा जैसे लोकप्रिय माध्यम में भी अपनी कलात्मक उपस्थिति के लिए खास स्थान रखता है. पुनीत बिसारिया जी द्वारा प्रस्तुत यह सामग्री अपने आप अत्यंत विशिष्ट है. अद्भुत काम कर रहे हैं बिसारिया जी.

  5. पुरवाई पत्रिका में पुनीत बिसारिया जी का लेख बेहद खूबसूरत और सार्थक बन पड़ा है।फिल्म दुनिया के चितेरों,विद्यार्थियों और शैक्षिक गतिविधियों से संबद्ध जन और युवाओं हेतु नव वर्ष की सौगात से कम नहीं है।
    सटीक और प्रमाणिक जानकारियों से सुसज्जित यह आलेख उन लिखने वाले वालों के लिए भी एक नज़ीर है कि सार्थकता और रोचकता के पुट को केंद्र में रखकर कैसे पाठक को साथ रखा जाए।
    पुरवाई पत्रिका परिवार और आदरणीय संपादक भाई तेजेंद्र शर्मा जी का विशेष आभार जिनके सौजन्य से यह आलेख पढ़ने को मिला।

  6. सम्माननीय पुनीत बिसारिया जी ने, विंध्य क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर, वर्तमान युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़कर उसे संवारने और सशक्त बनाने हेतु प्रेरित किया है।
    उनका यह योगदान सदा याद किया जाएगा।

  7. प्रोफ पुनीत बिसारिया द्वारा रचित बुंदेलखंड की कला संस्कृति और बुंदेलखंड के कलाकारों के योगदान की अनूठी और विस्तृत परम्परा और योगदान का अंवेषणात्मक, गहन अनुसंधान के साथ आलेख बहुत शानदार, ज्ञानवर्धक, अनूठी जानकारी युक्त है.

  8. बुंदेलखंड भूमि से जुड़े सिनेमा से सम्बन्धित लेख से जो जानकारी मिली वह ज्ञानवर्धक है ,यह शोधपूर्ण आलेख गौरान्वित करने वाला है।
    इस लेख के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद

  9. बुंदेलखंड भूमि से जुड़े सिनेमा से सम्बन्धित लेख ज्ञानवर्धक है
    इस लेख के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद

  10. महान साहित्यकार प्रोफेसर डॉ०पुनीत बिसारिया पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी द्वारा हिन्दी सिनेमा पर लिखित बुंदेलखंड के कलाकारों अभिनेताओं, निर्माताओं, निर्देशकों का अतुल्य योगदान का तथ्यपरक आलेख उत्कृष्ट सृजन है । सटीक एवं प्रामाणिक जानकारी का संयोजन भी क्रमबद्ध-व्यवस्थित ,संगुम्फित और विशिष्ट प्रस्तुति करता है । बुंदेलखंड सिनेमा इतिहास में यह आलेख महत्वपूर्ण साक्ष्य सिद्ध होगा ‌ इस श्रमसाध्य आलेख के लिए आपको हार्दिक बहुत-बहुत बधाई ‌ । सादर नमन ।
    भगवान सिंह “राही”

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