Tuesday, March 10, 2026
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संपादकीय – अमरीका में भारतफ़ोबिया

भारतीय मूल के अमरीकी सांसद श्री थानेदार ने कहा है कि अमरीका में हिन्दू-फ़ोबिया बड़ी हद तक महसूस किया जा रहा है। इससे लड़ने की ज़रूरत है। ऐसी नफ़रत के लिये अमरीका में कोई स्थान नहीं होना चाहिये। श्री थानेदार वर्तमान डेमोक्रैटिक सरकार के सांसद हैं। आगामी 20 जनवरी से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपना पदभार संभालेंगे। तब देखना होगा कि उनका रवैया इस मामले में क्या है।

विश्व का हर विकसित देश अवैध अप्रवासियों की समस्या से जूझ रहा है। भारत जैसा विशाल देश, जो विकास की राह पर तेज़ी से अग्रसर है, भी इस समस्या से अछूता नहीं है। अमरीका में डॉनल्ड ट्रंप की सरकार में भारतीय मूल के अप्रवासियों की महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति होने पर वहां भारतीयों के विरुद्ध एक फ़ोबिया सा पैदा होने लगा है। 
दरअसल हुआ कुछ यूं कि नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति ईलॉन मस्‍क को भारतीय मूल के विवेक रामास्‍वामी के साथ मिलकर आने वाली अपनी सरकार में डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी की जिम्‍मेदारी सौंपी। शायद एलन मस्क इससे कुछ बेहतर पद की उम्मीद रखते होंगे। उन्हें बंटी हुई ताकत पसंद नहीं आई होगी क्योंकि वो तो दुनिया की शक्ति का एक विशिष्ट केन्द्र बने हुए हैं। 
सोशल मीडिया पर एक प्रश्नकर्ता की टिप्पणी पर जवाब देते हुए ईलॉन मस्क ने कहा कि एच-1बी वीज़ा टूटा-फूटा है. इसमें सुधार की ज़रूरत है। मस्‍क का दावा है कि जब वे सरकार में आएंगे तो एच-1बी वीज़ा में सुधार के लिए मुख्‍य रूप से दो कदम उठाए जाएंगे… पहला – ‘मिनिमम सैलरी’ फ़िक्‍स की जाएगी ताकि बाहर से आने वाला व्‍यक्ति अमरीका में कम पगार पर काम ना कर सके। दूसरा – एच-1बी वीज़ा पर सालाना ख़र्च जोड़ा जाएगा ताकि किसी विदेशी को काम पर रखने से पहले एम्प्लॉयर कई बार सोचे और स्थानीय नागरिकों को प्राथमिकता दी जा सके।
बहुत बार राजनीतिक नेताओं को इस बात का अंदाज़ा नहीं होता कि उनका वक्तव्य कैसा भूचाल ला सकता है। ईलॉन मस्‍क के बयान के बाद अमेरिका में सियासी भूचाल आता दिख रहा है। जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी के भारतीय मूल के सांसद कर्नाटक के श्री थानेदार ने आरोप लगाया कि जबसे एच-1बी वीज़ा का ‘जिन्‍न’ सामने आया है, उसके बाद से ही हिन्‍दुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर अमेरिकी लोगों द्वारा हिन्‍दुओं के प्रति नफ़रत भरे कमेंट किए जा रहे हैं। साफ़ तौर पर अमरीकियों के मन में हिन्‍दू-फ़ोबिया होने की बात कही गई। 
डोनाल्ड ट्रंप इसी महीने की 20 तारीख़ को यानी कि 20 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। वे प्रवासियों के लिए कड़ी इमीग्रेशन पॉलिसी के पक्षधर रहे हैं। आईसीई (इमीग्रेशन एण्ड कस्टम्स एनफ़ोर्समेंट) ने नवंबर 2024 में यह आंकड़ा जारी किया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में करीब 18 हजार भारतीयों को डिपोर्ट किया जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में रहने वाले 17,940 भारतीय उन 1.45 मिलियन लोगों में शामिल हैं, जिन पर डिपोर्ट किए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है।
हाल ही में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 तक अमरीका में 10.5 मिलियन यानी कि एक करोड़ से भी अधिक अनधिकृत अप्रवासी रह रहे हैं जो कि वहां की आबादी का तीन प्रतिशत है। इन में सबसे अधिक करीब 41 लाख  मेक्सिको, 8 लाख अल-साल्वाडोर, सात लाख पच्चीस हज़ार भारतीय और् सात लाख ग्वाटेमाला के नागरिक हैं।
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, “अक्टूबर 2022 से सितंबर 2023 तक, 96,917 भारतीयों को बिना कागज़ात के अमेरिका में प्रवेश करने के कारण पकड़ा गया। जब से कोविड के बाद सीमाएं खुलीं, अमेरिका में बिना दस्तावेज वाले भारतीयों की संख्या बढ़ गई, वित्तीय वर्ष 2021 में 30,662 और वित्तीय वर्ष 2022 में 63,927 का सामना करना पड़ा। इस वर्ष लगभग 97,000 मुठभेड़ों में से 30,010 कनाडाई सीमा पर और 41,770 दक्षिणी सीमा पर थीं। 
ध्यान देने लायक बात यह भी है कि ईलॉन मस्क खुद भी अपने करियर के शुरूआती दिनों में एच-1बी वीसा पर ही अमेरिका में काम करते थे। बाद में खुद भी इसके बड़े समर्थक बन गए। मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया है कि वे उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने एच-1बी वीजा पर आकर टेस्ला, स्पेसएक्स और इस जैसी सैंकड़ों दूसरी कंपनियों को खड़ा कर अमरीका को मजबूत बनाया है. उन्होंने लिखा है कि इसके समर्थन के लिए वे संघर्ष तक करने को तैयार हैं।
एक तरफ़ जहां अमरीका 18 हजार भारतीयों को निकालने की तैयार कर रहा है। वहीं अमरीकी सरकार ने एक सूची जारी कर भारत पर ग़ैर-मददगार होने का आरोप लगाया है। इस सूची में उन देशों को रखा गया है जो अपने देश से अमेरिका गए लोगों को वापस लाने में सहयोग नहीं कर रहे हैं।
अमेरिकी एजेंसी ICE ने डिपोर्टेशन प्रोसेस (निर्वासन प्रक्रिया) में मदद नहीं करने वाले 15 देशों की लिस्ट बनाई है जिन्हें ‘ग़ैर मददगार’ बताया है। इनमें भारत का नाम भी शामिल है। लिस्ट में अपने नागरिकों की वापसी को अस्वीकार करना और निर्वासन में सहयोग न करने वाले देशों का नाम लिखा है।
आई.सी.ई. के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में 17,940 भारतीय ऐसे हैं जो अवैध प्रवासी हैं। साथ ही इन लोगों को गैर-कानूनी तरीके से अमेरिका में घुसने के लिए जेल में नहीं डाला गया है। ये कागजी कार्रवाई की लंबी प्रक्रिया में फंस गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह प्रक्रिया पूरी होने में 3 साल तक का समय लग सकता है।
बड़े नेता भी कभी-कभी ऐसे बयान दे देते हैं जिससे स्थिति अधिक विकट हो जाती है। हाल ही में अमेरिका के नए राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वो पद संभालने के बाद अमेरिका में पैदा होते ही नागरिकता मिलने वाले अधिकार को ख़त्म कर देंगे।
अमेरिकी संविधान के चौदहवें संशोधन के मुताबिक जो भी बच्चा अमरीका में पैदा होता है, उसे पैदा होते ही अमेरिका की नागरिकता मिल जाती है। भले ही उसके माता-पिता के पास किसी भी देश की नागरिकता हो। डॉनल्ड ट्रंप इस नीति में भी परिवर्तन करने के बारे में सोच रहे हैं। 
भारतीय मूल के अमरीकी सांसद श्री थानेदार ने कहा है कि अमरीका में हिन्दू-फ़ोबिया बड़ी हद तक महसूस किया जा रहा है। इससे लड़ने की ज़रूरत है। ऐसी नफ़रत के लिये अमरीका में कोई स्थान नहीं होना चाहिये। श्री थानेदार वर्तमान डेमोक्रैटिक सरकार के सांसद हैं। आगामी 20 जनवरी से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपना पदभार संभालेंगे। तब देखना होगा कि उनका रवैया इस मामले में क्या है।
जहां तक अवैध रूप से किसी भी देश में किसी भी अन्य देश के नागरिकों का प्रवेश का मामला है उसे किसी भी पैमाने पर सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि भारतीयों के बारे में एक तर्क अवश्य दिया जाता है कि वे जिस देश में भी जा कर बसते हैं, उस देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। टैक्स देने के मामले में और शिक्षा के क्षेत्र में वे हमेशा अग्रणी रहे हैं। मगर जो काम ग़ैर-कानूनी है वो तो ग़ैर-कानूनी ही रहेगा। 
देखना यह है कि अवैध रूप से अमरीका में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों का मामला दोनों देशों के संबंधों पर कैसा असर करता है। भारतीय राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को अपना मित्र मानते हैं। आमतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति डॉनलड ट्रंप को अच्छे मित्रों के तौर पर देखा जाता है। मगर इस उलझे हुए मामले को दोनों नेता मिल कर कैसे सुलझा पाते हैं इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में कहीं छिपा बैठा है। 
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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37 टिप्पणी

  1. जो जहाँ घुस सकता है
    घुस जाता है
    फिर
    और घुसने वालों से
    घबराता है
    आँख चुराता है!
    -nikhil

  2. एक विचार उत्तेजक और समीचीन संदर्भों को फोकस करता हुआ एक संपादकीय। सांसद विशेष श्री थानेदार का उल्लेख बहुत कुछ कहता है आज भारत अपने आप को पहचान कर आत्मनिर्भरता के रास्ते पर निकला है तब तब वहां की मूल संस्कृति और आत्मा भी प्रगति के रास्ते पर है जिसे श्री थानेदार साहब हिंदू फोबिया के नाम से लगभग गाली दे रहे हैं। एक शब्द और एक शब्द है और परिपक्व लोकतंत्र के जिम्मेदार नुमाइंदे से इस प्रकार के टिप्पण या संवाद एक विडंबना के सिवा और कुछ नहीं हो सकते भारत को अन्य 14 देश के साथ गैर जिम्मेदार देश ठहरना भी इसी कूटनीति का एक हिस्सा हो सकता है।
    आमतौर पर भारत के नागरिकों का अमेरिका क्या पूरे विश्व में गैर आपराधिक गैर आतंकी या गैर सामाजिक व्यवहार जैसा कुछ नहीं होता है।
    इसके उल्टे भारतीय मेहनती अनुशासित और अधिक से अधिक सेविंग या संचय करने वाले वैश्विक नागरिकों के रूप में देखे जाते हैं।
    ऐसे में भारत के मूल नागरिकों को हिंदू फोबिया कहना कितना सही है यह अमेरिका में रह रहे बहुसंख्यक लोग इस संपादकीय के बाद समझेंगे हमारे देश में भी ऐसे गैर जिम्मेदार और सत्ता के लिए बेचैन लोग काम नहीं है जो इस बात को निश्चित रूप से टूल देंगे और इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने में कोई कोर्ट का असर नहीं उठा सकेंगे यही बात भाभी राष्ट्रपति जो की 20 जनवरी को शपथ ग्रहण करने वाले हैं उनसे भी अपेक्षित होगी क्योंकि वह अपने पिछले कार्यकाल में भारत के मित्र होने का दम भरते थे और उनकी केमिस्ट्री हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ बहुत ही अच्छी अर्थों में मित्रता मित्रता रूप में देखी जाती थी आप देखें कि वह कैसे अपने मित्रता को निभाते हैं और हिंदू फोबिया जैसी गाली को इग्नोर कर भारत के मित्र के रूप में आगे बढ़ते हैं।

    • भाई सूर्यकांत जी, एक सार्थक और ज़िम्मेदार टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। आपका समर्थन हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है।

  3. त्वरित सम्पादकीय ,सामयिक विषय
    अमेरिका में रह रहे भारतीय युवाओं के लिए ट्रम्प की सोच मुश्किल में डालने वाली तो है।
    फिलहाल अनिश्चितता है।
    Dr Prabha mishra

  4. इन्द्रकुमार दीक्षित, 5/45 मुंसिफ़ कालोनी देवरिया। इन्द्रकुमार दीक्षित, 5/45 मुंसिफ़ कालोनी देवरिया।

    अमेरिका में भारतीय आप्रवासियों के प्रति वहां के लोगों में पनप रहे विरोध और नफरत का प्रभाव दोनों देशों के संबंधों पर असर डालेगा। बहुत ही संतुलित सम्पादकीय।
    सम्पादक जी को हार्दिक बधाई!

  5. पुरवाई का हर संपादकीय विचारोत्तेजक,सूचनापरक और पठनीय होता है। अवैध प्रवासियों की महत्वपूर्ण और समीचीन समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करता यह संपादकीय भी रोचक और सूचनापरक है।
    दरअसल वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद का दौर अब ह्रास की ओर है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को इसका जितना फ़ायदा लेना था ,ले चुके। अब हर विकसित देश संरक्षणवाद में लग गया है। सभी को अपने देश की अर्थव्यवस्था को बचाना है , अपने नागरिकों के लिए रोज़गार के अवसर को सुरक्षित रखना है , स्थानीय उद्योग और कृषि को संरक्षित करना है इसलिए ज़ाहिर है कि इन्हें ऐसे नियम बनाने होंगे जिससे देश में आप्रवासन कम हो। यूएन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में भारतीय प्रवासियों की संख्या लगभग 1.75 करोड़ है जोकि सर्वाधिक है। इसके अलावा अवैध प्रवासी भी हैं । H1 वीज़ा के नियमों के सख़्त होने से भारत का चिंतित होना लाज़िमी है। भारत स्वयं भी अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों की समस्या से जूझ रहा है। इसलिए हमें उन देशों की इस समस्या को भी समझना चाहिए ।

    • तरुण भाई, मैं आपकी लॉजिकल सोच का हमेशा से क़ायल रहा हूं। आपने संपादकीय का विष्लेषण पूरी गंभीरता और परिपक्वता से किया है। हार्दिक धन्यवाद।

  6. तेजेन्द्र सर का संपादकीय – अमरीका में भारत फोबिया। आप अपने संपादकीय में ऐसे विषय लेकर आते हैं जो लोगों से कहीं न कहीं जुड़े मिलते है। सहमत होना या न होना पाठक के ऊपर निर्भर करता है। इस संपादकीय में प्रवासी समस्या है। अमेरिका जैसे विकसित देश में दुनिया के लोग अपने जीवन स्तर को सुधारने हेतु वहां जाते हैं। उनका जीवन स्तर सुधरा भी है। वे जब कब अपने देश आते हैं तो लोगों का उनके प्रति बदला नजरिया दिख जाता है – अरे !विदेश में रहते हैं। बहुत पैसे कमाते होंगे। अगर किसी विशेष क्षेत्र में महारत हासिल है तो उनको लेकर सभा गोष्ठियां आयोजित करवाकर वाहवाही लूटने में पीछे नहीं रहते हैं। कुल मिलाकर उन्हें विशेष सम्मान की नजर से देखा जाता है।
    लेकिन नेता तो नेता ही होते हैं। उन्हें जो कहना होता है कह डालते हैं।भारत फोबिया या हिन्दू फोबिया कहने की क्या जरूरत है। फोबिया शब्द तो उधार का लिया हुआ है। हर किसी पर चेंप देना अच्छी बात नहीं है। इस शब्द को सुनकर लोग सोते से जाग जाते हैं। जहां नफरत न हो वहां भी होने लगती है।
    सीधी बात है नेताओं को इस पर अपनी बात रखनी चाहिए। न कि सनसनी फैलाना चाहिए।हर देश की अपनी सोच होती है। मैंने प्रवासी भारतीयों को हिन्दू जैसे शब्द का टैग लगाते हुए नहीं सुना है कि मैं हिन्दू… कट्टर हिन्दू आदि। एकाध मामले कभी आए हों तो मेरी जानकारी में नहीं है।
    एच-1 वीजा पर तो हम क्या कह सकते हैं, ये तो वहां की सरकार को करना है। हक में फैसला लेगी या विरोध में कहा नहीं जा सकता है।
    सर आपका ये विचार संपादकीय का केंद्र बिन्दु है कि भारत सरकार और अमेरिकी सरकार को मिलकर इस समस्या को सुलझाना चाहिए। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी और डोनाल्ड ट्रम्प में मित्रता है। ऐसा माना जाता है।
    आपकी इस संपादकीय ने अमरीकी सांसद श्री थानेदार जी के विचारों से अवगत कराया जो कि मुझे पसंद नहीं आया।
    प्रवासियों की समस्याओं से अवगत कराने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई सर

    • भाई लखनलाल पाल जी, आप की विशेषता यही है कि आप हर संपादकीय पर अपनी सोच के अनुसार टिप्पणी करते हैं। अपनी बात दो टूक कहने में आप गुरेज़ नहीं करते। आपका हार्दिक आभार।

  7. जिंदगी अजब गजब है बिल्कुल सही बात बढ़िया संपादकीय आदमी सोचने में मजबूर!

  8. मस्क के बयान कभी भी विश्वसनीय नहीं रहे हैं और मुझे नहीं लगता कि ट्रम्प उन्हें राजनीति चलाने देंगे। अवैध तरीके से रह रहे लोग किसी भी देश के लिये बड़ा खतरा हो सकते हैं तो इस पर अमेरिका को एक्शन लेने का पूरा अधिकार है । रहा सवाल हिन्दू फोबिया का तो ट्रम्प जैसे व्यावसायिक सोच के व्यक्ति ऐसा कुछ नहीं होने देंगे तो कनाडा में ट्रूडो ने हिंदुओं के साथ होने दिया और आखिर अब अपने ही देश के इतिहास के सबसे खराब प्रधानमंत्री माने जा रहे हैं । धीरे धीरे अमेरिका क्या समूचा विश्व समझेगा कि हिन्दू से किसी को कोई खतरा नहीं है ,हिन्दुफोबिया एक वहम साबित होगा । बाकी “सन ऑफ सोयल” (भूमिपुत्र) का मुद्दा तो दुनिया के हर देश और राज्य में मौजूद है । हमारे संविधान और सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को नहीं माना है मगर राज्यों में हमले जब तब होते रहते हैं बाहर से आये लोगों पर। बढ़िया सम्पादकीय है । बधाई व साधुवाद

    • दिलीप आपकी टिप्पणी संपादकीय को बेहतरीन अर्थ प्रदान करती है। हम आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा करते हैं।

  9. भारत अमेरिका के कूटनीतिक संबंध किस दिशा में बढ़ रहे हैं, समझ के परे हैं। प्रचारित यह किया गया है कि ट्रंप और मोदी के बीच अनौपचारिक स्तर की मित्रता है मगर ट्रंप के शपथ समारोह में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया है बल्कि शीजिनपिंग आमंत्रित हैं। अंबानी कैंडिललिट डिनर जरुर करेंगे और इसके लिये उन्होंने कितने करोड़ डालर का सौदा किया होगा वही जानते हैं। ट्रंप एक चालाक राजनेता है और उतना सहज नहीं जितना भारतीय समझते हैं। कल के बाद वह अपने पत्ते खोलेगा। उसका नारा रहा है, अमेरिका फर्स्ट। भारत को बहुत भरोसा उस पर नहीं करना चाहिए। रुस हमेशा भारत का प्राकृतिक दोस्त रहा है। इसे नहीं भूलना चाहिए।

  10. अमेरिका में भारतीय मूल के लोग सभी क्रीमी लेयर हैं जिन्हें भारत में वह स्थान नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था इसीलिए तो उन्होंने अमेरिका की तरफ किया। अमेरिका देश को सशक्त बनाने में वहां रहने वाले सभी भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है इस बात को भुलाया नहीं जा सकता।
    शुभकामनाएं

  11. अत्यंत महत्वपूर्ण एवं विचारणीय संपादकीय। हिंदु -फोविया… ऐसा तो हमेशा सबको लगता है… यहाँ रहनेवाले अन्य लोगों को भी यह फोविया है। यह तो सही है कि विदेश में रहने वाले भारतीय उस देश की अर्थ व्यवस्था में अपना सहयोग दिया है। यह हिंदु फोविया जैसी सोच दूर हो जाए तो दोनों देशों की मित्रता में और गहराई आ जाएगी।

    साधुवाद

  12. हिंदू फोबिया आज का नहीं सैकड़ों वर्षो पूर्व का है। अगर ऐसा न होता तो भारत पर विदेशी आक्रांताओं के द्वारा बार-बार आक्रमण न होते, हिन्दुओं की संस्कृति को कुचलने के साथ उनके आचार विचारों पर उन्हें हीनता के बोध से ग्रस्त न कराया जाता। पुरातन वेदों और साहित्य के समूल नाश के लिए विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को न जलाया जाता।

    यह तो मुगलों और अंग्रेजों के समय की बात है किन्तु आजादी के बाद भी वामपंथी विचारधारा के लोगों ने हिन्दुओं को उनकी हीनभावना से उबरने नहीं दिया।

    हिंदू सबसे सहिष्णु है तथा सभी धर्मो का आदर करने वाला धर्म है। हिंदू फोबिया कहकर उसे अपमानित करना ही है। आपने भी अपने आलेख में कहा है कि हिंदू जिस देश में भी जाकर बसते हैं, उस देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। टैक्स देने के मामले में और शिक्षा के क्षेत्र में वे हमेशा अग्रणी रहे हैं। शायद इसी के मद्देनज़र अमेरिकी राज्य जॉर्जिया ने हिंदू फोबिया की निंदा करने वाला प्रस्ताव पारित किया है। प्रस्ताव पारित करते हुए जॉर्जिया की असेंबली में कहा गया कि हिंदू धर्म ने बड़ी संख्या में लोगों का जीवन सुधारा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। यह एक सकारात्मक पहल है।
    आशा है इस बात को अन्य देश भी समझेंगे।
    इस विषय पर आलेख लिखकर आपने लोगों को चिंतन मनन करने का कार्य किया है। साधुवाद आपको।

    • सुधा जी, आपने सही कहा है कि “जॉर्जिया की असेंबली में कहा गया कि हिंदू धर्म ने बड़ी संख्या में लोगों का जीवन सुधारा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। यह एक सकारात्मक पहल है।” – “आशा है इस बात को अन्य देश भी समझेंगे।”

      इस बेहतरीन टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।

  13. Your Editorial of this Sunday points out how Indians will be at a disadvantage if this proposed policy will come into effect.
    A pointer for those Indians who plan settling there.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  14. जितेन्द्र भाई: इस कथन में दो मत नहीं है कि, चाहे अपनी मरज़ी से या फिर ज़ोर ज़बरदस्ती से, भारत से बाहर जहाँ जहाँ भी भारतीय जाकर बसे हैं या बसाये गए हैं वहाँ पर वो अपनी कड़ी महनत से सफ़ल हुए हैं। आज के माहॉल में अमरीका की जितनी भी बड़ी बड़ी कम्पनियाँ हैं वहाँ पर, दूसरे और देशों के मुकाबले में, अधिकतर भारतीय ही मिलेंगे। इन सभी कम्पनियों की मैनेजमैण्ट ने भारतियों में कुछ तो देखा होगा जो अपनी कम्पनियों की पूरी बागडोर इनके हाथों में देदी।अब ऐसे माहॉल में जब भारतीय अच्छी अच्छी पोज़ीशन पर होंगे तो जैलसी तो अवश्य ही होगी।
    मुझे श्री थानेदार, जो डैमोक्टिक पार्टी से जुड़े हुए हैं, की बातों में कोई दम नहीं लगता। इलैक्शन के टाईम पर भारतफ़ोबिया की बात उठाना कोई political stunt तो नहीं है। 20 जनवरी को मैं ने ट्रम्प की पूरी स्पीच सुनी थी। उसने अप्रवासियों को निकालने की बात ज़रूर कही थी लेकिन कहीं भी उसने भारत के ख़िलाफ़ कोई बात नहीं कही। वर्तमान अमरीका के जो हालात हैं उनका सब को पता है। उसने इन सब में सुधार लाने की बात कही थी। वैसे जितेन्द्र भाई, सब के अपने अपने विचार हैं। 1947-2014 तक के भारत के हाल देखकर और मोदीजी के आने पर मेरा सदा यह मत रहा है कि मोदीजी एक मसीहा है और भारत के हालात को यही ठीक कर सकते हैं। अब ट्रम्प-2 के बारे में भी मेरी यही राय है कि अगर अमरीका की बिगड़े हालातों को कोई ठीक कर सकता है तो वो केवल ट्रम्प ही है। बाकी समय बताएगा कि ट्रम्प-2 मसीहा है या फिर एक खलनायक। बाकी रहा भारत की भारतफ़ोबिया की बात। सो अभी तेल देखो, तेल की धार देखो। ऊंट किस कर्वट बैठता है और ट्रम्प-२ क्या क्या गुल खिलाता है, सब सामने आजाएगा।

    • विजय भाई, आपने सही है कि – समय बताएगा कि ट्रम्प-2 मसीहा है या फिर एक खलनायक। बाकी रहा भारत की भारतफ़ोबिया की बात। सो अभी तेल देखो, तेल की धार देखो। ऊंट किस कर्वट बैठता है और ट्रम्प-२ क्या क्या गुल खिलाता है, सब सामने आजाएगा। –

      इस सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  15. आपका संपादकीय पढ़ने के उपरांत अमेरिका की नीति और भारतीयों के प्रति उसके व्यवहार की सही जानकारी मिली। ट्रंप मोदी के मित्र माने जाते हैं मोदी का दौरा भी प्रस्तावित है। देखिए आगे दोनों देशों का संबंध क्या रुख पकड़ता है। महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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