Wednesday, February 11, 2026
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राजेन्द्र सिंह गहलौत का शोध लेख – लोकजगत के अल्पशिक्षित वर्ग की पाठकीय अभिरुचि और साहित्य

 लोकजगत के सृजन को संग्रहित, सुरक्षित तथा विश्लेषित करने का महत्वपूर्ण कार्य साहित्य में जितना भी किया जा रहा है वह महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय है । लोकगीतों एवं लोक कथाओं को ही नहीं लोकजगत की परंपराओं, रीति-रिवाजों, जीवन दर्शन को भी लोकप्रेमी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं, अपनी पुस्तकों में संग्रहित एवं विश्लेषित किया हैं । लोकगीतों एवं लोक कथाओं का अधिकांश स्रृजन वाचिक स्वरुप में ही था वे गीतों में गाई जाती थी तो कथाओं मे कही सुनी जाती थी । लोकप्रेमी साहित्यकारों द्वारा उन्हें लिपिबद्ध कर सुरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है और लगातार किया जा रहा है । लेकिन लोक जगत में ग्रामों एवं कस्बों में एक अल्प शिक्षित वर्ग है जो कि बाल्यकाल में मात्र प्राथमिक कक्षाओं तक पढ़ लिख कर युवा होते ही खेती किसानी या अन्य जीविकोपार्जन कार्य में लग गया । क्या उस वर्ग में  अपनी खेती किसानी या अन्य जीविकोपार्जन के कार्य के बाद बचे हुये समय में पुस्तक अध्ययन के प्रति अभिरुचि है ? यदि उसमें पाठकीय अभिरुचि है तो वह क्या पढ़ना पसंद करता है  ? उसकी अभिरुचि के अनुकूल पुस्तकें किनके द्वारा लिखी एवं प्रकाशित की जा रही है ? वह जिन पुस्तकों को पढ़  रहा है उनकी विषय वस्तु क्या है तथा साहित्य में क्या उनका कोई स्थान है ? आदि पहलुओं पर संभवतः वर्तमान साहित्य में न तो कोई ध्यान दिया गया है और ना ही इस बाबद किसी शोध कार्य का ही कोई उल्लेख मिलता है । जबकि लोकजगत की अल्प शिक्षित वर्ग की महिलाओं में अल्प शिक्षा का प्रमुख कारण इस पुरानी मान्यता के तहत रहा कि लडकियों को घर गृहस्थी का काम करना है अतः अधिक पढ़ाने लिखाने से क्या फायदा, चिट्ठी पत्री लिखना आ जाये गीता रामायण पढ़ कर सुना दे बस इतना ही पर्याप्त है , अधिक पढ़ाने-लिखाने से अधिक पढा लिखा लड़का भी ढूंढना पड़ेगा आदि। फिर भी परिवेशानुसार उनमें पुस्तक अध्ययन की रुचि थी तथा उनकी रुचि के अनुरूप भी पुस्तकें लिखी जा रहीं थी ।      
                    यदि भविष्य में कभी लोकजगत के अल्पशिक्षित वर्ग की पाठकीय अभिरुचि और साहित्य के संबधों की खोजबीन करते हुये कोई अन्य शोध कार्य किया जाता है तो उसके लिये सिर्फ “ बुक वर्क” ही नहीं “फील्ड वर्क” भी जरुरी होगा । तदहेतु ग्रामीण अंचल में 50 वर्ष से अधिक उम्र के स्त्री पुरुषों के हर वर्ग तथा सम्प्रदाय से प्रतिनिधि व्यक्ति का चयन कर, एक प्रश्नावली तैयार कर उसके माध्यम से उनका साक्षात्कार ले कर इस बाबद जानकारी एकत्र की जानी चाहिए । जिससे कि यह पता चले कि वे अपनी किशोरावस्था एवं युवावस्था में किस तरह की पुस्तकें पढ़ते थे तथा क्या वे अभी भी पुस्तकें पढते है ?  इस भांति के फील्ड वर्क से शोधकर्ता को अपने क्षेत्र के लोक जगत की पाठकीय अभिरुचि की जानकारी मिल सकती है ।
                               यद्यपि लोकजगत के अल्पशिक्षित स्त्री पुरुषों के बीच पुस्तक अध्ययन की रुचि लोकजगत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साधनों (टी वी, मोबाइल आदि) के प्रभावी होने तक ही पूरी तरह बरकरार रही बाद में काफी हद तक प्रभावित हुई लेकिन अभी भी उनकी अभिरुचि के अनुरूप पुस्तके कस्बों के धार्मिक पुस्तक विक्रेताओं तथा ग्रामों के मेलों एवं हाट बाजारों में विक्रय होती दिखलाई पड़ती है । यदि इस वर्ग के स्त्री एवं पुरुषों के मध्य पढ़ी जाने वाली पुस्तकों का उनकी विषय वस्तु के आधार पर आंकलन करें तो पता चलता है कि धार्मिक पुस्तकों रामायण, गीता, आल्हा आदि  तथा तंत्र मंत्र, जादू (बड़ा इन्द्रजाल, चमत्कारिक मंत्र, यंत्र, तंत्र एवं टोटका आदि), ज्योतिष(हस्त सामुद्रिक विज्ञान, भारतीय कुंडली दर्पण आदि)स्वास्थ्य एवं चिकित्सा( भैषज्य रत्नावली, आरोग्य प्रकाश, इंजेक्सन गाइड, चरक संहिता,जड़ी बूटी विज्ञान, इजाजुल गुरवा, बंगसेन संहिता, स्त्री रोग चिकित्सा आदि), यौन शिक्षा ( कोका पंडित द्वारा रचित असली कोकशास्त्र), पत्र लेखन कला, कुटीर उद्योग प्रशिक्षण आदि से संबंधित पुस्तकों के अलावा कहानी किस्सा, नाटक नौटंकी, कविता गीत गजल शेर ओ शायरी आदि पर केन्द्रित पुस्तकों के अध्ययन के प्रति भी उनमें रुचि  है । जबकि लोक जगत की महिलाओं मे धार्मिक एवं व्रत त्यौहार की जानकारी देने वाली पुस्तकों तथा घर गृहस्थी स्त्री सुबोधनी जैसी पुस्तकों के अतिरिक्त कविता, भजन, विवाह गीत, किस्सा कहानी आदि की पुस्तकों के अध्ययन के प्रति भी रुचि है ।
                      लोकजगत के अल्पशिक्षित वर्ग द्वारा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में से हम  सिर्फ किस्सा कहानी  वाली पुस्तकों पर ही ध्यान केंद्रित करें तो पता चलता है कि उनकी अभिरुचि जादू तिलस्म, दैत्य दानव, परी, प्रेम प्यार इश्क, स्त्री पुरुष बेवफाई, विचित्र वृत्तान्त, हास्य आदि पर ही अधिक केन्द्रित है तथा इसी के अनुरूप इन पुस्तकों के कथानकों का ताना बाना बुना गया है तथा पात्रों का चयन किया गया है । यद्यपि हिंदीभाषी हर प्रांत की अपनी कुछ अलग ही पुस्तकें हैं जो लोकजगत में पढी जाती है लेकिन कुछ ऐसी पुस्तकें हैं जो कि लगभग हर हिंदीभाषी प्रान्तों के लोक जगत के बीच लोकप्रिय है । उन में से विचित्र वृत्तान्त कथाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी, किस्सा हातिमताई, किस्सा गुलबकावली, अलीबाबा और चालिस चोर, सिंदबाद की यात्रा, अलाउद्दीन का  जादूई चिराग आदि है । स्त्री पुरुष बेवफ़ाई के कथानक वाली पुस्तकों में किस्सा तोता मैना, राजा भरथरी (भर्तृहरि ) रानी पिंगला, किस्सा गुल सनोवर आदि है । जबकि प्रेम सबंधों वाले  कथानकों की पुस्तकों में नल दमयंती, राजा ढोलन रानी मारू, किस्सा सारंग सदावृज, किस्सा केशर गुलाब आदि है तथा हास्य में अकबर बीरबल विनोद, लाल बुझक्कड एवं चुटकुलों की पुस्तकें हैं। इनके अलावा  किस्सा साढ़े तीन यार, किस्सा गुल बकावली, लालमन सुग्गा, त्रिया चरित्र, तिलस्मी मैना, चांद सौदागर की कहानी, सात तिलस्मी परिया, हंसता पान बोलती सुपारी, सोने का पेड़, हीरे की खेती, बोलता मुर्दा रोता मसान, चांदी की राजकुमारी, तिलस्मी गलीचा, पिसाचनी चन्द्र हास, तिलस्मी तोता आदि पुस्तकों का नाम लिया जा सकता है । इन पुस्तकों में से कुछ के कथानक अलिफ  लैला (अरेबियन नाइट्स) से लिये गये है तो कुछ के संस्कृत में लिखे ग्रंथों से जबकि इनमें से बहुत  सारी पुस्तकें लोक जगत के ही लेखकों द्वारा लिखी गई है । इस तरह की पुस्तकों के लोकजगत के लेखकों में से ठाकुर प्रसाद मिश्रा “दीवाना” गोरखपुर, रामदेव पांडेय “पिछउरा” प्रतापगढ़, दुर्गाशंकर त्रिवेदी, बाबू महादेव प्रसाद सिंह नाचाप जिला आरा, निशिकर आदि का नाम लिया जा सकता है । जबकि इन पुस्तकों के प्रमुख प्रकाशकों में ठाकुर दास एण्ड संन्स कचौड़ी गली बनारस,श्री लोकनाथ पुस्तकालय 173,महात्मा गांधी रोड कलकत्ता 7, लाला श्याम लाल हीरालाल श्याम काशी प्रेस मथुरा, बंबई पुस्तकालय एवं दुर्गा पुस्तक भंडार  527 ए /2 कक्कड  नगर , दरियाबाद इलाहाबाद ब्रांच जानसेनगंज इलाहाबादभोलानाथ पुस्तकालय  135, महात्मा गांधी रोड कलकत्ता 7, एन एस शर्मा गौड़ बुक डिपो  पं. नथाराम मार्ग हाथरस आदि है ।
               अलिफ लैला अरबी भाषा के अल्फ लैला का अपभ्रंश है अल्फ यानी एक हजार तथा  लैला यानी रात यानी  एक हजार रातों की कहनियां (अरेबियन नाइट्स) तथा यमन के दानी बादशाह हातिमताई की हुश्न बानो के सात प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की हैरतअंगेज कहानियां पूरे विश्व में लोकप्रिय है। उन पर कई फिल्म एवं टी वी सीरियल बन चुके हैं तथा कई भाषाओं में उनके कथानक पर पुस्तके लिखी गई है फिर भला लोकजगत का यह अल्पशिक्षित वर्ग कैसे उनसे अछूता रह पाता । लोकजगत के कहानीकारों ने इन क्रृतियो के सरल भाषा में पठनीय संस्करण उनके अध्ययन हेतु उपलब्ध कराये जो उनके मध्य लोकप्रिय हुये । किस्सा हातिमताई की तरह ही  किस्सा गुल बकावली, शाहजादा ताजुलमलूक द्वारा एक ऐसे फूल को लाने की हैरतअंगेज कहानी है जो ईरान के बादशाह जैनुअल मलूका की अंधी आंखों का इलाज  था । कहानी में बिल्ली के सिर पर चिराग रख कर जुंआ खेलने वाली वेश्या , परी बकावली, परी रूह अफजा, देव  आदि का ज़िक्र  है तथा चौबिस दास्तानों में कहानी बया की गई है । कहानी की भाषा उर्दू मिश्रित है तथा उसमे शैर, बैत आदि संवादों में प्रयुक्त किये गये हैं । यह पुस्तक भी लोकजगत में लोकप्रिय है ।    
                       जबकि लोक जगत में संस्कृत साहित्य से  हिन्दी में अनुवादित कर ली गई लोकप्रिय पुस्तकों में प्रमुख बेताल पच्चीसी एवं सिंहासन बत्तीसी हैं। बेताल पच्चीसी संस्कृत साहित्य में सिंहासन बत्तीसी से पहले लिखी गई थी तथा संस्कृत में उसे बेताल भटृराव ने बेताल पंचविशंतिका नाम से लिखा था । बेताल भटृराव महाराजा विक्रमादित्य के नौ रत्नों में से एक थे । बेताल द्वारा महाराजा विक्रमादित्य को सुनाई गई इन पच्चीस कहानियों के संकलन का अनुवाद कई भाषाओं में किया गया । बेताल पच्चीसी की ही भांति सिंहासन बत्तीसी भी मूलतः संस्कृत में लिखी गई थी । जिसका उत्तरी संस्करण सिंहासन द्वात्रिंशति तथा दक्षिणी संस्करण विक्रम चरित के नाम से उपलब्ध है जिसे क्षेमेंद्र मुनि ने लिखा था । इसे द्वात्रिंशत्पुत्तलिका के नाम से भी जाना जाता है तथा बंगाल   में  भटृराव ररुचि द्वारा लिखा इसका संस्करण मिलता है । राजा भोज द्वारा टीले की खुदाई मे मिले विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियो द्वारा विक्रमादित्य की शूर वीरता , दान एवं न्याय शीलता की कहानियां उन्हें सुनाई जाती है तथा 32वी पुतली रानी रुपमती के निर्देशानुसार  राजा भोज सिंहासन पर बैठने का इरादा त्याग कर पुनः सिंहासन को जमीन में गडवा देते हैं । हिंदी  में सिंहासन बत्तीसी एवं बेताल पच्चीसी का अनुवाद लल्लूलाल द्वारा किया गया था । संभवतः लोकजगत में विक्रय की जाने वाली इन  दोनो पुस्तकों की भाषा एवं स्वरुप को सरलीकृत एवं लोकोपयोगी बनाने के प्रयास में लोकजगत के लेखकों द्वारा इनमें थोड़ा बहुत परिवर्तन किया गया है लेकिन कथानक  मूलतः वहीं है ।ये दोनों कृतियां लोकजगत में अत्यंत लोकप्रिय होने के साथ ही साहित्य में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है ।
                     सिंहासन बत्तीसी एवं बेताल  पच्चीसी की ही भांति स्त्री पुरुष बेवफ़ाई की कहानियों में किस्सा तोता मैना अत्यंत लोकप्रिय है। इसके मूल लेखक के बतौर पं. रंगीलाल के नाम का उल्लेख मिलता है । यह पुस्तक 8 खंडो में विभक्त है जबकि कुछ प्रकाशकों ने इसे 24 खंडों में भी विभक्त किया है । इसके कथानक में बरसात से बचने हेतु एक तोता उस वृक्ष में आश्रय लेता है जिसमें एक  मैना का निवास है । मैना उसके आगमन पर एतराज़ करती है तथा पुरुषों की बेवफाई की बात  करते हुये उनकी बेवफाई की कहानियां सुनाती है ज़बाब में तोता स्त्रियों की बेवफाई की कहानियां सुनाता है । इन कहानियों के पात्रों द्वारा भी कहानियां सुनाई जाती है, इस भांति कहानियों का रोचक सफ़र चल पड़ता है । इन कहानियों में पात्रों के संवादों में शैर, रेख़्ता,  दोहा, सवैया, छप्पयकवित्त, चौपाई, रागिनी गिरनारी, ठुमरी, गीत, गजल, झुलना सभी का प्रयोग किया गया है । साहित्य में भी गद्य एवं पद्य का मिश्रित प्रयोग चंपू काव्य के तहत किया गया है । इन कहानियों के पात्र हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सम्प्रदाय के है तथा पात्रोंनुकूल परिवेश तथा भाषा भी कहानियों में प्रस्तुत होती है । कहानियों के अंत में हंस द्वारा यह कह कर समझौता कराया जाता है कि दुनिया में हर स्त्री पुरुष एक जैसे नहीं होते तथा तोता मैना का विवाह करवा दिया जाता है । तोता मैना की ये कहानियां इतनी लोकप्रिय हुई कि लोक जगत में इनकी पुस्तकें पढ़ी जाने के साथ ही यू ट्यूब पर इन कहानियों को गद्य एवं पद्य के मिश्रित स्वरुप में कई लोक गायकों ने प्रस्तुत किया जिनमें से ब्रृजेश सास्त्री का नाम महत्वपूर्ण है ।  लोक जगत में तोता मैना की कहानियों की लोकप्रियता का यह आलम है कि समद में तोता मैना की कब्र भी मिलती है जिसे किसने बनवाया पता नहीं चला । वर्तमान साहित्य में स्त्री विमर्श में कई कहानियां पुरुषों की बेवफाई एवं नारी उत्पीड़न की दिखाई पड़ती है तो ज़बाब में पुरुष विमर्श में भी पुरुष शोषण की कहानियां दिखलाई पड़ने लग गई है जबकि रविंद्र कालिया के संपादन में भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय का सुपर बेवफाई विशेषांक दो खंडों में प्रकाशित हुआ था जिसका समापन “ छिनार प्रकरण “ से हुआ । लेकिन इन सबके बावजूद वर्तमान साहित्य की किसी भी पत्रिका में आधुनिक परिवेश के स्त्री पुरुष बेवफ़ाई की तोता मैना मैना जैसी कहानियां सम्मिलित रुप से संभवतः प्रकाशित नहीं हुई ।
                          जबकि राजा भरथरी  रानी पिंगला की कहानी स्त्री बेवफाई में पुरुष  के वैराग्य लेने की कहानी है । राजा भर्तृहरि लोकजगत में राजा भरथरी के नाम से जाने जाते हैं तथा बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि प्रांतों के लोकजगत में राजा भरथरी रानी पिंगला की कहानी, नाटक, नौटंकी आदि प्रांतों की भाषा और बोलियों में पुस्तकाकार में प्रकाशित हो कर लोकप्रिय हुई है । राजा भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे वे वैराग्य ले कर गुरू गोरखनाथ के शिष्य बने तथा उनने संस्कृत में नीति शतक, श्रृंगार शतक, वैराग्य शतक तथा व्यांकरण पदीय नामक व्यांकरण ग्रन्थ लिखे । इन पर केन्द्रित विभिन्न कहानियां एवं किंवदंतियां प्रचलित है । लोक जगत में प्रचलित एक कहानी के अनुसार राजा भरथरी प्राप्त अमर फल अपनी रानी पिंगला को देते है वह उसे अपने प्रेमी सेना नायक को दे देती है, सेनानायक उसे अपनी प्रेमिका राजनर्तकी को देता है तथा राजनर्तकी उसे राजा को भेंट करती है । इस भांति अपनी रानी पिंगला की बेवफाई से व्यथित होकर राजा भरथरी अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को राज पाट सौंप कर वैराग्य ले लेते हैं । इसी भांति सनोवर के साथ गुल की बेवफ़ाई की आश्चर्यजनक कहानी किस्सा गुल सनोवर हैं ।        
                               लोक जगत के इस अल्पशिक्षित वर्ग में प्रेम कहानियों की जिन पुस्तकों को अधिक पढा जाता है उनमें से कुछ के नाम नल दमयंती, राजा ढोलन रानी मारु, रानी सारंग सदावृजकिस्सा केशर गुलाब आदि की प्रेम कहानियां हैं ।  नल दमयंती की कथा मूलतः महाकाव्य महाभारत में आती हैं जहां एक ऋषी द्वारा नल दमयंती के बीच  प्रेम, नल द्वारा जुंऐ में सब कुछ हार जाने तथा दरबदर भटकने के बाद फिर से उनके अच्छे दिन आने की कथा पांडवों को सुनाई गई थी । नल निषध देश के राजा थे तथा दमयंती विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री थी । निषध देश का बाद में नरवर नाम पड़ा जो कि मध्यप्रदेश में शिवपुरी के समीप है । राजा नल के पुत्र साल्हकुमार जो कि ढोला के नाम से जाने जाते हैं का बालविवाह जांगलू देश (जो कि वर्तमान में बिकानेर के नाम से जाना जाता है) के पंवार राजा पिंगल की पुत्री मारवणी (मारू) से हुआ था बड़े होने पर उसका दूसरा विवाह मालवणी से हुआ । ढोला द्वारा मारवणी को भूल जाना तथा मारवणी का उसके विरह में तड़फते हुये ढोली द्वारा  ढोला के पास  संदेश  भेजना । ढोली से संदेश एवं मारवणी के सौन्दर्य वर्णन को सुन कर ढोला द्वारा जांगलू देश जा कर मारवणी को लाना, राह में  सांप का काटना तथा दूसरी पत्नी मालवणी  द्वारा अडचने डालना आदि की ढोला मारू की प्रेम कहानी राजस्थान में अत्यंत लोकप्रिय है  । ढोला मारू की प्रेम कहानी मूलतः पद्यात्मक स्वरुप में है तथा उसका नाम ढोला मारू रा दूहा है । ढोला मारू रा दूहा के रचयिता कवि कल्लोल है जिनने ग्यारहवीं शताब्दी में इसे लिखा था तथा  सत्रहवी शताब्दी में कुशल राम वाचक ने इसमें कुछ चौपाइयां और जोड़ कर इसे विस्तार दिया । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने “ढोला मारू रा दूहा” को हेमचंद्र तथा बिहारी के दोहों के बीच की कड़ी माना है । लेकिन जब इसी ढोला मारू की प्रेमकथा का पुनर्लेखन उत्तर भारत के लोक जगत के कहानीकारों द्वारा किया जाता है तो उसके स्वरुप में परिवर्तन आ जाता है । वह ढोला मारू की जगह राजा ढोलन रानी मारू की कहानी बन जाती है उसमें नल दमयंती की कहानी के साथ ही ढोला मारू की कहानी जोड़ ‌दी जाती हैं तथा अलग से भी ढोलन मारू की कहानी लिखी जाती है । कहानी के संवादों में दोहा, चौपाई, गीतों का समावेश हो जाता है तथा कथानक में ढोला द्वारा मारू के सतीत्व परीक्षण हेतु बालू के घड़े को सूत की रस्सी से बांध कर पानी निकालने की बात की जाती है । मारू के शहर में तमोलिन, कलवारिन तथा मालिन द्वारा ढोला को मोहित करने के असफल प्रयास का प्रसंग आ जाता है । भाषा भी खड़ी बोली एवं भोजपुरी मिश्रित हो जाती है । कुछ पात्रों के नाम भी बदल जाते हैं मसलन मारवणी के पिता राजा पिंगल का नाम राजा बुद्ध सिंह लिखा गया है । संभवतः यह सब परिवर्तन राजस्थान की लोकप्रिय ढोला मारू की प्रेम कहानी को उत्तर भारत के लोक जगत के परिवेश के अनुकूल बनाने के दृष्टिकोण से उत्तर भारत के लोक जगत के कहानीकारों द्वारा किया गया है तथा इस प्रेम कथा की पुस्तक मे वे बतौर लेखक अपना नाम भी दर्ज करते हैं ।
                                             रानी सारंगा सदावृज तथा केशर गुलाब प्रेम कहानियों में सारंगा सदावृज की प्रेम कहानी में प्यासे हंस के जोड़े ने एक गढ्ढे में स्थित सीमित जल को एक दूसरे को पिलाने के प्रेम भरे हठ मे प्यास से प्राण त्याग दिए । शंकर जी के आशिर्वाद से हर योनि में वे प्रेमी-प्रेमिका बन कर पैदा हुये तथा सातवें जन्म में मानव योनि मे उनका मिलन हुआ  । सारंगा सदावृज प्रेम कहानी के लोक जगत के नौटंकी रुपांतरण में हास्य प्रसंगो का समावेश कर  रोचक बनाने के प्रयास में इस प्रेम कहानी में कई परिवर्तन किये गये । जबकि किस्सा केशर गुलाब में राज पुत्र गुलाब को उसकी भाभी ताना देती है कि क्या पानी पिलाने केशर कुंवरी  आयेगी,  उनसे  केशर कुंवरी के सौन्दर्य का वर्णन सुन कर  राजपुत्र गुलाब केशर कुंवरी को व्याहने निकल पड़ता है तथा दैत्य के चंगुल  से उसे मुक्त कर उससे विवाह करता है  । किस्सा साढ़े तीन यार , चार दोस्तों में से तीन दोस्तों के प्रेम तथा काफी संघर्ष के बाद अपनी अपनी प्रेमिकाओं से विवाह की कहानी है जिसमें दैत्य, परी, जादू , तिलस्म सभी का समावेश है । कहानी के संवादों में दोहा, शैर, गजल, चौताला, शोरठा, बैत आदि का प्रयोग किया गया है । चौथे यार बुद्धसेन को इसलिये आधा यार माना गया है क्यों कि ना ही वह किसी से प्रेम करता है और ना ही विवाह ।       
                             लोक जगत के अल्पशिक्षित वर्ग के मध्य पढ़ी जाने वाली इन पुस्तकों की लोकप्रियता का यह आलम रहा है कि इनके कई संस्करण प्रकाशित किये गये तथा लगातार प्रकाशित किये जा रहे हैं । मेरे पास उपलब्ध ऐसी लगभग 70 पुस्तकों में से कुछ के उनके प्रकाशन वर्ष में संस्करण एवं प्रतियों की संख्या निम्नानुसार है रानी सारंगा का गीत 50 वी बार प्रकाशित 5000 प्रतियां, किस्सा गुल बकावली 25 वी बार प्रकाशित 3000 प्रतियां, किस्सा केशर गुलाब 11 वी बार प्रकाशित 10000 प्रतियां । जबकि सिंहासन बत्तीसीबेताल पच्चीसी, किस्सा हातिमताई, नल दमयंती, ढोलन मारू , राजा भरथरी रानी पिंगला आदि के संस्करण एवं प्रतियां इनसे भी अधिक प्रकाशित हुये है । लोक जगत के इनके पाठकों द्वारा ये पुस्तकें वी पी पी द्वारा भी मंगवाई जाती है तथा  प्रकाशक एक साथ 8 पुस्तकों का आर्डर देने पर ही पुस्तकें भेजते हैं । इनकी कीमत भी वर्तमान साहित्यिक पुस्तकों की तुलना में काफी कम होती है । वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभावी होने पर इनकी भी पठनीयता प्रभावित हुई है पर लोकप्रियता नहीं । यू ट्यूब पर इन पुस्तकों मे से कई के कथानक रोचक तरीके से प्रस्तुत किये जा रहे है तथा लोकप्रिय है । इन पुस्तकों को पढ़ने में कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों की किशोरावस्था में रुचि रही इस संबध मे प्रतिष्ठित व्यंग्यकार शरद जोशी ने अपने एक आलेख में जिक्र किया था तथा मनोहर श्याम जोशी ने संभवतः लोकजगत की इन किस्सा कहानी की पुस्तको में से किस्सा साढ़े तीन यार के शीर्षक से प्रभावित हो कर अपनी पुस्तक का शीर्षक किस्सा पौने चार यार रखा था । 
                               वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद के प्रभावी होते ही यथार्थवादी साहित्यकारों ने भले ही बड़े गर्व से यह घोषणा कर दी हो कि अब कहानी राजा रानी की कहानी नहीं रह गई तथा काल्पनिक आश्चर्यजनक व्रृतांत की रोचकता को नकार दिया हो, पठनीयता के गुणों को दरकिनार कर दिया हो, अब आगें क्या होगा की जिज्ञासा जैसे कहानी के मूल तत्त्व को अनदेखा कर दिया हो और यह सब करते हुये वे यथार्थ के रिपोर्ताज को कहानी का जामा पहना रहे हो  । पर कहानी का भोला पाठक यथार्थ तो देख रहा है उसकी विभीषिका को तो भोग ही रहा है लेकिन वह अपनी जिंदगी के  पलों में कुछ खुशियां  समेंट लेना चाहता है, कल्पना की ऊंची-ऊंची उड़ान भरते हुये काल्पनिक रहस्य लोक की शैर भी करना चाहता है, हंसना खिलखिलाना चाहता है तो क्या उसकी खुशियों के लिये उसके जीवन में आनंद उल्लास के रंग भरते हुये कुछ नहीं लिखा जाना चाहिये ? दरअसल सदा से यह मानवीय प्रवृति रही है कि जो है नहीं उसकी कल्पना करने तथा जो अलौकिक है उसके रहस्य भेदने में उसे अधिक आनंद आता है । पाश्चात्य साहित्य ने पाठकों की इस प्रवृति को परख कर उनकी रुचि के अनुकूल ऐसी ऐसी आश्चर्यजनक वृत्तांत वाली कहानियां लिखी है जो कि विश्व के साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई है । ऐसी क्रृतियों में से एलिस इन वंडरलैंड, हैरीपाटर की कहानियां, गुलीवर की यात्राये आदि का नाम लिया जा सकता है ।
                             एक ओर वर्तमान साहित्य पाठकों के अभाव का रोना रो रहा है जबकि दूसरी ओर वर्तमान का प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित साहित्यकार और उनका लेखन आम पाठकों के बीच लोकप्रिय नहीं है । प्रकाशक वर्तमान यथार्थवादी लेखन की पुस्तकों के ग्राहक न मिलने की शिकायत कर रहे है दूसरी ओर सदियों पहले लिखी गई अलिफ लैला, बेताल पच्चीसी तथा सिंहासन बत्तीसी की कहानियां आज भी पाठको के बीच लोकप्रिय है यदि इसके पीछे निहित कारणों की जांच परख की जाये तो सदियों पहले लिखी इन क्रृतियों के सरल, बोधगम्य स्वरुप में अब आगें क्या होगा की जिज्ञासा के साथ आश्चर्यजनक व्रृतांत प्रस्तुत करने का गुण ही संभवतः उभर कर सामने आयेगा । शायद यह कहना भी ग़लत न होगा कि रामायण एवं महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथ अपनी धार्मिकता के साथ ही अपने आश्चर्यजनक रोचक वृतांत की वजह से भी आम पाठकों के बीच लोकप्रिय है । इन सब स्थितियों के मद्देनजर यह प्रश्न उभर कर सामने आता है कि यथार्थवादी लेखन के साथ ही काल्पनिक, रहस्यात्मक, रोचक एवं आश्चर्यजनक वृत्तान्त वाला लेखन क्या आम पाठकों के मनोरंजन हेतु वर्तमान साहित्य में नहीं किया जाना चाहिये ? 
                              दैत्य, परी, जादू, तिलस्म, राजा रानी की आश्चर्यजनक बातें अब पुरानी हो गई वर्तमान में विज्ञान के आश्चर्यजनक खोजों एवं प्रयोगों की कल्पना की ऊंची ऊंची उड़ान भरते हुये कहानियां लिखी जा सकती है, आम व्यक्ति के सर्वशक्तिमान बनने की कल्पना की जा सकती है, काल्पनिक अनूठे आश्चर्यजनक लोकों की यात्रा कथा लिखी जा सकती है, अवधूतों, अघोरियों के रहस्यों को भेदा जा सकता है, सागरों को खंगाला जा सकता है, आसमान में ऊंची उड़ान भरी जा सकती है, विचित्र वनों, रेगीस्तानों में आश्चर्यजनकजनक खोज की जा सकती है, विचित्र पशु, पक्षी, खतरनाक वायरस हर कहीं कल्पना के गोते लगा कर कहानियां ढूंढी और लिखी जा सकती है । बस जरुरी है कि कहानी रोचक,पठनीय एवं पाठकीय जिज्ञासा के गुणों को अपने अंदर समाहित किये हो । क्या ऐसी आश्चर्यजनक वृत्तांत वाले कहानी लेखन को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए ? क्या जरुरी नहीं है कि कम से कम कहानी को हर बंधनों से आजाद कर कल्पना के स्वतंत्र गगन में विचरण करने दिया जाये ? वैसे भी कितनी ही यथार्थवादी विमर्शवादी कहानी हो बिना कल्पना के समावेश के नहीं लिखी जा सकती तो फिर उसे पूरी तरह कल्पना की ऊंची उड़ान भरते हुये कुछ रोचक, आश्चर्यजनक , अलौकिक कथानको का ताना बाना बुनने की भी तो छूट मिलनी ही चाहिये क्या पता आज की कोई सुखद आशावादी काल्पनिक कहानी कल का यथार्थ बन जाये ।
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संदर्भ ग्रामों एवं कस्बो की पुस्तक विक्रेताओं एवं लोक जगत के मेलों में विक्रय की जाने वाली लोकजगत के अल्पशिक्षित वर्ग की पाठकीय अभिरुचि की लगभग 100 पुस्तकें । संस्कृत साहित्य एवं अरबी फारसी साहित्य की हिन्दी में अनुवादित विभिन्न पुस्तकें एवं इंटरनेट से हासिल की गई जानकारियां ।
राजेन्द्र सिंह गहलौत
(कहानीकार
,निबंधकार एवं समीक्षक)
सुभद्रा कुटी” बस स्टैंड के सामने बुढार 484110
जिला शहडोल (म. प्र.) मोबाइल 9329562110


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