Tuesday, June 16, 2026
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नीलमणि का लेख – सावित्रीबाई–ज्योतिराव फूले : साझेदारी का उजला अध्याय

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत, सामाजिक जड़ताओं, अंधविश्वासों और कठोर पितृसत्तात्मक ढाँचों में जकड़ा हुआ था। ऐसे समय में सावित्रीबाई फूले  और ज्योतिराव फूले  का जीवन केवल एक दांपत्य कथा नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का जीवंत घोष था।
सावित्रीबाई फूले  का विवाह मात्र नौ वर्ष की आयु में ज्योतिराव फूले   (जो 13 वर्ष के थे) से हुआ। उस समय वे निरक्षर थीं, किंतु ज्योतिराव ने उन्हें घर पर पढ़ाना आरंभ किया और आगे की शिक्षा के लिए प्रेरित किया। यह कदम स्वयं में उस युग की सामाजिक सोच के विरुद्ध था, जहाँ स्त्री की शिक्षा को अनावश्यक ही नहीं, अपशकुन भी माना जाता था। यही शिक्षा आगे चलकर सावित्रीबाई को भारत की पहली महिला शिक्षिका और एक निर्भीक समाज सुधारक के रूप में स्थापित करती है।
15 सितंबर 1853 को ईसाई मिशनरी पत्रिका ज्ञानोदय को दिए अपने साक्षात्कार में ज्योतिराव फूले  ने जिस स्पष्टता से अपने विचार रखे, वे उनकी दूरदर्शिता और स्त्रीपुरुष समानता में विश्वास को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि माँ के कारण बच्चे में होने वाला सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए जो लोग देश की प्रगति चाहते हैं, उन्हें महिलाओं की स्थिति सुधारने और उन्हें ज्ञान देने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसी सोच से उन्होंने सबसे पहले लड़कियों के लिए विद्यालय खोलने का साहसिक निर्णय लिया।
यह कार्य सरल नहीं था। समाज का तीखा विरोध झेलना पड़ा। जाति के लोगों ने बहिष्कार किया, पिता ने घर से निकाल दिया, स्कूल के लिए स्थान और संसाधन नहीं मिले, और लोग अपनी बेटियों को पढ़ाने को तैयार नहीं थे। किंतु इन सभी कठिनाइयों के बीच सावित्रीबाई और ज्योतिराव एकदूसरे का संबल बने रहे। सावित्रीबाई ने अपमान, पत्थर, कीचड़ और तानों के बावजूद शिक्षा का दीप जलाए रखा।
अक्सर सावित्रीबाई फूले  को केवल ज्योतिराव फूले  की पत्नी के संदर्भ में देखा जाता है, किंतु यह दृष्टि उनके स्वतंत्र योगदान के साथ अन्याय है। ज्योतिराव के विचार और कार्य सावित्रीबाई की चेतना से पूरी तरह मेल खाते थे। वे केवल सहभागी नहीं थीं, बल्कि नेतृत्वकारी भूमिका में रहींभारत की पहली महिला शिक्षिका बनकर, सत्यशोधक समाज की महिला शाखा का नेतृत्व कर, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी अमानवीय परंपराओं का विरोध कर उन्होंने स्त्रीसशक्तिकरण को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया।
फूले  दंपति का संबंध “1 + 1 = 2” नहीं, बल्कि “1 + 1 = 11” का उदाहरण है। आपसी सम्मान, विश्वास और सहयोग से वे, वह कर सके जो अकेले संभव नहीं था। यह साझेदारी आज भी समाज को सिखाती है कि सामाजिक परिवर्तन केवल विचारों से नहीं, बल्कि समानता पर आधारित रिश्तों से संभव होता है।
ज्योतिराव फूले  अपने समय से नहीं, आने वाले समय से सोचते थे। वे आज के पितृसत्तात्मक समाज की सीमाओं से बहुत आगे थेजहाँ स्त्री को सहचरी नहीं, अधीनस्थ माना जाता है। उन्होंने स्त्री को परिवर्तन की धुरी माना और सावित्रीबाई को वह स्थान दिया, जिसकी वे अधिकारी थीं।
सावित्रीबाई और ज्योतिराव फूले  का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब पतिपत्नी प्रतिस्पर्धी नहीं, सहयात्री बनते हैं, तब समाज का चेहरा बदलता है। उनका योगदान केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए दिशासूचक प्रकाश है।
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1 टिप्पणी

  1. बेहतरीन लेख

    निश्चित ही सावित्रीबाई को भारत की पहली महिला शिक्षिका और एक निर्भीक समाज सुधारक के रूप में सम्माननीय व स्मरणीय हैं।

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