साहित्य में “ यथार्थवाद “ शब्द से ही आभाषित होता है कि यह एक ऐसा वाद है जो साहित्य लेखन में सिर्फ यथार्थ को समाहित करने का हिमायती है । यानी संसार में हमें जो चीज जिन रुपों में दिखाई देती है या मिलती है उनका ग्रहण तथा वर्णन हमें ठीक उसी रुप में करना है । यथार्थ के लिये यह भी जरुरी है कि वह सर्वमान्य हो जबकि वैज्ञानिक यथार्थवाद के तहत माना जाता है कि यथार्थ प्रवाहमय है, परिवर्तनशील है तथा उसके किसी निश्चित रुप को जानना असंभव है । यथार्थ मानव मन की उपज नहीं है अत: उसमें कल्पना करना या काल्पनिक स्वरुप में उसका वर्णन करना संभव नहीं है । साहित्य में यथार्थवाद के प्रवर्तक हंगरी के प्रसिद्ध दार्शनिक और साहित्यिक आलोचक जार्ज लुकाच माने जाते है । जबकि सामाजिक यथार्थवादी रचनाकारों की परंपरा में अंग्रेजी साहित्य में चार्ल्स डिकेंस (1812-1870) तथा भारतीय साहित्य में प्रेमचंद को प्रमुख मान जाता है । यथार्थवाद के तहत किया गया लेखन मुख्यत: गरीब किसान, मजदूर, दलित, निम्न वर्ग के आम व्यक्ति को केंद्र में रख कर किया गया है लेकिन वह उनके शोषण, व्यथा, अभावों के चित्रण पर ही केन्द्रित होकर रह गया है जबकि ड्राइंगरुमीय यथार्थ लेखन में अक्सर वह अतिरंजना के विभिन्न प्रयोगों से भी ग्रस्त होता नजर आता है ।
कालान्तर मे धीरे धीरे पूरे वर्तमान साहित्य में यथार्थवादी लेखन प्रभावी होता चला गया तथा ऐसे किये जा रहे लेखन में यथार्थ के विभिन्न स्वरुपों को देखते हुए उसे कई वर्गो में विभाजित किया गया मसलन आदर्शोन्मुखी यथार्थ, समाजवादी यथार्थ, अति यथार्थ, जादूई यथार्थ आदि । आदर्शोन्मुखी यथार्थ (प्रेमचंद) के अलावा अन्य तीनों प्रकार के यथार्थ के प्रवर्तक पाश्चात्य साहित्यकार माने जाते हैं तथा उनसे प्रभावित होकर भारतीय साहित्य में प्रचुर मात्रा में लेखन किया गया है तथा लगातार किया जा रहा है । गेब्रियल गार्सिया मार्खेश के जादूई यथार्थ से प्रभावित होकर उदय प्रकाश ने अपने लेखन में जादूई यथार्थ का भारतीय स्वरुप (वारेन हेस्टिंग्स का सांड) प्रस्तुत किया । जबकि अति यथार्थवाद फ्रांस में जन्मा एक साहित्यिक आंदोलन था । 1917 में फ्रांसीसी लेखक आलोचक गिलौम अपोलिनेयर ने सर्वप्रथम इसका उपयोग किया । अति यथार्थवादियों ने यथार्थ का स्वरुप सर्वमान्य भौतिक एवं मानव प्रकृति में नहीं बल्कि उसके विपरीत जीवन की विकृतियों में खोजा इस वाद मे अनीश्वरवाद के समर्थक तथा जो कुछ परंपरा में है जो कुछ प्राचीन है और जो कुछ रुढियों और व्यवस्था मे बंधा हुआ है उनको समूल नष्ट कर देना अपना उद्देश्य माना । इसके तहत स्वचलित तरीके से केवल अचेतन आवेगो द्वारा शासित तर्क की अवहेलना और स्थापित नैतिक और सामाजिक मानकों का खंडन किया जाता है । इस विचारधारा के तहत लुई आरागान, पाल एलुआर्ड, एड्रे ब्रेटन, पांल इलियर्ड, बेंजामिन पेरेट आदि रचनाकारों ने रचनाये लिखी । जबकि भारतीय साहित्य में इस विचारधारा से प्रभावित लेखन ने नैतिकता और विशेष तौर पर हिन्दू धर्म का अपमानजनक ढंग से विरोध करने में जहां कमर कस ली वहीं यौन स्वछंदता, अश्लीलता तथा अप्राकृतिक यौन संबंधों के समर्थन के पुरजोर स्वर भी साहित्य में उभरने लगे । इस दिशा मे राजेन्द्र यादव एवं उनके द्वारा संपादित “हंस” पत्रिका ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की तथा संभवतः पहली बार साहित्य में हंस पत्रिका द्वारा दो खंडों में “अनैतिकता विशेषांक” प्रकाशित किया गया जिसमें विवाहेत्तर यौन संबंधों का सिर्फ लेखकों ही नहीं बल्कि लेखिकाओं ने भी जम कर समर्थन किया लेकिन किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया कि क्या इससे “विवाह” जैसे सामाजिक विधान का अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ जायेगा तथा क्या इस भांति की यौन स्वछंदता से मानव समाज पुनः आदिम युग में नही पंहुच जायेगा ? लेकिन उस ओर चिंतन न कर वर्तमान साहित्य में अतियथार्थवाद के नाम पर यथार्थ का अतिरंजित वर्णन तथा नैतिकता के बंधनों को नकारता हुआ हर मर्यादा रिश्तों को तोडता हुआ यौन संबंधों का चित्रण वर्तमान साहित्य में छाता जा रहा है। मानवीय भावनाओं की गुत्थियां सुलझाने की जगह पूरा लेखन देह की गणित के गुंणा भाग मे उलझा हुआ है । विवाहेत्तर संबंध, समलैंगिक संबंध तथा लीव इन रिलेशन के समर्थन के परचम लहराये जा रहे हैं रचनाओं में अश्लील गालियों एवं अश्लील देह संबंधों को चित्रित किया जा रहा है इन सबके बावजूद यौन मनोविज्ञान पर आधारित कोई भी चर्चित रचना नजर नहीं आ रही हैं। कुल मिला कर पाश्चात्य विचारधारा में जन्मे “यथार्थवाद” ने अपने नये नये अवतरित स्वरुपों में वर्तमान भारतीय साहित्य, विशेष रुप से पाश्चात्य वामपंथी विचारधारा से प्रभावित प्रगतिशील एवं जनवादी लेखन पर अपना सम्पूर्ण वर्चस्व कायम कर लिया । उस विचारधारा से प्रभावित लेखन द्वारा यथार्थवादी विचारधारा से इतर लेखन को अस्वीकारा गया, उपहासित किया गया तथा यथासंभव धित्कारा गया । वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद विशेष तौर पर कहानी उपन्यास एवं कविता लेखन पर अधिक प्रभावी दिखता है लेकिन क्या इस भांति किया जा रहा यथार्थवादी लेखन पूर्णतः यथार्थपरक है ? क्या संसार में जो जैसा दिख रहा यथार्थ है उसे उसी रुप में ग्रहण कर यथार्थवादी लेखन के तहत प्रस्तुत किया जा रहा है ? क्या यथार्थवादी लेखन में यथार्थ के प्रस्तुतिकरण में किसी तरह की कल्पना का समावेश नहीं होता ? क्या निम्न दलित शोषित वर्ग के शोषण दुखों अभावों का चित्रण ही यथार्थ है उनके जीवन की खुशियों के पल , उमंग, उत्साह , जिजीविषा तथा विषम परिस्थितियों से संघर्ष कर उन पर विजयी होना यथार्थ नहीं है ? मानवीय भावनाओं की कोमलता प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, ममत्व आदि यथार्थ नहीं है ? स्थापित सामाजिक, धार्मिक अध्यात्म की मान्यताओं एवं नैतिकता के बंधन, मर्यादाओं के खंडन का औचित्य क्या है ? तथा यथार्थवाद के नाम पर यह सब करते हुए क्या व्यक्ति के सामाजीकरण एवं सामाजिक नियंत्रण में ऐसा साहित्य बाधक नहीं बन रहा हैं ?
उपरोक्त तमाम प्रश्नों का जबाब जब हम निबंध छोड़ कर साहित्य की अन्य विधाओं विशेष तौर पर कहानी एवं उपन्यास के संदर्भ में ढूंढते हैं तो बड़ी विचित्र स्थिति उभर कर सामने आती है । कोई भी कहानी एवं उपन्यास तो बिना काल्पनिक कथानक के लिखे ही नहीं जा सकते ऐसी स्थिति में यथार्थवादी रचनाकार अपनी रचनाओं में जिस यथार्थ का दम भरते नजर आते हैं क्या वह सिर्फ उनकी रचना में काल्पनिक कथानक की प्रभावशाली प्रस्तुती हेतु एक गढ़ा गया यथार्थ नहीं होता है ? पूस की रात में कड़ाके की ठंड मे गरीब किसान द्वारा अपने खेत की रखवाली करना अत्यंत कष्टप्रद है यह यथार्थ है लेकिन कोई गरीब किसान क्या पूस की रात की ठंड की वजह से अलावा के पास ही पड़ा रहे और अपनी कड़ी मेहनत से उगाई फसल को जानवरों को चरने दे ऐसा हो सकता है ? निम्न दलित वर्ग की ग्राम मे दयनीय स्थिति उनकी भूख गरीबी यथार्थ हो सकती है लेकिन क्या कोई दलित बाप बेटे इतने संवेदनशून्य हो सकते है कि अपनी मृत बहू , पत्नी के कफन के लिये मिले पैसों को शराब और भरपेट खाने मे उड़ा दे और लाश बिना दाह संस्कार के लावारिश पड़ी रहे यह प्रेमचंद द्वारा उनकी कहानी में प्रस्तुत किया गया प्रभावशाली गढ़ा हुआ यथार्थ हो सकता है लेकिन ना ही किसी गरीब किसान को आसानी स्वीकार होगा और ना ही किसी गरीब से गरीब दलित को । इसी भांति देश विभाजन के दौरान भीषण बालात्कार की घटनाये कटु यथार्थ है लेकिन भीषण सामूहिक बालात्कार से बेहोश कोई लड़की डाक्टर के खिड़की खोलने की बात कहने पर कभी भी सलवार का इजारबंद खोलने की हरकत नही कर सकती है यह मंटो का अपनी कहानी की प्रभावशाली प्रस्तुति हेतु गढ़ा गया मार्मिक यथार्थ हो सकता है पर सर्वमान्य यथार्थ तो उसे नहीं माना जा सकता । यह तो दो प्रतिष्ठित साहित्यकारों की कुछ अत्यंत चर्चित रचनाओं के कथानक की प्रभावशाली प्रस्तुति हेतु गढ़े गये यथार्थ की बात है वर्तमान लेखन में तो यथार्थवादी रचनाकारों ने यथार्थ के नाम पर गढ़े यथार्थ की ऐसी ऐसी कलाबाजियां खाई है जिनसे सामान्य पाठक शायद ही सहमत हो पाये । यथार्थ के तहत यह माना जाता है कि संसार में हमें जो चीज जिस रुप में दिखाई पड़ती है उसका वर्णन उसी रुप में करना है तथा वह सर्वमान्य हो लेकिन कहानी उपन्यास में ऐसा करने पर रचना महज यथार्थ की रिपोर्ताज बन कर रह जायेगी अतः उसके कथानक मे कल्पना का समावेश जरुरी है । लेकिन जादूई यथार्थ के नाम पर इतिहास को दरकिनार कर देहवाद की रासलीला का जादू जगाती उदयप्रकाश की कहानी वारेन हेस्टिंग्स का सांड किस यथार्थ को प्रस्तुत करती है और यह कैसा जादुई यथार्थवाद है पाठक समझ नहीं पाता है । कुल मिला कर वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद या तो अतिरंजित यथार्थ परोस रहा है या चमत्कारिक जो सर्वमान्य नहीं कहा जा सकता । ऐसी स्थिति में वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद की अवधारणा क्या एक भ्रामक स्थिति निर्मित नहीं कर रही है ?
दरअसल यथार्थवादी रचनाये संसार में परिलक्षित यथार्थ, समाज की यथार्थ स्थितियों, परिस्थितियों, समाज में घटित विचारणीय सामाजिक घटनाओं आदि से कथ्य उठा कर उसे एक काल्पनिक कथानक के सांचे में ढाल कर अपने कलेवर में प्रस्तुत करती है । यथार्थवादी कहानियों के संदर्भ में कहा भी गया है कि कहानी झूठ (कथानक) बोल कर सच (कथ्य) कहने की कला है । जबकि हर युग की तत्कालीन समाज पर केन्द्रित रचनायें अपनी विभिन्न विधाओं कहानी, नाटक, उपन्यास, कविता आदि में बिना यथार्थवाद का ठप्पा लगाये यही तो करती आ रही थी । वस्तुत: हर युग का रचनाकार समाज के बीच रहने वाला एक बुद्धिजीवी प्राणी होता है स्वाभाविक है कि उसके लेखन की विषयवस्तु भी समाज की देखी सुनी यथार्थ स्थितियों से ही प्रभावित होगी फिर साहित्य में यथार्थवाद ने अलग हट कर नया क्या किया ? हां यह वाद साहित्य की एक पाश्चात्य विचारधारा अवश्य है और “ घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध ” की कहावत जग जाहिर है वरना ढूंढने पर वर्तमान यथार्थवादियों को अतीत की हिन्दी एवं संस्कृत साहित्य की कालजयी रचनाओं में हर तरह की यथार्थपरक रचनाये आसानी से मिल जाती ।
यदि पाश्चात्य साहित्य से आयातित यथार्थवाद से प्रेरित वर्तमान लेखन यह दावा करता है कि वे अपनी रचनाओं में यथार्थवाद के तहत गरीब, मजदूर, किसान, आम व्यक्ति, दलित, आदिवासी, शोषित स्त्रियों, वेश्याओं, किन्नरों (थर्ड जेंडर) आदि पर लिख रहे हैं जिस पर पहले नहीं लिखा जाता था तो वे यथार्थवाद की आत्ममुग्धता से ग्रसित हो कर गलत कथन कर रहे है । हर युग में बिना यथार्थवाद का लेबल चिपकाये इन सभी वर्गों की यथार्थपरक स्थितियों को चित्रित करते हुये आज से बेहतर एवं चर्चित लेखन किया गया है । जब दलित शब्द जन्मा भी न था यथार्थवाद का अतापता भी न था तब सन 1927 में “चांद” का “अछूत विशेषांक” प्रकाशित हुआ था । 1856 में सरला देवी, मृणालिनी सेन आदि ने बांग्ला साहित्य में अपने लेखन से स्त्रियों की सामाजिक दुर्दशा के प्रति लोगों का ध्यानाकर्षण किया तो पंजाब में सन 1882 में ही किसी अज्ञात महिला ने “सीमांतनी उपदेश” नामक पुस्तक लिख कर स्त्रियों से जुड़े मुद्दों की बात की । हिन्दी कहानी लेखन की शुरुआत में ही सन 1907 में राजेंद्र बाला घोष ने बंगमहिला के नाम से स्त्री की स्वराज चेतना की कहानी “दुलाई वाली” लिखी थी, सन 1927 में रामगोपाल मेहता द्वारा स्फुरना देवी के छद्म नाम से लिखी पुस्तक “अबलाओ का इंसाफ” में विधवाओं के यौन शोषण की स्थितियों को उजागर करते हुये उनके पुर्नविवाह की मांग करते हुये उनके लेखन ने उस समय हिन्दू समाज में हलचल मचा दी थी जबकि उस समय शायद “स्त्री विमर्श” शब्द कहीं सुनाई ही नहीं पड़ा था । अति यथार्थवादी वर्तमान में जिस समलैंगिकता के समर्थन का परचम लहराते हुये बाल एवं किशोर यौनशोषण को अनदेखा कर रहे हैं उसकी गंभीरता एवं दूषित परिणामों को उग्र ने सन् 1927 में ही अपनी कहानी “चाकलेट” में चित्रित कर दिया था । हर युग में वेश्याओं पर बहुचर्चित लेखन किया गया है इस बात की गवाह आचार्य चतुरसेन का उपन्यास “वैशाली की नगरवधु” से लेकर कई कृतियां हैं । सन 1939 में ही थर्डजेंडर पर निराला ने संस्मराणत्मक उपन्यास “कुल्ली भांट” लिख डाला था जबकि उस समय “थर्ड जेंडर विमर्श” नाम की कोई चीज जन्मी भी न थी ।
गरीब, निम्न वर्ग के शोषण उनकी दयनीय स्थिति का चित्रण कहानी अपने लेखन की शुरुआत से ही कर रही है । हिन्दी की पहली कहानी के रुप में मानी जाने वाली माधव राव सप्रे की सन 1900 में प्रकाशित कहानी “टोकरी भर मिटृटी” मे गरीब विधवा की झोपड़ी की जमीन को समृद्ध जमींदार द्वारा हड़पने की बात की गई है । इतना ही नहीं हिन्दी कहानी लेखन की शुरुआत से भी पहले से कही सुनी जाने वाली लोक कथाओं में से अधिकांश की कथावस्तु गरीब शोषित आम व्यक्ति, किसान, मजदूर, स्त्रियों पर ही केन्द्रित रहती थी । वर्तमान यथार्थवादी साहित्य ने समाज के जिस वर्ग पर कम लेखन किया है या लिखने से परहेज़ किया है उस अपराधी, चोर, डाकू, हत्यारों पर भी अतीत के साहित्य में काफी लिखा गया है तथा लोककथाओं में उनकी कहानियां भी कहीं सुनी गई है । आखिर उस वर्ग की भी तो उपस्थिति सदा से मानव समाज में यथार्थत: तो रही ही है । अगर अतीत की हिन्दी कहानियों एवं संस्कृत में लिखी गई कथाओं को खंगाला जाये तो गरीब, मजदूर, किसान, वर्तमान में दलित कहे जाने वाले वर्ग, आदिवासी, वेश्या, किन्नर ही नहीं अपराधी, चोर, डाकू, हत्यारों पर भी चर्चित एवं कालजयी रचनाये मिल जायेंगी । इतना ही नहीं धर्म, राजनीति, नैतिकता के गंभीर गूठ तत्त्वों की सरल एवं रोचक स्वरुप में प्रस्तुति के उद्देश्य से भी संस्कृत में कहानियां लिखी गई जिसका कि उदाहरण है पंचतंत्र, जातक कथा, कथा सरित्सागर, दशकुमारचरितम आदि की कहानियां । जबकि वर्तमान यथार्थवादी साहित्य में पाश्चात्य शिल्प का अंधानुकरण करते हुये लिखी जा रही कहानियों में दुरूह फैंटेसी एवं अन्य कलात्मक शिल्पो तथा घटना प्रधान की जगह सिर्फ दृश्य चित्रण के प्रयोगों से आम पाठकों हेतु लिखी जा रही कहानियां बोझिल, उबाऊ तथा अबोधगम्य होती जा रही हैं ।
दूसरी ओर यदि वर्तमान यथार्थवादी साहित्यकार यह गलतफहमी पाले हुए हैं कि गरीब, किसान, मजदूर, आदिवासी, झोपड़पट्टी फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले व्यक्ति आदि की दीन हीन, दारूणा दशा का चित्रण ही साहित्य में करना यथार्थ है तो वे भूल जाते हैं कि इस वर्ग के व्यक्तियों के जीवन में भी खुशियों के पल होते है, उनमें भी उत्साह, उमंग तथा अदम्य जिजीविषा होती है । वे विषम परिस्थितियों से संघर्ष कर उस पर विजयी होना भी जानते हैं उनके जीवन के इन पहलुओं पर लिखना क्या यथार्थपरक नहीं होगा ? यह भी देखने में आ रहा है कि वर्तमान यथार्थवादी लेखन ने मानव जीवन में भावनाओं की अहमियत को नकार दिया है । क्या प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, ममत्व आदि भावनाये यथार्थ नहीं होती ? फिर वर्तमान यथार्थवादी लेखन में भावनापरक लेखन क्यो नही दिखाई देता ? “प्रेम” को लिजलिजी भावुकता कह कर नकार देने के बाद “देहवादिता” के अश्लील विभत्स चित्रण, स्वच्छंद एवं अप्राकृतिक यौन संबंधों पर किया जा रहा लेखन ही क्या यथार्थवादी लेखन है ? और ऐसे लेखन की सामाजिक उपयोगिता क्या है ? उस पर तुर्रा यह कि इस यथार्थवादी साहित्य ने “विमर्शवाद” का चोला पहन कर वर्तमान साहित्य एवं साहित्यकारों को कई खेमों में बांट दिया है । दरअसल प्रेमचंद के युग से लेकर अब तक के यथार्थवादी साहित्य में दो तरह का लेखन दिखलाई पड़ता है । एक तो वह जो समाज की यथार्थ स्थितियों, परिस्थितियों, विसंगतियों, सामाजिक घटनाओं आदि को समझने एवं पाठकों को उसे समझाने का प्रयास करते हुये
परिलक्षित यथार्थ से कथ्य लेकर उसकी रोचक बोधगम्य प्रस्तुति हेतु उसे एक काल्पनिक कथानक में प्रस्तुत करते हैं ऐसा करते हुये उनका पूरा ध्यान कथ्य की प्रभावशाली प्रस्तुति पर होता है तथा वे कथानक की सत्यता का दावा भी नहीं करते । ऐसा लेखन स्वागतेय है तथा ऐसा लेखन किसी भी युग में किया गया हो उसके पाठक हर युग में मौजूद रहते हैं दूसरी ओर पाश्चात्य यथार्थवाद से प्रभावित ऐसे यथार्थवादी, विमर्शवादी साहित्यकार, समीक्षक, आलोचक, लेखक तथा साहित्यिक पत्रिकाएं है जो अपने प्रायोजित यथार्थ, विमर्श का डंडा लेकर पाठकों को अपने द्वारा लिखित, समीक्षित एवं प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत किये गये कथ्य, कथानक को ही सच मानने तथा मनवाने पर आमादा है । ऐसी स्थिति मे उन रचनाओं एवं पत्रिकाओं से ऊब कर दूर भागने वाले पाठकों को ऐसे लेखक, समीक्षक तथा पत्रिकाओ के संपादक वर्तमान साहित्य की समझ न रखने वाला मूढ़ पाठक साबित करने मे देर नहीं लगाते या फिर साहित्य के पाठकों के अभाव का रोना ही शुरू कर देते हैं । पर उन्हें अपने वर्तमान यथार्थवादी साहित्य की झीनी बीनी चंदरिया के सौ सौ छेद नहीं दिखलाई पडते ।
दरअसल समाज की यथार्थ स्थितियों तथा गरीब, दलित, शोषित, किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक, स्त्री आदि सभी वर्गों पर लेखन किये जाने से मेरी असहमति नहीं है बल्कि यह कहने का प्रयास है कि इन सभी वर्गों पर साहित्य में सहज स्वाभाविक रुप से इनके हितों के मद्देनजर सदा से लिखा जा रहा है । गरीब, दलित, शोषित, किसान, मजदूर, की निम्न स्थिति तथा उनकी जिंदगी को और बेहतर बनाये जाने, अल्पसंख्यकों की बात करते हुये उनसे भाईचारे एवं साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित करने तथा स्त्रियों की बात करते हुये कुरीतियों से उन्हें मुक्त कर समाज मे हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर भागीदारी देने की बात सदा से साहित्य में की जा रही है । लेकिन वर्तमान साहित्य में यथार्थवादी साहित्यकारों द्वारा वादमुग्धता एवं विमर्शप्रियता के चलते इन सभी वर्गों पर जिस भांति प्रायोजित ढंग से लिखा जा रहा है उसमे इन वर्गों के हितों की बातें कम वर्ग विद्वेष की बातें अधिक उभर कर सामने आ रही है । अल्पसंख्यक विमर्श के नाम पर बहुसंख्यकों द्वारा उनके शोषण उत्पीड़न की बातें अधिक की जा रही है तो स्त्री विमर्श के नाम पर यौन स्वातंत्र्य एवं यौन स्वच्छंदता का उन्हें पाठ पढ़ाया जा रहा है । जबकि इस तरह के लेखन करते हुये पाश्चात्य वादों एवं शिल्प से उनका लेखन इस भांति प्रभावित रहता है कि उनके लेखन की मौलिकता जहां संदिग्ध हो उठती है वहीं उनके लेखन में परोसा गया यथार्थ भी अविश्वसनीय प्रतीत होने लगता है । आये दिन इस भांति के यथार्थवादी लेखन पर पाश्चात्य साहित्यकारो के लेखन का अनुकरण या उससे प्रभावित होने का आरोप लगता रहा है ।
दूसरी ओर वर्तमान साहित्य के यथार्थवादी एवं विमर्शवादी साहित्यकार क्या अतीत के साहित्यकारो, लेखकों एवं उनके द्वारा किये गये लेखन को आरोपित करते प्रतीत नहीं होते कि उनका लेखन न तो समाज की यथार्थ स्थितियों को अपनी रचनाओं में प्रतिबिंबित कर सका और ना ही पिछड़े, दमित, दलित, अल्पसंख्यक, स्त्री आदि वर्गो की स्थितियों को भली-भांति विश्लेषित जिससे कि उन्हे पाश्चात्य साहित्य से यथार्थवाद को आयातित करना पडा एवं इन वर्गों की स्थितियों पर विचार-विमर्श हेतु अलग से विमर्श कायम करना पडा । इन वर्गों पर विचार-विमर्श तक तो बात ठीक थी लेकिन जब उस विमर्श ने विमर्शवाद का रुप धारण कर लिया तो ऐसा विमर्शवादी लेखन सिर्फ विमर्शों पर ही लेखन किये जाने की हठधर्मिता पाले हुए वर्तमान साहित्य में अपने अपने विमर्शवाद के अलग अलग झंडे गाड़ रहे है उसके अपने अलग से विमर्शवादी साहित्यकार, लेखक तथा खेमे कायम होते चले गये । दलित विमर्शवादियों ने तो सवर्ण वर्ग के लेखकों द्वारा दलितों पर किये गये समस्त लेखन को खारिज करते हुए सिर्फ दलितों द्वारा दलितों पर किये जा रहे लेखन को ही दलित विमर्शवादी साहित्य मान कर अपना अलग खेमा ही बना लिया है । उनका अनुकरण करते हुए अन्य वर्ग भी यदि सिर्फ अपने वर्ग के लेखकों द्वारा अपने ऊपर किये जा रहे लेखन को ही अपने वर्ग का विमर्शवादी लेखन मानने पर आमादा हो जाते है तो कल के दिन इस तरह के विमर्शवादी लेखन के पाठक भी सिर्फ उन्हीं के वर्ग तक ही सीमित हो कर न रह जायें । क्या वर्तमान साहित्य में लेखन की ऐसी स्थिति किसी भी नजरिये से उचित मानी जा सकती है ? जबकि वर्तमान यथार्थवादी एवं विमर्शवादी लेखन आये दिन नये नये विवादों को खड़ा कर अपने लेखन पर बर्तन ही प्रश्न चिन्ह लगा रहा है ।
इन सारी स्थितियों के मद्देनजर क्या यह जरुरी नहीं हो जाता कि वर्तमान लेखन को पाश्चात्य साहित्य से आयातित यथार्थवाद की वादमुग्धता एवं विमर्शवाद की हठधर्मिता से मुक्त कर स्वतंत्र चिंतन मनन से मौलिक रुप से अनुभूत लेखन को प्रोत्साहित किया जाये । वैसे भी साहित्य सदा से चेतना की मुक्ति का पक्षधर रहा है । इस भांति के स्वतंत्र चिंतन मनन से किये गये लेखन में यथार्थवाद, विमर्शवाद एवं विशेष विचारधारा से प्रेरित एवं पोषित यथार्थ से अधिक जीवंत एवं सारगर्भित यथार्थ स्वयं उभर कर सामने आयेगा तथा वहीं लेखन पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा ।
राजेन्द्र सिंह गहलौत
“सुभद्रा कुटी”
बस स्टैंड के सामने
बुढार 484110
जिला शहडोल (म.प्र.)
मोबाइल : 9329562110