राम-रावण युद्ध समाप्त हो चुका था। प्रभु राम की कृपा से विभीषण को लंका का राजपद मिला, और सीता जी सम्मानपूर्वक रामचंद्र जी के पास आ गई थीं। वानर सेना उन्हें देख-देखकर रोमांचित थी, और सभी आदर से सिर झुकाकर उन्हें नमन कर रहे थे।
अब राम को छोटे भाई भरत की याद आई। उनका त्याग, तप और सरलता भी याद आई। साथ ही उन्हें यह भी याद आया कि भरत ने उनसे कहा था कि ‘भैया, वन से आपके लौटने में अगर चौदह वर्ष से एक दिन भी ऊपर हुआ तो मैं अपने जीवन को समाप्त कर लूँगा।’
राम अपने भाई भरत के प्रेम भाव को जानते थे, उनकी करुणा तथा समर्पण को भी। अयोध्या के निकट नंदीग्राम में बिल्कुल त्याग की मूर्ति बनकर रह रहे भरत जी का चित्र उनकी आँखों के आगे आ गया, और वे भावुक हो गए।
‘सचमुच, भरत जैसा भाई मिलना तो बड़े सौभाग्य की बात है।’ उन्होंने मन ही मन कहा।
भरत के प्रेम और त्याग को याद करके उनकी आँखें भीग सी गईं।
अयोध्या के राज सिंहासन पर बैठने के बजाय उन्होंने नंदीग्राम में तापस वेश में रहना पसंद किया। ऐसा भाई भला भरत के अलावा और कौन हो सकता है!
फिर भरत के साथ-साथ उन्हें शतुघ्न की भी याद आई, जिनके मन में भरत और लक्ष्मण सरीखा ही निर्मल प्रेम और सरलता थी। साथ ही पूरी कर्तव्य निष्ठा भी।
फिर तीनों माताओं की याद आई, जो ममता की मूरत थीं। बचपन से ही उनकी गोद में पलकर वे बड़े हुए थे। सभी ने उन्हें कितना लाड़-प्यार दिया। फिर वन में भरत जी के साथ ही आईं कैकेयी के वे करुणा भरे शब्द याद आए, जिनमें उनमें हृदय बहा आता था। राम ने उन्हें सांत्वना देने की कितनी कोशिश की थी, पर उनके आँसू तो थमते ही न थे।
माता कैकेयी का वह रूप राम अभी तक भूले न थे। फिर गुरु वसिष्ठ का अपार स्नेह, जिसकी शीतल छाया वे बचपन से ही महसूस करते आए हैं।
मानो चलचित्र की तरह जीवन का एक-एक दृश्य उनकी आँखों के आगे आ रहा था, जा रहा था।
उन्होंने विभीषण से तुरंत ऐसा कोई प्रबंध करने के लिए कहा, ताकि वे जल्दी से जल्दी अयोध्या पहुँच सकें।
विभीषण चाहते थे कि राम अभी थोड़ा समय और रुकें। पर भरत की प्रतिज्ञा की बात पता चली तो उन्होंने कहा, “हाँ रघुवर, मैं समझता हूँ, आपको जल्दी से जल्दी अयोध्या पहुँचना चाहिए।”
उन्होंने तुरंत पुष्पक विमान भिजवाना। उसमें अनमोल रत्न, मणियाँ और सुंदर वस्त्र भरे हुए थे। प्रभु राम ने हँसकर विभीषण से कहा, “ये सब चीजें आप आकाश मार्ग से वानर-भालुओं के बीच ही बँटवा दें।”
और सचमुच, वे रत्न, मणियाँ और सुंदर वस्त्र ऊपर से फेंके गए, तो सब वानर-भालुओं ने अपनी-अपनी पसंद की चीजें ले लीं। वानर वे वस्त्र पहन-पहनकर बड़े चाव से प्रभु रामचंद्र जी को दिखाने आए, तो वे मुसकरा उठे। फिर बोले, “आप लोगों ने मेरी बहुत सेवा की है। अब आप लोग अपने-अपने घर जाएँ और अपने मन में मुझे स्मरण करते रहें।”
सुनकर सब उदास हो गए। कोई भी प्रभु राम से अलग नहीं होना चाहता था। रामचंद्र जी ने सबको बड़े प्यार से घर जाने के लिए समझाया तो वे राजी हुए।
*
प्रभु राम, लक्ष्मण और सीता जी पुष्पक विमान में जाकर बैठ गए। लेकिन सुग्रीव, अंगद, नल-नील, हनुमान, जामवंत और विभीषण अब भी हाथ जोड़े अपलक प्रभु रामचंद्र जी की ओर देख रहे थे। कुछ कहना चाहते थे, पर कह नहीं पा रहे थे।
रामचंद्र जी उनके मन की बात समझ गए। उन्होंने सभी को भीतर विमान में बैठा लिया। फिर पुष्पक विमान तेजी से अयोध्या की और चल पड़ा।
रास्ते में प्रभु रामचंद्र जी सीता को वे स्थान दिखाते जा रहे थे, जहाँ वनवास के दिनों में वे रहे थे। उन्होंने सीता जी को वह स्थान भी दिखाया, जहाँ समुद्र पर बाँध बनाया गया था और उन्होंने शिवलिंग स्थापित करके, पूजा की थी।
फिर विमान दंडकारण्य पहुँचा तो रामचंद्र जी ने विमान को रुकवाया। वहाँ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर उन्होंने आशीर्वाद लिया। फिर विमान आगे चित्रकूट पहुँचा तो वे वहाँ भी सब ऋषि-मुनियों से बड़े प्रेम से मिले।
देखकर सीता जी के आगे वनवास का पूरा चित्र घूम गया। वन में उन्होंने चाहे जितने भी कष्ट झेले हों, पर वन उनके लिए आनंद का तपोवन भी तो था। महर्षि भरद्वाज, वाल्मीकि और अत्रि समेत अनेक ऋषि-मुनियों से मिलने का आनंद तो वे कभी भूल ही नहीं सकतीं। फिर उन्हें गुरु माँ अनुसूया का सरल स्नेह और प्यार से दी गई सीख याद आई, जिसने सुख-दुख की घड़ियों में उन्हें राह दिखाने का काम किया।
विमान आगे चला तो यमुना और गंगा नदियों के दर्शन हुए। सीता जी ने ऊपर से ही हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया।
फिर वे प्रयाग आए, तो रामचंद्र जी ने विमान को नीचे उतरवाया। वे सभी के साथ मुनि भरद्वाज जी के आस्रम में पहुँचे, और उन्हें लंका विजय की पूरी कथा सुनाई। मुनि भरद्वाज ने बड़े प्रेम से उन्हें आशीर्वाद दिया।
इसके साथ रामचंद्र जी ने त्रिवेणी में स्नान किया। और सीता जी के साथ वहाँ पूजा की।
अयोध्या अब निकट ही थी। वहां लौटने पर तीनों माँओं और गुरुवर वसिष्ठ के साथ ही भरत, शत्रुघ्न जैसे प्यारे देवरों और समस्त परिजनों से मिलने की बात सोचकर, सीता जी की आँखों में खुशी के मारे आँसू आ गए।
रामचंद्र जी ने हनुमान को बुलाकर कहा, “हे हनुमंत, तुम अभी वटुक वेश में अयोध्या चले जाओ। वहाँ भरत को मेरे आने का संदेश देना। साथ ही उनकी कुशल-क्षेम पता करके, जल्दी यहाँ लौट आओ।”
*
(2)
हनुमान ने दिया संदेश
…………………………
रामचंद्र जी त्रिवेणी के पावन जल में स्नान करके, एक सुरम्य स्थान पर बैठ, अपने सभी साथियों के साथ प्रेमपूर्वक बातें कर रहे थे।
सामने कल-कल बहती धारा को देख, उन्हें एकाएक सरयू नदी की याद आ गई। फिर इसके साथ ही इतनी पुरानी स्मृतियाँ आँखों के आगे अभर आईं, कि मन भर आया। आँखें छल-छल कर उठीं।
सरयू के तट पर ही तीनों छोटे भाइयों और मित्रों के साथ खेल खेलते हुए ही उनका बचपन बीता। बाद में यही सरयू जल उनकी तरुणाई के उमंग भरे सपनों और सुख-दुख का साक्षी बना।
लग रहा था, पुरानी सारी स्मृतियाँ इतनी तेजी से उनके सामने आ-जा रही हैं कि वे वर्तमान को भूलकर अतीत में खो से गए हैं।
तभी निषादराज गुह वहाँ आया। उसे भी प्रभु राम के आगमन का संदेश मिल गया था। आते ही वह प्रभु राम के चरणों में लेट हो गया। प्रेम और आनंद के कारण उसका गला भर आया था और मुँह से कोई बोल नहीं निकल पा रहा था।
प्रभु रामचंद्र जी ने बड़े प्यार से उसे उठाकर गले से लगाया। फिर गुह ने सीता जी को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद लक्ष्मण जी से बड़े प्रेम और आत्मीयता से मिला।
रामचंद्र जी ने अपने सब साथियों से निषादराज का परिचय कराया। निषादराज प्रेममगन होकर सबसे मिला। फिर कहा, “मेरा यह सौभाग्य है कि प्रभु रामचंद्र जी ने मुझे अपनाया और इतना प्रेम दिया। ऐसा उदार हृदय भला किसका होगा!”
निषादराज की सरल बातों ने सबको मुग्ध कर दिया। फिर उसने प्रभु रामचंद जी से कहा, “हे प्रभु, बहुत समय बाद आपके दर्शन हुए हैं। अब आप मुझे अपने से अलग न करें। मैं भी उस सुंदर अवधपुरी के दर्शन कर लूँगा, जहाँ जन्म लेकर आपने इतनी लीलाएँ कीं।”
सुनकर प्रभु रामचंद्र जी ने निषादराज गुह को भी अपने साथ अयोध्या चलने के लिए कहा।
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उधर हनुमान जब वटुक वेश में भरत जी के पास पहुँचे, तो वे बड़े चिंतामग्न से बैठे थे। वे पूरी तरह प्रभु रामचंद्र जी के विचारों में ही लीन थे, और बार-बार अपने आप से ही कह उठते, ‘भैया राम के वनवास में अब सिर्फ एक दिन बचा है। कल चौदह वर्ष पूरे हो जाएँगे। अगर कल तक वे नहीं आए तो मैं निश्चय ही अपने जीवन का अंत कर लूँगा। प्रभु राम के बिना अब मैं और नहीं जीना चाहता।’
भरत इसी चिंता और ऊहापोह में थे और भाव-विह्वल होकर प्रभु राम को याद कर रहे थे। तभी हनुमान जी उनके पास आकर खड़े हो गए। कहा, “आप जिन प्रभु रामचंद्र जी की याद में खोए हुए हैं, वे माता सीता, छोटे भाई लक्ष्मण और वनवास के अपने प्रिय साथियों के साथ अयोध्या के पास ही आ गए हैं। वे जल्दी ही यहाँ आने वाले हैं।”
सुनकर भरत जी का मुख खिल गया। उन्होंने हनुमान जी की ओर देखा, पर वटुक वेश के कारण उन्हें पहचान नहीं सके। प्रेम से गद्गद होकर बोले, “अरे, इतना सुंदर संदेश देने वाले आप कौन हैं। कृपा करके आप मुझे अपना परिचय दीजिए।”
इस पर हनुमान बोले, “हे अजातशत्रु भरत जी, मैं प्रभु रामचंद्र जी का सेवक हनुमान हूँ। वे जल्दी ही अयोध्या पहुँचने वाले हैं। उन्होंने मुझे आपको यह संदेश देने के लिए ही भेजा है।”
कहकर हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आ गए।
“अरे पवनपुत्र हनुमंत, आप…? आप नहीं जानते कि इस समय आकर आपने मुझे कितना सुख दिया है!…पर भैया राम और सीता भाभी हैं कहाँ? मेरा प्यारा भाई लक्ष्मण कहाँ है?” भरत जी आनंदमग्न होकर बोले।
इस पर हनुमान जी ने बताया कि अभी रामचंद्र जी प्रयागराज में हैं। जल्दी ही उनका विमान अयोध्या पहुँचने वाला है।
“अहा, राम…! मेरे प्यारे राम…! राम आ गए…हमारे राम आ गए…!!” भरत ने आनंदित होकर कहा। उस समय उनकी हालत ऐसी थी, मानो तन-मन की सारी सुध भूल गए हों।
हनुमान जी को प्रेम से विदा करके, भरत जी ने उसी समय गुरु वसिष्ठ के पास जाकर यह शुभ संदेश दिया। फिर उन्होंने अयोध्या के राजमहलों में तीनों माताओं कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी के पास जाकर यह संदेश दिया कि रामचंद्र जी भाभी सीता जी और लक्ष्मण के साथ जल्दी ही अयोध्या आने वाले हैं।
सुनकर वे हर्षविभोर हो गईं। उसी समय दौड़-दौड़कर तत्परता से प्रभु राम की अगवानी की तैयारी करने लगीं। आनंद विह्वल होकर वे मंगल गीत गाती हुई, श्यामल छवि वाले सुंदर, सजीले प्रभु रामचंद्र जी के ध्यान में डूब गईं।
*
धीरे-धीरे प्रभु राम के आगमन का समाचार पूरी अयोध्या नगरी में फैल गया। चारों ओर हर्ष और उल्लास छा गया। जो भी सुनता, वह दौड़कर अपने परिजनों को बताने चल पड़ता। लोग एक-दूसरे से पूछते, “प्रभु राम जी कैसे हैं? वन में रहते हुए जरूर दुबले हो गए होंगे। क्या तुमने उन्हें अपनी आँखों से देखा है?”
कुछ लोग कहते, “नहीं भाई, हमने उन्हें देखा तो नहीं. पर सुना है कि वे विमान से आएँगे। साथ में लक्ष्मण और सीता जी हैं। उनके वनवास के दिनों के संगी-साथी भी आ रहे हैं।”
तभी कोई आनंद विभोर होकर कह उठता, “अहा, इतने दिनों बाद रामचंद्र जी को देखकर कितना अच्छा लगेगा। मेरे मन में तो उनकी वही सरल छवि बसी है, जब वे पिता की आज्ञा मानकर वन के लिए जा रहे थे। चेहरे पर जरा भी दुख नहीं। ऐसा उज्ज्वल चरित तो बस उन्हीं का हो सकता है।”
थोड़ी देर बाद भरत जी गुरु वसिष्ठ, तीनों माताओं, छोटे भाई शतुघ्न तथा परिजनों के साथ राम की अगवानी करने चल पड़े। तीनों रानियाँ कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी मंगल गान गाती हुई प्रेममगन सी चल रही थीं। उनके हाथों में सोने के सुंदर थाल थे, जिनमें दीप, पुष्प, अगर धूप, मिष्ठान्न और अर्चन सामग्री सजाई गई थी। बार-बार राम के सरल प्रेम से भरी बातें याद आती तो उनकी आँखें भीगने लगतीं।
अयोध्या की प्रजा को प्रभु रामचंद्र जी के लौटने का पता चला तो वह भी आनंद से भरकर साथ चल पड़ी। देखते ही देखते एक बड़ा काफिला बन गया, जो हर क्षण बढ़ता ही जा रहा था।
हर ओर आनंद और उल्लास का वातावरण था। लग रहा था, मानो पूरी अयोध्या ही प्रभु रामचंद्र जी का स्वागत और अगवानी करने चली जा रही है।
बहुत दिनों से अयोध्या पर पडी दुख और निराशा की झाँईं हट गई थी और लग रहा था, जैसे अयोध्या में प्राण लौट आए हैं। राम के आगमन के बारे में सुनते ही, पूरी अयोध्या मानो फिर से नई-नवेली हो गई थी।
राम अयोध्या के गौरव थे। आज राम के लौटते ही अयोध्या ने फिर से अपने पुराने गौरव और गरिमा को पा लिया था। यह वही अयोध्या थी, जो रामचंद्र जी को स्वर्ग से ज्यादा प्रिय थी, और तीनों लोकों में उस जैसी सुंदर, मनोरम नगरी कोई और न थी।
आज वहाँ जगह-जगह प्रेम और उत्साह भरे दृश्य नजर आ रहे थे।
सरयू का जल भी इस शुभ घड़ी में मानो किल्लोल करता हुआ, राम के स्वागत का गान गा रहा था—
राम आए हैं, आए हैं, राम आए हैं,
हमारे प्रभु आए हैं, आए हैं, राम आए हैं,
आज धन्य है अयोध्या, राम आए हैं
राम आए हैं, आए हैं, राम आए हैं…!
और आश्चर्य, जाने-अनजाने भरत जी के होंठों पर भी इस गीत के बोल फुरफुराने लगे थे।
*
(3)
उमड़ा अयोध्या में आनंद
……………………………
भरत जी गुरु वसिष्ठ और सभी परिजनों के साथ प्रभु राम जी की अगवानी करने जा रहे थे, तभी उन्हें ऊपर उड़ता हुआ पुष्पक विमान दिखाई दिया। उनके हाथ उठाकर इंगित करते ही, रामचंद्र जी ने वहीं पास ही पुष्पक विमान रुकवाया।
फिर वे लक्ष्मण, सीता जी और सभी साथियों के साथ बाहर आए। सामने गुरु वसिष्ठ, तीनों माताओं, भरत, शत्रुघ्न और अयोध्या वासियों को देख, उनके आनंद का ठिकाना न था। रामचंद्र जी ने उसी समय धनुष-बाण को जमीन पर रखा, और गुरु वसिष्ठ जी के चरण स्पर्श करके बड़े आदर से प्रणाम किया। वसिष्ठ जी ने उन्हें उठाकर बड़े प्रेम से गले लगाया और कुशलक्षेम पूछी।
फिर राम बड़े आदर के साथ तीनों माताओं से मिले। कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी तीनों ही प्रेममगन होकर, उन्हें एकटक देखे जा रही थीं। बार-बार प्यार से उनके सिर पर हाथ फेरतीं, और पूछ लेतीं, “तुम ठीक तो हो न बेटा। वन में तुमने कैसे इतना लंबा समय बिताया। कैसे इतने बलशाली रावण और विकराल राक्षसों को हराया? हमारी याद नहीं आई! अयोध्या को भूल गए?”
सुनकर राम सिर झुकाए, मंद-मंद मुसकराने लगे। बोले, “अयोध्या तो हर दिन हाथ हिला-हिलाकर पास बुलाती थी माँ। इसीलिए चौदह वर्ष पूरे होते ही मैं आ गया।”
सचमुच वनवास की लंबी अवधि में उन्हें सभी का प्रेम बार-बार याद आता था, और वे व्याकुल हो उठते थे। बचपन से ही सभी का इतना प्यार उन्हें मिला था, कि उनसे दूर जाने की बात उन्होंने कभी सोची भी न थी। पर फिर चौदह वर्षों तक वन में रहना पड़ा, तो पिछली स्मृतियाँ दौड़-दौड़कर वहाँ भी पहुँच जातीं और पूरी अयोध्या उनकी आँखों के आगे सजीव हो उठती।
आज वे पूरे चौदह वर्ष वन में बिताकर लौटे थे, तो अयोध्या उनके लिए पहले से भी अधिक सुंदर और प्रेममयी हो गई थी।
राम छोटे भाई भरत से मिले, तो बार-बार उनका हृदय रोमांचित हो उठता था। प्यार से भरत के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा, “भाई, मुझे तुम्हारी कही बात याद थी। इसलिए लौटते समय मन में शीघ्र अयोध्या पहुँचने की चिंता मन में थी, ताकि नियत तिथि से एक दिन भी ज्यादा न हो जाए!”
प्रभु रामचंद्र जी की बात सुन, भरत भाव-विह्वल हो गए। आँखों में आँसू भरकर बोले, “मुझे पता था भैया, आपका मुझ पर कितना स्नेह है। इसी अधिकार भाव से ही तो मैंने कहा था।…आज मन में कितना आनंद उमड़ रहा है, क्या कहूँ। सच तो यह है कि आपके आने से पूरी अयोध्या धन्य हो गई। सबके चेहरों पर आज बहुत दिनों बाद आनंद, उल्लास और अपूर्व कांति नजर आती है। आपके साथ-साथ अयोध्या की खुशियाँ भी लौट आई हैं।”
सुनकर प्रभु रामचंद्र जी ने एक बार फिर प्रेम से विह्वल होकर भरत को गले लगाया। इसके बाद ललककर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न से मिले। बड़े प्रेम से उसे गले लगा लिया और कुशल-क्षेम पूछी।
फिर सीता जी ने गुरु वसिष्ठ को प्रणाम करके, उनसे आशीर्वाद लिया। माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी से मिलते समय उनका हृदय रोमांचित हो रहा था। तीनों माताओं ने भी छाती से लगाकर उन्हें सुंदर असीसें दीं। फिर वे बड़े स्नेह से प्यारे देवरों भरत और शत्रुघ्न से मिलीं और उन्हें आशीर्वाद दिया। कितने लंबे बिछोह के बाद सब लोग आज मिले थे। कैसी आनंद की घड़ियाँ थीं। सीता जी का मन विह्वल सा हो रहा था।
लक्ष्मण ने भी बड़े आदर से गुरुदेव वसिष्ठ जी को प्रणाम करके, उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद तीनों माताओं से मिले। कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी तीनों ने बार-बार उन्हें प्यार से गले लगाया और वन में बिताए दिनों के बारे में पूछा। माँ सुमित्रा ने कहा, “बेटे, मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लग रहा है कि तुमने पूरे मन से भाई राम और सीता जी की सेवा की है।”
इसके बाद लक्ष्मण भरत जी और अनुज शत्रुघ्न से बड़े प्यार से मिले।
रामचंद्र जी ने बड़े ही ममतालु स्वर में, वन के साथियों हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, अंगद, नल-नील, जामवंत और निषादराज गुह से सबका परिचय कराया। बोले, “ये सभी साथी मेरे सुख-दुख के सखा-सहचर हैं, जो मुझे पर प्राण छिड़कते हैं और मेरे लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इन्हीं की सहायता से ही तो मैं रावण जैसे भीषण शत्रु को पराजित करके, फिर से सीता को पा सका।”
भरत जी ने बड़े आदर से हनुमान, सुग्रीव, अंगद और विभीषण का बड़े प्रेम और आदर से स्वागत किया। फिर उनके विश्राम और ठहरने की उचित व्यवस्था की।
माताएँ बार-बार राम और लक्ष्मण को प्रेम से छू-छूकर पूछ रही थीं, “बेटा, वन में कैसे तुमने इतने दुख भरे दिन काटे? कैसे रावण जैसे बली को जीता…?”
राम ने कहा, “वन में मेरा समय बहुत सुख-आनंद से बीता। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों का साथ मिला, जिनका सत्संग ही गंगा-स्नान जैसा था। वह आनंद मेरे लिए वर्णनातीत है।…बस, आखिरी साल में कुछ कठिनाइयाँ आईं। दुष्ट रावण सीता का हरण करके ले गया, और उसने बहुत दुख दिए। पर वन में इतने अच्छे मित्र, साथी और सहायक मिले कि उन्होंने मुझे कभी विकल या परेशान नहीं होने दिया। मेरे दुख और मुसीबतों को अपने ऊपर ओढ़ लिया। फिर लक्ष्मण जैसा प्यारा भाई तो था ही, जिसने हर पल छाया की तरह साथ रहकर मेरे सुख-दुख की चिंता की। इसलिए वन का कष्ट भी कष्ट नहीं रहा।”
फिर थोड़ा रुककर कहा, “यह मेरे लिए परीक्षा का समय था। मुझे प्रसन्नता है कि उन मुश्किलों में भी मैंने आशा नहीं छोड़ी। अब वापस आ गया हूँ तो लगता है, वन के कष्टों ने मुझे तपाकर थोड़ा और निर्मल कर दिया है।”
राम के आने पर अयोध्या में घर-घर दीए जले। सुंदर-सुंदर फूल-पत्तों की मनोहर लड़ियाँ और बंदनवार सजाए गए।
प्रभु राम जी के आने पर अयोध्या का सुख-आनंद फिर वापस आ गया था। लग रहा था, सभी अयोध्यावासी अब सनाथ हो गए हैं। इसलिए सबके चेहरे पर नई आभा और चमक थी।
सब अपने घरों में दीए जलाकर एक-दूसरे को प्रभु राम के आगमन की बधाइयाँ दे रहे थे। गलियों, मुहल्लों और राजपथ पर ढोल-मँजीरे बज रहे थे, और लोग देह की सुध-बुध भूल, आनंदमग्न होकर नाच रहे थे।
अयोध्या में ऐसा सुख बरसों बाद आया था।
तीनों रानियाँ कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी भर-भरकर दान दे रही थीं, और कामना कर रही थीं कि अयोध्या में यह आनंद हमेशा बना रहे। राम की अयोध्या आनंदमयी है, वह हमेशा आनंदमयी रहे।
स्वर्ग के देवताओं ने भी मानो पुष्पवर्षा करके कहा, ‘तथास्तु!’ और वे भी अयोध्यावासियों के साथ इन सुंदर पलों का आनंद लेते हुए, अपनी आँखों को तृप्त करने लगे।
*
रामचंद्र जी अब एक-एक करके तीनों रानियों के महल में गए। सबसे पहले वे कैकेयी से जाकर मिले। कहा, “माँ, तुम्हारा प्यार मुझ पर सबसे अधिक है। यह मैंने बचपन से ही देखा है। अब भी तुम्हारा लाड़-प्यार याद आता है, तो आँखें भर आती हैं।”
सुनकर कैकेयी ने बड़े प्यार से राम को गले लगाया और ढेर सारी असीसें दीं। बोलीं, “बेटा, माता कुमाता भले ही हो जाए, पर तुम्हारे जैसा पुत्र तो हमेशा सुपुत्र ही रहता है। तुमने मेरी भूलों को भुला दिया, इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती है!” कहते हुए कैकेयी का गला भर आया।
इस पर रामचंद्र जी ने कहा, “आप तो निमित्त थीं माँ। ऐसा होना ही था। नहीं तो भला रावण जैसे दुष्ट राक्षस का वध कैसे होता?”
कैकेयी से कुछ बोलते न बना। वे बार-बार प्रभु राम के सिर पर हाथ फेरते हुए, बलैयाँ लेने लगीं।
फिर कैकेयी से विदा लेकर रामचंद्र जी माता कौशल्या के महल में पहुँचे, तो उनकी हालत उस गाय जैसी थी, जो अपने बछड़े को देखकर, रँभाती हुई दौड़ पड़ती है। उन्होंने बार-बार राम को गले लगाया और पुचकारा। बोलीं, “तुम कितने ही बड़े क्यों न हो जाओ पुत्र, मेरे लिए तो आज भी छोटे से शिशु ही हो, जिसे मैंने ममता से भर-भरकर चूमा था, और दूध पिलाया था!”
कहते हुए उनकी आँखों से अजस्र स्नेह झरने लगा। फिर बोलीं, “सच्ची बताओ, वन में तुम्हें बहुत कष्ट झेलना पड़ा बेटे?”
राम बोले, “माँ, यह कैसे कहूँ कि वहाँ कोई कष्ट नहीं था? पर सीता जैसी पत्नी मेरे साथ थी. लक्ष्मण जैसा भाई मेरे साथ था। फिर वहाँ इतने लोगों का प्यार मिला। तो वन भी मेरे लिए राजभवन ही था माँ। मैंने थोड़ी सी मुश्किलों में रहने की आदत डाली, और फिर सब ठीक हो गया। सच्ची कहूँ तो खुद वन ने ही मुझे सिखा दिया, कि यहाँ कैसे रहना है!”
सुनकर माँ कौशल्या जैसे निहाल हो गईं। बोलीं, “मैंने न जाने कितने पुण्य किए थे राम, जो तुम्हारे जैसा पुत्र मिला। काश, आज राजा दशरथ होते, तो वे तुमसे मिलकर कितने खुश होते!”
कहते-कहते कौशल्या की आँखें डबडबा गईं। स्वयं रामचंद्र जी को भी बार-बार पिता की याद आ रही थी। बोले, “माँ, तुम चिंता न करो। वे ऊपर आकाश से यह सब देखकर खुश हो रहे होंगे।”
फिर माता कौशल्या से अनुमति लेकर, रामचंद्र जी माता सुमित्रा से मिलने गए। वे राम से मिलकर उत्फुल्ल हो उठीं। बोलीं, “बेटा, कल तक पूरी अयोध्या सूनी पड़ी थी। पर आज तुम्हारे आते ही अयोध्या के प्राण लौट आए हैं। तुम्हारे जाने के बाद कौशल्या और कैकेयी के साथ-साथ मेरा भी एक-एक दिन कैसे बीता, बताना मुश्किल है।”
फिर बोलीं, “तुम्हारे जाने के बाद कैकेयी तो बिल्कुल बदल ही गई बेटा। हर दिन वह तुम्हें याद कर-करके रोती रही है।”
राम बोले, “हाँ माँ, तुम्हारे बिना बताए ही मुझे यह पता चल गया था।”
फिर कहा, “माँ, आपने लक्ष्मण को मेरे साथ भेजा। इसी से मेरा वनवास ठीक से कट पाया। लक्ष्मण जैसा प्यारा भाई साथ था, इसीलिए रावण और इतने बड़े-बड़े राक्षसों का संहार हो सका। तीनों लोकों में ऐसा भाई मिलना कठिन है।”
सुनकर सुमित्रा अपलक राम की ओर देखती रह गईं। फिर बोलीं, “राम तुम हर किसी को सुख देते हो, और छोटो की भी सराहना करके उन्हें बड़ा बना देते हो। इसीलिए तो तुम राम हो। और इसीलिए इस धरती पर तुम्हारे जैसा कोई और न है, न होगा।”
कहते हुए सुमित्रा ने फिर से राम को ढेर सारा प्यार और असीसें दीं।
माता सुमित्रा से मिलकर प्रभु रामचंद्र जी अपने महल में आ गए, जहाँ चप्पे-चप्पे पर पुरानी स्मृतियों की छाप थी।
*
उसी दिन भरत ने गुरु वसिष्ठ के पास जाकर कहा, “हे गुरुदेव, बड़े भाई राम अब आ गए हैं। मैंने उनके आदेश के अनुसार पूरे चौदह वर्षों तक उनकी ओर से दिए गए दाय को सँभाले रखा। पर यह सिंहासन तो उनका ही है, और इस पर बैठने के अधिकारी भी वे ही हैं। वे इस पर विराजमान होंगे तो यह पूरी अयोध्या के लिए आनंद और गौरव की बात होगी।”
फिर कुछ रुककर कहा, “हे गुरुवर, अयोध्या की सारी प्रजा उस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा में है, जब उनका राज्याभिषेक होगा, और वे राजगद्दी सँभालेंगे। आप कृपया इस संबंध में शुभ मुहूर्त बताएँ, ताकि सभी तैयारियाँ की जा सकें।”
भरत के सीधे-सरल वचन सुनकर गुरु वसिष्ठ बहुत प्रसन्न हुए। कहा, “इतने लंबे समय बाद रामचंद्र जी वनवास से अयोध्या लौटे हैं। इससे शुभ घड़ी भला और कौन सी हो सकती है? अब आप लोग राजतिलक की तैयारियाँ करें। राम राजा होंगे तो प्रजा की चिर प्रतीक्षित अभिलाषा पूरी होगी। साथ ही अयोध्या की सारी प्रजा मानो सनाथ हो जाएगी।”
इसके साथ ही उन्होंने सुमंत्र को बुलाकर राम के राज्याभिषेक के लिए जल्दी से मंगल सामग्री लाने के लिए कहा।
सुनकर सुमंत्र के आनंद का ठिकाना न था। वे उसी समय अपना रथ निकालकर तेजी से दौड़ाते हुए, इस अवसर के अनुकूल पूजा-अर्चन की सामग्री लेने चल दिए।
भरत जी ने छोटे भाई शत्रुघ्न से प्रभु रामचंद्र जी के राज्याभिषेक की सभी तैयारियाँ करने के लिए कहा। साथ ही राजमहलों में जाकर तीनों माताओं को यह संदेश दिया।
यह आनंद का समाचार सुन, राजमहलों में नया जीवन, नई स्फूर्ति, नई उमंग सी छा गई। हर ओर खुशियों और उत्साह भरी चहल-पहल थी। तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी के आनंद का ठिकाना न था। वे पूरी लगन के साथ तैयारियों में लग गईं। सेवक-सेविकाएँ दौड़-दौड़कर सब काम कर रहे थे, ताकि कहीं कोई कसर न रह जाए।
होते-होते यह समाचार पूरी अयोध्या में फैल गया। और फिर अयोध्या के राजमहलों की तरह ही वहाँ के घर, गलियों और मुहल्लों में भी तरह-तरह की सजावट होने लगी। सुंदर पुष्पहारों, इत्र और केवड़े की सुगंध से हवाएँ महकने लगीं। मानो ये सुगंधित हवाएँ ही घर-घर जाकर राम के राज्याभिषेक की पाती बाँट रही हों।
सब बड़े आनंद के साथ रामचंद्र जी के राज्याभिषेक की तैयारियों में अपना योगदान करना चाहते थे।
पूरी अयोध्या और अयोध्या वासियों के लिए यह दिन आनंद-उमंग भरे उत्सव की तरह था, जिसकी वे पिछले चौदह वर्षों से बाट जोह रहे थे।
*
(3)
जय-जय, जय-जय राजा राम
………………………………….
अगले दिन रामचंद्र जी ने प्रातःकाल उठकर सेवकों से कहा कि वे वन से आए उनके साथियों के स्नान आदि की व्यवस्था करें। सुनते ही सेवक दौड़ पड़े। उन्होंने सुग्रीव, हनुमान, विभीषण, अंगद, नल-नील, जामवंत और निषादराज गुह को स्नान करवाया और सुंदर वस्त्र पहनाए।
इसके बाद प्रभु राम ने भरत को अपने पास बुलाया। अपने हाथों से उनके बढ़े हुए केश और जटाएँ काटीं। फिर उन्होंने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को भी वहीं बुला लिया। तीनों छोटे भाइयों को बड़े प्यार से स्नान करवाया।
इसके बाद उन्होंने गुरुदेव वसिष्ठ के पास जाकर अनुमति माँगी। तब अपनी जटाएँ भी कटवाईं और स्नान आदि करने लगे।
इस बीच तीनों माताओं ने सीता को पास बुलाकर, आनंदमग्न होकर स्नान करवाया। फिर बड़े चाव से सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाए।
आखिर वह शुभ घड़ी आ ही गई, जिसकी प्रतीक्षा पूरी अयोध्या कर रही थी।
गुरुवर वसिष्ठ ने प्रभु राम और सीता जी को सोने के राज सिंहासन पर बैठाया। फिर पूजा-अर्चना के बाद पूरे विधि-विधान के साथ प्रभु रामचंद्र जी का राजतिलक किया। इसके बाद तीनों माताओं और सब परिवारी जनों ने मंगल गान गाते हुए, उन्हें तिलक लगाया।
इस अवसर पर वानरराज सुग्रीव, लंका के राजा विभीषण, हनुमान, अंगद, नल-नील, जामवंत और निषादराज गुह भी उपस्थित थे। वे भावमग्न होकर इस शुभ घड़ी का आनंद ले रहे थे। साथ ही अयोध्या के गणमान्य लोग भी इस सुंदर पर्व के साक्षी बनकर, अपनी आँखें तृप्त कर रहे थे।
सब ओर इत्र, फूलों और सुगंधित केवड़े की वर्षा हो रही थी तथा हवाओं में मंगल गान गूँज रहे थे।
*
प्रभु राम का राज्याभिषेक देख, सारी प्रजा हर्षनाद करके अपना आनंद प्रकट करने लगी। सब कह रहे थे, “अहा, अयोध्या राम की है और अब राम ही हमारे राजा हैं। वे हम सबके हैं और हम उनके। प्रभु राम बिन कहे ही हमारा सुख-दुख समझ जाते हैं। भला उनके जैसा राजा और कौन हो सकता है!”
अयोध्या की गलियों में लोग भावमग्न होकर नृत्य कर रहे थे। सुंदर बधाई गीत गाए जा रहे थे, जिनकी स्वर लहरियाँ किसी चँदोवे की तरह पूरे अयोध्या पर छा गई थीं। ढोल और मँजीरे की गूँज दिशा-दिशा में व्याप्त थी।
बीच-बीच में लोग आनंदविभोर होकर कह उठते, “हम सब बड़भागी हैं कि हमें राम की प्रजा कहलाने का सुख मिला। यह कोई छोटा सुख नहीं है। लगता है, हमने पूर्व जन्मों में बड़े पुण्य किए होंगे। इसलिए हम इस आनंदपूर्ण दृश्य के साक्षी बन रहे हैं!”
यों राम अयोध्या के राजा बने, तो अयोध्या में मानो आनंद की नदियाँ ही उमड़ पड़ीं। सृष्टि का सारा सुख वहाँ चला आया। और केवल स्वर्ग ही नहीं, तीनों लोकों के सारे सुख-सौभाग्य अयोध्या में आकर निवास करने लगे।
राम के वनवास से आने पर अयोध्या ने फिर से अपना गौरव पा लिया था। अब वह फिर से धरती का स्वर्ग बन गई थी, जिसे देखने और राम की महिमा का आनंद लेने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे थे।
अयोध्या में अचानक ही तीनों लोकों की सारी ऋद्धि-सिद्धियाँ आकर निवास करने लगी थीं। हर ओर सुख, समृद्धि और सुंदरता का साम्राज्य। प्रजा प्रसन्न थी कि वह जीते जी मानो स्वर्ग का सुख प्राप्त कर रही थी।
राम अयोध्या के राजा बने, तो वहाँ की हवाएँ गीतों में पिरोकर दूर-दूर तक यह समाचार पहुँचाने लगीं। सारी प्रजा के होंठों पर इस गीत के बोल नृत्य कर रहे थे—
राम राजा बने,
राम राजा बने,
राम लाखों दिलों के राजा बने,
आज खुश है अयोध्या, राजा बने,
राम राजा बने, राम राजा बने…
हम सबके दिलों के राजा बने,
अजी, राजा बने, महाराजा बने,
आज खुश है अयोध्या, राजा बने,
राम राजा बने, राम राजा बने…!!
यों पूरे अग-जग तक राम के राज्याभिषेक का आनंदपूर्ण समाचार फैल गया था।
अब अयोध्या राम की ही नहीं, जन-जन की अयोध्या हो गई थी, जिसमें हर दिन उत्सव, हर दिन दीवाली थी।
मानस के उत्तरकाण्ड से
राम के सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने का प्रिय और आनंददायक प्रसंग नवरात्रि के पाठ के बाद एक बार पुनः पढ़ने के लिए मिला। बेहद आनंददायक लेकिन भावुक पल हैं।
भाइयों का परस्पर मिलन और स्नेह कि राम स्वयं, अपने हाथों से पहले भरत की जटाओं को खोलते हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा का आत्मिक निर्वाह ,कि जाति- पाँति से परे राम के सभी सहायकों को चरण स्पर्श करने पर गले लगाते हैं, क्योंकि वे राम के लिये सहोदर की तरह हैं, राम ने उन्हें गले लगाया है।
माताओं की ममता और अयोध्या की जनता तो सागर की तरह आनंद की लहरों में थी, जिससे प्रेम के रत्न बरस रहे थे।
प्रेम हर रंग में, हर रूप में वहाँ पर नजर आ रहा था।
राम को इस प्रसंग में पढ़ते हुए मन पूरी तरह राममय , अयोध्यामय हो जाता है।मन-आत्मा और प्राण उस काल में पहुँच जाते हैं, प्रेम की विव्हलता से आँसू भर-भर आते हैं।
खुशियों का रंग-रूप भी अद्भुत है !पता नहीं आँसुओं से उसका क्या तालमेल है कि दुख के प्रतीक होते हुए भी खुशी के अनमोल क्षणों में भी दुख की ही तरह सुख में भी साथ निभाते हैं।
मानस में प्रेम भाव ने ही अपने हर संबंध के मानक को त्याग,संयम और समर्पण की सीमा तक निस्वार्थ भाव से निभाया। रिश्तों के बरक्स मर्यादाओं की स्थापना का वह उच्चतम व सर्वोच्च शीर्ष था; जिसे कहकर नहीं जीवन में करके स्थापित किया गया, जो उसके बाद कभी नहीं दिखा और वर्तमान में अपने निम्नतम स्तर पर है।
आपकी इस रचना को मन-कर्म और आत्मा से माता-पिता और गुरु जनों द्वारा मिले हमारे जितने भी अच्छे और पवित्र संस्कार हैं उनके द्वारा प्रणाम
रामायण में जितना भरत ने रुलाया उतना किसी ने नहीं।
आपके इस पवित्र सर्जन के लिए आपको बार-बार प्रणाम
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का दिल से शुक्रिया।
और दिल की उतनी ही गहराइयों से पुरवाई का आभार भीआदरणीय बाबूजी
मानस के उत्तरकाण्ड से
राम के सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने का प्रिय और आनंददायक प्रसंग नवरात्रि के पाठ के बाद एक बार पुनः पढ़ने के लिए मिला। बेहद आनंददायक लेकिन भावुक पल हैं।
भाइयों का परस्पर मिलन और स्नेह कि राम स्वयं, अपने हाथों से पहले भरत की जटाओं को खोलते हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा का आत्मिक निर्वाह ,कि जाति- पाँति से परे राम के सभी सहायकों को चरण स्पर्श करने पर गले लगाते हैं, क्योंकि वे राम के लिये सहोदर की तरह हैं, राम ने उन्हें गले लगाया है।
माताओं की ममता और अयोध्या की जनता तो सागर की तरह आनंद की लहरों में थी, जिससे प्रेम के रत्न बरस रहे थे।
प्रेम हर रंग में, हर रूप में वहाँ पर नजर आ रहा था।
राम को इस प्रसंग में पढ़ते हुए मन पूरी तरह राममय , अयोध्यामय हो जाता है।मन-आत्मा और प्राण उस काल में पहुँच जाते हैं, प्रेम की विव्हलता से आँसू भर-भर आते हैं।
खुशियों का रंग-रूप भी अद्भुत है !पता नहीं आँसुओं से उसका क्या तालमेल है कि दुख के प्रतीक होते हुए भी खुशी के अनमोल क्षणों में भी दुख की ही तरह सुख में भी साथ निभाते हैं।
मानस में प्रेम भाव ने ही अपने हर संबंध के मानक को त्याग,संयम और समर्पण की सीमा तक निस्वार्थ भाव से निभाया। रिश्तों के बरक्स मर्यादाओं की स्थापना का वह उच्चतम व सर्वोच्च शीर्ष था; जिसे कहकर नहीं जीवन में करके स्थापित किया गया, जो उसके बाद कभी नहीं दिखा और वर्तमान में अपने निम्नतम स्तर पर है।
आपकी इस रचना को मन-कर्म और आत्मा से माता-पिता और गुरु जनों द्वारा मिले हमारे जितने भी अच्छे और पवित्र संस्कार हैं उनके द्वारा प्रणाम
रामायण में जितना भरत ने रुलाया उतना किसी ने नहीं।
आपके इस पवित्र सर्जन के लिए आपको बार-बार प्रणाम
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का दिल से शुक्रिया।
और दिल की उतनी ही गहराइयों से पुरवाई का आभार भी
बिटिया, आपने इतना डूबकर लिखा कि आपकी यह भावुक टिप्पणी पढ़ते हुए आंखों से आंसू बह निकले। सच पूछो तो जब मैंने लिखा था, तब भी यही हालत थी। खुशी और आनंद के आंसू भी संभाले नहीं जाते बिटिया!
आपने मेरे मन में उमड़ते भावों को ठीक वैसा ही ग्रहण किया। इसलिए मन सचमुच आनंद में उमग रहा है और पुलकित सा है।
रावण का श्री राम अंत कर चुके हैं, विभीषण लंका के सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं साथ ही वन की 14 वर्षीय अवधि समाप्त हो चुकी है, विभीषण ने पुष्पक विमान से उनके अयोध्या लौटने की तैयारी भी पूरी कर दी है लेकिन वन अवधि के समय जो उनके अभिन्न मित्र रहे जैसे विभीषण, हनुमान ,सुग्रीव ,अंगद ,नल ,नील, जामवंत इत्यादि राम को छोड़ना ही नहीं चाहते न ,हीं वह कुछ मुंह से कुछ कह पा रहे हैं, नैनों में जो याचना का भाव है सिर्फ और सिर्फ राम उसे समझ करके उन्हें अयोध्या तक साथ चलने के लिए विमान में साथ बैठा लेते हैं ,
लौटते समय वही क्षण जो पूर्व वनवास में रहते हुए सीता के साथ बिताए थे , पुनः उन्हीं दृश्य को देखकर उसे समय को याद करते हुए सीता को बताते हुए चलते हैं कि यहां हमने समुद्र पर सेतु बनाया था, दंडकारण्य वन में विमान को रोक कर ऋषि अगस्त्य से मिलकर उनका आशीर्वाद लेते हैं चित्रकूट में बताए हुएपलो को सीता जी भी याद करती हैं, यह सत्य है कि यदि स्त्री का पति अगर साथ में हो तो वन भी महल से कम नहीं होता, पति का प्रेम प्रसुरक्षा ही स्त्री के लिए सर्वोपरि होती है।
प्रयाग के आते ही पुनः विमान से उतरकर मुनि भारद्वाज के दर्शन करना आशीर्वाद लेना त्रिवेणी में स्नान करना इत्यादि के बाद, अब अयोध्या ज्यादा दूर नहीं है ,श्री राम को अपने भाई भारत का अंतिम वाक्य याद आता है की आपको वन में 14 वर्ष के बाद एक भी दिन ऊपर नहीं होना चाहिए अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगा राम अपने छोटे भाई भरत के प्रेम को समझने में बिल्कुल भी भूल नहीं करते, तुरंत हनुमान को पूर्व संदेश भरत के पास पहुंचा देते हैं कि हम जल्दी ही अयोध्या पहुंचने वाले हैं।
अयोध्या में यह संदेश पहुंचते ही मानो पवन के झोंको ने यह संदेश जन-जन तक पहुंचा दिया है फूल अपनी खुशबू बिखरने लगे हैं सहयोग का जल कल कल निनाद कर रहा है
राम अयोध्या आ रहे हैं राम अयोध्या आ गए हैं राम आ रहे हैं अयोध्या के राम आ रहे हैं
घर-घर ग्राम ग्राम मंगल तोरण बांधे जा रहे हैं ढोल मजीरे बजने से एक आनंदमय कोलाहल हो रहा है।
आखिरकार राम आ पहुंचे हैं सर्वप्रथम गुरु वशिष्ठ का आशीर्वाद लेते हुए माताओ के गले लगते हैं , माताये राम को स्पर्श करके भाव विह्वल होकर उन्हें देख रही हैं,
समस्त अयोध्या से पहुंचे जन-जन के काफिले को प्रणाम करते हैं जो राम के स्वागत में जिनके मस्तक झुके हुए हैं, आंखों में प्रेम की वर्षा का सरोवर भरा हुआ है
महल में पहुंचकर सर्वप्रथम राम माता केकई के महल में पहुंचते हैं, माता केकई का राम को गले लगाना और यह कहना की माता को माता हो सकती है लेकिन पुत्र सदैव सुपुत्र ही रहता है,
तब राम का यह कहना की माता कभी भी कुमाता नहीं होती, पुत्र को पुत्र हो सकते हैं, आप तो सिर्फ निमित्त मात्र थी ,आप ही की वजह से दुष्टों का वन में संहार हुआ, आपकी वजह से ही मैं जिंदगी को विभिन्न परिस्थितियों में, कैसे जिया जाता है,यह सीख पाया। आपने मुझे बचपन से ही अधिक स्नेह किया
श्री राम अन्य माताओं से मिलते हैं
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारी हो चुकी है चहूं और
हर्ष ही हर्ष आनंद ही आनंद फैला हुआ है,एक सुगंधित बयार बह रही है ,
राम का राजतिलक होने वाला है
आदरणीय मनु जी आपने रामचरितमानस से एक ऐसा प्रसंग उद्धृत किया है,जो कई कालखंड बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक है और प्रासंगिक रहेगा यह हमारी भारतीय संस्कृति की अमित झलक प्रस्तुत करता है
गुरु शिष्य परंपरा मित्रों का साथ भाई भाई का आपस में प्रेम
संकट में जिजीविषा को नहीं त्यागना, अच्छाई की बुराई पर विजय ही मनुष्य को मानव से राम श्री राम प्रभु राम बनाती
हे।
इतना मर्म स्पर्शी वर्णन किया है आपने की कोई भी इसे प्रसंग को पड़ेगा तो भावो की गंगा में सराबोर हो जाएगा
बस इतना ही कह सकती हूं कि में आपकी कलम को नमन करती हूं,आपके हृदय में उठे हुए इस संवेदनशील संवेदनाओं को जन जन में अति सरल रूप में पहुंचा कर एक पावन कार्य किया है
सच है यह कलम आप जैसे विरले विद्वान लेखकों का ही मुकुट है
साधुवाद
प्रिय कुंती जी,
रामकथा पर केंद्रित इस कहानी को आपने इतने मन से पढ़ा और उस पर इतनी भावभीनी टिप्पणी लिखी कि मन अभिभूत सा है। सच में रामकथा ऐसी सुंदर और सात्विक है कि न लिखते हुए कुछ सुध-बुध रहती है और न पढ़ते हुए। इसलिए जब मैंने यह प्रसंग लिखा, तो मन भीगा हुआ था।
आपका एक बार फिर से आभार कुंती जी। आपने सचमुच भावमग्न कर दिया।
रामकथा सदैव जन-मानस को भावविभोर कर भावनाओ में बहाती रही है।उसकी रसमयता हृदय को आप्लावित करतीहै।डा प्रकाश मनु.सर द्वारा रचित कहानी *चले अयोध्या की ओर ,राम वनवास से लौटकर आयें वनवासी राम के अयोध्या नगरी में प्रवेश करने की रोचक अलौकिक कथा है।
कहानी का प्रारंभ ही औत्सुक्य पूर्ण है।राम रावण युद्ध समाप्त हो चुका था।राम सीता और लक्ष्मण के.साथ अयोध्या लौटने की तैयारियों में व्यस्त हो गए। हाय जोड़कर सभी.वारों रीछ भालुवों से उनकी सहायता के लिए आभार प्रकट कर उन्हे विदा करते हैं। उनको नंदीग्राम में भरत का तपस्वी जीवन माताओ का दुलार स्नेह याद आ रहा है। आज राम का मन उनके.वश में नहीं है।आदरणीय प्रकाश मनु.सर की भगवान राम के प्रति अनन्य निष्ठा और भक्ति ही है जो रामकथा को एक सामान्य कथा नहीं बल्कि सरयू की पावन धारा सी लगती है।.यह उनकी लेखनी का ही जादू है जो.उसकी रसधारा में पाठक का.मन बहता चला जाता है।उनके द्वारा प्रस्तुत इस कहानी में राम एक अलौकिक पुरुष की.तरह नहीं बल्कि एक सामान्य मानव हैं जो.हर्ष विषाद सुख दुःख की अनेक स्थितियों से प्रभावित हुए बिना उनमें निहित भावनात्मक अनुभूतियों को महसूस भी करते.हैं। उनकी आंखें भरत के त्याग व भ्रातृ प्रेम को.देखकर बार बार भर आती हैं।यह अयोध्या वापसी एक ऐतिहासिक महत्वपूर्ण घटना है। जब अयोध्या वासियों नें रंगोली बनाकर दीप जलाए थे,अयोध्या का कोना कोना जगमगाया था। पूरे देश में दीपावली मनाने की प्रेरक रोचक परंपरा की नींव भी पडी थी। राम अधर्म और अन्याय के रावण को मार कर लौटे थे।जो तमिस्रा आतंक और कुवृत्ति का प्रतीक था इसलिए दीपावली भी तमस और अधर्म जनित बुराई के विरुद्ध उसके नाश के रुप में मनाई जाती है।
इस कहानी का प्रवाह पाठक को बांधे रखता है. विभीषण द्वारा उपलब्ध कराए गए पुष्पक विमान पर बैठे राम अपनी यात्रा में महत्वपूर्ण तीर्थों आश्रम और पूजा स्थलों को सीता को दिखाते हैं।गंगा की विशाल जलराशि देखकर उन्हे सरयू की याद हो आती है।उसके किनारे बिताए बचपन के दिन, भाईयों संग खेले खेल बहुत याद आ रहे हैं। कहानी कई रोचकता और. भावुकता तब और बढ जाती है जब प्रभु राम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं कि विपत्ति के समय सबने उनका साथ दिया था।
रास्ते में वे सीता को वे स्थान दिखाते जा रहे थे, जहाँ वनवास के दिनों में वे रहे थे।
उन्होंने सीता जी को वह स्थान भी दिखाया, जहाँ समुद्र पर बाँध बनाया गया था और उन्होंने शिवलिंग स्थापित करके, पूजा की थी।
यद्यपि राम की कथा नयी नहीं परंतु जितनी बार भी पढी जाये नित नूतन ही लगती है। राम का चरित्र और सीता का सौंदर्य पल पल बढता ही जाता है।क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदैव रुंपं रमणीयताया;।
फिर विमान दंडकारण्य पहुँचा तो रामचंद्र जी ने विमान को रुकवाया। वहाँ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर उन्होंने आशीर्वाद लिया। फिर विमान आगे चित्रकूट पहुँचा तो वे वहाँ भी सब ऋषि-मुनियों से बड़े प्रेम से मिले। इन यादों को एक बार पुन स्मरण करते हुए सीता वनवास के दिनों को याद करती हैं। वन में उन्होंने चाहे जितने भी कष्ट झेले हों, पर वन उनके लिए आनंद का तपोवन भी तो था। महर्षि भरद्वाज, वाल्मीकि और अत्रि समेत अनेक ऋषि-मुनियों से मिलने का आनंद तो वे कभी भूल ही नहीं सकतीं। फिर उन्हें गुरु माँ अनुसूया का सरल स्नेह और प्यार से दी गई शिक्षा याद आई, जिसने सुख-दुख की घड़ियों में उन्हें सुमार्ग दिखाने का काम किया। प्रयाग और गंगा यमुना का संगम देख राम और सीता ने अपना प्रणाम निवेदित किया।
अयोध्या निकट आ गई थी।मन सभी का विह्वल हो रहा था।सीता परिजनों को मिलने के लिए अत्यंत उत्कंठित.हो उठींरामचंद्र जी ने हनुमान को बुलाकर कहा, “हे हनुमंत, तुम अभी वटुक वेश में अयोध्या चले जाओ। वहाँ भरत को मेरे आने का संदेश देना। साथ ही उनकी कुशल-क्षेम पता करके, जल्दी यहाँ लौट आओ।”.कथाकार प्रकाश मनु.सर ने राम की उत्सुकता विहवलता का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। फामकथा के कुशल चितेरे आदरणीय प्रकाश मनु.सर ने रामायण के इस उत्तरार्ध प्रसंग को सुंदर भाव शिल्प और बिंबों को प्रस्तुत करने की अनूठी कला से मानो जान डाल दी है।आपकी लेखनी को शत-शत वंदन। राम के चरणारविंदों का वंदन।बहुत बहुत बधाईर बाबूजी।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
आदरणीय बाबूजी
मानस के उत्तरकाण्ड से
राम के सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने का प्रिय और आनंददायक प्रसंग नवरात्रि के पाठ के बाद एक बार पुनः पढ़ने के लिए मिला। बेहद आनंददायक लेकिन भावुक पल हैं।
भाइयों का परस्पर मिलन और स्नेह कि राम स्वयं, अपने हाथों से पहले भरत की जटाओं को खोलते हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा का आत्मिक निर्वाह ,कि जाति- पाँति से परे राम के सभी सहायकों को चरण स्पर्श करने पर गले लगाते हैं, क्योंकि वे राम के लिये सहोदर की तरह हैं, राम ने उन्हें गले लगाया है।
माताओं की ममता और अयोध्या की जनता तो सागर की तरह आनंद की लहरों में थी, जिससे प्रेम के रत्न बरस रहे थे।
प्रेम हर रंग में, हर रूप में वहाँ पर नजर आ रहा था।
राम को इस प्रसंग में पढ़ते हुए मन पूरी तरह राममय , अयोध्यामय हो जाता है।मन-आत्मा और प्राण उस काल में पहुँच जाते हैं, प्रेम की विव्हलता से आँसू भर-भर आते हैं।
खुशियों का रंग-रूप भी अद्भुत है !पता नहीं आँसुओं से उसका क्या तालमेल है कि दुख के प्रतीक होते हुए भी खुशी के अनमोल क्षणों में भी दुख की ही तरह सुख में भी साथ निभाते हैं।
मानस में प्रेम भाव ने ही अपने हर संबंध के मानक को त्याग,संयम और समर्पण की सीमा तक निस्वार्थ भाव से निभाया। रिश्तों के बरक्स मर्यादाओं की स्थापना का वह उच्चतम व सर्वोच्च शीर्ष था; जिसे कहकर नहीं जीवन में करके स्थापित किया गया, जो उसके बाद कभी नहीं दिखा और वर्तमान में अपने निम्नतम स्तर पर है।
आपकी इस रचना को मन-कर्म और आत्मा से माता-पिता और गुरु जनों द्वारा मिले हमारे जितने भी अच्छे और पवित्र संस्कार हैं उनके द्वारा प्रणाम
रामायण में जितना भरत ने रुलाया उतना किसी ने नहीं।
आपके इस पवित्र सर्जन के लिए आपको बार-बार प्रणाम
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का दिल से शुक्रिया।
और दिल की उतनी ही गहराइयों से पुरवाई का आभार भीआदरणीय बाबूजी
मानस के उत्तरकाण्ड से
राम के सीता और लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने का प्रिय और आनंददायक प्रसंग नवरात्रि के पाठ के बाद एक बार पुनः पढ़ने के लिए मिला। बेहद आनंददायक लेकिन भावुक पल हैं।
भाइयों का परस्पर मिलन और स्नेह कि राम स्वयं, अपने हाथों से पहले भरत की जटाओं को खोलते हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा का आत्मिक निर्वाह ,कि जाति- पाँति से परे राम के सभी सहायकों को चरण स्पर्श करने पर गले लगाते हैं, क्योंकि वे राम के लिये सहोदर की तरह हैं, राम ने उन्हें गले लगाया है।
माताओं की ममता और अयोध्या की जनता तो सागर की तरह आनंद की लहरों में थी, जिससे प्रेम के रत्न बरस रहे थे।
प्रेम हर रंग में, हर रूप में वहाँ पर नजर आ रहा था।
राम को इस प्रसंग में पढ़ते हुए मन पूरी तरह राममय , अयोध्यामय हो जाता है।मन-आत्मा और प्राण उस काल में पहुँच जाते हैं, प्रेम की विव्हलता से आँसू भर-भर आते हैं।
खुशियों का रंग-रूप भी अद्भुत है !पता नहीं आँसुओं से उसका क्या तालमेल है कि दुख के प्रतीक होते हुए भी खुशी के अनमोल क्षणों में भी दुख की ही तरह सुख में भी साथ निभाते हैं।
मानस में प्रेम भाव ने ही अपने हर संबंध के मानक को त्याग,संयम और समर्पण की सीमा तक निस्वार्थ भाव से निभाया। रिश्तों के बरक्स मर्यादाओं की स्थापना का वह उच्चतम व सर्वोच्च शीर्ष था; जिसे कहकर नहीं जीवन में करके स्थापित किया गया, जो उसके बाद कभी नहीं दिखा और वर्तमान में अपने निम्नतम स्तर पर है।
आपकी इस रचना को मन-कर्म और आत्मा से माता-पिता और गुरु जनों द्वारा मिले हमारे जितने भी अच्छे और पवित्र संस्कार हैं उनके द्वारा प्रणाम
रामायण में जितना भरत ने रुलाया उतना किसी ने नहीं।
आपके इस पवित्र सर्जन के लिए आपको बार-बार प्रणाम
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का दिल से शुक्रिया।
और दिल की उतनी ही गहराइयों से पुरवाई का आभार भी
बिटिया, आपने इतना डूबकर लिखा कि आपकी यह भावुक टिप्पणी पढ़ते हुए आंखों से आंसू बह निकले। सच पूछो तो जब मैंने लिखा था, तब भी यही हालत थी। खुशी और आनंद के आंसू भी संभाले नहीं जाते बिटिया!
आपने मेरे मन में उमड़ते भावों को ठीक वैसा ही ग्रहण किया। इसलिए मन सचमुच आनंद में उमग रहा है और पुलकित सा है।
मेरा स्नेहपूर्ण आशीर्वाद,
प्रकाश मनु
रावण का श्री राम अंत कर चुके हैं, विभीषण लंका के सिंहासन पर विराजमान हो चुके हैं साथ ही वन की 14 वर्षीय अवधि समाप्त हो चुकी है, विभीषण ने पुष्पक विमान से उनके अयोध्या लौटने की तैयारी भी पूरी कर दी है लेकिन वन अवधि के समय जो उनके अभिन्न मित्र रहे जैसे विभीषण, हनुमान ,सुग्रीव ,अंगद ,नल ,नील, जामवंत इत्यादि राम को छोड़ना ही नहीं चाहते न ,हीं वह कुछ मुंह से कुछ कह पा रहे हैं, नैनों में जो याचना का भाव है सिर्फ और सिर्फ राम उसे समझ करके उन्हें अयोध्या तक साथ चलने के लिए विमान में साथ बैठा लेते हैं ,
लौटते समय वही क्षण जो पूर्व वनवास में रहते हुए सीता के साथ बिताए थे , पुनः उन्हीं दृश्य को देखकर उसे समय को याद करते हुए सीता को बताते हुए चलते हैं कि यहां हमने समुद्र पर सेतु बनाया था, दंडकारण्य वन में विमान को रोक कर ऋषि अगस्त्य से मिलकर उनका आशीर्वाद लेते हैं चित्रकूट में बताए हुएपलो को सीता जी भी याद करती हैं, यह सत्य है कि यदि स्त्री का पति अगर साथ में हो तो वन भी महल से कम नहीं होता, पति का प्रेम प्रसुरक्षा ही स्त्री के लिए सर्वोपरि होती है।
प्रयाग के आते ही पुनः विमान से उतरकर मुनि भारद्वाज के दर्शन करना आशीर्वाद लेना त्रिवेणी में स्नान करना इत्यादि के बाद, अब अयोध्या ज्यादा दूर नहीं है ,श्री राम को अपने भाई भारत का अंतिम वाक्य याद आता है की आपको वन में 14 वर्ष के बाद एक भी दिन ऊपर नहीं होना चाहिए अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगा राम अपने छोटे भाई भरत के प्रेम को समझने में बिल्कुल भी भूल नहीं करते, तुरंत हनुमान को पूर्व संदेश भरत के पास पहुंचा देते हैं कि हम जल्दी ही अयोध्या पहुंचने वाले हैं।
अयोध्या में यह संदेश पहुंचते ही मानो पवन के झोंको ने यह संदेश जन-जन तक पहुंचा दिया है फूल अपनी खुशबू बिखरने लगे हैं सहयोग का जल कल कल निनाद कर रहा है
राम अयोध्या आ रहे हैं राम अयोध्या आ गए हैं राम आ रहे हैं अयोध्या के राम आ रहे हैं
घर-घर ग्राम ग्राम मंगल तोरण बांधे जा रहे हैं ढोल मजीरे बजने से एक आनंदमय कोलाहल हो रहा है।
आखिरकार राम आ पहुंचे हैं सर्वप्रथम गुरु वशिष्ठ का आशीर्वाद लेते हुए माताओ के गले लगते हैं , माताये राम को स्पर्श करके भाव विह्वल होकर उन्हें देख रही हैं,
समस्त अयोध्या से पहुंचे जन-जन के काफिले को प्रणाम करते हैं जो राम के स्वागत में जिनके मस्तक झुके हुए हैं, आंखों में प्रेम की वर्षा का सरोवर भरा हुआ है
महल में पहुंचकर सर्वप्रथम राम माता केकई के महल में पहुंचते हैं, माता केकई का राम को गले लगाना और यह कहना की माता को माता हो सकती है लेकिन पुत्र सदैव सुपुत्र ही रहता है,
तब राम का यह कहना की माता कभी भी कुमाता नहीं होती, पुत्र को पुत्र हो सकते हैं, आप तो सिर्फ निमित्त मात्र थी ,आप ही की वजह से दुष्टों का वन में संहार हुआ, आपकी वजह से ही मैं जिंदगी को विभिन्न परिस्थितियों में, कैसे जिया जाता है,यह सीख पाया। आपने मुझे बचपन से ही अधिक स्नेह किया
श्री राम अन्य माताओं से मिलते हैं
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारी हो चुकी है चहूं और
हर्ष ही हर्ष आनंद ही आनंद फैला हुआ है,एक सुगंधित बयार बह रही है ,
राम का राजतिलक होने वाला है
आदरणीय मनु जी आपने रामचरितमानस से एक ऐसा प्रसंग उद्धृत किया है,जो कई कालखंड बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक है और प्रासंगिक रहेगा यह हमारी भारतीय संस्कृति की अमित झलक प्रस्तुत करता है
गुरु शिष्य परंपरा मित्रों का साथ भाई भाई का आपस में प्रेम
संकट में जिजीविषा को नहीं त्यागना, अच्छाई की बुराई पर विजय ही मनुष्य को मानव से राम श्री राम प्रभु राम बनाती
हे।
इतना मर्म स्पर्शी वर्णन किया है आपने की कोई भी इसे प्रसंग को पड़ेगा तो भावो की गंगा में सराबोर हो जाएगा
बस इतना ही कह सकती हूं कि में आपकी कलम को नमन करती हूं,आपके हृदय में उठे हुए इस संवेदनशील संवेदनाओं को जन जन में अति सरल रूप में पहुंचा कर एक पावन कार्य किया है
सच है यह कलम आप जैसे विरले विद्वान लेखकों का ही मुकुट है
साधुवाद
प्रिय कुंती जी,
रामकथा पर केंद्रित इस कहानी को आपने इतने मन से पढ़ा और उस पर इतनी भावभीनी टिप्पणी लिखी कि मन अभिभूत सा है। सच में रामकथा ऐसी सुंदर और सात्विक है कि न लिखते हुए कुछ सुध-बुध रहती है और न पढ़ते हुए। इसलिए जब मैंने यह प्रसंग लिखा, तो मन भीगा हुआ था।
आपका एक बार फिर से आभार कुंती जी। आपने सचमुच भावमग्न कर दिया।
स्नेह,
प्रकाश मनु
आपका लिखा जब भी पढ़ती हूँ, मन को छू जाता है।प्रणाम
बहुत-बहुत आभार सुदर्शन जी।
स्नेह,
प्रकाश मनु
रामकथा सदैव जन-मानस को भावविभोर कर भावनाओ में बहाती रही है।उसकी रसमयता हृदय को आप्लावित करतीहै।डा प्रकाश मनु.सर द्वारा रचित कहानी *चले अयोध्या की ओर ,राम वनवास से लौटकर आयें वनवासी राम के अयोध्या नगरी में प्रवेश करने की रोचक अलौकिक कथा है।
कहानी का प्रारंभ ही औत्सुक्य पूर्ण है।राम रावण युद्ध समाप्त हो चुका था।राम सीता और लक्ष्मण के.साथ अयोध्या लौटने की तैयारियों में व्यस्त हो गए। हाय जोड़कर सभी.वारों रीछ भालुवों से उनकी सहायता के लिए आभार प्रकट कर उन्हे विदा करते हैं। उनको नंदीग्राम में भरत का तपस्वी जीवन माताओ का दुलार स्नेह याद आ रहा है। आज राम का मन उनके.वश में नहीं है।आदरणीय प्रकाश मनु.सर की भगवान राम के प्रति अनन्य निष्ठा और भक्ति ही है जो रामकथा को एक सामान्य कथा नहीं बल्कि सरयू की पावन धारा सी लगती है।.यह उनकी लेखनी का ही जादू है जो.उसकी रसधारा में पाठक का.मन बहता चला जाता है।उनके द्वारा प्रस्तुत इस कहानी में राम एक अलौकिक पुरुष की.तरह नहीं बल्कि एक सामान्य मानव हैं जो.हर्ष विषाद सुख दुःख की अनेक स्थितियों से प्रभावित हुए बिना उनमें निहित भावनात्मक अनुभूतियों को महसूस भी करते.हैं। उनकी आंखें भरत के त्याग व भ्रातृ प्रेम को.देखकर बार बार भर आती हैं।यह अयोध्या वापसी एक ऐतिहासिक महत्वपूर्ण घटना है। जब अयोध्या वासियों नें रंगोली बनाकर दीप जलाए थे,अयोध्या का कोना कोना जगमगाया था। पूरे देश में दीपावली मनाने की प्रेरक रोचक परंपरा की नींव भी पडी थी। राम अधर्म और अन्याय के रावण को मार कर लौटे थे।जो तमिस्रा आतंक और कुवृत्ति का प्रतीक था इसलिए दीपावली भी तमस और अधर्म जनित बुराई के विरुद्ध उसके नाश के रुप में मनाई जाती है।
इस कहानी का प्रवाह पाठक को बांधे रखता है. विभीषण द्वारा उपलब्ध कराए गए पुष्पक विमान पर बैठे राम अपनी यात्रा में महत्वपूर्ण तीर्थों आश्रम और पूजा स्थलों को सीता को दिखाते हैं।गंगा की विशाल जलराशि देखकर उन्हे सरयू की याद हो आती है।उसके किनारे बिताए बचपन के दिन, भाईयों संग खेले खेल बहुत याद आ रहे हैं। कहानी कई रोचकता और. भावुकता तब और बढ जाती है जब प्रभु राम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं कि विपत्ति के समय सबने उनका साथ दिया था।
रास्ते में वे सीता को वे स्थान दिखाते जा रहे थे, जहाँ वनवास के दिनों में वे रहे थे।
उन्होंने सीता जी को वह स्थान भी दिखाया, जहाँ समुद्र पर बाँध बनाया गया था और उन्होंने शिवलिंग स्थापित करके, पूजा की थी।
यद्यपि राम की कथा नयी नहीं परंतु जितनी बार भी पढी जाये नित नूतन ही लगती है। राम का चरित्र और सीता का सौंदर्य पल पल बढता ही जाता है।क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदैव रुंपं रमणीयताया;।
फिर विमान दंडकारण्य पहुँचा तो रामचंद्र जी ने विमान को रुकवाया। वहाँ अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर उन्होंने आशीर्वाद लिया। फिर विमान आगे चित्रकूट पहुँचा तो वे वहाँ भी सब ऋषि-मुनियों से बड़े प्रेम से मिले। इन यादों को एक बार पुन स्मरण करते हुए सीता वनवास के दिनों को याद करती हैं। वन में उन्होंने चाहे जितने भी कष्ट झेले हों, पर वन उनके लिए आनंद का तपोवन भी तो था। महर्षि भरद्वाज, वाल्मीकि और अत्रि समेत अनेक ऋषि-मुनियों से मिलने का आनंद तो वे कभी भूल ही नहीं सकतीं। फिर उन्हें गुरु माँ अनुसूया का सरल स्नेह और प्यार से दी गई शिक्षा याद आई, जिसने सुख-दुख की घड़ियों में उन्हें सुमार्ग दिखाने का काम किया। प्रयाग और गंगा यमुना का संगम देख राम और सीता ने अपना प्रणाम निवेदित किया।
अयोध्या निकट आ गई थी।मन सभी का विह्वल हो रहा था।सीता परिजनों को मिलने के लिए अत्यंत उत्कंठित.हो उठींरामचंद्र जी ने हनुमान को बुलाकर कहा, “हे हनुमंत, तुम अभी वटुक वेश में अयोध्या चले जाओ। वहाँ भरत को मेरे आने का संदेश देना। साथ ही उनकी कुशल-क्षेम पता करके, जल्दी यहाँ लौट आओ।”.कथाकार प्रकाश मनु.सर ने राम की उत्सुकता विहवलता का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। फामकथा के कुशल चितेरे आदरणीय प्रकाश मनु.सर ने रामायण के इस उत्तरार्ध प्रसंग को सुंदर भाव शिल्प और बिंबों को प्रस्तुत करने की अनूठी कला से मानो जान डाल दी है।आपकी लेखनी को शत-शत वंदन। राम के चरणारविंदों का वंदन।बहुत बहुत बधाईर बाबूजी।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
अरे बिटिया, बहुत सुंदर लिखा। बहुत ही सुंदर। रामकथा की भावना को आपने हृदय से ग्रहण किया, फिर लिखा तो जैसे भावनाओं में बहती चली गईं।
इतना सुंदर और भावमय और कौन लिखेगा। मेरे ढेरों आशीर्वाद बिटिया।
स्नेह, प्रकाश मनु