Wednesday, February 11, 2026
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राजेंद्र सिंह गहलौत का लेख – अश्क की प्रभावशाली मनोविश्लेषणात्मक कहानी पलंग बनाम प्रियंवद की पलंग कहानी

अतीत की किसी कहानी से  प्रभावित हो कर वर्तमान में कहानी लिखना या पूर्व में लिखी किसी कहानी  से प्रेरित हो कर वर्तमान में एक नई कहानी लिखना कोई नई बात नहीं है । ऐसे प्रयोग साहित्य जगत में कई  बार हुये है । लेकिन अतीत की किसी कहानी से इस कदर प्रभावित होकर वर्तमान में कहानी लिखना कि उस अतीत की कहानी का शीर्षक भी वर्तमान में लिखी गई कहानी में यथावत रखा जाये तो वह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान की  कहानी का कहानीकार अतीत की उस कहानी से अत्याधिक प्रभावित हैं । लेकिन इन सब के बावजूद जब वर्तमान में लिखी गई कहानी अपने कथ्य, कथानक एवं कथानक में उत्पन्न परिस्थितियों से पाठकों को निराश ही न करें बल्कि उनके मन में क्षोभ भी पैदा करें तो वर्तमान में लिखी गई कहानी के उद्देश्य पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है । यह अलग बात है कि वर्तमान का कहानीकार सप्रयास अपने प्रभाव से अपनी उक्त कहानी को चर्चित करा ले । जबकि अतीत की तथा वर्तमान की दोनों ही कहानियां मनोविश्लेषणात्मक आधार लिये हो तो उनकी प्रभावोत्पादकता तुलनात्मक रूप से विचारणीय हो जाती है । ऐसी ही एक कहानी है वर्तमान के प्रतिष्ठित कहानीकार प्रियंवद द्वारा लिखी गई कहानी “पलंग” जो कि पूर्व में लिखी गई महान साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क की कहानी “पलंग” से प्रभावित हैं पर शायद प्रियंवद इस तथ्य को न स्वीकारें ।
              अश्क की लगभग 200 कहानियों में से चर्चित कहानियां डाची, पहेली, ये मर्द, सैलाब, लीडर, मोहब्बत, उबाल आदि है लेकिन कम चर्चित लेकिन बेहद प्रभावशाली, भावनापरक, मनोविश्लेषणात्मक कहानी “पलंग” का भी अपना एक अलग ही महत्व है । जिसमे कथानायक केशी अपनी बाल्यावस्था में जिस पलंग पर अपने मम्मी पापा को साथ लेटा देखता है तथा पापा की मृत्यु के बाद अपनी मम्मी, जिसे वह बहुत प्यार करता है के साथ जब उसी पलंग पर लेटाता है तो उनसे बाल-सुलभ कथन करता हुआ कहता है कि  “ मैं तुमसे ब्याह करूंगा” । उसकी मम्मी उससे कहती हैं कि “उसके लिए वह अपनी ही जैसी दुल्हन  ब्याह कर लायेगी ।“ वह कहता है कि “मै फिर यही पलंग लुंगा” ज़बाब में उसकी मम्मी कहती हैं “ हां हां यह पलंग मैं तुम्हें और तुम्हारी दुल्हन को दुंगी ।“ लेकिन केशी के बड़े होने पर जब उसकी मम्मी उसके लिए अपने ही कद काठी की दुल्हन ब्याह कर लाती है तथा सुहागरात में केशी और उसकी दुल्हन के लिए सुहाग सेज हेतु अपना वहीं पलंग सजा कर देती है तो केशी सुहागरात में उस पलंग पर अपनी दुल्हन के साथ नहीं सो पाता । उस पर लेटते ही उसे अपनी मम्मी की याद आती है । अपने मम्मी पापा की शादी एवं उस पलंग पर मम्मी पापा के सुहागरात की कल्पना से उपजा चित्र उसके मानस में आता है और वह नैतिकता की भावना से व्यथित हो कर उस पलंग पर अपनी पत्नी के साथ नहीं सो पाता । पहले वह कमरे से निकल कर बाहर पत्नी के साथ टहलने जाता है फिर बगल वाले स्टोर रूम की सिटकनी किसी तरह खोल कर वहीं सोफे पर अपनी पत्नी के साथ सो जाता है । कहानी में बालक केशी की बाल सुलभ भावनायें, मां के प्रति प्रेम, बड़े होने पर विवाहोपरांत सुहागरात में मम्मी पापा के पलंग पर सोने में नैतिकता की भावनाओं का ऊंहापोह, अतीत की स्मृतियां, कल्पना सबका बड़े ही सुन्दर भावनापरक एवं मनोविश्लेषणात्मक तालमेल के चित्र कहानी के फलक पर चित्रित है । लेकिन इस भावनापरक प्रभावशाली कहानी से प्रभावित होकर जब वर्तमान के प्रतिष्ठित कहानीकार प्रियंवद ने अपनी “पलंग” कहानी लिखी तो उसका स्वरुप ही बिल्कुल बदल गया । उसके दृश्य, स्थितियां, कथानायक का मनोविश्लेषण सब बिल्कुल ही अस्वाभाविक प्रतीत हुआ । जिसे पढ़ कर ताजुब हुआ की अश्क की बेहतरीन “पलंग” कहानी से प्रभावित होकर कोई क्या प्रियंवद की “पलंग” जैसी कहानी भी लिख सकता है । 
         प्रियंवद ने अपनी “पलंग” कहानी में एक तीन कोने वाले कमरे का जिक्र किया है, जिसके एक कोने में कथानायक की मां दूसरे कोने में वह स्वयं तथा तीसरे कोने में एक बड़ा पलंग है जो कि उसकी मां अपने विवाह मे साथ ले कर आई थी तथा अक्सर वह रात को उस पलंग पर सोते हुये अतीत की मधुर स्मृतियों में खो जाती है । उसी पलंग पर नायक अपनी अधेड़ उम्र (पकी उम्र) के बावजूद अपनी वृद्ध मां के साथ सोता है । सुबह उठने पर उसकी मां कमरे की सफाई करती है तथा नहा कर अमूमन एक ही वस्त्र मे बाथरूम से कुछ सामान लेने कमरे में आ जाती है । जिसे कथानायक सिगरेट पीते हुये देखता रहता है (इस कहानी के अतिरिक्त भी अपनी कुछ कहानियों में न जाने किस मनोविज्ञान के तहत कहानीकार ने मां के सामने पुत्र को सिगरेट पीते हुए चित्रित किया है) । एक दिन रात्रि में कथानायक काफी शराब पीने तथा अपनी प्रेमिका द्वारा देह संबंध बनाने से इंकार करने से आक्रोशित होकर घर लौटता है तो रात भर ठीक से सो नहीं पाने और सुबह मां को नहाने के बाद निर्वसन हालत में देख कर जुगुप्सा से आक्रोशित होकर उसी हालत में अपनी मां का हांथ पकड़ कर धकेलते हुए कहता है “निकल बाहर इसी तरह निकल”  । मां उसी हालत में उसके पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुये कहती है “बस एक बार बस एक बार माफ कर दो” । उसके बाद दोनों एक दूसरे के प्रति स्वाभाविक रूप से नहीं रह पाते और कुछ दिनों बाद उसकी मां की मृत्यु हो जाती है । मां की मृत्यु के कुछ दिनों बाद वह अपनी प्रेमिका से शादी कर लेता है तथा सुहागरात में जब वह अपनी पत्नी (प्रेमिका) के साथ निर्वसन हो कर उस पलंग पर लेटता है तो पत्नी के चेहरे पर उसे अपनी मां का चेहरा उभरता हुआ दिखलाई पड़ता है और वह चीख पड़ता है ।           
           प्रियंवद की “पलंग” कहानी में पलंग केंद्र में नहीं है बल्कि कथानायक द्वारा निर्वसन हालत में अपनी वृद्ध मां को देखना तथा जुगुप्सा से क्रोध मे उसी हालत में हाथ पकड़ कर मां को बाहर निकल जाने के लिए कहना । मां का उसी निर्वसन हालत में अपने पुत्र के पैर पकड़ कर माफी मांगना तथा उसकी मृत्यु के बाद  उसके पुत्र द्वारा अपनी प्रेमिका से शादी करना तथा सुहागरात मे निर्वसन पत्नी (प्रेमिका) के चेहरे पर उसे अपनी मृत मां के चेहरे को उभरता हुआ देख कर उसके चीख उठने की मनोविश्लेषणात्मक स्थिति कहानी के केन्द्र में है । यह स्थिति किसी खास पलंग के कहानी में न होने पर भी चित्रित की जा सकती थी । जब कि अश्क की “पलंग” कहानी के केन्द्र में वह खास पलंग है जिस पर कभी कथानायक केशी की मां और पिता सोया करते थे तथा पिता की मृत्यु के बाद केशी बाल्यावस्था में अपनी मां के साथ सोया करता था । बाल-सुलभ हठ करते हुये वह अपनी मां से उस पलंग की मांग अपनी शादी मे देने के लिये करता है । युवा होने पर शादी के बाद जब सुहाग सेज के लिए सजा कर, मां उसे और उसकी दुल्हन के लिए वह पलंग देती है तो केशी की सभी पलंग से जुड़ी स्मृतियां तथा नैतिकता के बंधन उसके मानस का मंथन करते हैं और वह उस पलंग पर अपनी पत्नी के साथ नहीं सो पाता । इस भांति अश्क की कहानी का शीर्षक “पलंग” पूरी तरह से सार्थक है जबकि प्रियवंद की कहानी का शीर्षक “पलंग” महज अश्क की प्रभावशाली कहानी “पलंग” के शीर्षक का अनुकरण हो सकता है उनकी कहानी की मनोवैज्ञानिक स्थिति के अनुरूप नहीं ।       दरअसल अश्क की “पलंग” कहानी में नैतिकता के उहापोह की भावनात्मक स्थिति का प्रभावशाली चित्रण है जबकि प्रियंवद की “पलंग” कहानी में कहीं पर भी नैतिकता है ही नहीं । कथानायक अपनी मां के सामने सिगरेट पीता है, शराब पी कर उसके सामने आता है तथा बेरहमी से, निर्वसन हालत में अपनी मां का हांथ पकड़ कर क्रोध से उसे उसी हालत में बाहर निकल जाने को कहता है तथा मां उसी हालत में उसका पैर पकड़ कर माफी मांगती है । कहानी की ये सभी स्थितियां अनैतिक एवं पीड़ादायक है जिसे शायद कोई भी सहृदय पाठक सहज रुप में न लें सकेगा । जबकि अश्क की “पलंग“ कहानी बेहद भावनापरक, मनोविश्लेषणात्मक एवं प्रभावशाली कहानी है । यदि प्रियंवद ने अश्क की पलंग कहानी से प्रभावित होकर अपनी पलंग कहानी लिखी है तो एक बेहतरीन कहानी को किस हद तक बर्बाद किया जा सकता है इसका एक विचित्र उदाहरण ही प्रस्तुत किया है ।
           प्रियंवद अपनी “पलंग” कहानी में निर्वसन या एक वस्त्र में मां को देखने की जिस स्थिति को चित्रित करते हैं वह महानगरों के झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले परिवारों में तथा ग्रामों मे नदी तालाब में नहाती वृद्धाओं में आम बात है । वृद्ध महिलाये अपने शरीर को ढक छिपा कर रखने में लापरवाह हो जाती है । शायद उनकी यह मानसिकता होती है कि अब उनके शरीर में ऐसा कुछ बचा नहीं है जो किसी पुरुष द्वारा देखा जायेगा तथा उस परिवेश में पुरुष वर्ग भी इसे अनदेखा करते हैं । लेकिन निर्वसन हालत में वृद्ध मां  को देख कर उसी हालत में मां को घर से निकालने और उसी हालत में मां द्वारा पुत्र के पैर पकड़ कर माफी मांगने की स्थिति संभवतः यथार्थ में कहीं घटित नहीं होती । यह स्थिति पुत्र द्वारा मां से मारपीट करने या उसे वृद्धाश्रम में भेजने से भी अधिक असंवेदनशील एवं निर्मम है । दूसरी ओर जब पुत्र इतना निर्मम और असंवेदनशील है तो सुहागरात में नग्न पत्नी के चेहरे पर मां का चेहरा उभरने की बात किसी भी तरह से नैतिकता के मनोविश्लेषणात्मक स्थिति के तहत सही नहीं प्रतीत होती ।
           प्रियंवद अपनी कहानियों में असामान्य स्थितियों एवं असामान्य पात्रो को चित्रित करने के पक्षधर हैं । इस बात की गवाह है उनकी एक और कहानी “बूढ़े का उत्सव” जिसमें डाक्टर छिपकली पकड कर खाने वाले एक बुढ्ढे को एक औरत की कहानी सुनाता है जिसमें उस औरत का एक युवा विकलांग बेटा है जिसका शरीर सेरिब्रल पाल्सी बीमारी से ग्रस्त होकर पूरी तरह से निष्क्रिय हैं । उसकी मां उसे नहलाती धुलाती है तथा पूरे शरीर की साफ सफाई करती है । पुत्र के शरीर की सफाई करती मां उसके यौनांग को सहलाती है तो पुत्र के आनंदित होने पर हांथों द्वारा उसे यौन संतुष्टी प्रदान करती है । पूरी ही कहानी अस्वाभाविक एवं उद्देश्य रहित है । पुत्र का जब पूरा शरीर ही निष्क्रिय है तो यौनांग ही कैसे सक्रिय हैं यह तो कोई मेडिकल साइंस का विशेषज्ञ ही बतला सकता है लेकिन कभी भी कोई मां अपने पुत्र के निष्क्रिय शरीर के यौनांग से ऐसी छेड़खानी नहीं कर सकती ।  लेकिन प्रियवंद वर्तमान के एक प्रतिष्ठित कहानीकार होने के बावजूद जब अपनी “पलंग” और “बूढे का उत्सव” जैसी कहानियों में असहज अस्वाभाविक स्थितियों को सिर्फ कहानी के चर्चित एवं विवादित होने के उद्देश्य से रखते हैं तो जहां पाठक उन्हें हतप्रभ हो कर ताकता रह जाता है वहीं ऐसी कहानियों के लेखन के उद्देश्य पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है।
राजेन्द्र सिंह गहलौत
“सुभद्रा कुटी”
बस स्टैंड के सामने
बुढार 484110
जिला शहडोल (म.प्र.)
मोबाइल : 9329562110
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