करने में हिमाचल के रचनाकारों में सुदर्शन वशिष्ठ का योगदान अन्यतम है | कविता, उपन्यास और व्यंग्य में भी अपनी अनूठी छाप छोड़ी है परन्तु पहचान कहानी विधा से ही बनी है | पांच दशकों से सुदर्शन वशिष्ठ की कहानियाँ समय के साथ परिपक्व होती गयी और प्रदेश से बाहर और अंदर हिमप्रस्थ ,गिरिराज वीर प्रताप,धर्मयुग,सारिका,वर्तमान साहित्य, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश,हंस, सेतु आदि अनेक पत्रिकाओं में छपने लगीं | सौ के करीब कहानियाँ तकरीबन दस कथा संग्रहों के माध्यम से वशिष्ठ ने पाठकों के समक्ष रखीं|
इसके अतिरिक्त ‘बहुचर्चित कहानियां’ , ‘सुदर्शन वशिष्ठ की कहानियां , ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ आदि शीर्षकों से इनकी कहानियों के अनेक संग्रह सामने आ चुके हैं | 2016 में भी भावना प्रकाशन की ओर से 70 कहानियों का ‘सम्पूर्ण कहानियां –सुदर्शन वशिष्ठ’ प्रकाशित हुआ | इन संग्रहों में कहानियों का चयन कभी दशक आधारित है तो कभी प्रवृत्यामक ,कभी विमर्शों यथा नारी दलित आदि पर है जो इनके कहानी यात्रा के विभिन्न पडावों को लेकर सामने आते है |
इधर, आधार प्रकाशन ने ‘सुदर्शन वशिष्ठ –कहानियाँ’ (2024) शीर्षक से उनकी तीस कहानियों का संकलन साहित्य के बाजार में उतारा है | यह सुखद रहा कि इसका संपादन हिंदी के ही कथाकार और चिन्तक राजकुमार राकेश ने बड़े सुनियोजित ढंग से किया है | सुदर्शन वशिष्ठ ने आज तक की अपनी कथा यात्रा में विषय विविधता लिए सौ के लगभग कहानियाँ लिखी हैं | ऐसे में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ की श्रेष्ठ कहानियों के माध्यम से उन कहानियों के बहुआयामी पक्ष को पाठकों के समक्ष रखना बड़ा ही श्रमसाध्य कार्य सम्पादक राजकुमार राकेश ने किया है | यह तीस कहानियाँ वशिष्ठ की ‘सम्पूर्ण कहानियां’ में भी उपलब्ध हैं | विषयगत वर्गीकरण को आधार बनाते हुए राजकुमार राकेश ने वशिष्ठ की पारिवारिक- सामाजिक जटिलताओं की कहानियों में ‘सेमल के फूल’,’पिंजरा’, ‘सुख का पंछी’ ,’दादा का प्रेत’, ‘बार में बूढा’ आदि को लिया है | अन्य वर्गीकरण में व्यवस्थागत कहानियां ली गयी हैं यथा , ‘फाइल में पताका’, ‘अथ श्री सचिवालय कथा’ , ‘शहादत’ आदि |
चूँकि सुदर्शन की भाषा में व्यंजना को प्रमुख स्थान मिला है और व्यंग्य उनकी प्रिय विधा भी है इसलिए राजकुमार राकेश ने ऐसी प्रवृतिगत कहानियों यथा ‘हँसाना मना है’, ‘दंगल’ , ‘बिरादरी बाहर’ ‘पहाड़ देखता है,’ ‘नैनम छिदंति शस्त्राणी,’ आदि को व्यंग्य कहानियों में लिया है | ‘घर बोला’, ‘पहाड़ पर कटहल,’ सिमले वाला संत’ आदि मार्मिक कहानियाँ विस्थापन के फलस्वरूप नोस्टाल्जिया के भाव को अभिव्यक्ति देती हैं | एक वर्गीकरण और किया गया है जिसको संपादक ने ‘लम्बे इतिहास क्रम’ की कहानियां कहा है जिनमे ‘अंतरलों में घटता समय’, ‘हदे निगाह तक,’ ‘पीला गुलाल, बसंत और पतझड़’, ’मंच पर सन्नाटा’ आदि सम्मिलित की गयी हैं |
इन कहानियों के अंत में संपादक ने उन पत्रिकाओं के नाम भी दे दिए हैं जिनमें यह छपीं हैं | शोधार्थियों को पत्रिका का नाम ,वर्ष, माह और अंक आदि की जानकारी मिलने से तत्कालीन सामाजिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक घटनाओं,स्थितियों और परीवेश के हालात की जानकारी मिलती है जिनके प्रभावस्वरूप रचना जन्म और आकार लेती है | यह ही वह छोटी छोटी सूचनाएं होतीं हैं जिन्हें शोधार्थियों को जुटाना पड़ता है | इससे आलोचना, विवेचन और विश्लेषण में सहायता मिलती है जो कृति या रचना के मूल्यांकन में सहयोग देती हैं | इसलिए राजकुमार राकेश साधुवाद के पात्र हैं |
1969 से लेकर अब तक वशिष्ठ का कथाकार समय और अनुभव के साथ संवेदनशील, पैना, परिपक्व और सशक्त होता गया है | इन कहानियों में विषय और वर्णन की गहनता, विविधता, परिपक्वता तो है ही बिम्ब बहुलता संप्रेषणीयता प्रदान करता है | भाषा का अचूक इस्तेमाल करना वशिष्ठ अच्छी तरह से जानते हैं | आंचलिक शब्दावली का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया गया है जो सामान्य पाठक को भी बोधगम्य लगता है और यह जनभाषा कहानी पाठ में व्यवधान पैदा नहीं करता |
चूँकि कथा संसार बहुआयामी और विविधता से परिपूर्ण है ; जिसमें गाँव भी और कस्बा भी आता है ,परिवार है समाज है, तो दफ्तर भी है और राजनीति भी है अर्थात कोमल मानवीय संवेदनाओं के साथ साथ ठोस यथार्थ तक –कथाकार ने जिस भी परिवेश का चित्रण किया है सुदर्शन की भाषा ने गहरे उतर कर किया है | कई दृष्टियों से यह संग्रह कहानीकार की कथा यात्रा का दुर्लभ दस्तावेज के रूप में स्थापित होता है हालांकि यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है | **********
— डा. देवेंद्र गुप्ता,
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