वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, उपन्यासकार, कहानीकार, अनुवादक नासिरा शर्मा जी से पुरवाई पत्रिका की उपसंपादक नीलिमा शर्मा की बातचीत।
लेखक, पत्रकार से कुछ मायनों में अलग होता है और उसकी रचना आहिस्ता आहिस्ता पाठकों तक पहुँचती है और शताब्दियों तक ठहरती है।
~ नासिरा शर्मा ~
प्रश्न : नासिरा शर्मा जी यह हिंदी दिवस मनाने का क्या औचित्य है? अपनी मातृभाषा के लिए एक दिन निर्धारित करना क्या सही है?
उत्तर : हर्ज ही क्या है? लेकिन इस ग़लतफ़हमी से निकलना होगा कि हिंदी को केवल वह लोग समृद्ध बना रहे हैं जिनकी मातृभाषा हिन्दी है। हिंदी भाषा–साहित्य में वे लोग हैं जो कई कारणों से हिंदी में लिखते हैं। वे जिनकी मातृ–भाषा उनकी स्थानीय बोली है और शिक्षा की भाषा हिंदी हो गई है जिस पर उनकी पकड़ मज़बूत हो गई और वह अपने परिवेश को हिंदी भाषा में लिख कर हिन्दी लेखक बने या फिर उन्हें हिंदी भाषा के लेखक बहुत अच्छे लगे और वह अपनी(भारतीय भाषाओं) भाषा की जगह हिन्दी में लिखने लगे। या फिर उन्हें हिंदी भाषा अच्छी लगी। कहने का मेरा मतलब है कि हिंदी को एक तंग खाँचें में बांधना उचित नहीं है फ़िलहाल इकहरी सोच वालों ने सीमित समय के दायरे में बाँध उसे बाक़ी भारतीय भाषाओं से अलग कर देते हैं एक विशेष दिवस या पखवाड़े तक के लिए| जबकि ख़ुद हिंदी ने अपनी बहन उर्दू की तरह अपना दामन फैला सभी मातृभाषा वालों को अपने में समेट रखा है। हिंदी में पुस्तकें छप रहीं हैं और बिक रही हैं मगर उससे सम्बन्धित समस्याओं पर कोई ठोस क़दम उठाया नही जाता है।
प्रश्न : आप विभिन्न भाषाओं की ज्ञाता हैं। आपकी मातृभाषा उर्दू रही है लेकिन आपने हिन्दी में अपना अधिकतम साहित्य रचा है। हिंदी साहित्य को आपने अनूठे विषय दिए हैं। क्या आपको लगता है कि आज विषय से ज़्यादा शिल्प और बिम्ब पर ध्यान दिया जाता है?
उत्तर : आज के नए लेखन में जो अकसर देखने को मिलता है वह यह है कि जो कहानी अपने बयान में आसमान के सारे तारे तोड़ अक्षरों में रौशनी भरती है वह अन्त में जाकर जली फुलझड़ी साबित होती है। क्योंकि कभी अन्त अटपटा सा, कभी बेहद मामूली लगता है और जब आप कहानी पढ़ लेते हैं तो महसूस होता है कथा वस्तु कितनी लड़खड़ाती सी बिना किसी तर्क के आपको किसी आशा में डाल अपने को अन्त तक पढ़वातो लेती है मगर कुछ दे नहीं पाती है| इस लनतरानी से हिंदी भाषा में भी कोई इज़ाफ़ा नहीं हो रहा है और कहानी उखड़ी–उखड़ी ज़मीन से ऊपर तैरती रह जाती है। उसकी वाह वाही भी देखने को मिलती है।कहानी वह हैं जिसे पढ़कर उसमें आप देर तक डूबे रहें, कभी ख़ुद से सवाल करें या कभी किसी को कहें फला कहानी पढ़ लो और मेरे साथ विमर्श करो|
प्रश्न : आज कल कुछ लोग कहानी उपन्यास लिखते हुए (बिना उन जगहों पर जाए) वहाँ के माहौल पर लिखने का दावा करते हैं। क्या ये उचित है? आप इस बारे में क्या सोचती हैं ?
उत्तर : आपने ठीक कहा, आजकल लेखक ही नहीं पत्रकार भी घर बैठे चर्चित घटनाओं और सियासी बदलाव पर कुछ चित्र लगा कर रिपोर्टिंग कर देते हैं। यह उनकी मजबूरी है क्योंकि उन्हें बाहर भेजने, वहाँ रुकने में ख़र्च होने वाला धन अकसर न्यूज़ एजेंसी के पास नहीं होता है। बी बी सी, अल जज़ीरा जैसे चैनलों की तरह ख़बरों की गहराई में जाने में वह कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। रणक्षेत्रों तक पहुँचने के लिए अपने पत्रकारों की सुरक्षा एवं जान गँवाने पर मुआवजा देने की कोई सुविधा भी नहीं है जैसा विदेशी ख़बर माध्यमों में होता है। कम रिसोर्सेज़ हमारी मजबूरी है और इसलिए हम ज़्यादातर विदेशी न्यूज़ बुलेटिन सुनते हैं और उनकी दी लाइनों को पकड़ लेते हैं। उसपर सूचना का ख़ाका बना लेते हैं जिसमें हमारी अपनी विवेचना नहीं होती है| अब आता है सवाल लेखकों का।लेखक का संवेदनशील मन जब किसी दर्दनाक घटना से प्रभावित होता है तो वह क़लम उठा लेता है। हमदर्दी में लिखी यह रचना पाठकों तक पहुँचती है और पसंद की जाती है। लेकिन कुछ विषय ऐसे होते हैं जो आपकी हमदर्दी के साथ विवेक भी चाहते हैं। पाठक कारण और ऐतिहासिक संदर्भ जानना चाहता है तब आपकी रचना तर्क और तथ्य पर कितनी प्रमाणिकता के साथ पाठकों तक पहुँचती है या फिर आप से ज़्यादा उस विषय को जानने वाला आपकी रचना को जब पढ़ता है तो वह आपकी कमज़ोरी को पकड़ लेता है और रचना अपना विश्वास खो बैठती है। लेखक,पत्रकार से कुछ मायनों में अलग होता है और उसकी रचना आहिस्ता आहिस्ता पाठकों तक पहुँचती है और शताब्दियों तक ठहरती है। यह नया शौक़ जो इधर उभरा है कि चर्चित पत्रकारिता के विषयों को उठाने का वह असल में साहित्य के लिए मुनासिब नहीं हैं। लेखकों को ऐसे विषय नहीं उठाने चाहिए जिस विषय पर न उनकी पकड़ मज़बूत है और न ही आप इंसान की अन्तर-आत्मा तक पहुँच पाते हैं। अपने विचार और संवेदना की अटकले उसमें डाल देते हैं,जो उचित नहीं हैं |
प्रश्न : क्या आपको लगता है कि ऐसा करके लेखक वहाँ की सभ्यता और संस्कृति के साथ न्याय कर पाता है ?
उत्तर : जैसा मैंने पहले कहा कि इस तरह की रचनाओं की दो कसौटियाँ होती हैं| पहली, वह जो कम सूचना जानने वालों के समक्ष पेश होती हैं दूसरी वह जो ज्ञानी की नज़र से गुजरे।जो केवल “गाइड बुक” या समाचारों से मैटर लेते हैं तो उस मे सृजन का वह पुट नहीं आ पाता है जो आना चाहिए । मैंने दूसरे देशों पर लिखा है। यह महज़ शौक़ नही एक इत्तफ़ाक़ था कि मैं दो क्रांतियों की चश्मदीद गवाह बन गई और पूरी प्रामाणिकता के साथ लिखा क्योंकि मुझे वहाँ की भाषा भी आती थी मगर अपने पसंदीदा अफ़्रीक़ी देशों पर बहुत चाहने पर भी मैं क़लम न उठा सकी क्योंकि मैं वहाँ कभी गई नहीं | यदि मैं अपने शौक़ को पूरा करने के लिए इधर उधर से सामग्री बटोर कर लिख देती तो उसमें मेरी मौलिकता कहीं नज़र नहीं आती .. क्योंकि न तो मेरी स्थानीय स्तर पर कोई पकड़ मज़बूत होती और न ही मुझे भाषा ज्ञान था फिर एक ‘पर्दानशीन’ इश्क़ पर मैं कैसे क़लम उठा सकती थी जिसकी बारीकियाँ तो दूर सही बयान भी गहराई से न कर पाती| याद रखें आपका लेखन चाहे वो यात्रा संस्मरण या कहानी या उपन्यास हो यदि उसके अन्दर दी गई कमियों को जब सचेत पाठक पकड़ लेता है तो उस रचना का रस जाता रहता है क्योंकि उसे वो सारे वीडियो और कुछ अन्य किताबों के विवरण याद आने लगते हैं,जो आपके अनुभव व अनुभूति को पूरी ताज़गी के साथ पन्नों पर नहीं उतार पाए। यह बड़ी बारीक बातें हैं जिनको हमें समझना होगा |
प्रश्न : कहानी लेखन में आप विषय को कितना महत्वपूर्ण मानती हैं? क्या साधारण विषय को भी बेहतर अभिव्यक्ति से उत्तम में ढाला जा सकता है?
उत्तर : विषय महत्वपूर्ण है मगर इतना नहीं कि वह पत्रकारिकता में ढल जाएं फिर साधारण और महत्वपूर्ण विषय का निर्णय कौन लेगा, पाठक या लेखक? साहित्य इंसान के अन्दर की कैफियत का बयान होता है वह जितना प्रभावी ढंग से व्यक्त होगा विषय स्वयं महत्वपूर्ण हो उठेगा। मामूली सी घटना का असर रचनाकार किस स्तर पर महसूस करता है। उसकी मौलिक अभिव्यक्ति उस रचना को उत्कृष्ट बना देती है। पढ़ने वाले को एक नई दृष्टि और जिज्ञासा से भर देती है|
प्रश्न : आजकल सोशल मीडिया के कारण इन्सान के हर्ष और विषाद के पल आसानी से सार्वजनिक हो जाते हैं। शब्दों का आसान ईमोजी ले चुके हैं। मृत्यु के समाचार के लाइक कर दिया जाता है। अहसास सोशल मीडिया के शोर में कहीं दब जाते हैं। आप कैसा महसूस करती हैं?
उत्तर : मुझे कुछ चीज़ें अच्छी नही लगतीं हैं जैसे अपना हर दुःख साझा करना। सोशल मीडिया पर जिसे देखने/पढ़ने वालों की न कोई पहचान होती है न कोई दिलचस्पी। बतौर मिसाल कुछ लोग मरे हुए रिश्तेदारों के ऐसे चित्र जिसमें लाशें क़फ़न में लिपटी नज़र आ रही हैं , डाल देते हैं जो मुझे उस मरे हुए इन्सान का अपमान जैसा लगता है। सोशल मीडिया सूचना का एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है जिसका प्रयोग ज़रूरत पड़ने पर करना उचित होता है मगर जब तकनीकी आसानी आपके हाथ में हो तो उपभोक्ता अपने आप को रोक नहीं पाता है।वैसे इसका एक कारण तन्हाई भी हो सकता है। वह अपने दुःख को इस तरह बाँट कर लोगो के तसल्ली भरे शब्दों से राहत महसूस करता है।सोशल मीडिया का यह भी प्लस प्वाइंट है कि आप कुछ अहम ख़बरें एक साथ सबसे साझा कर रहे हैं। कुछ घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिसे देखनेवाला इन्सान दूसरे इंसान के दुःख सुख के क़रीब अपने को महसूस करता है यदि वह उसके जान पहचान का न भी हो तो भी एहसासों को समझ सकता हैं |आजकल बात और आगे बढ़ चुकी है कुछ वीडियो पर लिखा आता है या कुछ आवाज़ सुनाई पड़ती है कि जिसने इसे लाईक नहीं किया उसका बहुत बुरा होगा,मुझे यह सब बहुत ही बुरा लगता हैं |
प्रश्न : नासिरा जी, चाहे भारत में हो या फिर प्रवासी भारतीयों में, हिन्दी साहित्य में पुरुषों के मुक़ाबले महिला लेखक अधिक संख्यां में दिखाई दे रही हैं। इसके पीछे क्या कारण देख सकती हैं आप?
उत्तर : शिक्षा, फिर विश्वास! इसके बाद परिवार का प्रोत्साहन व स्वतंत्रता। सरकारी योजनाएं और महिला का जीवन के हर कार्यक्षेत्र में दाख़िला। जब उनके हाथ में क़लम आया तो उसने इन्हें मुखर बनाकर इस घुटन को काग़ज़ पर उतरवाया जो मौखिक परंपरा से आगे की बात थी। इस समय पुरुष व महिला लगभग बराबर से लिख रहे हैं मगर जो नाम उभर कर इस समय नज़र आ रहे हैं वह महिलाओं के अधिक हैं जैसे आज से तीस वर्ष पहले महिलाएं लिख रही थीं मगर नाम पुरुषों के अधिक उभर के सामने आ रहे थे। महिलाओं को कई तरह के प्रोत्साहन ने भी उनमें उत्साह पैदा किया है। वह शिक्षित हैं, खुद कमाती हैं। दूसरी ओर साहित्य की दुनिया में महिला विशेषांक,स्त्री विमर्श, हिंदी दिवस, विदेश की यात्राएं और ढेरों पुरस्कारों की शुरुआत जिसने एक सकारात्मक माहौल बनाकर उनमें ऊर्जा भरी।
प्रश्न : महिलाएं आमतौर पर राजनीति जैसे विषय पर कम ही क़लम चलाती हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं। आप किन विषयों को अपने दिल के क़रीब मानती हैं?
उत्तर : सबसे ज्यादा राजनीति विषय में उनकी रुचि का न होना। पकड़ का मज़बूत न होना।बेकार की झंझटो में न पड़ना, इत्यादि कारण हो सकते हैं । मुझे कोई भी मानवीय विषय जो किसी भी जानकार के उत्पीड़न, शोषण, अन्याय का कारण बना हो उस पर लिखना अच्छा लगता है। प्रकृति के बयान में मेरा मन बहुत रमता है।
प्रश्न : हिंदी में मुस्लिम समाज की लेखिकाएँ अपेक्षाकृत कम हैं। आप जब लेखन में आई तो आपका स्वागत कैसा हुआ था? आज के लेखन में आप मुस्लिम लेखिकाओं को कैसे देखती हैं और उनसे क्या अपेक्षाएं रखती हैं?
उत्तर : वह समय आज के समय से बिल्कुल अलग था।आज भी मुस्लिम पुरूष लेखकों की अपेक्षा, बेशक लेखिकाएँ कम हैं मगर ख़ुद पुरुष लेखक भी हिंदी साहित्य में शायद दर्जन भर भी न हों। मैंने इस तरह सोचा नहीं कभी क्योंकि मैं किसी तरह की ख़ानाबंदी के ख़िलाफ़ हूँ। न उर्दू–हिंदी का भेदभाव मैं करती हूँ। एक लेखक को पूरी आज़ादी है कि वह देश की 24 भाषाओं में से किसी भी भाषा को अपने साहित्य की अभिव्यक्ति के लिए चुन सकता है। पहले मुझे ख़ुद से यह सवाल करना है कि जब मैं आई तो मैंने क्या महसूस किया तो कहूँगी न बेगानापन न अजनबीपन, न झिझक न भय क्योंकि हमने दोनों भाषाओं में कभी कोई फ़र्क़ नहीं समझा| मगर आपका सवाल है कि हिंदी भाषा साहित्य में मेरा स्वागत कैसा हुआ तो इसका जवाब कुछ इस तरह दे सकती हूँ कि मेरी कहानियाँ बहुत प्रकाशित हुई हैं, श्रीपत राय की पत्रिका ‘कहानी’ में धर्मवीर भारती ने धर्मयुग में, कमलेश्वर जी के सम्पादन में ‘सारिका’ में| जो उस समय के सभी बड़े सम्पादक जो लेखक भी रहे हैं उन्होंने मुझे छापा जैसे अमरकांत, मनोहर श्याम जोशी, सोमदत्त वग़ैरह पत्रकारिता में भी हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, नवभारत, दिनमान में। यही मेरे समय में महत्वपूर्ण पत्र- पत्रिकाएँ थीं जिसमें आसानी से जगह नहीं मिलती थी।किसी लेखक को इन पत्रिकाओं में छापने का उस समय मतलब था कि उसकी लेखनी स्वीकार करने के क़ाबिल है। हिंदू मुस्लिम का मुझे कभी पक्षपात नज़र नहीं आया तो भी ईर्ष्या के चलते कुछ हुआ भी तो वह मेरे लिए महत्वहीन रहा। आज, जो मुस्लिम महिलाएं अचानक एक साथ हिन्दी में लिख रही हैं उनके लेखन को पसन्द किया जा रहा है, उन्हें पुरस्कार भी मिल रहे हैं। उनसे मेरी वही अपेक्षाएं हैं जो नई पीढ़ी के बाक़ी लेखकों से हैं कि वह अच्छा और बेहतर लिखने की कोशिश करें।


लाजवाब साक्षात्कार मजा आ गया पढ़ कर
समय निकाल कर फिर से पढूंगी और कुछ समीक्षात्मक लिखने का प्रयास करूंगी। धन्यवाद पुरवाई पत्रिका का आपने इतनी बड़ी नारी शक्ति शख्सीयत से मिलवाया
आभार आपका
नासिरा शर्मा से हुई नीलिमा शर्मा की यह बातचीत महत्वपूर्ण तो है ही, काबिलेगौर यह है कि इनमे सवाल घिसे पिटे नहीं हैं,बल्कि इस बहाने नासिरा जी के लेखन और रचनात्मक व्यक्तित्व की परतें खुलती हैं. उनके विचार और भावभूमि से साक्षात्कार होता है.
बहुत बधाई
आभार अवधेश प्रीत सर
नीलिमा जी ने जैसे सुंदर ढंग से प्रश्नों को रखा, नासिरा जी ने उसी खूबसूरती से उत्तर दिए। लाजवाब साक्षात्कार। पुरवाई के पाठकों को यह पसंद आएगा, मुझे यकीन है।
– जितेन्द्र जीतू
shukriya
काफी दिनों बाद कुछ अच्छा और सार्थक पढ़ा। नासिरा मैम हमारे समय की वरिष्ठ और दिग्गज कथाकार हैं। उनका लेखन पूरे गंगा-जमुनी तहजीब से लेकर ईरान, अफगान और मध्य-पूर्व तक फैला हुआ है। इस मामले में वह हिंदी की इकलौती कथाकर नज़र आती हैं, जिन्होंने एक साथ इन देशों के समाजों पर कलम चलाई है। बहरहाल, देखा जाए तो अलग होने के बाद भी ये सभी देश अपनी ही माटी-बाणी के लगते हैं।
नीलिमा शर्मा मैम ने बहुत अच्छे सवाल किए और उनके जवाब भी बहुत दिलचस्प और बेहतर तरीके से दिए गए। एक रचनाकार के रूप में इस तरह के साक्षात्कार पढ़ना-समझना अपनी समझ को समृद्ध करने वाला अनुभव रहा।
यक़ीनन आपने बिल्कुल सही कहा।
यह साक्षात्कार नासिरदा जी के पूरे व्यक्तित्व को सामने लेता है। नासिरदा जी से हमारी मुलाकात इंदौर में हुई थी।उनकी आंखों से झरती इंसानियत को आपने सवालों के आइने में उतारा है। सचमुच उनका लेखन युगीन सत्य को समयानुसार अभिव्यक्त करता। आपके प्रश्नों से जो जवाबी परिवेश उभरा वह आपकी सूचिका दृष्टि का परिणाम है। साधुवाद
आभार आपका
साहित्य और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर नासिरा जी की राय पढ़ना वाकई रोचक रहा । सभी सवाल सामयिक और ज़रूरी हैं जिनके जवाब की रौशनी में आज के साहित्य और समाज को समझने में मदद मिलती है। लेकिन साक्षात्कार थोड़ा छोटा लगा ।
आभार आपका
नासिरा शर्मा से नीलिमा शर्मा द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार एक दस्तावेज है। लेखिका के व्यक्तित्व और उसकी लेखन यात्रा को समझने का अवसर देता है यह साक्षात्कार । मैंने भी बहुत से साहित्यकारों के साक्षात्कार लिए हैं। इसलिए समझ सकती हूँ कि नीलिमा शर्मा जी ने इस साक्षात्कार के लिए प्रश्नों को बनाने में बहुत मेहनत की है । यह भी मानना पड़ेगा जितने अच्छे प्रश्न पूछे गए हैं नासिर जी ने भी उतने ही शानदार जवाब दिए हैं। कुल मिलाकर एक रोचक, जानकारी से युक्त संग्रहणीय साक्षात्कार है।
शुक्रिया नीलम जी
बहुत महत्वपूर्ण साक्षात्कार. प्रभावित करते हुये सवाल और जवाब. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर. आप दोनों को हार्दिक शुभकामनायें
शुक्रिया
नासिरा शर्मा से हुई नीलिमा शर्मा की यह वार्ता महत्वपूर्ण तो है ही, गौरतलाब यह है कि सारे प्रश्न नयी भाव भूमि पर तैयार किए गए हैं जिनके उत्तर भी सटीक और सार्थक है।
आप दोनों को ढेर सारी बधाई
SHUKRIYA आपका
नीलिमा जी को बहुत बहुत बधाई जो उन्हें नासिरा जी से यूँ साक्षात्कार करने का मौक़ा मिला। प्रश्न भी अच्छे हैं जो नासिरा जी के संपूर्ण साहित्यिक यात्रा को समेट लेता है। नासिरा जी के विचारों से प्रभावित हुई। उनकी बातें लेखकों के लिए एक मार्गदर्शिका सम प्रतीत हो रही है।
shukriya reeta ji
बहुत बढ़िया और सहज रूप से लिए गए इस साक्षात्कार के लिए बहुत बधाई…।
साहित्य की चर्चा में कहीं भी कुछ भी बोझिल नहीं होने दिया आप दोनों ने, यही सबसे अच्छा लगा।
वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा जी से नीलिमा जी की बातचीत अत्यंत रोचक है।
प्रत्येक प्रश्न बड़े ही सुचारू ढंग से किया गया है,।
साक्षात्कार के माध्यम से लेखकों को प्रेरणा मिलती है। ज्ञानवर्धक साक्षात्कार नासिरा शर्मा जी साहित्यिक के क्षेत्र कीअनमोल धरोहर हैं।
नासिरा शर्मा जी एवं नीलिमा जी को हार्दिक बधाई
प्रख्यात लेखिका नासिरा जी से मित्र नीलिमा शर्मा ने आवश्यक प्रश्न किए हैं और लेखिका महोदया ने खूबसूरत और सुकोमल ढंग से उत्तर दिए l
नासिरा जी को मैंने भी खूब पढ़ा है l
इस इंटरव्यू के लिए पुरवाई टीम और नीलिमा को बधाई :))
सर्वप्रथम नासिरा जी को सादर प्रणाम
नीलिमा जी का यह शायद तीसरा साक्षात्कार हम पढ़ रहे हैं। लेकिन एक बात इनकी कमाल की है; इनके प्रश्न महत्वपूर्ण रहते हैं। बहुत सोच समझ कर, परिश्रम से ये ऐसे प्रश्न तैयार करती हैं , साक्षात्कार में जिनके उत्तर से सभी समृद्ध होते हैं ।इनका हर साक्षात्कार कम से कम हमें तो बहुत समृद्ध करता है और आज का साक्षात्कार भी हमने पूरा पढ़ा। आपको बेहतर जान पाए, समझ पाए और आपकी सोच,आपके विचारों व अपने क्षेत्र में एक लंबे समय तक कार्यरत रहने के आपके अनुभव से रूबरू हुए।
हिंदी दिवस मनाने में हमें भी कोई आपत्ति नहीं है यह भी जन्म दिवस मनाने की ही तरह है। बस यह है कि हम श्रेष्ठ के बारे में सोचें और दोषों को दूर करने का प्रयास करें।
आपने बेहतर समझाया कि,” हमें इस गलतफहमी से निकलना होगा कि हिंदी को केवल वे लोग ही समृद्ध बना रहे हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी है।” अनुवाद ने आजकल हर भाषा को हिंदी से जोड़ा है और हिंदी भी हर भाषा से जुड़ी है। हम आपकी इस बात से भी सहमत है कि हिंदी को एक तंग खाँचे में बाँधना उचित नहीं। हमें याद आता है कि हमारे स्कूल के समय में नाइंथ क्लास में हमारी संस्कृत की टीचर ने एक बात समझाई थी कि संस्कृत सब भाषाओं की माँ है और हिंदी उसकी सबसे बड़ी बेटी है। सभी भाषाएँ उसकी बहनें हैं। उन्होंने दिल्ली से अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत में एम ए किया था। यह शायद 66-67 की बात है।उस समय जिस तरह से उन्होंने समझाया था हमें लगा था कि वह बिल्कुल सही कह रही हैं वह बात अलग है कि हम उस तरह से नहीं समझा सकते, लेकिन कम से कम हिंदी में 35 से 40% तक संस्कृत के ही शब्द होते है। और लगभग 50% संस्कृतजन्य। हिदुस्तान के साथ यह विडंबना रही कि यहाँ पर बाहरी आक्रमणों को देश ने बहुत झेला है। जो-जो भी आक्रमणकारी बाहर से आए उनकी भाषा के थोड़े-थोड़े बहुत कॉमन शब्द हिंदी में समाहित होते रहे। फिर चाहे वह उर्दू हो, फारसी हो, पुर्तगाली हो ,अंग्रेजी हो या और कोई सी भी। हमारे पूर्वज लेखक जितने भी हुए हैं उनकी भाषा में उर्दू हिंदी के साथ मिलकर आगे बढ़ती रही। कुछ लोग हिंदी के प्रति इतने सख्त हैं कि हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों को झेलना उन्हें अपमान की तरह लगता है। पर यह हिंदी की उदारता है और आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से सारा विश्व ही जुड़ रहा है तो इस तरह की बाते असहज सी लगती हैं। अन्य भाषाओं के साथ मिलकर भी हिंदी समृद्ध ही हो रही है।
जिस स्थान को हमने स्वयं देखा हो उसके बारे में बेहतर लिख सकते हैं इसमें कोई दो मत नहीं किंतु आजकल व्यवस्थाएँ इस तरह प्रगति पर हैं कि जहाँ हम न गए हों तब भी वहाँ की पूरी जानकारी मिल जाती है लेकिन आपकी इस बात से भी हम 100% सहमत हैं कि तथ्य और तर्क के आधार पर रचना प्रामाणिकता के साथ पाठकों के बीच पहुँचना चाहिये ताकि जानकार पाठक के सामने आपके लेखन की कमजोरी नज़र न आए जाए। और आपकी रचना का विश्वास बना रहे। पत्रकारिता साहित्य का विषय होते हुए भी स्वरूप शैली व उत्तरदायित्व की दृष्टि से साहित्य की विधाओं से कुछ अलग है। उसके विषय की जरूरतें भी अलग हैं। इसके बावजूद विषय का बहुत महत्व है और जिस विषय पर आप लिख रहे हैं उसके बारे में पूरी तरह से तथ्यों सहित जानकारी होना लिखने वाले के लिए बहुत अधिक आवश्यक है तभी आप सच्चाई और वास्तविकता के निकट होंगे और लेखनी विश्वसनीय होगी।
कहानी के संबन्ध में यह कहना बिल्कुल सही है कि कहानी वही श्रेष्ठ है जो देर तक आपके दिमाग में चलती है और जिसके प्रभाव से आप सहजता से मुक्त नहीं हो पाते, जो आपको कुछ सोचने पर विवश कर देती है। एक लंबे समय तक वह आपको मथती आती है। शिल्प और बिंब; रचना के सौंदर्य के कारक हैं। और जहाँ तक हम समझते हैं काव्य में इसका ज्यादा महत्व है। काव्य में आपके पास अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए बहुत जगह नहीं होती है आपको कम और सीमित शब्दों में विस्तृत भावों का समावेश करना होता है। बिंब और शिल्प यहाँ बहुत काम करते हैं। गद्य की किसी भी विधा में अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपके पास पर्याप्त जगह रहती है छूट रहती है एक सीमा में विस्तार के लिए आपके पास वृहद् शब्दकोष रहता है। यहाँ भाषा और शैली का ज्यादा महत्व होता है।
आपसे हम सहमत कि रचनाकार की मौलिक अभिव्यक्ति ही रचना को उत्कृष्ट बनाकर पढ़ने वाले को भी एक नई दृष्टि और जिज्ञासा से भर देती है।
लेखन के क्षेत्र में महिलाओं का उभर कर आना इस विषय पर आपके विचार का स्वागत है। शिक्षा और अभिव्यक्ति के लिये चाहत और स्वतंत्रता सभी ही मायने रखते हैं, पर फिर भी लिखने के लिए कुछ भी लिखना जायज नहीं है। श्रेष्ठ लेखन अपने आप को साबित करता है।
लेखन को जाति, धर्म पंथ और वात की सीमाओं से परे रखना चाहिये ,भाषा को सीमाओं में नहीं बाँधा जाना चाहिये। जिस भाषा पर आपकी पकड़ बेहतर है और जिस भाषा का शब्दकोश आपके लिए श्रेष्ठतम है,अधिकतम है उसी भाषा में लिखना ही किसी भी लेखक के लिए बेहतर होगा। और उसी भाषा में अभिव्यक्ति आपके लिए सरल व सहज होगी। हम ऐसा सोचते हैं।
लेखकों से जुड़े रहने वाली आपकी बात हमें बहुत पसंद आई। रिश्तों को संभाल के रखना बहुत ज्यादा जरूरी है हम तो विद्वत्ता का सम्मान करते हैं सभी आदरणीय लेखक भी हमारे लिए श्रद्धेय हैं। प्रवासी शब्द हमें भी खटकता है। फिलिस्तीनियों व इज़राइल को लेकर लेखन के संबंध में आपके विचारों को जानकर अच्छा लगा।धर्म, सियासत, युद्ध और जीवन लेखन की अभिव्यक्ति में स्वाभाविक ही सम्मिलित होते हैं। इसीलिए साहित्य समाज का दर्पण है।
इस बेहतरीन ज्ञानवर्धक और रोचक साक्षात्कार के लिए नीलिमा शर्मा जी का बहुत-बहुत शुक्रिया नासिरा जी को एक बार पुनः सादर प्रणाम। पुरवाई का भी तहेदिल से शुक्रिया।
नसिरा जी के साथ नीलीमा जी के साक्षात्कार
पर पाठक पक्ष समीक्षा ….
सच कहा है जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि….
अधिकांश लेखक हमदर्दी में कलम चलाता है लोग उसे बहुत पसंद भी करते हैं लेकिन आदरणीया नसिरा मेम ने कहा है कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जो हमदर्दी के साथ पूरा समर्पित विवेक भी चाहते हैं। पाठक और लेखक दोनों होने के नाते मैं भी इस मत से पूर्ण सहमत हूॅं।
आदरणीया ने आपके सवाल नये विषय और शिल्प बिम्ब के उत्तर इतना सटीक और संक्षिप्त गागर में सागर भर कर रचना की गहराई की तह को व्यक्त कर दिया। विषय नया पुराना नहीं होता कोई भी हो पाठक पढ़कर उसकी गहराई में न डूबे,खुद से सवाल न करे या स्मरण करके चर्चा न करें जब तक सार्थकता नहीं है।
कहानी लेखन के सवाल पर उन्होंने जो उत्तर दिया वह बहुत ही शानदार है।
कहानी की अभिव्यक्ति किस तरह से की गई है। पाठक के सामने कैसे प्रस्तुत किया है। वो ही मायने ज्यादा रखता है कभी अच्छे और संवेदनशील विषय भी फिकेऔर बेजान हो जाते। विषय कोई हो छोटा या बड़ा अपने आप महत्वपूर्ण हो जाता है। जब अभिव्यक्ति सटीक रूचिपूर्ण तरिके से पाठक के समक्ष प्रस्तुत हो।
आपके सवाल वर्तमान समय में पुरुष की अपेक्षा महिलाओं का लेखन क्षेत्र में अधिक दिखाई देना के उत्तर में
सच कहा नसिरा जी सौ प्रतिशत सत्य है। महिलाएं पहले भी लिखती थी। मगर आगे नहीं आ पाती थी।ये कड़वा सच है। मगर जब से शिक्षा और रोजगार से जुड़ी है। उनके व्यक्तित्व डेवलपमेंट और मानसिक विकास के द्वारा खुल गये है। जिससे निडरता और सशक्त फैसले लेना सीख गई महिलाएं।इसी का परिणाम है वो अपनी बात और जज्बात खुशी को दर्द और समाज की समस्याओं को पर बेबाक तरीके से लेखन में अपना पक्ष रखने लगी है।और महिलाओं के पक्ष में बहुत सी पत्रिकाएं और विचार विमर्श आगे आए हैं जिससे भी काफी फर्क पड़ा।मदद मिली है।
हिंदी में मुस्लिम महिलाओं काम के जिक्र में
आपने जो जबाब दिया सच महिलाओं को ऐसा ही करना चाहिए। स्त्री सिर्फ स्त्री है। स्त्री का हृदय एक सा है। चाहे वो कोई भी मजहब की हो।।कभी किसी बंधन में बंध कर अपने विचारों की अभिव्यक्ति को नहीं रोकना चाहिए। आप अच्छा लिखेंगे तो भाषा कोई भी हो।आप रूक नहीं सकते।
अब नसिरा जी के विषय बदल रहे हैं ये सच है समय और परिस्थिति बदलती है तो समाज की स्थितियां बदलती है।और जब समाज में बदलाव होता है तो लेखक की दृष्टि भी उस ओर जाती है। इस लिए समय अनुकूल लेखक के विषय बदल ही जाते हैं और बदलने भी चाहिए।लेखक समाज का ही हिस्सा है।और आईना है।
नयी पीढ़ी के नये लेखक भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं पर आपने सही मशवरा दिया की नयी पीढ़ी का लेखन ऐसा हो जो पुराने लेखक और नये दोनों को मिला सके और समय हालत की पटरी पर मजबूत से लोड सके अपने होने की पहचान के साथ ठहर सके।
फिलिस्तीन पर लिखी उनकी पुस्तक में जो वहां के लोगों के दर्द को उजागर कर पाठकों के सामने रखा। युद्ध की विभिषिका की बाद भी लेखक के हृदय में वो सब रहता है जिसे हर मनुष्य को आवश्यकता होती है प्रेम। मनुष्य किसी भी देश का हो। कोई भाषा बोलता हो।प्रेम हर घाव को हर दर्द से निजात दिलाता है। ये सत्य लेखक ही बता सकता है।
नीलमा जी आपके प्रश्न सरल और बहुत ही सटीक और संक्षिप्त है उत्तर का विस्तार लिए हुए थे।
आदरणीया नसिरा जी ने सागर भरे विषयों के उत्तर गागर भर इतनी सटीकता और तरीके से दिए की पाठक को विषय की संपूर्णता समझ आ गई। विस्तार ग्रहणशील हो गया। नसिरा जी और उनके विचारों के साथ उनके लेखन को समझने का अवसर मिला।
साक्षात्कार पढ़ कर मजा आ गया।आप दोनों को बधाई शुभकामनाएं।
मंजू किशोर’रश्मि’
कोटा राजस्थान
नासिरा शर्मा जी सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं और ऐसे लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों के पास अथाह जानकारी और गहन और संवेदनशील दृष्टि और समझ तो होती ही है।तभी वे ऐसे स्वप्निल पायदान पर पहुंचते हैं और समाज में आदर से देखे सुने पढ़े और समझे जाते हैं।
तिस पर भी साक्षात्कार कर्ता की भी समझ और दृष्टि काफी गहन होने के साथ साथ व्यावहारिक होनी चाहिए तभी तो इंटरव्यू एक अनुसंधानित ,खोजी और रोचक होना चाहिए ताकि पाठक उसमें अपना एंगल देख पाएं।
नीलिमा शर्मा जी ने यह इंटरव्यू इसी स्तर का बना दिया है।शानदार और दमदार प्रश्न पूछे हैं और सभी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए एक सुंदर सी अनुभूति बतौर पाठक होती है।
बधाई नीलमा जी और नासिर शर्मा जी को।
बहुत सुंदर बातचीत
बधाई आप दोनों रचनाकारों को।
बहुत सुंदर बातचीत
बधाई आपको
नासिरा शर्मा जी का यह साक्षात्कार पढ़ा। नीलिमा जी ने भी साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर प्रश्न पूछे है। नासिरा जी ने बड़े सटीक जवाब दिए हैं। इन जवाबों में गंभीरता है। मुझे लगता है कि साक्षात्कार ऐसे ही लिए जाने चाहिए। केवल साक्षात्कार के लिए साक्षात्कार नहीं लेने चाहिए। कभी-कभी तो साक्षात्कार लेने वाला/ वाली अपने को ही हाईलाइट करते रहते हैं। इसमें ऐसा नहीं है। नीलिमा जी ने जिस विषय पर उनसे प्रश्न किए हैं नासिरा जी बड़े आराम से उन प्रश्नों की तह में जाकर उत्तर दिए हैं। कहीं कोई जल्दबाजी नहीं की है कि चलो हो गया, आगे बढ़ो। उनके लेखन से संबंधित प्रश्न हो, आज के साहित्य या साहित्यकारों से संबंधित हो अथवा अनुवाद से संबंधित हो सभी का उत्तर बेबाकी और धैर्य के साथ दिया है। दोनों साहित्यकारों को बधाई
बहुत ही रोचक बातचीत। जितने गहन और महत्वपूर्ण सवाल रहे नीलिमा जी के, आपा के जवाब भी उतने ही सटीक रहे। कुल मिलाकर आपा के लेखन से जुड़े सभी पहलुओं को सामने रखता है यह साक्षात्कार। आपा और नीलिमा जी दोनों को हार्दिक बधाई। शुक्रिया पुरवाई।
नीलिमा जी का साक्षात्कार अत्यंत रोचक शानदार और एक रचनाकार के ज्ञान को समृद्ध करने वाला है। साहित्य के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं पर पूछे गए प्रश्नों में जितनी परिपक्वता, व्यापक दृष्टिकोण और गहराई है, लेखिका नासिरा जी के उत्तर भी उतने ही ज्ञानवर्धक और प्रभावित करते हैं जिसे लेखिका के
नीलिमा जी का साक्षात्कार अत्यंत रोचक शानदार और एक रचनाकार के ज्ञान को समृद्ध करने वाला है। साहित्य के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं पर पूछे गए प्रश्नों में जितनी परिपक्वता और गहराई है, प्रसिद्ध लेखिका नासिरा जी के उत्तर भी उतने ही ज्ञानवर्धक और प्रभावित करते हैं जिनसे लेखिका के व्यक्तित्व, व्यापक दृष्टिकोण और उनकी साहित्यिक यात्रा के बारे में जानने को मिला। नीलिमा शर्मा जी जितनी अच्छी लेखिका हैं उतनी ही कमाल की साक्षात्कार कर्ता भी हैं। आप दोनों को बहुत बधाई।
नासिरा जी से साक्षात्कार करना वास्तव में साहित्य के एक युग की यात्रा करने जैसा है l महिला लेखन, विदेशी मुद्दों पर उनकी पकड़, और गाँव-कस्बे के संवेदनशील किस्से उनकी कलम की विशेषताएं हैं l
एक बात और बताता चलूँ कि उनके रचनात्मक व्यक्तित्व से मैं प्रभावित रहा हूँ l वैसे भी वे मेरे कस्बे मुस्तफाबाद (ऊँचाहार) जिला-रायबरेली की मूल निवासी हैं l त्योहार पर उनका कई ऊँचाहार आना हुआ है l ऐसे ही लगभग 25 वर्ष पूर्व मेरी उनसे मुलाकात भी हुई l उस समय मैंने राष्ट्रीय सहारा अखबार के लिए उनका एक साक्षात्कार भी लिया था, जिसमें मेरे साथ पत्रकार मित्र फिरोज नकवी भी थे l विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई थी l सचमुच नासिरा जी को पढ़ना और उनके रचनात्मक व्यक्तित्व से जुड़ना बहुत ही प्रभावशाली और प्रेरक है l
– अरविन्द कुमार साहू (ऊँचाहार – रायबरेली)
साधुवाद नीलिमा जी…नासिरा जी से लिया गया साक्षात्कार पढ़ सुखद एहसास हुआ।नासिरा जी मेरी पसंदीदा लेखिकाओं में हैं इसलिए उनकी रचनाएँ पढ़ना और उनके बारे में पढ़ना या देखना बहुत अच्छा लगता है। आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब में साहित्य की विवेचना नासिरा मैम ने बेबाकी से है।
नासिरा जी के साथ नीलिमा शर्मा की यह बातचीत काफी अलहदा सी है। नीलिमा ने बहुत अच्छे प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर देते हुए नासिरा जी का अंतर्मन खुल पड़ा है। उनके रचनाकार की चिंताएं, अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, बेचैनियां और ऐसे माहौल में भी कुछ कह पाने, कुछ कर पाने की तड़प–सब कुछ उभरा है और बखूबी उभरा है।
इस सुंदर बातचीत के लिए नासिरा जी और नीलिमा शर्मा को साधुवाद। भाई तेजेंद्र जी को भी, जिन्होंने एक बड़ी लेखिका से कुछ अलग सी, खुली बातचीत को पढ़ पाना संभव किया।
मेरा स्नेह,
प्रकाश मनु
निश्चित ही ये बातचीत सुघड़ और संतुलित है। सवाल ऐसे की जवाब भी लाजवाब होकर उतरे।
नासिरा जी, से बात करना हमेशा तटस्थ और संवेदनशील होता है। आप जानती हैं कि कहां उन्हें रुकना है और कहां बोलना है। आपकी शख्शियत कमाल की है। उनके मन का ठहराव और ज्ञान दोनों मुझे लुभाते हैं।
नासिरा जी ने जब शिवानी जी का इंटरव्यू लिया होगा, उसे जब मैंने देखा तो स्तब्ध ही रह गई थी। आवाज़ की सजलता और साफ उच्चारण के साथ प्रश्नों की तासीर, बैठने का सलीका… कितनी बार मैंने उसे देखा।
वैसे ही एक बार आपसे वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु जी बातचीत कर रहे थे। नासिरा जी जिस सहूलियत से उनके प्रश्न के उत्तर दे रही थीं, अद्भुत था। आपकी आंखों की चमक और तरलता देख मुझे बहुत ही सौंदर्यपूर्ण लगा था।
बहरहाल नासिरा जी के दोनों पक्ष यानी जितनी अच्छी वे लेखक हैं, उतनी ही अच्छी इंसान है। आपसे खुलकर बात हो सकती है मगर तहज़ीब के दायरे में रहकर। जितना मैंने उन्हें पढ़ा समझा, जाना , कह सकती हूं।
साधुवाद नीलिमा शर्मा को कि उनकी मारफ़त हम और जान सके लेखन और लेखक को।
पूरा इन्टरव्यु बहुत सहजता से भरा है। सादगी और बेबाकी दोनों है। नासिरा जी ने जिस तरह कहा कि भारत की २६भाषाओं में जिसे लेखक चुनना चाहे वह उसकी स्वतंत्रता है,यह बहुत मानीखेज बात है। नासिरा जी का सामाजिक और राजनीतिक दोनों तरह का लेखन है। नीलिमा जी ने दोनों पर सवाल रखे। नासिरा जी ने जिस तरह फिलिस्तीन पर जवाब दिया वह भी बहुत संवेदनशील है।
साधुवाद और हार्दिक बधाई नीलिमा जी। उम्मीद है आप इन्टरव्यु सीरिज जैसा कुछ शुरू करेंगी।
वरिष्ठ साहित्यकार नासिरा शर्मा जी से नीलिमा जी की बातचीत बेहद आत्मीय और समृद्ध करने वाली लगी । निजी तौर पर और साहित्य में भी नासिरा दी बहुत सहज हैं l वे गंभीर से गंभीर विषय जिस सहजता से प्रस्तुत करती है कि आम और खास दोनों पाठक उनसे स्वतः ही जुड़ जाते हैं l नीलिमा जी के प्रश्न बहुत सशक्त हैं, और दी के उत्तर भी उतने ही मानीखेज l इसको पढ़कर समृद्ध हुई । आभार नीलिमा जी और पुरवाई परिवार
बहुत ही सुचिंतित बातचीत। नीलिमा ने आपा के लेखन के हर पहलू पर सवाल किए। आपा ने धैर्य पूर्वक विस्तृत जवाब दिए जिससे उन्हें और उनके लेखन को समझने में मदद मिली।
समसामयिक विषयों को भी प्रश्नोत्तर में शामिल किया गया ये बात महत्वपूर्ण रही।
मित्रो, यह सच है कि आदरणीय नासिरा शर्मा जी हमारी पीढ़ी की सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। उनका अनुभव क्षेत्र केवल भारत तक सीमित नहीं है। वे विदेश के कई देशों में रह भी चुकी हैं और यात्रा भी की है। इस साक्षात्कार मेंं पुरवाई की उप-संपादक नीलिमा शर्मा जी ने नासिरा जी से खोद-खोद कर नासिरा जी के व्यक्तित्व के तमाम पहलुओं के बारे में जानकारी हासिल की है। नासिरा जी अंतरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित हैं और पुरवाई पत्रिका के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आप सबकी टिप्पणियां इस बात का सुबूत हैं कि नीलिमा जी के सवाल और नासिरा जी के सटीक जवाब आप सबके दिलों तक पहुंचे हैं।