(महाकवि सुब्रमण्यम भारती की तमिल कविताओं का हिंदी अनुवाद)
मूल कवि : महाकवि सुब्रमण्यम भारती
अनुवाद : डॉ. जमुना कृष्णराज
महाकवि सुब्रमण्यम भारती भारतीय साहित्य की वह सशक्त चेतना हैं, जिनकी कविताएँ केवल काव्य नहीं, बल्कि जागरण का शंखनाद हैं। “भारती की काव्यमाला” उनके उसी ओजस्वी, निर्भीक और मानवीय स्वर को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का एक सार्थक और संवेदनशील प्रयास है। यह कृति मात्र कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि दक्षिण और उत्तर भारत की भाषिक आत्माओं को जोड़ने वाला एक सेतु है।
इस काव्यमाला में कुल तीस कविताएँ संकलित हैं। इनमें बारह कविताएँ ईश्वर-वंदना पर आधारित हैं, जो श्रद्धा, भक्ति और आंतरिक दृढ़ता का भाव जगाती हैं। शेष कविताएँ राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हैं, जिनमें नारी-चिंतन, स्वतंत्रता-भाव, भारत को माँ के रूप में देखने की दृष्टि तथा जाग्रत नागरिक चेतना स्पष्ट रूप से मुखर होती है। ईशभक्ति और देशभक्ति से युक्त ये कविताएँ आज के समय से भी गहरा संवाद करती प्रतीत होती हैं।
मूल तमिल भाव का हिंदी में सहज प्रवाह, भाषा की सरलता के साथ उसकी गहराई, तथा प्रतीकों और बिंबों की स्पष्टता इस कृति को विशिष्ट बनाती है। अनुवाद होते हुए भी ये कविताएँ अनुवाद नहीं लगतीं—यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। डॉ. जमुना कृष्णराज जी की संवेदनशीलता, मूल भाव के प्रति उनकी निष्ठा और हिंदी पाठक के लिए सहज प्रस्तुति हर कविता में अनुभव की जा सकती है। उन्होंने शब्दों का नहीं, भावों का अनुवाद किया है; इसी कारण कविताएँ सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं।
सरस्वती वंदना की पंक्तियाँ—
“गीत गाती कोयल के कंठ में
और तोते की जिह्वा में बसती”
ज्ञान और कला की सजीव उपस्थिति का अत्यंत सुंदर बिंब रचती हैं।
नवरात्रि पर आधारित कविता में—
“स्वर्णरूपणी, नारायणी, देवी प्रतिष्ठात्री
नवरत्नों की आभा सम, सुशोभित दिव्यरूपणी”
नारी-शक्ति का दिव्य और गरिमामय स्वरूप सामने आता है।
राष्ट्र-भक्ति से जुड़ी कविताओं में मन की दृढ़ता, धरती की भलाई और इसी भूमि पर स्वर्ग देखने की आकांक्षा झलकती है—
“वंदे मातरम बोलेंगे, एकता से होगा सुखी जीवन”
जैसी पंक्तियाँ आपसी सौहार्द और सामूहिक चेतना का सशक्त संदेश देती हैं।
स्वतंत्रता-भाव से युक्त कविताओं में—
“नभ के रवि को बेचकर कोई, जुगनू को क्यों अपनाए”
जैसे स्वर आत्मसम्मान और विवेक का आह्वान करते हैं।
नारी को लेकर भारती का दृष्टिकोण विशेष रूप से प्रभावशाली है। यहाँ नारी करुणा की मूर्ति नहीं, बल्कि शक्ति, बुद्धि और स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है—
“खेलो कूदो बिटिया, नारी मुक्ति का नृत्य”
जैसी पंक्तियाँ स्त्री को समाज के केंद्र में प्रतिष्ठित करती हैं।
इस पुस्तक को हाथ में लेते ही यह अनुभव होता है कि यह केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि विश्वास और स्नेह की सौगात है। इसी के साथ पहली बार तमिल साहित्य की समृद्ध परंपरा को इतने सहज रूप में समझने का अवसर मिला।
डॉ. जमुना कृष्णराज जी स्वयं तमिल भाषा की गहरी समझ रखती हैं और साथ ही हिंदी साहित्य से जुड़ा उनका संस्कार इस अनुवाद को और अधिक विश्वसनीय बनाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो एक समृद्ध कवि की रचनाएँ, एक उतनी ही संवेदनशील और सशक्त अनुवादक के माध्यम से पाठक तक पहुँची हों। शायद इसी कारण यह पुस्तक मुझे पढ़नी नहीं पड़ी—यह स्वयं खुलती चली गई।
पढ़ते समय कई बार मन ठहर-सा गया। कुछ कविताएँ ऐसी लगीं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं, बल्कि भीतर उतरते हुए जिया।
इन कविताओं में स्वतंत्रता, नारी-सम्मान, साहस, निर्भीकता और आत्मसम्मान के भाव बार-बार मन को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। भाषा ऐसी प्रतीत होती है, मानो कविताएँ हिंदी में ही जन्मी हों। पुस्तक बंद करने के बाद भी कुछ शब्द, कुछ भाव मन में गूँजते रहते हैं।
समकालीन संदर्भ में “भारती की काव्यमाला” का महत्व और भी बढ़ जाता है। आज जब समाज विभाजन, भय और असंवेदनशीलता से जूझ रहा है, तब भारती की कविताएँ मानवीय एकता, साहस और आत्मसम्मान की याद दिलाती हैं। यह कृति नई पीढ़ी के लिए भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए।
अंततः कहा जा सकता है कि “भारती की काव्यमाला” केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि अनुभूत की जाने वाली कृति है। डॉ. जमुना कृष्णराज द्वारा किया गया यह अनुवाद हिंदी साहित्य को समृद्ध करता है और महाकवि सुब्रमण्यम भारती की चेतना को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में सफल होता है। यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए अनुशंसित है, जो कविता में केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि जागरण, विचार और आत्मबल की खोज करते हैं।
छाया सक्सेना प्रभु
माँ नर्मदे नगर,
म.न.- 12, फेस- 1बिलहरी,
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