Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. संजीव कुमार का स्तंभ – महाकाव्यों- रामायण एवं महाभारत- में व्‍यंग्‍य

महाकाव्य काल भारतीय साहित्य का एक स्वर्णिम युग है। यह काल आदर्शों, नीतियों और धर्म का प्रतिपादक है, जिसने भारतीय समाज को नैतिकता और आदर्शों का मार्ग दिखाया। महाकाव्य काल में रचित साहित्य ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को विश्व स्तर पर स्थापित किया है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ आज भी समाज के हर वर्ग में आदर और श्रद्धा से पढ़े और सुने जाते हैं, और यह भारतीय समाज को सदैव दिशा देने का कार्य करते रहेंगे।
महाकाव्य काल का हिंदी साहित्य में विशेष स्थान है। यह काल संस्कृत और प्राचीन भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण युग है, जिसमें महाभारत, रामायण जैसे महान ग्रंथों की रचना हुई। महाकाव्य काल में काव्य रचना में वीरता, नीति, धर्म, और आदर्शवाद का प्रमुख स्थान रहा है। इसे प्राचीन भारतीय साहित्य का गौरवमयी युग माना जाता है। यहाँ महाकाव्य काल के प्रमुख विशेषताओं और योगदान का वर्णन किया गया है:
1. महाकाव्य का स्वरूप:
  • महाकाव्य एक दीर्घ और विस्तृत काव्य रचना होती है, जिसमें नायक की वीरता, संघर्ष, नीति, और जीवन के आदर्शों का चित्रण होता है।
  • इसमें देवता, ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा, राक्षस, और अन्य अलौकिक पात्रों के माध्यम से कथा का निर्माण होता है।
  • महाकाव्य न केवल मनोरंजन प्रदान करता है बल्कि शिक्षा और धर्म का मार्गदर्शन भी करता है।
2. प्रमुख महाकाव्य:
  • रामायण: महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण एक प्रमुख संस्कृत महाकाव्य है। यह राम, सीता, लक्ष्मण और रावण की कथा को प्रस्तुत करता है। इसमें राम का आदर्श जीवन, कर्तव्यपरायणता, और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया है।
  • महाभारत: महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है। इसमें कौरव और पांडवों के संघर्ष, धर्म-अधर्म की लड़ाई, और श्रीकृष्ण के गीता उपदेश का वर्णन किया गया है। यह महाकाव्य जीवन के प्रत्येक पहलू को समेटे हुए है और इसे “पंचम वेद” भी कहा जाता है।
3. महाकाव्य की विशेषताएँ:
  • दीर्घता और विशालता: महाकाव्य की रचना बड़ी होती है, जिसमें अनेक सर्ग और प्रसंग होते हैं। इसमें कथा का विस्तार, अनेक उपकथाएँ, और चरित्रों की विविधता होती है।
  • वीरता और आदर्शवाद: महाकाव्य का मुख्य उद्देश्य आदर्श नायक और उसकी वीरता का चित्रण होता है। इसमें नायक की जीवन यात्रा, संघर्ष और उसकी सफलता या बलिदान का वर्णन होता है।
  • धर्म और नीति: महाकाव्य में धर्म और नीति का विशेष स्थान होता है। इसमें आदर्श जीवन के सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों को प्रस्तुत किया जाता है, जिससे समाज को मार्गदर्शन मिलता है।
  • प्राकृतिक और अलौकिक तत्वों का समावेश: महाकाव्य में देवताओं, दानवों, ऋषि-मुनियों, और अलौकिक घटनाओं का समावेश होता है। यह रचना को अद्भुत और रहस्यमय बनाता है।
4. महाकाव्य काल की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका:
  • महाकाव्य काल में धर्म और संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया गया। महाकाव्यों के माध्यम से समाज में धर्म और कर्तव्य का प्रचार हुआ।
  • महाकाव्य समाज के नैतिक और आदर्श मूल्यों को संरक्षित करने का साधन बने। इनकी कथाएँ परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों की शिक्षा देती हैं।
  • महाकाव्य न केवल कथा और मनोरंजन का माध्यम रहे, बल्कि समाज को एकता, वीरता, और सहिष्णुता का भी संदेश देते हैं।
5. महाकाव्य काल के काव्य तत्व:
  • रस: महाकाव्य में वीर रस, करुण रस, और शांत रस का प्रमुख स्थान होता है। इन रसों के माध्यम से कथा का प्रभाव बढ़ता है और पाठक को भावनात्मक रूप से जोड़ता है।
  • छंद: महाकाव्य में श्लोक, अनुष्टुप, और त्रिष्टुप छंदों का प्रयोग किया गया है, जिससे काव्य का लयबद्ध और प्रभावशाली स्वरूप बनता है।
  • अलंकार: महाकाव्य में अनुप्रास, रूपक, उपमा जैसे अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है, जिससे कथा का सौंदर्य और गहराई बढ़ती है।
6. महाकाव्य काल का साहित्यिक महत्व:
  • महाकाव्य काल ने भारतीय साहित्य को अमूल्य योगदान दिया है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य केवल साहित्यिक ग्रंथ नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर भी हैं।
  • इस काल के महाकाव्य आज भी समाज में मार्गदर्शन का स्रोत हैं। इनके आदर्श, नीति और धर्म की शिक्षाएँ समाज के लिए आज भी प्रासंगिक हैं।
  • महाकाव्य ने भारतीय भाषा, साहित्य और कला को एक नई दिशा दी। इन महाकाव्यों ने संस्कृत साहित्य को चरम पर पहुँचाया और विभिन्न भाषाओं में अनुवाद और व्याख्याओं के माध्यम से इसे जन-जन तक पहुँचाया।
रामायण में व्‍यंग्‍य
रामायण वाल्मीकि द्वारा रचित एक महाकाव्य है, जो भारतीय संस्कृति और साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें भगवान राम के जीवन, उनके आदर्शों, और उनके संघर्षों का वर्णन किया गया है। रामायण में धार्मिक, सामाजिक, और नैतिक विषयों के साथ-साथ व्‍यंग्‍य का भी समावेश है। वाल्मीकि ने विभिन्न पात्रों और घटनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों, पाखंड, और विसंगतियों पर तीखा व्‍यंग्‍य किया है।
  1. रावण का अहंकार:
    • विवरण: रावण का चरित्र अहंकार और पाखंड का प्रतीक है। वाल्मीकि ने रावण के माध्यम से अत्यधिक शक्ति, अहंकार, और पाखंड पर तीखा व्‍यंग्‍य किया है।
    • उदाहरण:
अयं पंचशरः कण्डूः कामश्च समदर्शनः।
तिष्ठ तावत् प्रयाणार्थं, क्षणमेकं वदाम्यहम्॥
(रावण ने कहा, यह पांच तीरों वाला, कण्डू और काम समान दृष्टि वाला है। रुको, यात्रा के लिए तैयार हो जाओ, मैं एक क्षण में वापस आता हूँ।)
  • विश्लेषण: यहाँ रावण का अहंकार और उसकी आत्ममुग्धता पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि अत्यधिक शक्ति और अहंकार व्यक्ति को कैसे मूर्ख बना सकते हैं।
  1. कैकयी की कूटनीति:
    • विवरण: कैकयी का चरित्र धूर्तता और चालाकी का प्रतीक है। उसने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य प्राप्त करने के लिए राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। वाल्मीकि ने इस घटना के माध्यम से धूर्तता और स्वार्थ पर व्‍यंग्‍य किया है।
    • उदाहरण:
सत्यं ब्रवीमि ते देवि, कुरु सत्यं मम प्रियं।
राज्यं च भरते देहि, रामं च वनं प्रेषय॥
(हे देवी, मैं आपको सच बता रहा हूँ। मेरे प्रिय के लिए सत्य को पूर्ण करो। भरत को राज्य दो और राम को वन भेजो।)
  • विश्लेषण: यहाँ कैकयी की कूटनीति और स्वार्थ पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे स्वार्थ और धूर्तता व्यक्ति को नैतिकता से दूर ले जा सकती है।
  1. सुग्रीव और बाली का संघर्ष:
    • विवरण: सुग्रीव और बाली का संघर्ष भाईयों के बीच शक्ति और अधिकार के लिए था। वाल्मीकि ने इस घटना के माध्यम से पारिवारिक कलह और शक्ति के लिए संघर्ष पर व्‍यंग्‍य किया है।
    • उदाहरण
भ्रातृभिः क्लिश्यमानस्य परदारा भुजङ्गमः।
त्वां हत्वा विगतस्नेहो भ्राता ते राघवाश्रयः॥
(भाईयों द्वारा परेशान किए जाने पर परदारा भुजंग की तरह होता है। तुम्हें मारकर तुम्हारा भाई राघव की शरण में चला गया।)
  • विश्लेषण: यहाँ भाइयों के बीच के संघर्ष और कलह पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे पारिवारिक कलह और शक्ति का लोभ रिश्तों को बर्बाद कर सकता है।
  1. शूर्पणखा का हंसी-ठिठोली:
    • विवरण: शूर्पणखा का चरित्र हंसी-ठिठोली और मूर्खता का प्रतीक है। उसने राम और लक्ष्मण पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। वाल्मीकि ने इस घटना के माध्यम से मूर्खता और अज्ञानता पर व्‍यंग्‍य किया है।
    • उदाहरण:
अहं तु राघवः सम्यगृधोभ्यां राघवाणां, त्वं तु मूर्खो भवेन्नित्यं त्यक्त्वा नारायणं हरिम्।
(मैं राघव हूँ, जो राघवों में श्रेष्ठ है। तुम मूर्ख हो, जो नारायण और हरि को छोड़कर मुझे चाहती हो।)
  • विश्लेषण: यहाँ शूर्पणखा की मूर्खता और अज्ञानता पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे अज्ञानता और मूर्खता व्यक्ति को हास्यास्पद बना सकते हैं।
रामायण में व्‍यंग्‍य का महत्वपूर्ण स्थान है। वाल्मीकि ने विभिन्न पात्रों और घटनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों, पाखंड, और विसंगतियों पर तीखा व्‍यंग्‍य किया है। रावण के अहंकार, कैकयी की कूटनीति, सुग्रीव और बाली का संघर्ष, और शूर्पणखा की मूर्खता पर व्‍यंग्‍य के माध्यम से वाल्मीकि ने समाज को सुधार की दिशा में प्रेरित किया है। इस प्रकार, रामायण में व्‍यंग्‍य का प्रयोग समाज और धार्मिक अनुष्ठानों की विसंगतियों को उजागर करने के लिए किया गया है।
महाभारत में व्‍यंग्‍य
महाभारत, वेदव्यास द्वारा रचित, भारतीय साहित्य का सबसे लंबा और महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच के संघर्ष का विस्तृत वर्णन है। महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं, समाज की विसंगतियों, नैतिकता, धर्म, और पाखंड पर भी गहरा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। महाभारत में व्‍यंग्‍य का भी महत्वपूर्ण स्थान है, जो विभिन्न पात्रों और घटनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों और पाखंड को उजागर करता है।
महाभारत में व्‍यंग्‍य
  1. दुर्योधन का अहंकार:
    • विवरण: दुर्योधन का चरित्र अहंकार और अधर्म का प्रतीक है। महाभारत में दुर्योधन के अहंकार और उसकी मूर्खता पर तीखा व्‍यंग्‍य किया गया है।
    • उदाहरण:
सापेक्षं कुर्वतो दृष्टं, ततः कर्णोऽब्रवीत् तदा।
सम्यक् स्वपिति दुर्धर्षो धार्तराष्ट्रः सुयोधनः
(तब कर्ण ने कहा, “देखो, धार्तराष्ट्र दुर्योधन अच्छे से सो रहा है।”)
  • विश्लेषण: यहाँ दुर्योधन की आत्ममुग्धता और उसके आत्मविश्वास पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि अत्यधिक अहंकार और आत्ममुग्धता व्यक्ति को कैसे मूर्ख बना सकते हैं।
  1. द्रौपदी की सभा में अपमान:
    • विवरण: द्रौपदी का अपमान कौरवों की पाखंडिता और अधर्म का चरम था। महाभारत में इस घटना के माध्यम से धर्म और नैतिकता पर व्‍यंग्‍य किया गया है।
    • उदाहरण:
वासांसि हि त्वा प्रेष्यन्तु, प्राणेभ्यो हि गरीयसी।
धार्तराष्ट्राः सभामध्ये पश्यन्तु वृष्णिनन्दन॥
(द्रौपदी ने कहा, “हे वृष्णिनन्दन, धार्तराष्ट्रों को यह बताओ कि वस्त्र मेरे प्राणों से अधिक मूल्यवान हैं।”)
  • विश्लेषण: यहाँ द्रौपदी के अपमान के माध्यम से कौरवों की पाखंडिता और अधर्म पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह घटना दिखाती है कि कैसे पाखंड और अधर्म समाज को पतन की ओर ले जाते हैं।
  1. शकुनि की कूटनीति:
    • विवरण: शकुनि का चरित्र धूर्तता और चालाकी का प्रतीक है। उसने द्युतक्रीड़ा (जुए) में पांडवों को धोखा दिया। महाभारत में इस घटना के माध्यम से धूर्तता और चालाकी पर व्‍यंग्‍य किया गया है।
    • उदाहरण:
उत्तिष्ठतु नरश्रेष्ठो, भीमः सेनापतिर्भव।
शकुनिः सौबलो धूर्तो, राज्यायैवं युधिष्ठिर॥
(हे नरश्रेष्ठ, उठो और सेनापति बनो। शकुनि ने धूर्तता से राज्य के लिए युधिष्ठिर को चुनौती दी।)
  • विश्लेषण: यहाँ शकुनि की धूर्तता और चालाकी पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे चालाकी और धूर्तता समाज को भ्रष्ट कर सकती हैं।
  1. शिशुपाल का वध:
    • विवरण: शिशुपाल का चरित्र अहंकार और अनाचार का प्रतीक है। उसने भगवान कृष्ण का अपमान किया और अंततः भगवान कृष्ण द्वारा मारा गया। महाभारत में इस घटना के माध्यम से अहंकार और अनाचार पर व्‍यंग्‍य किया गया है।
    • उदाहरण:
शिशुपाल उवाच, ‘कृष्णं न हि ब्राह्मणः साक्षात्।
यतो धर्मसुतो राजा, पाण्डवः सुत्यवानिति
(शिशुपाल ने कहा, “कृष्ण ब्राह्मण नहीं है। इसलिए धर्मराज पाण्डव सत्यवादी नहीं हो सकते।”)
  • विश्लेषण: यहाँ शिशुपाल के अहंकार और मूर्खता पर व्‍यंग्‍य किया गया है। यह दिखाता है कि अत्यधिक अहंकार और अनाचार व्यक्ति को कैसे विनाश की ओर ले जाते हैं
महाभारत में व्‍यंग्‍य का महत्वपूर्ण स्थान है। वेदव्यास ने विभिन्न पात्रों और घटनाओं के माध्यम से समाज की बुराइयों, पाखंड, और विसंगतियों पर तीखा व्‍यंग्‍य किया है। दुर्योधन के अहंकार, द्रौपदी के अपमान, शकुनि की कूटनीति, और शिशुपाल के वध के माध्यम से महाभारत ने समाज को सुधार की दिशा में प्रेरित किया है। इस प्रकार, महाभारत में व्‍यंग्‍य का प्रयोग समाज और धार्मिक अनुष्ठानों की विसंगतियों को उजागर करने के लिए किया गया है।


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2 टिप्पणी

  1. डॉ संजीव कुमार जी की खोज अद्भुत है। जहाँ तक मेरी जानकारी है, इस तरह का कार्य हिन्दी व्यंग्य क्षेत्र में पहली बार हुआ है जो शलाघनीय है। इसकी जितनी सराहना की जाये वह कम है। इस श्रम साध्य और शोध के लिए संजीव जी को और पुरवाई पत्रिका के संपादक तेजेंद्र शर्मा को साधुवाद और बधाई।

  2. आदरणीय संजीव सर नमस्ते आपके स्तंभ का पहला भाग तो हम नहीं पढ़ पाए थे। लेकिन आज हमने दूसरा भाग पढ़ा। इसे पढ़ने के बाद हमें ऐसा लगा इस पर हमें कुछ कहना चाहिए जिस काल को आपने महाकाव्य काल कहकर संबोधित किया है दरअसल वह भक्ति काल है। महाकाव्य काल नहीं। भक्ति काल को ही साहित्यिक दृष्टि से स्वर्ण युग कहा जाता है। भक्ति काल को दो धाराओं में बाँटा गया है निर्गुण भक्ति धारा और सगुण भक्ति धारा।सगुण भक्ति धारा भी दो भागों में विभाजित है- राम भक्ति और कृष्ण भक्ति! राम भक्ति में तुलसीदास और उनका महाकाव्य है रामचरितमानस तथा कृष्ण भक्ति में सूरसागर महाकाव्य सूरदास जी का। निर्गुण भक्ति धारा को भी दो भागों में बाँटा गया है।पहला ज्ञान मार्गी शाखा इसके प्रमुख कवि कबीर रहे साखी में इनके दोहे हैं और सबद व रमैनी। दूसरी प्रेम मार्गी शाखा थी इसके रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी थे और इनका महाकाव्य था पद्मावत। रामायण वाल्मीकि कृत है और यह श्रीराम के जन्म के 200 वर्ष पूर्व लिखा गया था।‌ वाल्मीकि त्रिकालदर्शी थे इसलिए यह महाकाव्य पूर्व में ही लिखा गया। राम त्रेता में हुए थे और यह उनके जन्म से भी पूर्व लिखा गया था। यह संस्कृत का महाकाव्य है। महाभारत द्वापर की कथा है।कुछ विद्वान महाभारत को महाकाव्य मानने से इन्कार करते हैं क्योंकि यह महाकाव्य की विशेषताओं की अनुकूल नहीं बैठता। इसमें अनेक कथाएँ हैं जो एक साथ चलती हैं कुछ भगवत् गीता व श्रीकृष्ण के कारण इसे महाकाव्य मानते हैं। हर महाकाव्य का मानक विषय वस्तु की दृष्टि से अलग रहता है। रामायण रामचरितमानस दोनों ही महाभारत से बिल्कुल अलग हैं।इनसे भारतीय समाज को नैतिकता और आदर्शों का मार्ग मिला यह बात आपने बिल्कुल सही कही। पर महाभारत और रामायण दोनों ही भक्तिकाल से परे हैं दोनों का संबंध भक्ति काल से नहीं है। और न ही दोनों की रचना भक्ति काल में की गई।वे भक्ति से संबद्ध है वह एक अलग बात है महाकाव्य की विशेषताएँ-महाकाव्य की पहली विशेषता है कि इसका नायक उदात्त चरित होता है। इसकी दूसरी विशेषता है कि इसमें सात या 8 सर्ग होते हैं। इसकी तीसरी विशेषता है कि हर सर्ग मंगलाचरण से शुरू होता है। इसकी चौथी विशेषता होती है कि इसमें तीन रस होते हैं-वीर श्रृंगार और शांत! एक रस प्रधान रहता है। पाँचवी विशेषता यह है नायक के संपूर्ण जीवन का चित्रण होता है। अन्य कथाएँ गौण रूप से रहती हैं।
    अगर काव्य सौंदर्य की बात करें। तो रामचरितमानस में हर रस किसी न किसी रूप में मिलेगा अपने तीन प्रमुख रसों के अतिरिक्त। अलंकार की दृष्टि से- अलंकार तीन प्रकार के होते हैं1- शब्दालंकार 2-अर्थालंकार और 3-उभयालंकार।लगभग सभी अलंकार इन तीन अलंकारों में समाहित है और रामचरितमानस में लगभग सभी अलंकार प्रयुक्त हुए हैं। हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के अनेक छंद है । जहाँ तक व्यंग्य की बात है तो आपने सिर्फ वाल्मीकि रामायण की चर्चा की है।वह संस्कृत में है। संस्कृत हमने पढ़ी है पर संस्कृत में रामायण नहीं पढ़ी। हिन्दी अनुवाद पढ़ा है। एक दूजे के ऐसा लगा की हिंदी अनुवाद में थोड़े सुधार की जरूरत है। महाभारत भी हिंदी में ही पढ़ी है। महाभारत में व्यंग्य बहुत हैं। दुर्योधन तो बिना व्यंग्य के बात ही नहीं करता था। लेकिन महाभारत का सबसे बड़ा व्यंग वह था जब हस्तिनापुर का निर्माण होने के बाद दुर्योधन वहाँ गया । हस्तिनापुर अद्भुत था! महल में ऐसी संरचना की गई थी कि किसी एक जगह पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पानी नहीं है लेकिन वहाँ पानी था और जहाँ पानी था वहाँ ऐसा प्रतीत ही नहीं हो रहा था कि पानी है। वहाँ पर दुर्योधन को पानी से बचते और पानी में गिरते हुए देखकर द्रौपदी ने उसकी हँसी उड़ाते वह कहा था कि, “अंधे का बेटा भी अंधा ही होता है!”द्रोपदी का यह उपहास ही स्वयं द्रोपदी के चीर हरण का कारण बना और महाभारत के युद्ध का भी। महाभारत का उत्तरार्ध का तो सारा ताना-बाना ही व्यंग्य पर है।आपने भक्ति काल की भूमि पर उन महाकाव्य की बात की जिनका सृजन भक्ति काल से युगों पहले हुआ था हालांकि उद्देश्य सबके एक ही थे। इसे पढ़ते हुए एक बात हम और सोच रहे थे कि आपने हिंदी के महाकाव्यों को क्यों नहीं लिया ! अब महाकाव्य के उद्देश्य थोड़े बहुत बदल गए हैं और महानायक की जगह उसमें सर्वहारा वर्ग को भी लिया जाने लगा है! लिखने के पहले हमने बहुत बार सोचा कि हमें लिखना चाहिए या नहीं लेकिन फिर लगा के लिखना चाहिए क्योंकि क्रिया की प्रतिक्रिया तो होती ही है। आप काफी वरिष्ठ हैं और साहित्यिक दृष्टि से आपका कद भी बहुत ऊँचा है। आपके समक्ष हम तो कहीं से कहीं तक भी नहीं ठहरते। अंत: निवेदन है कि अगर कुछ गलत लगे तो मार्गदर्शन करें। और बुरा लगे तो कृपा कर क्षमा कीजिएगासादर।

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