प्रकाश मनु लीक छोड़कर चलने वाले विलक्षण साहित्यकार हैं। बड़ों के लिए तो उन्होंने साहित्य की प्रायः हर विधा में जमकर लिखा ही है, बच्चों के लिए भी भरपूर लिखा। कुछ अरसा पहले उनके कठिन संघर्षों भरे जीवन सफर, थोड़ी अलहदा शख्सियत और विविध रुचियों को लेकर बातचीत हुई। मनु जी ने बहुत खुलकर मेरे सवालों के जवाब दिए, जिनमें बीच-बीच में उनकी खरी और खुरदरी शख्सियत की एक झलक भी दिखाई पड़ जाती है। जैसे सीधे सवाल, वैसे ही सीधे जवाब। बड़े संक्षिप्त पर गहरे भी, जिसमें जीवन के प्रति उनका आशावादी नजरिया है तो साहित्य के प्रति उनकी चिंताएँ और सरोकार भी। साथ ही अपने ढंग से कुछ करने की जिद और उत्साह भी।
प्रकाश मनु जी के साथ यह अनोखा इंटरव्यू थोड़े संक्षिप्त रूप में यहाँ दे रहे हैं। आशा है, इसे पढ़कर पाठक उनके जीवन और विचारों को जानने क साथ-साथ, खुद उनकी भी कुछ अलग छवियाँ देख पाएँगे।

श्याम सुशील – अपने जन्मदिन पर किस तरह की यादें मन में कौंधती हैं?
प्रकाश मनु – श्याम जी, बचपन में जन्मदिन मनाने की परंपरा घर में न थी। जब जन्मदिन की तारीख ही ठीक न लिखी हो, तो उसे मनाने का उत्साह भी कैसा? यों भी हमारे पुराने पारंपरिक भारतीय परिवारों में मुझे याद नहीं पड़ता, ऐसी कोई परंपरा थी। पर अगली पीढ़ी में हमारे देखते-देखते यह चल निकला।…बाद में भी बच्चे बड़े हुए तो उन्होंने ही मम्मी या पापा का जन्मदिन मनाया। हालाँकि बहुत सादा ढंग से। जन्मदिन पर सुनीता जी सुबह-सुबह हलवा बना लेती हैं और घर के मंदिर के आगे खड़े होकर हम लोग हाथ जोड़ लेते हैं। उस स्वादिष्ट हलवे को खाते हुए लगता है, दुनिया में इससे बड़ा कोई सुख, स्वाद और आनंद तो हो नहीं सकता।
जिन दिनों ‘नंदन’ पत्रिका में था तो हम लोग मिलकर सभी साथियों का जन्मदिन मनाते थे। मेरा जन्मदिन मनाना भी मित्रों को याद रहता था। तब भी कोशिश होती थी कि बाहर से कुछ मँगाने की बजाय मैं सुनीता जी के हाथ की बनी पूरियाँ और सूखे आलू की भाजी मित्रों के लिए लेकर जाऊँ। सब बड़े शौक से मिल-जुलकर खाते थे। ये बड़े आनंद के क्षण होते थे, जिनमें खूब अच्छी गप्पाष्टक भी होती थी और हम लोग खूब हँसते-कहकहाते थे। वे आनंदपूर्ण क्षण आज भी याद आते हैं। उन्हीं दिनों मैंने मन ही मन यह संकल्प करना शुरू किया कि इस वर्ष मैं ये-ये काम पूरे करूँगा। इस बहाने बहुत से काम हो जाते थे और बहुत खुशी मिलती थी। यह नियम तो मेरा आज भी चल रहा है। इस बार जन्मदिन पर मैंने सोचा है कि मैं बरसों से चलते आ रहे अपने अधूरे काम जल्दी से जल्दी पूरे करूँगा, ताकि इसी साल वे पाठकों के आगे आ सकें।
श्याम सुशील – आपने बचपन में क्या सपने देखे थे अपने बारे में?
प्रकाश मनु – बचपन से ही श्याम जी, लेखक होना मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना लगता था। उन दिनों भी मेरे हीरो कहें या नायक, साहित्यकार ही थे और वे आज भी हैं। मुझे लगता था, परमात्मा ने इस संसार में अपने बाद सबसे बड़ा साहित्यकार को ही बनाया है। बड़े से बड़ा नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, धनपति, अफसर, इंजीनियर, डाक्टर, किसी बड़ी से बड़ी संस्था का अध्यक्ष या किसी जगविख्यात कंपनी का सर्वेसर्वा, ये सब मुझे लेखक या साहित्यकार के आगे हेय लगते थे। आज भी लगते हैं। मेरी बनाई हुई दुनिया के सूरज, चाँद, सितारे तो लेखक ही हैं। उनसे बड़ा वहाँ कोई नहीं। कोई बड़े से बड़ा कुर्सीनशीन आए तो कोई जरूरी नहीं कि मैं उसके लिए खड़ा होऊँ। पर जिंदगी भर गरीबी, बेबसी और अभावों के बीच रहकर लिखने वाले किसी साहित्यकार के आगे आदर और विनम्रता से झुकने पर लगता है, मैंने स्वर्ग का सुख पा लिया।…हालाँकि साहित्यकार भी वही आकर्षित करते हैं, जिनमें स्वाभिमान और खुद्दारी हो और जिन्होंने सफलता के पीछे दौड़ने की बजाय, शब्दों की साधना में, तप में खुद को खपाया है, इस दुनिया के लाखों मामूली लोगों के सुख-दुख और तकलीफों से एकाकार होकर लिखा है।
श्याम सुशील – बचपन में आपका रोल मॉडल कौन था?
प्रकाश मनु – श्याम जी, बचपन में मेरे रोल मॉडल साहित्यकार ही थे। गद्य में रोल मॉडल प्रेमचंद थे, तो कविता में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, रामनरेश त्रिपाठी और निराला की मानस छवियाँ मुझे सबसे अधिक मोहती थीं। इन्हें पढ़कर ही मन में अपने लेखक होने की छवि बनी। आँखों में एक सपना जागा और जाने-अनजाने मैं उसे पोसने लगा।…आज अगर कुछ शब्द जोड़ लेता हूँ तो उसका श्रेय इन्हीं बड़े कद्दावर लेखकों को है। हालाँकि बाद में और लेखकों को पढ़ा तो मन में और-और साहित्यकारों की भी ऐसी ही मोहक मानस छवियाँ बनने लगीं, जो मुझे कलम पकड़कर शब्दों की इस अनोखी दुनिया में आने के लिए आकर्षित करने लगीं।
श्याम सुशील – आपके लिए दुनिया की सबसे बड़ी खुशी क्या है?
प्रकाश मनु – किसी को थोड़ी सी खुशी देकर मिलने वाली खुशी मुझे इस दुनिया की सबसे बड़ी खुशी लगती है।
श्याम सुशील – कौन सी चीज आपके अंदर जोश भर देती है?
प्रकाश मनु – किसी ऐसे पीड़ित जन के साथ खड़े होकर लड़ना, जो बहुत उपेक्षित है, तकलीफें झेल रहा है और जिसकी बात कहने वाला कोई नहीं है, मुझमें सबसे ज्यादा जोश भर देता है। मुझे लगता है, जिसका सब साथ छोड़ दें, लेखक या साहित्यकार का साथ उसे जरूर मिलना चाहिए। उसके हक में लड़ते हुए या अपनी किसी रचना में उसकी तकलीफ को उकेरते हुए, मन में बड़ा जोश उमड़ता है और महसूस होता है कि मैं सच्चाई के साथ खड़ा हूँ। यानी एक लेखक के रूप में सार्थक जीवन जी रहा हूँ। इसी तरह महाराणा प्रताप, शिवाजी, झाँसी की रानी की लड़ाइयों और भारत के स्वाधीनता संघर्ष में क्रांतिकारियों के उत्सर्ग को याद करते हुए, या उनके बारे में लिखते हुए मन में बड़ा जोश उमड़ता है।
श्याम सुशील – आपकी जिंदगी में कोई ऐसी बात जिसका आपको अफसोस है?
प्रकाश मनु – हाँ, माँ के अंतिम दिनों की मुझे अकसर याद आती है, जब मैं उनके निकट नहीं था। मैं हिंदुस्तान टाइम्स में था और कुछ दिन की छुट्टी लेकर उनसे मिलने गया था। तब माँ कुछ दुखी लगीं, पर अपनी व्यथा उन्होंने मुझसे नहीं कही। पर जब मैं चलने लगा, उन्होंने एक-दो दिन और रुकने का अनुरोध किया। मैंने कहा कि माँ, अभी तो मुझे जाना है, पर मैं जल्दी आऊँगा। इस पर माँ के मुँह से निकला, “पुत्तर, फिर मैं तैनूँ नईं मिलणा।” मैं चौंका, फिर भी इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें आश्वासन देकर कि जल्दी ही फिर से आऊँगा, मैं दिल्ली चला आया। पर मेरे वहाँ पहुँचने के दो-तीन दिन बाद ही बड़े भाईसाहब का फोन आया कि माँ को ब्रेन हैमरेज हुआ है, एक तरफ का शरीर लकवाग्रस्त हो गया है। ठीक से बोल भी नहीं पातीं।
मैं दौड़ा-दौड़ा आगरा पहुँचा, जहाँ वे अस्पताल में दाखिल थीं। तब माँ ने मुझे देखते ही बहुत जोर लगाकर अपनी अस्पष्ट आवाज में कहा, “पुत्तर, मैं तैनूँ कहया सी ना। फिर मैं तैनूँ नईं मिलणा।” सुनकर मुझे रोना आ गया। माँ कोई बीस-पचीस दिन चारपाई पर रहीं। अचेत प्रायः। बस, बीच-बीच में होश आता तो कुछ बुदबुदातीं।…और फिर वे चली गईं। जब वे अचेत थीं, मैं पूरे समय उनके पास ही बैठा रहा और पछताता रहा कि जब उन्होंने एक-दो दिन रुकने के लिए कहा था तो मैं उनके पास रुका क्यों नहीं! यह पछतावा अब भी गया नहीं है और मन को लगातार विकल करता है।



बहुत बढ़िया, छोटी से लेकर बड़ी बड़ी बातें मनु जी के जीवन के रहस्य खोलती हैं। डूबकर की गई बातचीत को पढ़ते समय तारतम्य नही टूटता
श्याम सुशील जी का बेहतरीन इंटरव्यू है यह कृष्ण मनु जी के साथ।
नंदन पत्रिका हमने पढ़ना शुरू करने के बाद दसवीं क्लास तक पढ़ी। वह एक बेहतरीन पत्रिका थी। हमें आज भी घनश्याम दास बिरला का उसमें लिखा हुआ एक संस्मरण याद है कि किस तरह सुबह 5:00 बजे से घूमने जाते हुए जब उन्होंने ठंड में फुटपाथ पर ठिठुरते सोते लोगों को देखा तो ठंड के दिनों में वह कंबल लेकर जाने लगे थे, और गरीबों को सोते में उढ़ा दिया करते थे।
जहाँ तक जन्मदिन की बात है। वह समय ही ऐसा था। जन्मदिन कोई नहीं मनाता था। बाद में ही यह प्रचलन में आया। फिर भी हम लोग मनाते नहीं थे। मंदिर में जाकर प्रसाद चढ़ाते थे बस।
साहित्यकारों के प्रति जो सोच प्रकाश मनु जी की है, हमें लगता है लगभग सभी की सोच भी उसी तरह की रहती थी तब। साहित्यकार हम लोगों के लिए भी सर्वोपरि थे। उनके लिखे को हम लोग सिर्फ पढ़ते ही नहीं थे बल्कि जीवन में उतारने का प्रयास भी करते थे हमें आज भी यह बात दृढ़ता से महसूस होती है कि हमारे जीवन की निर्मिती में माता-पिता, गुरु एवं साहित्यकारों का ही योगदान है। हम जो भी ,जैसे भी हैं हमारी सोच और हमारे विचारों पर इन तीनों का ही प्रभाव है। और हम शुक्रगुजार हैं सबके कि उन्होंने हमें इतना अच्छा जीवन इतनी बेहतरीन सोच से नवाज़ा।
श्याम सुशील जी! प्रश्नों की आपकी श्रृंखला काफी लंबी है। बहुत सोच विचारकर आपने अपना प्लान तैयार किया और क्रम से सभी प्रश्नों के जवाब बहुत सहजता और सरलता से दिये प्रकाश मनु जी ने।
प्रारंभिक कई बातें अपने समय की होने के कारण बहुत अपनी सी लगीं। हर काल का भी अपना एक स्वभाव होता है जो उस काल के लोगों में नजर आता है लगभग सभी में।
इसमें कोई दो मत नहीं यह एक बेहतरीन इंटरव्यू है इसमें बहुत कुछ सीखने के लिए है। इस इंटरव्यू के लिए शाम सुशील जी!आपका तहेदिल से शुक्रिया।
साथ ही प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का भी दिल से आभार!
बहुत रोचक साक्षात्कार। वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु जी के साहित्य के प्रति विचार बहुत उत्कृष्ट हैं और साथ ही बहुत स्पष्ट हैं।
श्रद्धेय मनुजी के सक्षात्कार को बड़ी तल्लीनता एवं मनोयोग से पढ़ा।
श्याम सुशीलजी के प्रश्नों के उत्तर में श्रद्धेय मनुजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अनेक अनछुए पहलू उजागर हुए हैं।
भगवान कृष्ण की गीता की याद ताजा हो गई।
बच्चों के लिए आपका संदेश बेहद प्रेरक है। हर बच्चा बेहतर मनुष्य बनें। एक सच्चा इंसान बनें।
दीवानों की तरह पढ़ना और लिखना ही आपका प्रिय नशा है।
बेहद प्रेरक, सारगर्भित एवं नई दिशा देने वाला साक्षात्कार।
हार्दिक बधाई, श्रद्धेय।
सादर,
सविनय,
श्यामपलट पांडेय
15 मई ,2024
गज़ब का साक्षात्कार, श्याम सुशील जी ने जिस खुले मन से प्रकाश मनु जी का साक्षात्कार लिया मनु जी ने जबाब भी उतनी ही साफ गोई से दिए। अपनी जिंदगी का खुला चिट्टा सबके सामने रख दिया।
अद्भुत संवेदन शीलता और कल्पना का गठजोड़ है उनका जीवन. इंसानियत के प्रति लगाव प्रेम और बालपन की मन में बसी झांकी उन्हें दूसरे साहित्यकारों से अलग करती है.।
उम्र के इस पड़ाव में बिना रुके बिना थके लिखते जाना और अपने ऊपर घमंड नहीं कोई अपेक्षा नहीं.।
ईश्वर आपको शतायु करे, खूब लिखें, खूब पढ़ें और बाल
साहित्य की सेवा करें।