वर्षों बाद अपने गांव की धरती पर हमारा होना किसी आंतरिक उल्लास और आह्लाद से कम नहीं था। अपने पुत्रवत भतीजे राजा की सगाई के अवसर पर हम दोनों मैं और मेरे पति, वहां आए थे जिसका आयोजन छपरा शहर के एक हौटल में किया गया,भावी पुत्रवधू कल्पना और अपने परिजनों से मुलाकात बहुत ही सुखद लगी शुभता भरा सुप्रभात मंगलकामनाओं से सुशोभित हो रहा था।
मेरे लिए यह धरती मेरी ससुराल थी और आदर मान सम्मान की अधिकारिणी भी। हम लोग शहर के ही एक होटल*मयूर*में ठहरे हुए थे जो,जगदम कालेज के सामने,बस स्टैंड के पास स्थित था, वहां दो दिन की मेहमानी के बाद आज अपने गांव आ गई हूं।सिद्धपुर-सिधवलिया*जहां अपने पुरखों के घर से मिलना उनके वहां मौजूद रहने के अहसास को जीना बहुत ही भावुक पल थे हमारे लिए। वहां कोई नहीं रहता है अब,बस अपने माता-पिता और पूर्वजों के निवास स्थान को एक मंदिर की भांति संजो मैंने की भावना थी,जो हमारे संकल्प को दृढ़ बनाती रहती है कि इस घर को नष्ट नहीं होने देना है,यह धरोहर है हमारी,इसकी रक्षा करनी है,,यद्यपि दीवारें पुरानी हो गई थी,दालान की छत पर न जाने कितनी जानी अनजानी सब्जियों की बेलें लद गयी थीं, आंगन में बेतरतीब उगी झाड़ियां,मौसम की मार झेलती घर की चारदीवारी बहुत कुछ कह रही थी,इस बार फिर घर की व्यवस्था ठीक करवानी होगी।
घर केवल ईंट पत्थर और गारे मिट्टी से बना नहीं होता, उसमें हमारी भावनाएं, संस्कार, परंपराएं माता पिता का आशीर्वाद सभी कुछ होता है। पुरखों की धरती पर हर उत्सुक परिचित अपरिचित निगाहें हमारे स्वागत में तत्प। बरसात के दिनों में हुई बारिश की अधिकता से चारों ओर पानी भरा हुआ था,,इसी कारण धान की फसल नहीं हो पाई, और न ही खेती की सुरक्षा। केवल जलकुंभी और सिंघाड़े की फसलें जहां तहां स्वत: उग आई थी, फिर भी इस परेशानी में भी सबके चेहरों पर मुस्कान थी, एक अव्यक्त उल्लास, उत्साह दिखाई दिया वहां पर, शाय़द सबने कठिनाइयों में भी जीना सीख लिया था,यही तो गांव की विशेषता है,जिसे हम शहरवासियों को सीख लेनी चाहिए,, यहां कठिनाइयों में भी समाधान ढूंढ लेते हैं। बेवजह,शोर नहीं होता।
अपने देवर अजय जी के घर पर हमारा भरपूर स्वागत हुआ,यह भी एक सुखद संयोग था कि हम आस्था के पवित्र पर्व छठ पर गांव में थे। हमारी देवरानी छठ कर रही थीं,,मेरे पति बहुत ही उत्साहित थे कि बचपन के बाद इस छठ पूजा में शामिल हो रहे थे, हमारे होने से सभी उत्साहित थे, बच्चे, बहुएं सभी स्वागत और सेवा के लिए तत्पर। पहली बार छठ पूजा में करीब से शामिल हो रही हूं।.इस वर्ष गांव के पावन, हरित परिवेश में,,घुली एक अनिवर्चनीय पवित्रता,मन को शांत शीतलता प्रदान कर रही थी।.छठ के सूर्य को नमन करने का अवसर मिला यह हमारे लिए गर्व की बात थी,,रात दो बजे से जगकर पूजा स्थल की साफ सफाई। प्रसाद बनाने की पवित्र भावना के साथ आस्था की ज्योति जल रही थी, और मेरी देवरानी अपनी अपार निष्ठा के साथ हंसमुख मन, गीत गाते हुए प्रसाद, में खरना की खीर और रोटी बनाने में व्यस्त थी,,पूरा परिवार उसी समर्पित भावना के साथ फल,,दूध,घी, गन्ना और अनेक मौसमी फलों, सामग्रियों को जुटाने की तैयारियों में लगा हुआ था, इस पवित्र अनुष्ठान की पूर्णता के लिए एक ऐसा उत्साह व्याप्त था घर में जैसे,बेटी की शादी की तैयारियां।
मेरे गांव में नदी नहीं है लेकिन घर के बाहर कुएं पर ही अर्ध्य देने की परंपरा थी,, और पूजा की भी। गांव के बीच में मां काली के मंदिर के सामने ही छठ का पूजा स्थल बना था,,बालू और मिट्टी से बना छठि मां का प्रतिरूप गेंदे के फूलों से सजा था और उसके चारों तरफ व्रती महिलाएं अपना डाला सजाकर बैठी छठ के गीत गा रही थी।कहीं चटाई तो कहीं दरी बिछाकर अच्छी खासी भीड़ भी जुटी हुई थी। छोटे से गांव में छठ पर्व का उल्लास एक अद्भुत आनंद की सृष्टि करता है,मेले का सा दृश्य।अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा, अभ्यर्थना के स्वरों में, घर परिवार, गांव की सुख समृद्धि की कामना थी, कहीं पुत्र की लालसा लिए मौन प्रार्थना थी तो कहीं,अवध के राम की तरह अखंड सौभाग्य की याचना। इस व्रत में अमीर गरीब, ऊंच नीच की खाई मिट जाती है, सभी एक ही दिशा में, एक ही स्वरों में केवल सूर्य से तेज, आशिर्वाद और सुख की कामना करते हैं,,यह सुख मन का भी है, जीवन का भी, और एक अभाव की पूर्णता हेतु भी।आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है, जैसे। सबकी आंखें नम हैं और मन भींगा है।न जाने क्यों अति प्राचीन इस प्रकृति पर्व में एक स्वाभाविक पवित्रता जन्म लेने लगती है।कोई विभेद नहीं होता मन में।
‘गांव में छठ’ पद्मा मिश्रा जी का संस्मरण है। शीर्षक से पता चलता है कि इसमें छठ पूजा का विधि-विधान होगा। लेखिका बहुत दिनों बाद अपने ससुराल के गांव जाती हैं जहां उनका खूब आदर सत्कार होता है। शहर से आए रिश्तेदारों का स्वागत लोग ऐसे ही करते हैं। लेखिका अपने पैतृक गांव के भी दरस-परस कर आती हैं।
इस संस्मरण के केन्द्र में गांव और छठ पूजा तो है ही, इसके साथ ही जन्मभूमि की मिट्टी का जो सौधापन है जो आकर्षित करता है। जन्मभूमि वाला घर अपने अकेलेपन का दंश भोग रहा है क्योंकि अब वहां कोई नहीं रहता है। मकान की दीवारें कमजोर होने लगी है। खालीपन को दूर करने के लिए मकान बेलों को, घास-पात को आश्रय दे देता है। उसके साथ के लिए कोई चाहिए भी तो।
लेखिका उस घर से जुड़ाव महसूस करती हैं तभी तो उसकी इस हालत पर क्षोभ से भर जाती हैं।
देवरानी के साथ छठ पूजा का मनोहारी दृश्य उभरता है। पूजा के समय गांव के सभी लोगों का एकसाथ खड़े होना तथा किसी तरह के भेदभाव का न होना यह बताता है कि परंपरा से चले आ रहे ये पर्व मनुष्य को आपस में जोड़ रहे हैं, आगे भी जोड़ते रहेंगे।
छठ पूजा में खरना की खीर, दूध ,मिठाई, फल, पकवान आदि से गांव के कुआं पर छठि मैया की पूजा का मनोहारी दृश्य उभरता है। अपनी मन्नतों को छठि मैया के सामने रखतीं इन पुजारिनों की आस्था और विश्वास देखते बनता है।
घर परिवार से मिलना केवल घर के सदस्यों से मिलना भर नहीं होता है। उसकी मिट्टी से, वहां के पेड़-पौधे और वहां की आवोहवा से भी मिलना होता है जिसे हम बहुत पहले छोड़ आते हैं।
पद्मा जी आपने इस संस्मरण के माध्यम से अपने पुराने दिनों को भेंट लिया है। इसके लिए आपको बधाई
सादर प्रणाम। अशेष धन्यवाद आभार सर।आपने इसे पढकर मेरी भावनाओ और लेखनी को सम्मान दिया।बहुत अच्छा लगा।गांव हमारी आत्मा में.बसता है।शहरों की आपाधापी में भी गांव की सहजता सरलता और आत्मीयता कभी भूलती नहीं।आभार।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रिय पद्मा जी छठ पूजा का वर्णन पढ़कर हृदय भर आया ,एक अपने पैतृक स्थल से जुड़ाव ,खाली रहने पर घांस बेल पत्तो का जमाव ,घर के सुने पन को खानी कहता हे,
लेकिन अचानक जब जब हम अपने उसे घर में पहुंचते हैं जहां हम ब्याह कर आए थे तो एक अजब सिहरन,एक असीम लगाव सा जाग उठता है, घर मानो अपनों के शोर से हलचल से फिर से जीवंत सा हो जाता है।
वहां निवास कर रहे ,अनुज अग्रज सभी के चेहरे खिल जाते हैं
सभी के साथ छठा पूजा मनाना एक असीम आस्था ईश्वर से प्रकृति से ।हृदय को जोड़ देता हे
आपने संस्मरण को आलेख में जीवंत कर दिया हे
प्रिय साधुवाद
बहुत बहुत धन्यवाद, सस्नेह आभार कुंती जी।आपकी सराहना मेरी उर्जा है।बहुत अच्छा लगा आपने पढा और अपना आशीर्वाद दिया।सादर प्रणाम।
पद्मा जी!
बहुत ही प्यारा संस्मरण है आपका।
पहले इतना नहीं जानते थे हम छठ पूजा को, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आजकल सारी जानकारियाँ हर प्रांत के और हर धर्म की पूजा को बहुत निकट कर दिया।
फिर आप जैसी कुछ और बहनें भी हैं जो छठ पूजा से जुड़ी हुई हैं।
गाँव का वातावरण वैसे भी पवित्रता और आत्मीयता का आभास देता है।
बहुत दिनों बाद ससुराल जाना निश्चित रूप से सुखद पल रहे होंगे।
छठ पूजा सूर्य की कठिन पूजा है।
सूर्य वास्तव में इस संसार में साक्षात भगवान है जो दिखाई देते हैं। इसके अलावा ऊर्जा के प्रतीक भी हैं सूर्य विशेषांक में हमने पढ़ा है, सूर्य आयु,यश, बल और बुद्धि के दाता हैं। सूर्य को नित्य जल चढ़ाना चाहिये। उदित होते हुए सूर्य की लाल रश्मियाँ आंखों की ज्योति के लिये ही नहीं पीलिया के लिए भी औषधि की तरह होती हैं। विटामिन डी का सबसे अच्छा स्रोत सूर्य की प्रातः कालीन धूप है। वाल्मीकि रामायण में जब राम रावण को मार नहीं पा रहे थे तब अगस्त्य ऋषि ने श्री राम से सूर्य की उपासना के लिए कहा और उपासना के लिए उन्हें आदित्य हृदय स्तोत्र दिया।
मायका हो या ससुराल लेकिन बहुत दिनों के बाद परिवार से मिलना बहुत सुखद और आनंददायक पल होते हैं।
बहुत-बहुत बधाई आपको इस संस्मरण के लिये ।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार।
सस्नेह प्रणाम नीलिमा दी,
आपने मेरा संस्मरण पढकर अपना स्नेहाशीष दिया यह मेरे लिए बडी बात है।हृदय से आभार दीदी।