Wednesday, February 11, 2026
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कमलेश कुमार दीवान की नज़्म – ओ दस्तगीर

ओ दस्तगीर बताओ कि तुम मिले ही क्यों
मुझे इस राह,अकेले ही गुजरने देते
बहुत चला हूँ सांसो का अब पता हैं कहाँ
कुछ देर ओर झमेले मे ही फिरने देते
तुमने सोचा है लाचार है बूढ़ा है बहुत
थामकर हाथ राह पार करा दूंगा इसे
हमने चाहा था मेले में अकेले रहना
साथ चलती हवाओं के हवाले वहना
ये न चाहा था कि तैयार हो ही जाएगा
अब न हासिल हुए किरदार से कहलाएगा
कुछ आसपास रहा साथ रहा न कोई
कुछ देर ओर सही आह ही भरने देते
मै राहगीर हूँ तो मुझे राह भटकने देते
ओ दस्तगीर बताओं…..
मुझको मिलते रहे हैं सोख सबेरे ऐसे
जैसे कोई साँझ टूटती है तन्हाई लिए
रात आती है वे ही बात और यादों को लिए
चाँद ठिठका और ठिठुरता हो जुन्हाई को पिए
मेरी दुनिया थी वही, सफर भी करने देते
यूँ उदासी,न गम ए बारात दिल मे अब है मेरे
न तिलिस्मात और जज्बात साथ आए हैं
ऐसा लगता रूठी हुई कायनात ही है
क्या इशारे हैं ,न अपने हैं न पराए हैं
खुशामदीद मुझे देखने देते दुनिया
जिसमें सुख है दुख के भी घने साये हैं
ओ दस्तगीर मुझे चलने भटकने देते
यहां एक राह है हर ओर तो दो राहे हैं

कमलेश कुमार दीवान

संपर्क – [email protected]

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