मन की अतल गहराइयों में
एक बक्सा पड़ा है
बंद, जर्जर, धूल से ढका
पर भीतर…
आवाज़ें गूंजती हैं
सपनों के छिन्न अवशेष
कुछ रक्तरंजित यथार्थ
कुछ घाव, जो स्पर्श मात्र से
रिसने लगते हैं
यह बक्सा खुलते ही
हवाओं में घुल जाएगा
विष का पुराना स्वाद
रातें फिर से डरावनी हो जाएंगी
फिर भी
कब तक सिसकियों को
चुप रहने का आदेश दिया जाए
कब तक तड़प को शब्दों से वंचित रखा जाए
कब तक मौन के आवरण में
घावों को सड़ने दिया जाए
आज नहीं तो कल
इस पैंडोरा के बक्से को खोलना ही होगा
और फिर समय
एक निर्दयी वैद्य की भाँति
किसी दिन संधान करके
विष की गाँठ खोल देगा
और हम…
अग्निस्नान करके
निर्बंध, मुक्त, निर्वसन
पुनः जन्मेंगे
अनुजीत जी!
आपकी कविता पैंडोरा बॉक्स पढ़ी। पैंडोरा का अर्थ हमें समझ में नहीं आया।पर कविता पढ़कर भाव समझ में आये।
मन में दर्ज व संरक्षित पीड़ाएं कुंठा को जन्म देती है कविता की अंतिम पंक्तियाँ महत्वपूर्ण है। वाकई सब कुछ समय के हाथ में है। समय परिवर्तनशील है। अंतिम पद-
और हम…
अग्निस्नान करके
निर्बंध, मुक्त, निर्वसन
पुनः जन्मेंगे
अनुजीत जी!
आपकी कविता पैंडोरा बॉक्स पढ़ी। पैंडोरा का अर्थ हमें समझ में नहीं आया।पर कविता पढ़कर भाव समझ में आये।
मन में दर्ज व संरक्षित पीड़ाएं कुंठा को जन्म देती है कविता की अंतिम पंक्तियाँ महत्वपूर्ण है। वाकई सब कुछ समय के हाथ में है। समय परिवर्तनशील है। अंतिम पद-
और हम…
अग्निस्नान करके
निर्बंध, मुक्त, निर्वसन
पुनः जन्मेंगे
-महत्वपूर्ण है बहुत।