Wednesday, February 11, 2026
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कुसुम पालीवाल की कविता – बस कर्म करो

लोग कहते मिलते हैं
अक्सर
इसको देखो ज़रा
उसको देखो ज़रा
लेकिन क्यों देखो इसको और उसको
क्यों नहीं देखते तुम खुद को
सम्पूर्ण विद्यालय तो
इस तन में ही समाया है
हाथों की
पाँचों अंगुलियों से कुछ सीखो
कहती हैं हमेशा से
कोई बड़ा न छोटा
किसी के विचार एक नहीं ,
तो क्यों रखते हो उम्मीद
क्यों करते हो झगड़ा
आज न कोई बड़ा
न कोई पिछड़ा ….
क़िस्मत हाथों की लकीरें नहीं
कर्म से बनाई जाती है
तक़दीर को दोष क्या देना
तदबीर की ख्वाहिश रखो
हाथों की लकीरों का काम
कर्म के पीछे – पीछे चलना
तुम उसकी भाषा को पढ़ लो …..
बस
इसको और उसको
देखने में समय को ज़ाया मत करो
खुद को देखो
खुद को पढ़ो
खुद से दो बात करो
बदल जायेगा सब कुछ यहाँ पर
खुद पर विश्वास धरो …….
धरा नहीं पूछती किसी से
कितनी घायल है वो किस – किस से
सहती , सिसकती , कभी – कभी धसकती
पर कुछ न कहती
चुपचाप सहती
तक़दीर में उसके
शायद रौंदा जाना ही लिखा है
उसके हिस्से में तो
कभी कुदाल और कभी फावड़ा ही आना है
लेकिन उसको तो बस देकर ही जाना है
हरियाली और रास्ता …..
मत देखो इसको और उसको
खुद को देखो
तुम अपने ही तन के विद्यालय में
एक विद्यार्थी हो
करो शोध ,
पर न करो शोर
कुछ गरजते हुए बादलों जैसा
जो समझ में नहीं आते हैं किसी को
बरसेंगे या चले जायेंगे
छोड़कर प्यासा इस धरा को
जो जीवन देती है
इसको और उसको …..
तुम सिर से लेकर नख की
भाषा को पढ़ लो
इसकी हो या उसकी
बस कर्म करो .. कर्म करो … कर्म करो ……॥
कुसुम पालीवाल
नोएडा
ई-मेल: [email protected]
कुसुम पालीवाल
कुसुम पालीवाल
शिक्षा - एम. ए. प्रकाशित पुस्तकें— चार काव्य संग्रह, दो कहानी संग्रह. संपर्क - [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. कुसुम पालीवाल जी!

    आपकी कविता अच्छी लगी। प्रेरणास्पद है। आपने कविता में सही कहा कि हमारा शरीर ही शिक्षक की तरह है जो हमें सिखाता है।हाथ की पाँचों उँगलियाँ कहती हैं कि सब की सोच एक जैसी नहीं होती ,सब लोग एक जैसे नहीं होते।
    हमारे कर्म ही हमारे भाग्य को बनाते हैं। इसको, उसको, या किसी को भी देखने के बजाय हम स्वयं को देखें। यह बात सिखाती है हमारे हाथ की लकीरें।
    बधाई आपको इस कविता के लिये।

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