प्राननाथ
चरन स्पर्श
जाड़े तो हींस-हाँसकर निकल गए। गर्मी आ गई है। जेठ का महीना तो वैसे ही बहुत तपता है। इसी महीने मायके में दो लड़कियों के ब्याह थे। निमंत्रण आया था, मैं वहाँ हो आई। व्यवहार भी लिखा आई। व्यवहार की कापी में तुम्हारा ही नाम लिखा रही थी पर लिखाड़ी बोला, “यहाँ ससुराल में उनका नाम नहीं लिया जाता है, इसलिए उनके नाम से कम लोग परिचित हैं। तुम अपना नाम लिखा दो, वही ठीक रहेगा।” सही तो कह रहा था वह, मायके में लड़की का ही नाम चलता है। ससुराल में पति के नाम से ही सब कुछ जाना जाता है। घर-वार ही नहीं, संतानें भी उन्हीं के नाम से जानी जाती हैं। मैंने कहा, “लिख दे, मैं उन्हें बता दूँगी कि मैं अपना नाम लिखा आई।”
भैंस सरबत चाची के जिम्मे सौंप गई थी। अलग-अलग तिथि के ब्याह थे, सो दो बार जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने मेरा खूब आदर-सत्कार किया। लौटती बेर ब्याह वाले ने मिठाई बाँध दी थी। मैंने पूरी मिठाई सरबत चाची को दे दी। सरबत चाची घर की देखभाल करती रही, उसको देना तो बनता था। घाँटी उतरे माटी होत। तुम तो जानते हो, मुझे मिठाई पसन्द नहीं है। मेरे ब्याह में तो सात मिठाइयाँ बनी थीं, मैंने मिठाई का एक टुकड़ा मुँह में न डाला था। अम्मा मेरे लिए मिठाई रखे रही थी कि मौड़ी ससुराल से लौटकर आएगी, तो खा लेगी। मैंने वह मिठाई अपनी सहेलियों को खिला दी थी। भतीजा नत्थू कह रहा था कि बुआ तुम तो बड़ी दिखने लगी हो। मैंने कहा, “हट्ट,बड़ी काहे। सत्तरह वर्ष की उम्र में मेरा ब्याह हो गया था। ब्याह के पाँच साल ही तो हुए हैं।”
वह हँस रहा था।
मैं भरी-पूरी देह की हूँ न, हो सकता है इसी से कह रहा हो।
नत्थू अब गबडू जवान हो गया है। पहले मरघिल्ला-सा घूमता रहता था। बाप तो बचपन में चल बसा था, अम्मा परसाल गुजर गई। अकेला रह गया है वह। अच्छी बात यह रही कि अम्मा के सामने उसकी सगाई हो गई थी। अगले साल ब्याह हो जाएगा। वह कह रहा था कि बुआ मेरे ब्याह में आठ-दस दिन पहले आ जाना। देखा-सुनी के लिए कोई नहीं है। तुम आ जाओगी, तो मैं इस तरफ से स्वतन्त्र हो जाऊँगा।
मैंने कह दिया कि आठ-दस दिन के लिए तो नहीं, दो-चार दिन पहले आ जाऊँगी। जब उसका कोई नहीं है, तो दो-चार दिन के लिए जाना नहीं पड़ेगा? बिलकुल जाना पड़ेगा।
बेचारा नत्थू बड़ा अभागा है। पिता का साया बचपन में उठ गया था, अब माँ चल बसी। डुको बहू के हाथ की रोटी न खा सकी। जब नसीब ऐसा है, तो कोई क्या कर सकता है? अपने हाथ से बनाता-खाता है। एक-दो दिन मैं उसका खाना बना आई थी। चलो अगली साल बहू आ जाएगी, तो घर-गृहस्थी संभल जाएगी।
प्राननाथ, यह दुनिया ही विचित्र है। कोई कहीं से दुखी, तो कोई कहीं से। सब जग एक-सा नहीं है। दुख-सुख जीवन में लगा रहता है। न रोने से काम चलता है और न हँसने से। हँसना-रोना साथ-साथ चलता रहता है और ऐसे ही जिन्दगी पार हो जाती है।
तुम्हें ही देख लो, कितने दिन हो गए तुम्हें गए। तुम आए नहीं। मैं तुम्हें हर पल याद करती रहती हूँ कि तुम आओगे। चिट्ठी-पत्री तक नहीं भेजी। मेरी खता तो बता देते। तुम इतने निष्ठुर तो न थे।
मैं भी क्या लेकर बैठ गई। मैं तुम्हें अपने मायके का हालचाल बता रही थी। मुलिया है न… अरे वही, मेरी और उसकी शादी एक ही तिथि को हुई थी। हम दोनों की बारातें एक साथ आई थीं। उसकी लड़की चलने-फिरने लगी है। वह मौछी-मौछी कहकर मेरी गोद में बैठ जाती थी। बड़ी प्यारी बच्ची है। छोटे बच्चे प्यारे लगते ही हैं। जितने समय मैं वहाँ रही, मेरी गोद से न उतरी।
मुलिया बता रही थी कि ससुराल में सब सुख है सिवाय एक दुख के। सास रोज झगड़ा करती है। मैंने कहा, मुला तू इसे दुख कहती है। मैं इसे सुख को बढ़ाने वाला रसायन मानती हूँ। सास लड़ी, पति ने एकांत में मना लिया। इससे पति-पत्नी का प्रेम अटूट हो जाता है। तू ये तो सोच कि तुझे कहने वाला कोई तो है। मुझसे पूछ, मुझे कभी अपनी सास के दर्शन नहीं हुए। पड़ोस की सरबत चाची है, उसी को सास मान लेती हूँ। वह मुझे कभी-कभार डपट देती है कि रमकल्लो ये क्या कर रही है, यह ठीक नहीं है। मैं मान लेती हूँ।
तू भी उसकी बात मान लिया कर। इन लोगों के जिन्दगी के बहुत अनुभव होते हैं। वही अनुभव उन्हें बक-झक करवाते हैं। उन सासों से ईश्वर बचाए, जो बहुओं को मार डालती हैं। तेरी सास ऐसी थोड़ी होगी।
मेरी बात पर वह हँस रही थी। कह रही थी, तू कितनी समझदार हो गई है। एक दिन तू नेता (नेत्री) बनेगी। वह बोली, “क्या करूँ रमकल्लो, मुझमें भी सहनशक्ति नहीं है। मेरे हर काम में वह टोकती है, मुझे बुरा लगता है। बस इसी बात से तू-तड़ाक शुरू हो जाती है।
आते वक्त मुला गले लगकर रो पड़ी थी। कह रही थी कि अबके बिछुड़े कब मिलेंगे। मैंने उसे दिलासा दिया कि तू उदास मत हो, नत्थू के ब्याह में फिर मिलेंगे। एक-दो दिन पहले से आ जाना, बैठकर खूब बातें करेंगे।
प्राननाथ मुझे भी रोना आ गया था। तुम तो जानते ही हो कि मैं बातें ज्यादा करती हूँ, सो लोग बातूनी समझकर मेरे दुख को कम अहमियत देते हैं। उन्हें लगता है कि मैं सुखी हूँ। मेरे हृदय की कौन जान सकता है। आप भी तो नहीं समझते हो। बातें तो और भी बहुत हैं। चिठिया में अब जगह नहीं बची है। बन्द करती हूँ।
आपकी ही,
रमकल्लो


*चिठिया में अब जगह नहीं बची*
•••••••••••••••••••••••••••
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रही *रमकल्लो की पाती* बुंदेलखण्ड के कथाकार लखनलाल पाल की अत्यंत लोकप्रिय कहानी के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। *रमकल्लो की पाती* का दूसरा भाग पहले भी पढ़ चुका हूँ।
इस कहानी में जिस तरह के ठेठ शब्दों का प्रयोग कथाकार ने किया है वे शब्द कथाबिंबों को उजागर करने में बहुत बड़ी भूमिका निर्वाह करते हैं। रमकल्लो के अंतर्बाह्य जगत को खुल्लमखुल्ला पाठकों के सामने खड़ा कर देते हैं। *रमकल्लो की पाती* में प्रयुक्त कुछ निचाट शब्द इतने मारक रूप में प्रयुक्त हुए हैं कि भुलाए नहीं भूलते।
एक वाक्यांश को देखिए-
रमकल्लो का भतीजा नत्थू जब रमकल्लो से कहता है, ‘बुआ तुम बड़ी दिखने लगी हो’ … इस पर रमकल्लो का जवाब देखते ही बनता है… *’हट्ट ! बड़ी काहे।* अब इस ‘हट्ट’ में जितनी अल्हड़ता है,उसका कोई जवाब नहीं।
इसी प्रकार एक और बड़ा ही मौलिक शब्द पाल साहब ने प्रयोग किया है, रमकल्लो जब व्यवहार लिखाने जाती है वहाँ जो व्यवहार लिखने वाला व्यक्ति है उसके लिए उन्होंने ‘लिखाड़ी’ शब्द का प्रयोग किया है। बुंदेली के तमाम शब्द कोश देख डालिए आपको शायद ही ‘लिखाड़ी’ मिले। *रमकल्लो की पाती* एक दूसरी विशेषता यह भी है कि इसमें बुंदेली के शब्दों के अतिरिक्त खड़ीबोली के साथ ही अनेक देशज शब्दों का प्रयोग प्रचुरता में हुआ है। हींस-हाँसकर, डुको, परसाल, घांटी, गबडू, लिखाड़ी जैसे शब्द रमकल्लो की पाती के साथ प्राण की तरह चिपके दिखते हैं…
वस्तुतः कोई कहानी इसलिए भी पाठक के मन में रच बस जाती है कि उसकी कहन, छुवन उसके भीतर भीतर घुसकर उसे उद्वेलित करती है, यही खासियत मुझे इस कहानी में दिखाई देती है।
भाई तेजेंद्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने अपनी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई: में *रमकल्लो की पाती* को धारावाहिक रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। कथाकार आदरणीय डॉक्टर लखन लाल पाल का कहना ही क्या ! वे बिंदास तरह के लेखक हैं. आदमी भी बिंदास हैं। उनका यह बिंदासपन बना रहे।
ऐसी शुभकामना
*चिठिया में अब जगह नहीं बची*
डॉ० रामशंकर भारती
भारती जी, रमकल्लो की पाती लिखते समय मुझे जितनी खुशी हो रही थी, उतनी ही खुशी मुझे आपकी यह समीक्षा पढ़कर हो रही है। आपके लेखन में ऐसा आकर्षण है कि मन करता है पढ़ते ही रहें। यह आपकी समीक्षा की खूबी है।बहुत बढ़िया समीक्षा लिखी आपने। भारती जी आपका तहेदिल से आभार ।
आदरणीय सर जी!
रमकल्लो की दूसरी पाती पढ़ी।
वैसे तो पढ़ने के पहले ही चेहरे पर एक खुशनुमा मुस्कान आ जाती है।
अब दिक्कत यह है कि बेचारी रमकल्लो पाती पर पाती लिख रही है और साहेब जवाब नहीं दे रहे। यह चिंता भी साथ-साथ चल रही है।
हींस-हाँसकर(इसका अर्थ हमने यह लिया है की रजाई को खींच- खाँचकर अब तो लगभग सभी यहाँ हिंदी बोलते हैं पहले देशज शब्द में यहाँ पर खींचने के लिये हैंचो /हैंचना शब्द चलता था) अच्छा लगा। देशज शब्दों से रचना रसदार , मसालेदार और लज्जतदार बन कर जी उठती है। दिक्कत बस इतनी सी है कि जब हँसी आती है तो साथ देने वाला आसपास कोई नहीं हो तो मजा नहीं आता।अकेले हँसना भी कोई हँसना है? धोखे से किसी ने देखा तो समझे पागलपन का दौरा तो नहीं पड़ा।
अगर खिलाड़ी हो सकते हैं तो लिखाड़ी क्यों नहीं हो सकता है? बिल्कुल हो सकता है।
यह बात तो रमकल्लो ने बिल्कुल सही कही कि मायके में तो लड़की का ही नाम चलता है। ससुराल में सब कुछ पति के नाम से।
बताओ….खुद की शादी में 7-7मिठाइयाँ बनी और दुल्हेन एक भी मिठाई नहीं खाती…..
मासूमियत या दिल्लगी….. -“बुआ तुम तो बड़ी दिखने लगी हो।”
17 बरस की बाली उमर और 5 साल बाद युवा… फर्क तो पड़ता है।हट्ट…
फिर भोलेपन से कितना मासूम सा जवाब ।
“मैं भरी-पूरी देह की हूँ न,”
अचानक ही हमें याद आया एक बार हमें भी किसी ने कहा था कि,” “आँग-पाँव में तो अच्छी है”
इस बात ने हमें एक ऐसी बात याद दिलाई जिसे हम लगभग भूल चुके थे।
छुट्टियों के समय नागपुर में अपनी मौसेरी बहन के साथ हम अपनी एक और जीजी के यहाँ गए थे। तब हम 11वीं में पढ़ते थे।
फर्स्ट फ्लोर में जिस कमरे में हम गए वहाँ पलंग पर लक्ष्मी जीजी की सासू जी बैठी हुई थीं। अच्छी मोटी तगड़ी।
उन्हें नमस्ते करके हम उनके सामने वाले पलंग पर बैठ गये। जीजी लक्ष्मी जीजी को बुलाने ऊपर चली गईं।
हमने देखा वो लगातार हमको घूर रही हैं।
हम पलंग पर आड़े लेट गए और पास में रखा हुआ पेपर उठाकर अपने आँखों के सामने रख पढ़ने लगे। उनका इस तरह देखना हमें खटक रहा था।
इतने में दोनों जीजी आ गईं। हमने मृदुल जीजी से कहा कि अब चलो। लक्ष्मी दीदी ने जबरदस्ती बिठा लिया सासू जी ने मृदुलता जी जी से पूछा-जा मौड़ी कौन की है?”
जीजी ने कहा- लखन मौसियाजी की है बड़ी बेटी नीलिमा।”
उन्होंने बड़ी-बड़ी आँखें उठाकर हमें घूरते हुए कहा-आँग-पाँव में तो अच्छी है। सूरत बी अच्छी है।” हम तीनों सुट्ट हो गये।
हमने जीजी से कहा- हम नीचे जाते हैं! हमारा नाप तौल हो रहा है! दिक्कत यह थी कि हँसी भी आ रही थी। तुरंत ही हम तीनों ही नीचे उतर आए और खूब हँसे ।
ऐसा नहीं है कि गाँव सिर्फ गाँव में ही रहता है। गाँव शहर में भी रहता है।हँसी के लिए हम लोगों को एक लंबे समय तक के लिये अच्छा मसाला मिल गया।
गबड़ू जवान, मरगिल्ला,
डुको (शायद डुकरिया से अर्थ है) सब यहाँ भी चलते रहे।
दुनिया की विचित्रता का रमकल्लो ने सही चित्रण किया है।
स्वामी चिट्ठी का जवाब ही नहीं देते ,तो दुख तो होना ही है।
खता यानी दोष या गलती होता है।
हमारे इधर पुराने लोग खता फोड़े फुंसी को कहते थे।
सखी सहेलियों की बातें अच्छी हुईं।
अबके बिछड़े नत्थू के ब्याह में मिलेंगे।
सखियाँ मिल जाती हैं तो दुनिया जहान की बातें हो जाती है।
शादी के बाद हमें भी बड़ी दिक्कत हुई।
घी की तौलिया, तेल का काँसिया। हम तो सुन सुनकर हँसी बड़ी मुश्किल से रोक पाते। और हमारी नंद पूरे टाइम-भाभी हँसो तो मत ,भाभी जोर से मत हँसो।
एक बार ससुर जी ने रुमाल माँगा। हम रुमाल ले गए। कहने लगे अरे यह नहीं ,यह तो दस्ती है।
उन्हें गमछा चाहिए था।
गाँव के सुख अपने जैसे! अनोखे ही !!एकदम निश्छल, पवित्र, साफ-सुथरे होते थे पहले। शायद अब भी होते हों।
हमारी शादी के समय हमारा घर और मोहल्ला भी प्रेमचंद के उपन्यासों के गाँवों से कम नहीं था।
हाथ भर लंबा घूँघट हमने भी काढ़ा, गिरे भी और गालियाँ भी खाईं कि “लच्छन नईं याँ चलबे-फिरबे को ।”
लेकिन हमारे गिरने के बाद हमारे ससुर ने ऐलान कर दिया कि अब कोई बहुएँ इतना लंबा घूँघट नहीं निकालेंगी। घूंघट बालों तक सिमट गया।
पर फिर भी ऐसा लगता है कि आज की बनावटी जिंदगी से उस समय की जिंदगी काफी अच्छी थी।
रमकल्लो की पाती के बहाने हम भी अपने पुराने समय को जी लिये। आपकी रमकल्लो हमें हमारी सखी सी लगी।
बेहतरीन और मनोरंजक पाती के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।
नीलिमा करैया जी, आप रचना की बहुत गहराई तक चली जाती हैं। समानांतर रूप से आप अपने जीवन की स्मृतियों को मिला लेती है। इन स्मृतियों से लगने लगता है कि लिखी गई रचना जीवन के काफी निकट है। आपने रचना का सम्यक विवेचन किया है।
आपने बहुत बढ़िया टिप्पणी की है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार
लो, रमकल्लो की दूसरी पाती भी आ गयी। कुछ दिनों के लिये मायके में है रमकल्लो। दोनों भतीजियों की शादी-ब्याह के बाद ही उसका घर वापस लौटना होगा। किंतु इतने ही समय में उसने मायके का सारा किस्सा सुना डाला। यहाँ तक कि बचपन की सहेली मुलिया के बारे में भी जो अपनी सास से बहुत दुखी रहती है (भगवान जाने असलियत क्या है) उसकी बातें सुनकर रमकल्लो भावुक हो जाती है और सोचती है कि काश उसकी सास जिंदा होती तो कितना अच्छा होता। उसे भी अपनी सास का प्यार मिलता। इसपर सोचना पड़ता है कि यह सब कहने की बातें हैं। सास जिंदा होती तो पता नहीं उसका क्या हाल करती। बहुयें सास को सिर्फ पति की माँ समझकर अपना दिल उनके प्रति पत्थर का रखती हैं। आजकल की बहू तो अलग रहकर ही घर को अपना घर समझती है। सबके साथ रहकर घर संभालना पसंद नहीं करती।
रमकल्लो बातों का पिटारा है। अपने मन में कुछ नहीं रखती। बातों-बातों में यह भी पता लग गया कि रमकल्लो की शादी कब हुई थी। उस हिसाब से अब वह 21 साल की है। और फिर भी इतनी अकल की बातें करती है। उसका दिमाग चारों तरफ की खबरें रखता है। और अपने बारे में कुछ न छुपाकर पाती में हर प्रकार की व्यथा कथा लिख गयी अपने प्राननाथ को। कहीं शहर में रह रही होती तो न जाने पाती में और क्या-क्या लिखती। समझदारी से लिखा उसका सारा रोना-धोना पढ़कर आखिर में उसके प्राननाथ की पाती न मिलने की शिकायत के बारे में भी पढ़ा। यह तो बड़े दुख की बात है।
लखनलाल जी, बातूनी रमकल्लो की चिठिया पढ़वाने के लिये आपका बहुत धन्यवाद।
अगली चिठिया पढ़ने के पहले आशा है कि वह चिठिया भी अब तक सही पता ढूँढकर रमकल्लो तक पहुँच गयी होगी।
-शन्नो अग्रवाल
शन्नो जी आपका शुक्रिया। मुझे लग रहा है कि रमकल्लो के आगे मैं पिछड़ जाऊंगा। लोग एक उपन्यासकार को भूलकर रमकल्लो को ही याद रखेंगे। मुझे तो रमकल्लो से डर लगने लगा है
बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार
बहुत सुंदर लगी यह चिट्ठी भी। मायके आई रमकल्लो कैसे अपने पीछे घर की देख रेख का प्रबन्ध करती है। फिर अपनी पड़ोसन को गाँव से लाई मिठाई दे देती है। नत्थू की टिप्पणी पर जवाब -उस पर तरस। अपनी बचपन की सखी मुलिया की बेटी देख कर उसका मन भी संतान की चाहना करता है। अपनी सखी को सास के ताने सहने के लिये भी कहना कि अच्छा है कि कोई तो है जो कुछ कहता सुनता है
उसके एकाकीपन की टीस को उजागर करता है। शादी से पहले गाँव के रहन सहन से अधिक मैं परिचय नहीं था पर हरयाणा के गाँव में ब्याही हूँ अक्सर जाना होता है वहाँ के रीति-रिवाज को ग़ौर से देखती हूँ
ज्योत्स्ना जी आपकी टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा। रमकल्लो के प्रति आपकी ऐसी सहानुभूति बताती है कि आप उसके साथ जुड़ गई है।
आपने पाती पढ़कर बढ़िया प्रतिक्रिया दी है इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार