सी-सेक्टर सोनागिरी की गलियों में,
खेलते-कूदते बचपन की वो शामें हसीन,
किसी ने पूछा घर का नंबर, मैंने कहा चौबीस,
वो घर, वो गली, आज भी दिल के हैं करीब।
पिपलानी बाज़ार की रौनक में,
जब किसी ने पूछा मेरा ठिकाना,
सोनागिरी मेरा जवाब था,
वो वीकली बाज़ार, वो गोलगप्पे — यादों में है वो ज़माना।
भोपाल लेक व्यू पर नए दोस्त बने,
भेल एरिया में रहता हूँ — बताया मैंने,
वो झील, वो दोस्ती, आज भी दिल को छू जाती,
वो पल, वो बातें — अब भी यादों में हरदम बहती।
ट्रेन के सफर में जब किसी ने पूछा शहर का नाम,
फूले हुए सीने से निकला जवाब — “मेरा भोपाल”,
वो ट्रेन, वो सफर — आज भी चलता मेरे संग,
वो शहर, वो पहचान — अब भी वही मेरा रंग।
एमपी में कहाँ से हो जब किसी ने पूछा,
बताया मैंने — दादाजी-पिताजी इंदौर से,
मैं भोपाल में पला-बढ़ा,
वो जड़ें, वो मिट्टी — भोपाल आज भी मुझ में खिला।
हैदराबाद के दिनों में जब उत्तर भारत की बात चली,
बीवी दिल्ली की, मम्मी कानपुर की,
एमपी का रिश्ता फिर से गर्व से दोहराया,
वो रिश्ते, वो यादें — दिल में फिर एमपी जगमगाया।
मैं अपनी यादों के तार, कहीं भी फिट कर लेता हूँ,
हर जगह, हर पल, एक नया रंग भर लेता हूँ,
कभी मिट्टी की खुशबू, कभी शहरों की हवा,
हर मोड़ पे एक नया कनेक्शन जोड़ लेता हूँ।
और फिर अंग्रेज़ों के बीच भारत से अपने तार जोड़े,
वो देश, वो संस्कृति — आज भी गर्व से दिल में बसी,
रीडिंग में तेलुगु एसोसिएशन में,
अपने हैदराबाद के दिनों की यादें जगाईं।
अब भारत जाता हूँ तो यूके से जुड़े अपने तार बताता हूँ,
वो सफर, वो बदलाव — दोनों दिल में बसाता हूँ,
दो दुनियाओं के बीच अपनी सूरत पाता हूँ,
हर कसक में अपना प्रिय वतन ढूंढ़ लाता हूँ।
लंदन के नेहरू सेंटर में कहता — बर्कशायर से हूँ,
स्लाउ के कर्व में खुद को रीडिंग से जोड़ता हूँ,
रीडिंग मेले में अर्ली अपना डेरा बताता हूँ,
हर जगह को मैं अपने किस्सों में पिरोता जाता हूँ।
मैं अपनी यादों के तार, कहीं भी फिट कर लेता हूँ,
हर ठौर को अपना बनाता, हर राह को सी लेता हूँ,
ये यादें, ये रिश्ते — मैं खुद को हर पल में जी लेता हूँ,
मैं अपनी यादों के तार, कहीं भी फिट कर लेता हूँ….
मैं अपनी यादों के तार, कहीं भी फिट कर लेता हूँ।
रितेश ऽ निगम
रितेश ऽ निगम, भोपाल में जन्मे और अब इंग्लैंड में निवास कर रहे एक पुरस्कार विजेता लेखक, प्रकाशक और प्रेरक हैं। उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित वर्ल्ड लीडर्स समिट में ‘ऑथर ऑफ द ईयर’ के प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा गया है, जहाँ उन्होंने अपनी प्रशंसित कृति “श्रीमद् भगवद स्वगीता” के अंग्रेजी संस्करण का विमोचन भी किया।
रितेश निगम अपनी अभिनव ‘लिंक पोएट्री’ शैली और छह-शब्दों की कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं, जो उन्हें अर्नेस्ट हेमिंग्वे की फ्लैश फिक्शन से प्रेरित मिली। एक पूर्व आईटी पेशेवर और बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र, रितेश ने लंदन में 18 साल बिताए, जहाँ उन्होंने विभिन्न संस्कृतियों में धार्मिक ग्रंथों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोणों का अवलोकन किया। उनके साहित्यिक कार्य भारतीय और ब्रिटिश दोनों मीडिया में व्यापक रूप से प्रकाशित हुए हैं, जो उनके व्यक्तिगत संघर्षों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक के सफर को दर्शाते हैं।
साहित्यिक उपलब्धियों के अलावा, वे सामाजिक कार्यों के प्रति भी प्रतिबद्ध रहे हैं, जैसे बीमार बच्चों के लिए धन जुटाने हेतु लंदन से पेरिस तक साइकिल चलाना और क्राउडफंडिंग बुक पब्लिशिंग मॉडल के माध्यम से ब्राजील जैसे देशों में पुस्तकालय स्थापित करने में मदद करना।