एक पंख माँ बोली का गिरा
एक पंख पुरखों की मिट्टी का गिरा
कलेजा हूक उठा
एक पंख आँसू का गिरा
सारी सड़कें ऊँची होते जाने के बीच
एक एक पंख हरेक घर का गिरा…
लहूलुहान पंखों को आत्मा के पन्नों में संजोकर
कविता के पंख से लिख रहा हूँ :
उस दिन एक पंख पंछी का गिरा था
जबकि यह टेकऑफ करते बमवर्षक का गिरना चाहिए था।
××
2 – कभी नहीं कहा
नदी के पास बहुत ताकत थी
पर उसने पेड़ को कभी नहीं कहा :
मेरी भाषा सीखो।
पेड़ बहुत मज़बूत और हरा था
पर उसने चिड़िया को कभी नहीं कहा :
मेरी रुचि का खाना खाओ।
चिड़िया हवा की प्रेमिका थी
सीना चाक करने का दम रखती थी
पर उसने हवा को कभी नहीं कहा :
मेरे कहने में रहो।
हवा उड़ा सकती थी
हवा गिरा सकती थी
हवा भड़का सकती थी
कभी कभी उसने यह सब किया भी
पर कभी किसी नदी पेड़ या चिड़िया को यह नहीं कहा :
मेरे घर से बाहर निकल जाओ।
××
कमल जीत चौधरी
गाँव व डाक- काली बड़ी
(रेलवे क्रॉसिंग साम्बा के नज़दीक)
तहसील व जिला- साम्बा- 184121 (जे.&के.)
मेल आई. डी. – [email protected]
कमल जीत चौधरी हिन्दी के सुपरिचित कवि-लेखक व अनुवादक हैं। अब तक लगभग साठ साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ, आलेख, अनुवाद और लघु कथाएँ छप चुकी हैं। इनके तीन कविता संग्रह- ‘हिन्दी का नमक’ (2016), ‘दुनिया का अंतिम घोषणापत्र’ (2023) और ‘समकाल की आवाज़: चयनित कविताएँ’ (2022) प्रकाशित हैं। इसके अलावा इन्होंने जम्मू-कश्मीर की कविताई को रेखांकित करते हुए; ‘मुझे आई डी कार्ड दिलाओ’ (2018) नामक एक कविता-संग्रह संपादित किया है। इनकी कविताएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में अनूदित व प्रकाशित हैं। इन्होंने अनेक डोगरी कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी किया है।