वाहनों के हथियार के रूप में इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा पाना आसान काम नहीं है। अधिकांश मामलों में वाहन किराये पर लिया जाता है। कार–रेंटल एजेंसियों के पास कोई ज़रिया नहीं है कि वे इस बात की पुख़्ता जानकारी हासिल कर सकें कि जो व्यक्ति वाहन भाड़े पर ले रहा है, वह उसका इस्तेमाल किस काम के लिये करने वाला है। फ़िलहाल तो वैश्विक स्तर पर वर्ष 2025 की शुरूआत हिंसा और ख़ून–ख़राबे से हुई है… आशा करते हैं कि बाक़ी का साल शांतिपूर्वक बीत सके।
जब वैज्ञानिकों ने कार का आविष्कार किया होगा तो उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि इस आरामदेह सवारी का इस्तेमाल कभी एक हथियार की तरह भी किया जा सकेगा। इलॉन मस्क के तो सपने में भी यह विचार नहीं आया होगा कि उसकी कम्पनी की टेस्ला कार को उनके ही नवनिर्वाचित राष्ट्रपति की ट्रंप टॉवर के सामने कार बम्ब की तरह उड़ा दिया जाएगा। मगर यह एक ठोस सच्चाई है कि इन्सान का शैतानी दिमाग़ आतंक फैलाने के लिये किसी भी हद तक गिर सकता है।
इस क्रिसमस से पहले जर्मनी के मागडेबर्ग शहर की एक क्रिसमस मार्केट में एक कार ने भीड़ को रौंद दिया जिस में 15 लोगों की जान गई और साठ से अधिक लोग घायल हो गये। अमरीका में नए वर्ष का आरंभ तीन हिंसक हमलों से हुआ। पहला आंतकी हमला न्यू ऑरलियंस में बुधवार तड़के हुआ जिसमें अमरीका के ही एक भूतपूर्व सैनिक ने जश्न मना रहे लोगों पर तेज़ रफ्तार पिकअप ट्रक चढ़ा दिया जिसमें मरने वालों की संख्या 15 बताई जा रही है।
इसके कुछ ही घंटों बाद लास वेगास में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के होटल के बाहर एक टेस्ला साइबर ट्रक में विस्फोट हुआ जिसमें ट्रक में मौजूद व्यक्ति की मौत हो गई और सात घायल हो गए।
भारत भी नववर्ष की हिंसा से बच नहीं पाया। हालांकि यहां कोई आतंकवादी घटना तो नहीं कही जा सकती, मगर महाराष्ट्र के जलगाँव ज़िले में मामूली विवाद की वजह से बवाल मच गया और आगज़नी और हिंसा की घटनाएं सामने आईं। वहां कर्फ़्यू लगा दिया गया। यहां हिंसा के लिये कार का इस्तेमाल नहीं किया गया मगर हिंसा शुरू कार के हॉर्न से ही हुई।
सबसे पहले बात करते हैं जर्मनी के मेगडेबर्ग शहर में एक क्रिसमस मार्केट में हुए आतंकवादी हमले की। अलग-अलग सूत्रों ने मरने वाले और घायल लोगों की संख्या भिन्न-भिन्न ही बताई है। घायलों में सात भारतवासी भी बताए जा रहे हैं… मगर मरने वालों में एक नौ वर्ष का बच्चा भी था। यह हमला केवल तीन मिनट तक चला। मेगडेबर्ग बर्लिन के पश्चिम में करीब 130 किलोमीटर दूर सैक्सनी अनहाल्ट राज्य में है जहां करीब 237,000 लोग रहते हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमले में, एक काली बीएमडब्ल्यू सीधे क्रिसमस बाजार की भीड़ में घुस गई। टाउन हॉल की दिशा में तेज़ गति मे कार 400 मीटर भीड़ को रौंदती चली गई। हमलावर की उम्र 50 साल है। पेशे से डॉक्टर यह आदमी मूल रूप से सऊदी अरब का है। वह लगभग दो दशकों से जर्मनी में रह रहा है। फिलहाल उसे हत्या, हत्या की कोशिश और गंभीर रूप से लोगों को जख्मी करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है।
हमलावर का नाम तालेब अल-अब्दुलमोहसिन बताया जा रहा है। तालेब के ख़िलाफ़ पहले भी अपराधिक मामले दर्ज किये गये हैं। हालाँकि यह हमला लगभग पूरी तरह इस्लामी अंदाज़ में किया गया है मगर तालेब के बारे में यह बताया जाता है कि जब वह सऊदी अरब में रहता था, वह इस्लाम के विरुद्ध झंडा बुलंद किये रहता था। उसने सोशल मीडिया और कई साक्षात्कारों में इस्लाम पर बहुत सारे आरोप लगाए हैं। उसका दावा है कि जर्मन अधिकारी इस्लाम से युद्ध के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं।
ध्यान देने लायक बात यह है कि मात्र दस दिन पहले अमेरिकी प्लेटफॉर्म आरएआईआर ने डॉक्टर तालेब के साथ एक इंटरव्यू किया था। आरएआईआर एक इस्लाम विरोधी संगठन है। इसमें तालेब ने जर्मन पुलिस पर इस्लाम छोड़ कर आने वाले सऊदी शरणार्थियों की जिंदगी जान बूझ कर तबाह करने का आरोप लगाया था। उसने खुद को इलॉन मस्क और धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक दल अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) का प्रशंसक बताया था। हालांकि बातचीत के दौरान उसने खुद को राजनीतिक रूप से वामपंथी भी बताया था।
इस आतंकवादी घटना के बाद सऊदी अरब ने तालेब के प्रत्यार्पण की माँग की, जिसे जर्मनी ने ठुकरा दिया है। इस पर इलॉन मस्क ने ‘एक्स’ पर ट्वीट करते हुए कहा, “वह साफ़ तौर पर सनकी था, जिसे कभी भी जर्मनी में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए थी। जब सऊदी अरब ने अपील की थी तो उसे डिपोर्ट किया जाना चाहिए था। इस मामले में जर्मन सरकार ने आत्मघाती सहानुभूति दिखाई है।”
यूरोप से अमरीका तक पहुंची आतंकवादी घटना हुई न्यू ऑर्लियन्स शहर में जब नववर्ष के जश्न के दौरान एक हमलावर ने बॉर्बन स्ट्रीट पर लोगों को ट्रक से कुचल दिया और गोलीबारी की। इस हमले में 15 लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। एफ.बी.आई. ने इसे आतंकवादी हमला मानते हुए जांच शुरू कर दी है, क्योंकि हमलावर के ट्रक से इस्लामी संगठन आईएसआईएस (ISIS) का झंडा बरामद हुआ है। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में हमलावर को मार गिराया। हमलावर की पहचान 42 वर्षीय शम्सुद्दीन बहार जब्बार के रूप में हुई है, जो अमरीकी सेना का पूर्व सैनिक था और अफगानिस्तान में तैनात भी रहा था।
जब्बार टेक्सास का रहने वाला था। वह ह्यूस्टन में एक रियल एस्टेट एजेंट के रूप में काम करता था. उसने सेना में एक आईटी विशेषज्ञ के रूप में भी काम किया था. वह आईएसआईएस का सदस्य था. उसके पास से एक्सप्लोसिव डिवाइस और अन्य हथियार भी मिले हैं। अब उस घटना के सी.सी.सी.टीवी. फ़ुटेज सामने आए हैं। वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस आतंकवादी हमले की निंदा की है तो वहीं नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिये यह एक नई चुनौती के रूप में सामने आई है।
आईएसआईएस के कथित आतंकी जब्बार ने हमला करने से पहले एक वीडियो रिकॉर्ड किया था। उस वीडियो में उसने कबूल किया था कि वह आईएसआईएस (ISIS) का सदस्य है। एफबीआई की मानें तो वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारना चाहता था। एफबीआई का कहना है कि यह अकेले आदमी का काम नहीं हो सकता है। इसके पीछे पूरे संगठन का हाथ दिखाई देता है।
आतंकवादी गतिविधियों के लिये कार या अन्य वाहनों के इस्तेमाल के ये कोई पहले उदाहरण नहीं हैं। अपनी पत्रिका ‘इंस्पायर’ में प्रकाशित 2010 के एक लेख में अल-कायदा ने अपने अनुयायियों को “अल्लाह के शत्रुओं को कुचलने के लिए वाहनों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया”।
पश्चिमी तट पर फ़िलिस्तीन द्वारा इज़राइल के विरुद्ध इस साधन का खुल कर इस्तेमाल किया गया। अमरीका के न्युयॉर्क और वर्जीनिया; फ़्रांस के शहर नीस; चीन के शहर ज़ूहाई; कनाडा, ब्रिटेन और अन्य देशों के भिन्न शहरों में वाहन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके आतंकवादी गतिविधि को अंजाम दिया गया है। इनमें से अधिकांश आतंकवादी घटनाओं के पीछे किसी ना किसी इस्लामिक चरमपंथी संस्था का हाथ साबित होता है।
वाहनों के हथियार के रूप में इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा पाना आसान काम नहीं है। अधिकांश मामलों में वाहन किराये पर लिया जाता है। कार-रेंटल एजेंसियों के पास कोई ज़रिया नहीं है कि वे इस बात की पुख़्ता जानकारी हासिल कर सकें कि जो व्यक्ति वाहन भाड़े पर ले रहा है, वह उसका इस्तेमाल किस काम के लिये करने वाला है। फ़िलहाल तो वैश्विक स्तर पर वर्ष 2025 की शुरूआत हिंसा और ख़ून-ख़राबे से हुई है… आशा करते हैं कि बाक़ी का साल शांतिपूर्वक बीत सके।
आतंकी हमलों की इतनी खबरें पढ़ चुका हूं ना पूछिए ही मत। आतंकवाद पर लेख भी लिख चुका हूं पुनीत बिसारिया जी द्वारा संपादित किताब में। आपका यह संपादकीय पढ़कर जानकारी में वृद्धि जरूर हुई है। किंतु संवेदना के स्तर पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता आतंक की खबरों से।
चलिए जानकारी में वृद्धि होना भी एक सकारात्मक कदम है। शुक्रिया।
नव वर्ष में मीडिया अक्सर जश्न या फिर सेलिब्रिटीज और आतिशबाजी या कुछ ऐसी की तस्वीरें।कहीं कहीं हाशिए पर हिंसा भी रहती है यह हिंसा या आतंकवाद की खबरें सुर्खियों में भी आ जाती हैं बशर्ते वे अमीर या विकसित देश की हों ।
आतंक और हिंसा पर भी जानकारी होनी चाहिए,जिसे इस संपादकीय में स्थान दिया गया है।मंशा मानवीय संवेदनशीलता को जाग्रत करने की है।
भाई सूर्यकांत जी, इस संपादकीय का मुख्य मुद्दा आतंकवाद का नया हथियार – वाहन, यानी कि कार और वैन आदि हैं। इस समस्या को नियंत्रित कर पाना आसान नहीं।
प्रतिक्रिया भाग दो
एक और अहम तथ्य जिस पर शायद ध्यान ही नहीं गया ,वह है वाहन के माध्यम से आतंकवाद को बढ़ाने और फैलाने की कुत्सित कोशिश का इतिहास भी बेहद संजीदगी से बताया गया है। जो इस संपादकीय का महत्वपूर्ण पहलू है। इसे यानी संपादकीय को हम वाहन को हथियार बनाने ऐतिहासिक जानकारी देने वाला कोलाज कह सकते हैं
अब आपने मुद्दे को पकड़ लिया है।
झूठ अहंकार और सारी दुनिया मुझे चाहिए मेरी मुट्ठी में चाहिए इस प्रकार की मानसिकता ने यह कांड कर दिया है। वास्तविक जिस दिन आदमी पैदा हुआ उसी दिन तय हुआ होता है कि उसे एक दिन जाना है लेकिन पाखंडी कट्टरपंथी अज्ञानी लोक अपने आप को बड़ा मानते हैं। हिंचार से नहीं शांति संयम अपनापन और भाईचारे से रहने में ही इस सृष्टि की पृथ्वी की और हर जाति धर्म के व्यक्ति की भलाई है। श्रद्धेय तेजेंद्र शर्मा जी ने बिल्कुल सच्चाई प्रस्तुत की है उन्हें धन्यवाद!
हार्दिक धन्यवाद प्रकाश भाई।
स्तब्ध हूँ सर! इंसान किस हद तक जा सकता है… और पूरी धरती पर… ऐसे इंसान जो कि शैतान बन हिंसा और हत्या को अंतिम निर्णय बनाया है… उन्हें क्या कहा जाए।
आप आपके संपादकीय के माध्यम से एक महत्वपूर्ण स्थिति की वास्तविकता को पाठकों तक पहुँचाकर.. विचारों को एक प्रवाह देने में सफल हए है, सर
अनिमा जी, इन्सान एक दूसरे को मार कर धरती से मानव का अस्तित्व मिटाने पर तुला है।
Your Editorial of today calls for a deep reflection of these monstrous events spreading in the West.
It is very disturbing indeed how vehicles are now being used for these terrorist attacks n destruction of the scale that you have described here.
Thanks for sharing this worrisome situation and hoping we shall have no more of these tragedies brought forth by terrorist activities.
Warm regards
Deepak Sharma
Thanks so much Deepak ji for underlining the crux of the editorial. Regards.
आतंकवाद दुनिया के लिए दुर्भाग्य है
ये सिलसिला कहाँ और कब थमेगा कोई नहीं जानता ।
सबको सन्मति दे भगवान
Dr Prabha mishra
हार्दिक आभार प्रभा जी।
ये वाकई चिंता वाली बात है कि कही कोई ट्रक इस कार का ही इस्तेमाल एक बम की तरह करने लगेगा ऐसे में इसे रोकना असम्भव ही होगा, जबकि इस्लाम ये आतंकी रूप पूरे इस्लाम धर्म को बदनाम ही करता है, स्थापित तो किसी भी रूप में नहीं करता, ये इसे मानने वालों को समझने की बड़ी ज़रूरत है ।
आलोक भाई आप ने बिना किसी संकोच के बेबाक प्रतिक्रिया दी है। धन्यवाद।
विश्व भर में मनुष्य का मस्तिष्क विस्कृतियों का शिकार होता जा रहा है। समस्या का मूल कहाँ है, वह हाथ नहीं आता। जबकि ज़रूरी वही है । ऐसे हिंसक जानवर, इंसान के रूप में मोहरे भर हैं। इन्हें हाँक कोई और ही रहा है।
किसी के ईश्वर का कोई आदमी शत्रु कैसे हों सकता है भला! है ना मूर्खता की हद।
पुनः एक ज्वलंत विषय पर सम्पादकीय। आपको धन्यवाद।
निर्देश जी, आपकी दो टूक टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।
आतंक तो सर्वव्यापी होता जा रहा है। टूल्स भी बदलते जा रहे हैं। भारत में तो मैंने प्रेशर कुकर, स्कूटर, ब्रीफकेस में भी बम रखकर जानमाल का नुकसान पहुँचाते पढ़ा है। अमेरिका के ट्विन टावर में तो एरोप्लेन से हमला किया गया था। फिश प्लेट हटाकर या ट्रेन की पटरी पर कोई सामान रखकर आतंकवादी घटना को अंजाम देना भी आम बात हो गई है। लैपटॉप और पेजर के जरिये भी ब्लास्ट की घटनायें हुई हैं। कार तो सर्वसुलभ साधन है।
वैसे भी ज़ब कोई व्यक्ति स्वयं को आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न कर लेता है तो वह न स्वयं की परवाह करता है न समाज की। खून की होली खेलना उसकी नसों में ऐसा रच बस जाता है कि उसे कभी ग्लानि का एहसास नहीं होता।
वैसे तो कहा जाता है कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता किन्तु जितने भी आतंकवादी संगठन हैं वे एक ही धर्म के हैं। ये खुशियों के रंग में भंग डालकर ही खुश होते हैं। काश! ये समझ पाते कि जिन्हें वे शिकार बना रहे हैं, वे भी किसी पिता, माँ,भाई, बहन या पत्नी हैं।
जितनी विज्ञान के द्वारा इंसान ने तरक्की की है, उतना ही कुछ विकृत मस्तिष्क वाले लोग दुनिया को विनाश की कगार पर ले जा रहे हैं। काश! इंसान हैवान नहीं, इंसान बन पाता।
भले ही नववर्ष का प्रारम्भ आतंकवादी घटनाओं से हुआ हो, शेष वर्ष दुनिया को प्रगति और निर्माण की ओर ले जाये।
दुनिया को आइना दिखाते संपादकीय के बधाई एवं साधुवाद।
सुधा जी, आपने संपादकीय को विस्तार से समझाते हुए एक सार्थक टिप्पणी की है। संपादकीय पसंद करने के लिए हार्दिक आभार।
क्रिमिनल माइण्ड का ख़ुराफ़ाती दिमाग, परफ़ैक्ट क्राइम करने के लिए, हमेशा नए नए तरीके सोचने में लगा रहता है कि कैसे उसे सरेअंजाम किया जाए और क्रिमिनल माइण्ड का मक्सद पूरी तरह से काम्याब हो। खुली जगह में अगर उसे बम्ब फोड़ना हो या लोगों का कत्ले आम करना हो तो उसकी इस साज़िश में जितना कार काम आ सकती है कोई दूसरा साधन नहीं। तबाही करने का सारा सामान उसने कार में रखा है जिसका आम जन्ता को कुछ पता नहीं। आराम से, यह जनाब, कार को अपने शिकार की तरफ़ घुमा घुमा कर देख रहे हैं और जैसे ही मौका मिला, स्पीड तेज़ की और लोगों को दनादन कुचलना शुरू कर दिया। जर्मनी में, न्यु औरलियन्स में और ट्रंप के होटल के बाहर टैस्ला कार से जो काण्ड किया गया वो इस सोच की सचाई को पुख़्ता करता है। जैसे जैसे समय बीतता जारहा है, दुनिया के और देशों में भी, इस साधन का खुल के इस्तेमाल हो रहा है।
यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि यह सब धमाके ट्रंप के inauguration से पहले क्यों हो रहे हैं। क्योंकि ट्रंप ने जो अपनी कैबिनेट चुनी है और खुले आम दुनिया को धमकियां देना शुरू कर दिया है तो हो सकता है कि उसके दुशमनों की सोच ट्रंप के दिल में एक डर पैदा करने की हो। सत्ता संभालने के बाद अब देखना है कि नये राष्ट्रपति क्या क्या गुल खिलाते हैं।
शायराना अन्दाज़ में, यह तो ‘इब्तदाये इश्क’ है, अब तो यह देखना है की ‘आगे आगे क्या होता है’। आगे आने समय में और क्या क्या नए गुल खिलेंगे यह तो समय ही बताएगा।
एक प्रश्न जो मेरे दिमाग़ में बार बार आता है और दिल को कटोचता है वो है उन लोगों की सोच जो स्कूलों में घुसकर या किसी शॉपिंग सैन्ट्र में जाकर अन्धाधुन्द गोलियां चलाकर मासूम बच्चों का कत्ल और बेगुनाह लोगों को गोलियों से भून देते हैं। क्या मिलता है ऐसी सोच वाले दरिन्दों को यह सब करके? हो सकता है कि अपनी तस्वीर अख़बार में देखकर और बार बार अपना नाम टीवी पर सुन कर ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’ वाली कहावत अच्छा लगती हो।
विजय भाई आप तो उस इलाक़े में रहते हैं, वहां की स्थितियों को समझते हैं… कम से कम राजनीतिज्ञों को सच बोलना शुरू करना होगा… आयं बायं शायं करना बंद करना होगा।
आपने ठीक लिखा है जितेन्द्र भाई।रानीतिज्ञों का सच न बोलना ही तो सब हत्या की जड़ है। यदि यह लोग सच बोलने लगें तो आतंकित समस्याएं में भी कमी होने की सम्भावना हो सकती है। इन्हें तो अपनी वोट से मतलब है।जंता जाए भाड़ में।
सही कहा भाई विजय जी।
अगर दुनिया की अधिकांश आतंकवादी घटनाओं का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि आतंकवाद मजहबी कट्टरता की पैदाइश होता है, जो विधर्मियों को मारने के लिए नृशंसतम तरीकों का सहारा लेने से भी नहीं हिचकता। इजरायल की टीम पर ओलंपिक में हुए आतंकी हमले, नाइन इलेवन और ट्वेंटी सिक्स इलेवन की घटनाओं और उसके बाद शुरू हुए लोन वुल्फ अटैक के पीछे यही नीचतापूर्ण मानसिकता काम करती है, लेकिन हैरत तब होती है, जब तथाकथित बुद्धिजीवियों और ठेकेदारों द्वारा पत्रिकाओं में लेख लिखकर या भड़काऊ बयानबाजी करते हुए इन घटनाओं के लिए उकसाया जाता है या फिर तथाकथित जेहाद के लिए क्रूरतम तरीके सुझाए जाते हैं। क्रिसमस और नव वर्ष पर यूरोप और अमेरिका में हुए ये हमले घृणा की पराकाष्ठा के द्योतक हैं। इसके विपरीत सनातन संस्कृति सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया और ऐसा होने से मुझे भी कोई शोक नहीं होगा जैसी विश्व कल्याण की कामना करती है। इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई बीत जाने के बाद भी अगर दुनिया के कुछ कट्टरपंथी धार्मिक उन्माद फैलाने और निर्दोष लोगों की हत्याएं करने में लगे हैं तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। दुनिया में विश्व शान्ति सनातन मार्ग के अवलंबन से ही आ सकती है। भारत को इस संबंध में विश्व का पथ प्रदर्शित करना होगा और वह भविष्य में ऐसा करेगा भी, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है क्योंकि योग के माध्यम से भारत विश्व को निरोगी बना सकता है तो सनातन मान्यताओं के माध्यम से विश्व शान्ति भी स्थापित कर सकता है। उत्कृष्ट और समसामयिक विषय पर संपादकीय लेखन हेतु आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।
पुनीत भाई, आपकी टिप्पणी गहराई से स्थिति को समझा रही है। हमारे तमाम पाठकों को यह टिप्पणी पढ़नी चाहिये।
द पुरवाई के संपादकीय में ‘नववर्ष और क्रिसमस का आतंकी स्वागत’ विषय को लिया गया है। यह नए तरह का हमला तो नहीं है। इससे पहले भी ऐसे हमले किए जाते रहे हैं। इसे ‘वोल्फ अटैक’ कहा जाता है।
दुनिया नियमों से चलती है जो सार्वभौमिक हैं, मानवीय है। आतंकियों के अपने नियम है जो बहुत ही सीमित है। सीमित नियम मानव जाति के लिए उपयोगी नहीं है। दुनिया के नियम हर मानव के लिए समानता का अधिकार देते हैं जिसमें न्याय भी शामिल है। आतंकियों को भी पकड़ लिया जाता है तो उस पर मुकदमा चलता है। लेकिन आतंकियों के अपने नियम है सीधे मार डालो। वे पूरी दुनिया पर अपना साम्राज्य चाहते हैं। इनसे सभी पीड़ित हैं।
इस संपादकीय पर टिप्पणी कर चुके तेजस पुनिया जी से सहमत हूं कि रोज दुनिया में ऐसा होता रहता है। अब ये घटनाएं जीवन से जुड़ चुकी हैं। इस दुनिया में रहना है तो ये सब देखना पड़ेगा। सुरक्षा ही इसका उपाय है। बाकी तो आतंकवाद खत्म होने से रहा। लेकिन इस पर बात होती रहनी चाहिए। मानवीय विषयों को लेकर संपादकीय लेख लिखने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई
प्रिय भाई लखनलाल पाल जी हमारी पत्रिका का नाम ‘पुरवाई’ है। Email ID प्राप्त करने के लिये [email protected] का इस्तेमाल करना पड़ा। जैसा कि संपादकीय में लिखा है कि लोगों पर तेज़ रफ़्तार वाहन चढ़ा देने का ज़रिया बहुत पुराना नहीं है… इसकी शुरूआत 2010 में अल-क़ायदा द्वारा की गई। घटनाओं को सहना तो होगा… मगर जब तक राजनीतिज्ञ सच बोलने से डरते रहेंगे, इसका कोई हल नहीं निकलेगा। Politically correct रहने के चक्कर में हम सच बोलने से परहेज़ कर जाते हैं।
विश्व में आतंकवाद अपने चरम स्तर पर है।
आपने बहुत बढ़िया तरीके से विश्व स्तर पर फैल रहे आतंकवादी की स्पष्ट जानकारी दी। बहुत बहुत आभार
हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
आतंकवादी सोच किस तरफ मुड़ जाय नहीं जाना जा सकता है और पहले ये अपने पैर भारत में ही फैला रहा था लेकिन अब ये तो कभी भी और कहीं भी कुछ भी घटित हो सकता है। सिर्फ वाहन ही क्यों, ये लोग टिफिन, कुकर को भी नहीं छोड़ते हैं।
इसका कोई अंत नहीं दिखलाई देता है, वैसे भी युद्ध की विभीषिका में विश्व जल ही रहा है, ऐसे में शांति की आशा कौन करे? हमें बचना चाहिए विनाश की विभीषिका से।
रेखा जी, सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
आतंकवादी पूरी दुनिया में आतंक मचाए हुए हैं! इससे छुटकारा कैसे पाएंगे?
्
सही सवाल भाग्यम जी।
धार्मिक कट्टरवाद की मानसिकता में जीता मनुष्य धार्मिक नहीं होता, वह तो उस मानसिकता का गुलाम होता है जो उसके अंदर फीड की जाती है। वह तो खुद ही बम बनने के लिए तैयार हो जाता है फिर तरीका कोई सा भी हो। चाहे फिर विस्फोटक अपने शरीर पर बांधने हों या फिर कार में रखने हों। वाहनों का प्रयोग आसान होता है। पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुके इस आंतकवाद से निबटना तभी कुछ संभव हो सकता है जब राजनेता नहीं बल्कि पूरी राजनीति सच्चाई पर काम करे। स्वार्थीपन से बाहर निकले।
आपके संपादकीय जानकारीपरक तो होते ही हैं। सोच को एक नई दिशा भी देते हैं।
सुधा आपने धार्मिक कट्टरवाद को सही पहचाना है। संपादकीय को पसंद करने के लिये हार्दिक धन्यवाद।
नव वर्ष की शुरुआत आतंकवादी हमलों से ,वो भी नव निर्वाचित अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के होटल के सामने कार द्वारा विस्फोटक हमला ,गौर की बात ये हे कि सर्वोच्च शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति की संपत्ति भी सुरक्षित नहीं,जर्मनी में वाहन के द्वारा आतंकी हमला ,आर्लियंस शहर में क्रिसमस पर ट्रक द्वारा 15 को रौंदना,isis इस्लामी आतंकवादी संगठन द्वारा, यह सत्य हे कि वाहनों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करके कई देशों में आतंकी हमले हुए हैं,वाहनों को प्रतिबंधित करना कठिन कार्य हे,
पूरा विश्व आतंकवाद से ग्रसित हो चुका है,मानव में दैत्य के बीज पनप रहें हैं, वह समय कुछ और था जब सिर्फ अख़बारों में,रेडियो पर आतंकवादी खबरें सुनकर दिल दहल जाया करता था ,हमारे अजगर हो गए शरीर, भोथरी कलम में अब कुछ हरकत ही नहीं होती,अब तो खबरों में रोमांच ही तब आता हे जब कोई युवा आत्मघाती बम बनता है , कहीं स्कूल के बच्चे गन से हमला करते हैं,कल ही एक किशोर ने दूसरे बच्चे को चाकू से मार डाला ,क्योंकि उसने खेलने से इनकार कर दिया था ,ये विषैले बीज कहां से पैदा हो रहे ,विश्व के
घरों से कहीं आतंकवाद शुरू होकर गिरोह में, देश में ,विदेशों में, तो नहीं फैल रहा?शुक्र है भारत इतना बड़ा देश होने के बावजूद नए वर्ष में कोई आतंकी घटना का न होना हमारे लिए संतोषजनक तो है, निशफिकर होने जैसा नहीं, जैसा कि संपादकीय से पता चलता हे अत्यधिक आतंकी गतिविधियां इस्लामिक देशों से संचालित होती हैं हमे सजग रहना होगा पड़ोसी देशों से, हालांकि किसी भी मजहब में मनुष्य का जीवन सर्वोपरि बताया गया है ,लेकिन कुछ कट्टर पंथी हरधर्म को मजहब को अपनी तरह से आकलन करके तोड़ मरोड़कर मानव को गुमराह करते हैं नतीजा प्रताड़ित,गुमराह हुए भटके हुए लोग अमानवीय कृत्यों लिप्त होकर आतंकी घटनाओं को जन्म देते हैं ,कभी कभी
कुछ अति महत्वाकांक्षी लोग अहंकारवश दुनिया पर शासन की ख्वाहिश में भी गलत करते हैं यह भावना देशों में भी अन्य देशों के प्रति रहती हे ,आज कई उदाहरण हम देख रहे हैं ,आतंकवाद के लिए वाहनों का हथियार की तरह उपयोग हो या अन्य किसी साधन का,घातक ही है, आतंकवाद समूल नष्ट हो या न हो जड़ तक पहुंचना ही होगा,
आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर ने नव वर्ष की शुरुआत आतंकी हमले वाहनों द्वारा
चिंता व्यक्त की है,एक कलम के सिपाही ने बढ़ते आतंकवाद की तरफ पाठकों को साहित्यकारों को सचेत करने की कोशिश की है ,सभी साहित्यकारों को कलम में धार देनी होगी
साधुवाद प्रिय तेजेंद्र सर
कुन्ती जी, आपने तो आतंकवाद पर एक गहरी और सार्थक टिप्पणी कर डाली है। पुरवाई का प्रयास रहता है कि हर मुद्दे की तह तक जाकर उसे समझा जाए और अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाए। आपके प्रोत्साहन के लिये हार्दिक धन्यवाद।
मैं किन्हीं बारीकियों या आपके संपादकीय के गुण दोष विवेचन पर नहीं जा रही। रचना वह सार्थक है जो अपना सन्देश, पाठक तक पहुंचा सके। आपके संपादकीय ने सन्देश जनमानस तक पहुंचाया है, धन्यवाद और बधाई।
यूँ तो भारतीय veteran हो चुके हैं न केवल आतंकवाद की ख़बर पढ़ के बल्कि आतंकवाद झेलके…
भला हो आतंकवादियों का जो World Trade Center पर हमला हुआ…
आतंक नोटिस में तो आया अन्यथा मज़ाक था इन तथाकथित विकसित देशों के लिए, हम भारतीय तो यूँ ही गाल बजाते रहते हैं…
आज तो ये रोज़मर्रा की बात है तो कोई “जुंबिश नहीं होती”…
काश इस लाइलाज माहामारी का इलाज मिले।
शैली जी आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
इतनी छोटी सी दिखने वाली बात को आपने विचार बना सोचने
पर मजबूर कर दिया कि आतंकी त्योहारों पर आतंक का त्योहार मना रहे है आजकल।वैश्वीकरण के परचम के नीचे खड़े हम सब के लिए ये युद्ध,ये आतंक सचमुच दुखद हैं।
नीहार जी इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
आतंकवाद का आतंक पूरे विश्व में है। यह वैश्वीकरण का युग है यह हम सबके लिए विचारणीय है।आपने बेहतरीन दृष्टिकोण से अपनी यथार्थ अभिव्यक्ति दी है।
हार्दिक धन्यवाद भावना।
भाई जी, मानव जाति का इतिहास ही कुछ ऐसा रहा है पहले छोटे छोटे इलाकों के शासक या कबीले के प्रमुख एक दूसरे से जर, जोरू और ज़मीन के चक्कर में संघर्षरत रहते थे , इसमें हर साल हज़ारों लाखों लोग की जानें जाती थीं . पिछले दो विश्व युद्ध की विभीषिका के बात से कुछ अंशों में ऐसी घटनाओं में कमी आई है लेकिन खूनी मानसिकता तमाम ऑलभौतिक विकास और संपन्नता के बावजूद यह किसी न किसी रूप में फैलती रहती है यही सचाई है, कार को घातक शस्त्र में बदल देना उसीkacdjत