Wednesday, February 11, 2026
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नासिरा शर्मा की कविताएँ

नासिरा शर्मा की कविताओं में जीवन की गहराई, समाज का यथार्थ और स्त्री-संवेदना का अद्भुत संलयन दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति, स्मृतियाँ और संघर्षशील स्त्री का रूप इस तरह उभरता है कि पाठक केवल पाठ नहीं करता, बल्कि अनुभव करता है। “वह औरत कौन है” में भील स्त्री का आत्मकथ्य एक प्रतिरोध है, जहाँ जंगल और ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। “ए औरत!” कविता समय और व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है, जहाँ कानून की नीयत और ग़रीब की विवशता आमने-सामने खड़ी दिखती है।
“बचपन की वह नदी” स्मृतियों का सजीव रूपक है, जहाँ बहती हुई नदी जीवन और समय दोनों के बहाव का प्रतीक बन जाती है। वहीं “पगली आरज़ू” प्रेम की मासूम और चंचल उड़ान है, जो खुरदरी ज़मीन पर सपनों का मुलायम गलीचा बुनती है। “सुनो सितारों!” में बचपन की निश्छलता और प्रकृति से जुड़ाव का वह सौंदर्य है, जो आधुनिक जीवन की भीड़ में कहीं खो गया है।
नासिरा शर्मा की कविता न तो केवल करुणा है, न ही मात्र रोष, बल्कि दोनों के बीच संतुलित संवेदना है—एक स्त्री की आवाज़ जो स्मृतियों, संघर्षों और सपनों के संग बहती है।
इस विशिष्ट कवयित्री को जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएँ – आपकी लेखनी यूँ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए संवेदनशीलता और संघर्ष का दीपक जलाती रहे। – (पुरवाई टीम)
1. वह औरत कौन है
जो साल के जंगलों के बीच
ढल गई है दरख़्तों में
उसके पसीने की बूँदें
झिलमिला रहीं हैं ऐसे
जैसे हरे पत्तों पर टिकी हो
ओस की बूँदें।
जिस तरह सींचती हैं जड़ें पौधों को
वह पालती है परिवार को
उसका सारा संसार है
ज़मीन,जंगल और जानवर
जिस पर लुटाती है वह प्यार अपना।
वह औरत कौन है
बताया तो वह मेहनतकश औरत है
जो जानती है धरती की धड़कन
जानवरों की बोली और
मौसम की आहटों को
वह हवाओं से बतियाती है और
बाँटती है अपने दुख-सुख को
अपनी नाराज़गी दर्ज करती है
अपने आक्रोश भरी आवाज़ में।
हमारे जंगलों को हमारा ही रहने दो
जहाँ बसते थे हमारे पुरखे
हम सुरक्षित हैं शांति के साथ यहाँ
जीवित लोगों और उनकी आत्माओं
के साथ।
हमें राजनीति नहीं नागरिक
अधिकार चाहिए
हमें अपने जंगल, ज़मीन और जानवर
चाहिए।
मैं भीलऔरत हूँ
मुझे पहचानो ज़रा।
2. ए औरत!
जाड़े की इस बदली भरी शाम को
कहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुए
ठहरो तो ज़रा!
मुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैं
थकन और भूख -प्यास की
सर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर
कहाँ लेकर जा रही हो इसे ?
तुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना,धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करना
अपराध है अपराध!

गैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसे
तुम्हारी ग़रीबी,बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों से
कुछ नहीं लेना देना है क़ानून को
बस इतना कहना है कि
जाड़े की ठुटरी रात में,गरमाई लेते हुए
रोटी सेंकने की ग़लती मत कर बैठना
पेड़ कुछ कहें या न कहें तुमसे
मगर
इस अपराध पर, क़ानून पकड़ लेगा तुम्हें।

यह दो हज़ार चौबीस है
बदलते समय के साथ चलो ,
और पुराने रिश्तों से नाता तोड़ो
सवाल मत करो कि बमों से निकलते बारूद
धूल, धुएं से पर्यावरण का नाश नहीं होता
पेड़ों के कटने से गर्मी का क़हर नहीं टूटता
यह छोटे मुंह और बड़ी बात होगी।
3. बचपन की वह नदी
जो बहती थी मेरी नसों में
जाने कितनी बार
उतारा है मैंने उसे अक्षरों में
पढ़ने वाले करते हैं शिकायत
यह नदी कहाँ है जिसका ज़िक्र है
अक्सर आपकी कहानियों में?
कैसे कहूँ कि यादों का भी एक सच होता है
जो वर्तमान में कहीं नज़र नहीं आता
वर्तमान का अतीत हो जाना भी
समय के बहना जैसा है
जैसे वह नदी बहती थी कभी पिघली चाँदी जैसी
अभी अलसाई सी पड़ी रहती है तलहटी में
शायद कल वह भी न हो
और ज़िक्र हो उसका सिंधु घाटी की तरह
कोर्स की पुस्तक के किसी पन्ने पर
अतीत में बहती थी कभी, एक नदी की तरह
4. पगली आरज़ू
कहा था मैंने तुमसे
उस गुलाबी जाड़े की शुरुआत में
उड़ना चाहती हूँ मैं तुम्हारे साथ
खुले आसमान में
चिड़ियाँ उड़ती हैं जैसे अपने जोड़ों के संग
नापतीं हैं आसमान की लम्बाई और चौड़ाई
नज़ारा करती हैं धरती का, झांकती हैं घरों में
पार करती हैं पहाड़, जंगल और नदियाँ
फिर उतरती हैं ज़मीन पर,चुगती हैं दाना
सुस्ताती किसी पेड़ की शाख पर
अलापतीं हैं कोई गीत प्रेम का
जब उमडता है प्यार तो गुदगुदाती हैं
अपनी चोंच से एक दूसरे को
उसी तरह मैं प्यार करना चाहती हूँ तुम्हें
लब से लब मिला कर ,हथेली पर हथेली रखकर
जैसे वह सटकर बैठते हैं अपने घोंसले में
वैसे ही रात को सोना चाहती हूँ तुम से लिपट कर
आँखों में नीले आसमान के सपने भर
इस खुरदुरी दुनिया को समतल बनाने के लिए ।
मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे संग ऊँचाइयों पर
जहाँ मुलाक़ात कर सकूँ सूरज से
उस डूबते सूरज को पंखों में छुपा लाऊँ
लौटते हुए उगे चाँद के चेहरे को चूम कर
चुग लाऊँ कुछ तारे चोरी-चोरी
फिर उन्हें सजा दूँ धरती के अंधेरे कोनों में ।
5. सुनो सितारो!
कहाँ गुम हो जाते हो तुम रात आते ही
जाते हो शराब-ख़ाने या फिर
थके हारे मज़दूर की तरह
पड़ जाते हो बेसुध चादर ओढ़ तुम!
मच्छर लाख कांटे और गुनगुनाएँ
उठते नहीं हो तुम नींद से
कुछ तो बताओ आख़िर कहाँ चले जाते हो तुम
हमारी आँखों की पहुँच से दूर
अंधेरी रातों में आ जाते थे रौशनी भरने
आँखों में आँखें डाल टिमटिमाते थे
सारे दिन की थकी आँखों को सेंकते थे और
बिना बोले ही बहुत कुछ बतियाते थे
मौसम कोई भी हो, तुम चमकना नहीं भूलते
चाँद निकले या न निकले ,सूरज के डूबते ही
तुम मिलने चले आते थे
नींद में डूबती आँखों में तुम ऐसा भ्रम भरते
जैसे ओढ़ रखी हो सितारों टकी चादर हमने
तुम्हारी यादों को आज भी सजा रखा है
अपने छोटे से फ़्लैट के कमरे की छत पर
यह सोच कर कि कैसे बन जाते थे रिश्ते तब
जब हमें क़ुदरत लिए फिरती थीं अपनी बाहों में
छूट गया तारों की छाँव का वह आँगन हमसे
जो न उभरेगा कभी मेरे बच्चों की निगाहों में
समझ न पायेंगे ज़मीन से आसमाँ के रिश्तों को
वह जायेंगे देखने तुम्हें तारा -मंडल में ।
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1 टिप्पणी

  1. नासिरा शर्मा जी की कविताएं सीधे दिल तक पहुंचती हैं। उनकी संवेदना की परिधि में मात्रा मनुष्य ही नहीं अपितु प्रकृति भी है। आदिवासी स्त्री हो या बचपन की नदी हो प्रत्येक कविता में स्त्री मन है और स्त्री की दृष्टि से देखे गए दृश्य हैं ।आदरणीया नीलिमा जी ने बहुत अच्छी टिप्पणी के साथ कविताएं प्रस्तुत की हैं ।
    नासिरा शर्मा जी को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई।

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