‘कभी-कभी मुझे लगता है, मैं एक बेआसरा शख़्स हूं।‘
‘बेआसरा मतलब? शहर में फ्लैट है तुम्हारा, नौकरी है तुम्हारी, कार है तुम्हारे पास। तुम्हारा बेआसरापन शौकिया है। सारे मज़े लूटो शहर के और लिखते हुए बेआसरा बन जाओ।’
‘हां, क्योंकि लिखते हुए मैं वह होती हूं जो शायद पीछे छूट गई है।‘
‘ज़्यादा बनो मत, यह निर्मल वर्मा की बिट्टी है- दिल्ली की बरसाती में इलाहाबाद को याद करती हुई। तुम लेखक लोग एक ही थीम बार-बार दुहराते रहते हो। घर पर रहते नहीं, लेकिन उसे पीठ पर टांगे घूमते हो, सबको दिखाते हुए कि पीठ कितनी ज़ख़्मी है।‘
‘तुम नहीं समझोगे। बिट्टी के अकेलेपन और मेरी बेआसरा मानसिकता में अंतर है। और पीठ ज़ख़्मी है- घर को ढोते हुए नहीं, बल्कि अकेलेपन और परायेपन के कोड़े सहते हुए।‘
‘कौन मार रहा है तुम्हें कोड़े?‘
‘तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि बाज़ार तुम्हें कुछ देखने नहीं देता।‘
‘तुम बाज़ार में नहीं हो? और बाज़ार है तो ये सारी चमक-दमक है।‘
‘हां, इतनी रोशनियां हैं कि अंधेरे का पता तक नहीं चलता। और सड़कों पर भीड़ भी तो देखो। गाड़ियों का आना-जाना जैसे ख़त्म ही नहीं होता।‘
‘मुझे तो लगता है कि बाजार है तो राहत है। पैसे दो सामान लो और जीवन जियो। इस बाज़ार में हम खुश हैं। बाज़ार चलता रहे। बाज़ार खुला रहना अमन और अमीरी की गारंटी है। बाज़ार तब बंद होता है जब दंगे होते हैं, जब तोड़फोड़ होती है।‘
‘कौन करता है दंगे? कौन करता है तोड़फोड़?’
यह सवाल रुखसाना को अटका गया। आगे क्या? अब वह क्या लिखे? तीन दिन के भीतर उसने यह नाटक पूरा कर देने का वादा किया हुआ है। इसे कॉलेज के सालाना जलसे में खेला जाना है। आज़ादी के अमृत महोत्सव के नाम पर एक बड़ा फंड मिला है जिससे यह सब हो रहा है। तो वह जल्दी-जल्दी लिख रही थी। बिना पूरा प्लॉट सोचे। यह मान कर कि उसके किरदार ही उसकी कहानी आगे बढ़ा देंगे। ऐसा पहले भी हुआ है। वह अपने किरदारों पर बहुत भरोसा करती रही है। वे अक्सर उसका हाथ थाम उसे उन गलियों में ले जाते रहे हैं जहां अकेली शायद वह नहीं जा पाती। कोई उसे जाने नहीं देता। लेकिन कई बार उसे लगता है कि अपने किरदारों की तरह वह भी काल्पनिक हो उठती है, उसका वजूद किसी शून्य में चला जाता है, वह किसी भी दरवाज़े, रोशनदान या सूराख तक से निकल सकती है। वह अदृश्य उस जंगल में घूम सकती है जिसका नाम शहर है। उसकी कलम जैसे कोई फर्राटा गाड़ी होती जिस पर वह अपने किरदारों को बैठा कर एक अनूठी दुनिया की सैर का आनंद लेती और लिखती।
लेकिन अभी यह फर्राटा गाड़ी- उसकी कलम- रुकी हुई थी। लैंप की झरती रोशनी में काग़ज़ के आधे कोरे पन्ने जैसे उससे पूछ रहे थे- कौन करता है दंगे? कौन करता है तोड़फोड़?
इसका जवाब शमीम कई बार दे चुका है- वे बेरोज़गार, निठल्ले लड़के जिनकी फौज बड़ी होती जा रही है और जिन्हें समाज में अपनी पहचान के लिए सबसे आसान और माकूल तरीक़ा धार्मिक झंडे उठाने, सांप्रदायिक नारे लगाने और देशभक्त बन जाने का लगता है। ‘इसलिए बेरोज़गारी सरकार के एजेंडे पर नहीं है। बेरोज़गार चाहिए पथराव के लिए, बेरोज़गार चाहिए कारसेवा के लिए, बेरोज़गार चाहिए झंडे उठाने के लिए, दंगे करने के लिए।‘ अक्सर अपनी राय बहुत साफ़ शब्दों में रखने वाला शमीम इसीलिए उसे अच्छा लगता है। लेकिन क्या चीज़ें वाकई इतनी साफ़ हैं?
रुखसाना को स्टाफ़ रूम की बातचीत याद आती है। प्रोफ़ेसर आशुतोष पांडेय अफ़सोस के साथ कह रहे हैं- ‘1947 में जो ग़लती हो गई, हम उसी का नतीजा झेल रहे हैं।‘
इसके बाद की ग़लती शमीम ने कर दी है। अब अपने उर्दू वाला होने की तोहमत झेलेगा। उसने ताना मारने वाली मासूमियत से पूछा है- ‘1947 की ग़लती? यानी आज़ादी? क्या आप इसी की बात कर रहे हैं? बहुत लोग मानते हैं कि अंग्रेज़ ही रहते तो अच्छा होता।‘
आशुतोष पांडेय ने कुछ ज़ख़्मी नज़र से शमीम को देखा था। ठंडी सांस भर कर बोले, ‘शमीम साहब, सारी आज़ादी यहीं है, दूसरे देशों का हाल देख लीजिए।‘
लेकिन शमीम अब इस आज़ादी का लुत्फ़ उठाने के मूड में था। उसने पलट कर कहा- ‘इसीलिए तो हम हिंदुस्तान हैं पांडेय जी। आप इसी कोई दूसरा देश क्यों बनाना चाहते हैं?’
बाकी सहकर्मियों ने बात बढ़ने से रोक लिया था। रुख़साना ने भी बाद में कहा, ‘यार, क्यों बेमतलब उलझना? तुम्हें पता है, वह आदमी नई हुकूमत में लगातार ताक़तवर हुआ जा रहा है। चुप नहीं रह सकते?’
लेकिन शमीम उससे बात करते हुए गंभीर हो चुका था- ‘चुप रहोगी तो कल को ये पत्थर मारेंगे। जवाब देना होगा, बताना होगा- कि आप यों ही हम पर कीचड़ उछाल कर निकल नहीं सकते। कब तक चुप रहोगी?
रुख़साना और शमीम तब कॉफ़ी हाउस में बैठे हुए थे। रुख़साना के पास जवाब था- ‘तुम तो आज पत्थर खा रहे हो, मैं तो कब से खाती रही हूं। बांझ होने का पत्थर, बदचलन होने का पत्थर, बददिमाग होने का पत्थर, तलाकशुदा होने का पत्थर। सिंगल वूमन होने का पत्थर। मुझ तक तो फूल भी पत्थर की शक्ल में आते हैं शमीम। मैं कहां-कहां जवाब देती रहूं। और तुम पर तो वे कीचड़ उछाल रहे हैं जो तुम्हें पराया मानते हैं। मुझ पर तो उनकी बिजली गिर रही है जो मुझे अपना बताते हैं।‘ शमीम चुप हो गया था।
रुखसाना ने ठंडी सांस ली। आशुतोष पांडेय हिंदी पढ़ाते हैं, शमीम उर्दू और वह ख़ुद इतिहास पढ़ाती है। आशुतोष हमेशा से ऊंची आवाज़ में बोलने वाले रहे- बेशक, अंग्रेज़ी वालों से कुछ दबते रहे, लेकिन आम तौर पर उनकी देशभक्ति उनकी साहित्यिक समझ के साथ एक होकर लेखकों के क़द तय करती थी। मगर इन दिनों वे कुछ ज्यादा देशभक्त हो गए थे।
और शमीम? उसमें एक शायराना-सूफ़ियाना मुलायमियत थी- शायद अभावों में पले बचपन के बाद मीर-ग़ालिब की संगत ने उसे एक बेफ़िक्री दी थी। लेकिन इन वर्षों में बस पांडेय जी ही नहीं, वह भी बदल रहा था। अब वह पहले से ज़्यादा चिड़चिड़ा हो गया था।
बेशक, रुख़साना के पास आकर उसकी मुलायमियत लौट आती। वह शायरों की बात करता, दिल्ली की ऐतिहासिक जगहों की बात करता, अपनी लाइब्रेरी से गिर कर मरे हुमायूं में उसकी बड़ी दिलचस्पी थी, कविताओं और ग़ज़लों और उपन्यासों की भी बात करता। लेकिन मौजूदा माहौल के ज़िक्र से अचानक वह बचने लगा था। मानो उसे न जाहिल दिखते मुसलमानों की परवाह थी न बर्बर नज़र आते हिंदुओं की। वह जैसे अपनी ही खोल में सिमटता, अपने ही भीतर खोया हिंदुस्तान था।
रुखसाना को लगा कि इन टुकड़ों से नाटक को आगे बढ़ाया जा सकता है। क्या वह इसे चरित्रों की बातचीत में जोड़ दे? क्या बहुत फार्मूला टाइप लेखन नहीं लगेगा? वह अनमने ढंग से कागज़ के ऊपर कलम फिराती रही। देखती रही अपने-आप एक कलम की तस्वीर बन रही है।
ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। उसके किरदार जैसे उसका हाथ झटक कर, उससे दूर छिटक कर जा खड़े हुए हैं। जो रास्ता वह नहीं खोज पा रही है, क्या वे भी नहीं खोज पा रहे हैं? लेकिन क्यों? क्या इसलिए कि वह भी कुछ नकली लिखने की कोशिश कर रही है- अपने अनुभव संसार से बाहर? या वह लिखने से वह बच रही है जिसका दबाव भीतर से आ रहा है कि लिखा जाना चाहिए? अचानक एक टीस उसके भीतर उभरी। क्या वह ख़ुद भी इन दिनों अकेली महसूस नहीं कर रही है? अकेली तो ख़ैर वह कई बरस से है, लेकिन इन दिनों का अकेलापन कुछ अलग सा है जिसमें अकेलेपन से ज़्यादा परायेपन का एहसास है। यह कोरोना का पैदा किया हुआ अकेलापन नहीं है जो दो साल से सबकी ज़िंदगी में अवसाद पैदा कर रहा है, यह किसी और महामारी का इशारा है। पहले भी सोसाइटी में लोग उसे कुछ अजीब निगाहों से देखते रहे, जैसे जो भी उसके साथ पेश आता है वह अतिरिक्त उदार हो जाता है या फिर अतिरिक्त सजग। हालांकि यह बात भी पुरानी है लेकिन इन दिनों जैसे एक और नई पहचान उसके साथ जुड़ गई है – या एक तीसरी नज़र एक गुस्ताख़ नज़र जो जैसे उससे पूछती हो कि तुम यहां क्यों हो, यहां तुम्हें रहने का हक़ किसने दिया?
अचानक लिखने से उसका जी उचट गया। उसे लगा, वह सो जाए। हालांकि अभी रात के नौ ही बजे थे। चाहे तो वह एक घंटा लिख सकती है। लेकिन उसने लिखना सुबह के लिए मुल्तवी किया। खाना इन दिनों वह सात बजे ही खा लेती है। उसने चेंज किया, कमरे की लाइट ऑफ़ कर दी और बिस्तर पर लेट गई।
………..
एक ज़ोरदार झनाक की आवाज़ से रुख़साना की नींद टूटी- जैसे कोई शीशा टूटा हो। एक लम्हा उसे यह समझने में लगा कि वह सपना देख रही है या सच है। आवाज उसके ही बेडरूम से आई है। नीम रोशनी में ही उसने देखा- खिड़की का शीशा टूटा हुआ है। उसे लगा कि क्या हवा इतनी तेज़ थी? खिड़की पर खड़ी होकर उसने नीचे देखने की कोशिश की। अचानक वह सन्न रह गई। तीन-चार हीही करते लड़के बाइक स्टार्ट करके भाग रहे थे। क्या इन लोगों ने जान-बूझ कर उसके यहां पत्थर फेंका है? उसने घड़ी देखी- दस बज कर चालीस मिनट। एक लम्हे को वह बुरी तरह डर गई। लेकिन दूसरे लम्हे उसने वहीं से चिल्लाना शुरू किया- गार्ड-गार्ड! गार्ड जब तक आते, तब तक लड़के रफ़ूचक्कर हो चुके थे।
उसने बत्तियां ऑन की, कपड़े पहने, तेज़ी से अपना घर लॉक किया, चाबियां हाथ में झुलाती हुई ही नीचे की ओर दौड़ी। फर्स्ट फ्लोर का अपना फ़्लैट वह कितना सुरक्षित मानती थी!
नीचे गार्ड, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन सब इकट्ठा हो चुके थे। उसकी आवाज़ सुन कर एकाध और लोग बाहर आ गए थे। उसने सबको बताया, किस तरह उसके घर पत्थर मारा गया है। उसने गार्ड से पूछा, ये लोग कौन थे? कैसे आए थे? उसने सोसाइटी के सेक्रेटरी को भी फोन किया था जो धीरे-धीरे चले आ रहे थे। गार्ड कुछ बता नहीं पा रहा था। सब उससे हमदर्दी जता रहे थे। सचिव ने कहा, ‘कुछ बच्चों की शरारत होगी, जाने दीजिए।‘ वह बुरी तरह भड़क उठी- ‘जाने दूं? यह शरारत है? सोसाइटी में चार लड़के घुस कर एक अकेली रह रही महिला के घर पत्थर मार कर, उसका शीशा तोड़कर भाग जाते हैं और आप कह रहे हैं, ये शरारत है? फिर अपराध क्या होता है? किसी दिन में वे मेरे घर घुस कर मेरे ही साथ कुछ कर बैठेंगे तब अपराध मानेंगे?’ वह अपने ही बोले हुए का अर्थ समझ कर सिहर गई। ‘नहीं, नहीं’, अब सचिव महोदय हकलाने लगे थे। ‘ग़लत तो उन्होंने किया ही है। लेकिन लगता है, नुक़सान पहुंचाने का इरादा नहीं था- बस तंग करने का था।‘ रुखसाना हैरान थी। हर बात पर नियम-क़ायदे की दुहाई देने वाले इस सेक्रेटरी को क्या हो गया है? यह तो हमेशा दूसरों का बिजली-पानी बंद करने की धमकी देता रहता है? उसने तमतमाते हुए कहा, ‘नुक़सान नहीं हुआ? मेरा शीशा टूटा है, और उसी कमरे में मैं सोई हुई थी। अगर कांच मेरे ऊपर आ गिरा होता तो? और रात को साढ़े दस बजे एक अकेली महिला के फ़्लैट में इस तरह पत्थर मारना शरारत है?’
सेक्रेटरी अब चुप थे। रुख़साना अब गार्ड्स की ओर मुड़ी। आप लोग बताइए, ये कौन लोग थे- कैसे एंट्री कर गए? सबके नाम रजिस्टर में होते हैं न? आपने दर्ज किया होगा न? रजिस्टर लाइए।‘
गार्ड ने सहमे हुए अंदाज़ में कहा- गाड़ी वालों और पैदल चलने वालों को तो हम रोक लेते हैं। लेकिन बाइक वाले लड़के इस छोटे से गेट से तेज़ी से निकल जाते हैं। हम समझते हैं कि सोसाइटी के ही लड़के होंगे। या फिर उनके दोस्त होंगे- इसलिए टोकते नहीं।‘
‘तो य़ही सिक्युरिटी है आपकी?’ रुख़साना अब सचिव की ओर मुड़ चुकी थी। सचिव महोदय अब भी चुपचाप थे- ‘गार्ड्स को भी कुछ नहीं बोलेंगे?’
‘ग़लत तो किया है…’ अब वे बुदबुदा रहे थे।
‘तो मैं पुलिस के पास जा रही हूं। कंप्लेन लिखवाने। और गेट पर सीसीटीवी कैमरा तो है। उसकी फुटेज निकालिए।‘
‘आप समझिए मैम, माहौल बहुत ख़राब है।‘ सेक्रेटरी अब समझाने लगे थे। ‘माइनॉरिटी को लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं। हमें कई लोगों ने कहा कि इनको मकान किराये पर क्यों दिया?’
रुख़साना अब बिल्कुल अवाक थी। इस पहलू पर तो उसने सोचा ही नहीं था। हालांकि यह पहलू बार-बार पहले भी आता रहा था। जब उसने 30,000 रुपये महीने की दर से किराया देना स्वीकार किया था तो एक दोस्त ने कहा भी- ‘तुम ज़्यादा किराया दे रही हो। किसी भी सूरत में 25,000 से ज़्यादा नहीं देना था।।‘ तब हंसते हुए उसने कहा था कि पांच हज़ार रुपये तो उसने मुसलमान होने के बढ़ाए हैं। उसे घर कहां मिल रहा था?
लेकिन पांच हज़ार अतिरिक्त रुपये दरअसल उसके लिए एक सुरक्षित नागरिकता की गारंटी भी थे- यह भरोसा कि एक अपार्टमेंट के भीतर घर होगा तो उस अकेली औरत को सुरक्षा का एहसास ज़्यादा होगा। हालांकि यहां भी उसे ख़ूब उलझना पड़ा। वह अकेली है, यह जानकर ही बहुत सारे सवाल खड़े हो गए। उसे कई तरह की फालतू किचपिच से गुज़रना पड़ा। सोसाइटी में उसकी छवि एक झगड़ालू औरत की बन गई। इससे उसने कुछ सुकून ही महसूस किया, हालांकि सुकून के भीतर दुख की एक गहरी रेखा खिंची हुई थी- वह समझे जाने की जो वह दरअसल नहीं थी। लेकिन फिर भी एक भरोसा था कि वह यहां सुरक्षित है।
आज इस भरोसे पर पत्थर चला था। यह पत्थर की सियासत भी अजीब थी। हर जगह पत्थर चल रहे थे। अकबर पर भी, औरंगज़ेब पर भी। गांधी पर भी और नेहरू पर भी। असली पत्थर भी। श्रीनगर में भी, सहारनपुर और इलाहाबाद में भी। पत्थरों से जैसे देश की राजनीति तय हो रही थी। कहीं पत्थऱ फेंकने वाले आतंकी कहला रहे थे, कहीं देशद्रोही और कहीं देशभक्त भी। सबके पत्थर सब पर चल रहे थे।
लेकिन वह तो इन सबसे दूर खड़ी थी। वह तो हर तरह के पत्थर के ख़िलाफ रही। फिर उसके घर यह पत्थर किसने फेंका? यह शरारत है, साज़िश है या सियासत है? वह सोसाइटी में कंप्लेन करे, पुलिस थाने जाकर एफआइआर दर्ज कराए या फिर अपने फ़्लैट में जाकर सो रहे?
वह पहले ही शमीम को फोन कर चुकी थी जो अब उसके बगल में खड़ा था। इस नुकीली दाढ़ी वाले कम्युनिस्ट लगते मुसलमान को सेक्रेटरी साहब पहले से पहचानते थे। उनकी भौहें और तन गईं। ये एक छोटे से मामले को तूल देने पर तुले हुए हैं। ठीक है, वे भी थाने फोन कर देंगे कि कार्रवाई तो हो, लेकिन देखकर, हमारे घरों के बच्चे भी शामिल हो सकते हैं।
सेक्रेटरी साहब का असली डर यही था। उनके पुराने दोस्त और सोसाइटी के प्रेसिडेंट का बेटा इन दिनों तमतमाया घूमता है कि मुसलमानों को सबक सिखाना होगा। उसे उन्होंने कई बार समझाया कि वह इन सबसे दूर रहे, पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दे, लेकिन उसका मन जैसे कहीं और अटका हुआ है। तो उन्हें डर था कि इस शरारत में उसका भी हाथ न हो। सीसीटीवी फुटेज में वह निकल गया तो?
शमीम इस बीच रुखसाना से सारा ब्योरा ले चुका था। घर जाकर देख भी चुका था। उसकी साफ़ राय थी, सोसाइटी के भरोसे रहना ठीक नहीं, पुलिस थाने में शिकायत करनी चाहिए। बेशक, वे कार्रवाई न करें, लेकिन यह संदेश तो जाएगा कि पुलिस तक बात पहुंच चुकी है।
तो पंद्रह मिनट में रुखसाना और शमीम थाने में थे। आधी रात के आसपास इन दो लोगों को आया देख उनींदा सा पड़ा थाना कुछ परेशान दिखने लगा था। कुछ ऊंघते और उबासी लेते पुलिसवाले ने लेकिन जब रुख़साना का नाम सुना तो चौकन्ना हो गया। उसे समझ में आ गया कि मामला टेढ़ा होगा। भले पत्थर फेंका है, लेकिन एक अकेली रहने वाली मुसलमान लड़की के घर फेंका है। हालांकि उसने तत्काल साथ चलने से इनकार किया। कहा कि सबेरे वह तफ़्तीश ज़रूर करेगा और पता करेगा कि कौन इसके पीछे है।
रुखसाना और शमीम भी तब तक कुछ ठंडे पड़ चुके थे। उन्हें एहसास हो चला था कि इस मामले के बस क़ानूनी पहलू ही नहीं हैं, सामाजिक आयाम भी हैं। दोनों लौटे, शमीम रुख़साना के फ़्लैट तक आया, उसने पूछा कि क्या वह रुक जाए। रुखसाना ने मना किया, नहीं, इससे एक और चर्चा सोसाइटी वालों के बीच चल पड़ेगी। शमीम ने खिड़की के टूटे हुए हिस्से पर अख़बार चिपका दिया और कहा कि वह सो जाए।
लेकिन शमीम के जाने के बाद रुखसाना की नींद उड़ी हुई थी। वह बिस्तर पर करवट बदलती रही, बार-बार अपनी टूटी हुई खिड़की पर किसी तरह चिपकाए अखबार को देखती रही। लेकिन आख़िरकार उठ बैठी। उसे लगा कि इस तनाव से ध्यान भटकाना ज़रूरी है। अच्छा हो, वह अपना नाटक आगे बढ़ाए। हमेशा अपने किरदारों के पास पहुंच कर उसे कुछ राहत मिलती है। अपनी सारी समस्याएं वह उन्हीं के हिस्से कर देती है। तो उसने फिर लिखना शुरू किया।
……..
‘कौन करता है दंगे? कौन करता है तोड़फोड़?’
यह आख़िरी वाक्य अब भी एक सवाल की तरह उसके सामने टंगा हुआ था और वह जवाब तलाश रही थी।
‘तुम्हारा सवाल बहुत ट्रिकी है। मान लो, तुम्हारे घर पर कोई पत्थऱ फेंके तो तुम क्या करोगे?
‘मैं भी पलट कर उसके घर पर पत्थऱ फेंकूंगा।‘
‘लेकिन अगर तुम्हें पता ही न चले कि तुम्हारे घर किसने पत्थऱ फेंका, वह कहां रहता है तो क्या करोगे?’
वह फिर कुछ उदास हो गई। बार-बार पूछा अपने किरदारों से- वे क्या करेंगे? यह खयाल भी आया कि वे जाने-पहचाने निकल गए तब भी वे क्या करेंगे? किसी ने जवाब नहीं दिया। लेकिन एक गाने लगा- ‘हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे।‘ इकबाल बानो की लरजती हुई आवाज़ में फ़ैज़ की ग़ज़ल! वह कुछ अवाक सी रह गई। एक साथ रुलाई सी छूटी और एक संकल्प सा जागा- हम देखेंगे। उसने फिर लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे इस संवाद से वह अपने किरदारों के साथ एक रास्ता खोजने लगी। बीच में दूसरे किरदारों को भी ले आई। शमीम की शक्ल और उसके तेवर को ध्यान में रखते हुए उसने एक किरदार खड़ा किया, लेकिन उसे उर्दू का नहीं, इतिहास का प्रोफ़ेसर बना दिया- और यह खयाल रखा कि वह हिंदू हो।
फिर पत्थर की राजनीति में लव जेहाद भी चला आया- उसने एक प्रेमी जोड़ा घुसाया और एक पुलिसवाला भी। एक दाढ़ी वाला नेता भी आ गया, लेकिन इस एहतियात के साथ कि उसकी पहचान किसी से न मिले। वह बहुत मिठास से बोलने वाला किरदार बना। वह हैरान थी, कैसे मुद्दे से मुद्दे जुड़ते जा रहे हैं? उसने तो लिखते हुए यह सब सोचा भी नहीं था। ये लव जेहाद वाला जोड़ा अचानक नागरिकता विरोधी आंदोलन में भी कैसे दिखने लगा? उसे डर लगा कि फिर उसकी कहानी सरलीकरण की शिकार न हो जाए। और वह आरक्षण विरोधी 370 हटाने का समर्थक कैसे हो गया? उसने फिर अपने आसपास के क़िस्सों को याद किया- याद आई उनकी हताशा भी। उसने तय किया कि वह अपने किरदारों को इस शहर से भगा देगी और उनके कहीं और बसने का ठिकाना खोजेगी। उसने घड़ी देखी। रात के तीन बज चुके थे। यानी उसकी रुटीन पूरी तरह बरबाद हो गई। लेकिन वह फिर भी संतुष्ट थी। शीशा टूटने की जो खरोंच मन पर थी, वह लिखने से कुछ कम हो गई थी। वह दुखी थी, लेकिन एक सुख भी था। वह सो गई।
…..
सुबह दस बजे लगातार बजती कॉल बेल के साथ उसकी नींद टूटी। वह उठी तो उसकी घरेलू सहायिका इमरती हैरान सी दरवाज़े पर खड़ी थी। अख़बार बाहर पड़ा हुआ था। इमरती ने घुसते ही पूछा, ‘तबीयत ठीक है न। अब तक सोई हुई थी तुम?’ उसने सिर झटका, मुस्कुराने की कोशिश की, बताया कि तबीयत ठीक है। फिर बताया कि रात क्या हुआ था। इमरती बिल्कुल हैरान रह गई। उसने खिड़की के पास गिरा हुआ कांच बहुत सावधानी से चुना- उसे बाहर फेंका। फिर झाड़ू करती-करती बोली- ‘बाहर से पत्थर कौन फेंकेगा दीदी? यहीं का लड़का लोग होगा।‘ रुख़साना के भीतर यह दबा हुआ संदेह फिर सिर उठाने लगा था- ‘हां न इमरती! मुझे भी यही लगता है।‘
शाम होते-होते दूसरी कानाफूसियां भी सुनाई पड़ने लगी थीं। दोपहर को पुलिसवाले आए, उसकी खिड़की का भी मुआयना किया, वहां से झांक कर नीचे की जगह देखी, सिर हिलाते आपस में बात करते रहे, और फिर सोसाइटी के सेक्रेटरी और प्रेसिडेंट से मिलने चले गए। लौट कर एक पुलिसवाले ने कहा- निश्चिंत रहिए मैडम, अब कोई पत्थर फेंकने की हिम्मत नहीं करेगा। रुख़साना पूछ तक नहीं पाई कि कोई ऐसी हिम्मत क्यों नहीं करेगा।
दो घंटे बाद सोसाइटी का ही एक मेकैनिक एक शीशा लिए उसके घर आया तो उसने धीरे-धीरे बताया- प्रेसिडेंट के बेटे का हाथ है। पुलिसवाले भी जानते हैं। पच्चीस हज़ार रुपये लेकर माने हैं। वरना गिरफ़्तार करने वाले थे। कह रहे थे कि सांप्रदायिक दंगा भड़काने की कोशिश बहुत बड़ा जुर्म है। रुख़साना यह जान कर भी हैरान रह गई। उसे एक संतोष भर हुआ कि अपने आवारा बेटे की वजह से प्रेसिडेंट को पच्चीस हज़ार रुपये का चूना लग गया है। लेकिन कुछ था जो फिर भी लगातार उसे खटक रहा था। उसे सहसा खयाल आया कि जो आदमी पच्चीस हज़ार खर्च करके अपने बेटे को जेल जाने से बचा सकता है, वह पचास हज़ार या एक लाख ख़र्च करके उसे जेल भिजवा भी सकता है। अचानक उसके सामने वे सारे चेहरे तैर गए जो अलग-अलग आंदोलनों की वजह से झूठे आरोपों में जेल काट रहे हैं।
लेकिन फिलहाल इस अंदेशे से जूझने का भी समय उसके पास नहीं था। सुबह से उसके पास फोन का तांता लगा हुआ था। रात मोबाइल साइलेंट करके सोई थी, इसलिए उठने तक तो पता नहीं चला, लेकिन उसके बाद उसने देखा कि पचासों मिस कॉल पड़े हुए थे। शमीम ने दरअसल सबको बता दिया था। तो उसके तमाम शुभचिंतक परेशान थे। सब जानना चाहते थे, क्या हुआ, सब पूछ रहे थे, वह सुरक्षित तो है?
वह क्या बताती? बस एक पत्थर चला था। पत्थर इस देश में रोज़ चल रहे हैं। उसके घर चला पत्थर भी उस पर नहीं, खिड़की पर लगा था। लेकिन फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि वह पत्थर तो अब तक बिल्कुल उसके दिल में धंसा हुआ है? कहीं ऐसा तो नहीं कि खिड़की से टूटा हुआ कोई कांच उछल कर उसके कलेजे में आ गड़ा हो? सोसाइटी वाले समझा रहे हैं कि ज़्यादा बड़ी बात नहीं है, वह इसे आगे न बढ़ाए। पुलिस वाले रिश्वत खा कर गए और दिलासा भी देते गए कि वह सुरक्षित है। लेकिन क्या वह वाकई सुरक्षित है? क्या जान बचे रहना ही सुरक्षित रहना होता है? क्या महफ़ूज़ रहने का एहसास आज़ादी के एहसास से जुड़ा हुआ नहीं है? उसने फिर सिर झटका। जाने दो, एक बार वह भूलने की कोशिश करेगी।
लेकिन सोसाइटी भूलने नहीं दे रही थी। शाम तक बहुत सारी अफ़वाहें मक्खी की तरह भिनकने लगी थीं। बस इसलिए कि दोपहर बाद उससे मिलने उसके कई रिश्तेदार चले आए थे। सोसाइटी का दरबान हैरान था कि इतने मुसलमान तो कभी आते ही नहीं। वह कुछ कह तो नहीं सकता था, इसलिए उसने जाने सबको दिया, लेकिन चुपके से प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी को जानकारी दे दी। बस यहीं से ख़बर पसरने लगी- सबको सावधान किया जाने लगा- यह बताते हुए कि बहुत सारे अजनबी अचानक सोसाइटी में दाख़िल हो रहे हैं- और फुसफुसाते हुए कि वे मुसलमान हैं, और चुपके से इशारा करते हुए कि कल रात इस महिला के घर का कांच टूटा है तो वह बवाल कर रही है।
‘कांच टूटने पर इतना झगड़ा हो तो हर रोज़ सोसाइटी में झगड़े हुआ करें, बच्चे क्रिकेट-फुटबॉल खेलते हैं और फ्लैटों के कांच टूटते हैं, अब इसमें इतनी बड़ी बात क्या है’, कोई भनभना रहा था।
रुख़साना हैरान थी। पत्थर फेंकने की वारदात को किस तरह बस कांच टूटने की दुर्घटना में बदला जा रहा है। शाम को उसके मकान मालिक का भी फोन आ गया। उसके पास सोसाइटी के कुछ लोगों का फोन गया था कि वे अपना घर ख़ाली करा लें- एक फ़सादी औरत रह रही है। हालांकि खुद मकान मालिक बहुत डरी हुई सज्जनता के साथ यह सब कह रहा था- ‘देखिए जी, हमें तो बस किराये से मतलब है। और फिर आप बात-व्यवहार में इतनी अच्छी हैं। पढ़ी-लिखी हैं। इन अनपढ़ सोसाइटी वालों से आपका क्या मुक़ाबला। तो एक बार कोशिश कीजिए कि इन लोगों से मिल-जुल कर रहिए। बाक़ी आगे झगड़ा-वगड़ा हो तो देख लीजिए अपने ही इलाक़े में कोई घर।‘
इसको बेदख़ली कहते हैं। रुखसाना ने बहुत मायूसी से सोचा। किस तरह उसे पराया बनाया गया। अब उससे ‘अपने ही इलाक़े’ में जाने को कहा जा रहा है। लेकिन ‘अपना इलाक़ा’ कौन सा? जहां मुसलमान ज़्यादा रहते हैं? उसने अपने-आप से पूछा और उत्तर समझते हुए चुप रह गई। उसने अपना फ़्लैट देखा, बाहर निकल कर सोसाइटी देखी। कल तक यह फ़्लैट पूरी आश्वस्ति के साथ उसका अपना था। सोसाइटी में उसे कभी डर नहीं लगा। पास-पड़ोस वाले बहुत मिलनसार नहीं तो भी दूर नहीं थे। सब मिलने पर हालचाल पूछते थे। शादी ब्याह, पर्व त्योहार में बुलाते भी थे। कोरोना के दौर में सब सिमटे-सिकुड़े रहे, सोसाइटी से पांच लोगों की मौत भी हुई, उनके लिए ऑनलाइन हुई शोकसभा में भी वह शामिल थी।
लेकिन महज चौबीस घंटे में कुछ ऐसा हो गया कि वह खुद को अजनबी, पराया और असुरक्षित महसूस कर रही है। उसे डर रहा है कि अचानक कोई उसके घर में घुस कर उसे बाहर निकलने को न कहे। उसकी क्या गलती है? पुलिस के पास जाना? क़ानून पर भरोसा करना? सोसाइटी वालों के रहमो-करम पर रहने से इनकार करना? वह कहां जाए? बस एक ही जगह उसकी अपनी थी- उसके किरदारों का घर- उसका बन रहा नाटक।
……..
लेकिन उसकी कहानी उसके हाथ से फिसल-फिसल जा रही थी। उसके किरदार बिल्कुल बाग़ी हो रहे थे। वे भी किसी के घर पत्थर फेंकना चाहते थे। उसे लग रहा था कि वह भी अपने किरदारों में शामिल हो गई है। वह जो लिख रही है, वह अपनी ही दास्तान है। लेकिन वह चाहती थी कि अपनी तकलीफ़ और गुस्से से उबर कर लिखे। लव जेहाद के नाम पर पकड़े गए जिस जोड़े को वह बस शहर से बाहर निकलवाना चाहती थी, वह अब यह मुल्क ही छोड़ने पर आमादा था। अमन की बात करने वाला बुज़ुर्ग कहीं मायूस किनारे खड़ा था। अब कुछ अटट्हास करते लड़के उसके नाटक में चले आए थे। उनकी बाइकें सड़क पर पार्क थीं और वे हंस रहे थे कि कैसा मज़ा चखाया। लिखते-लिखते उसने पाया कि वह रो रही है। उसे बहुत सारे लोगों की याद आई- शमीम की, जो लगातार उसे फोन कर रहा है और जिसे उसने अपनी सोसाइटी में आने से रोक रखा है। अम्मी-अब्बू की, जिनको ख़बर तक नहीं है कि उनकी बेटी किन हालात से जूझ रही है। उसके तलाक़ के बाद वे जिस तरह टूटे थे, वह उसे याद है। वह उसे फिर से तोड़ना नहीं चाहती।
लेकिन नाटक में एक मां भी चली आई थी। बेटी का माथा सहलाती हुई। बताती हुई कि औरतें सारे हालात से लड़ लेती हैं। वे कमज़ोर दिखती हैं लेकिन होती नहीं। और वह तो कमज़ोर दिखती भी नहीं। वह तो कैफ़ी आज़मी की औरत है- ‘अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे।‘
उसने ख़ुद पर काबू पाया। धीरे-धीरे नाटक और किरदारों को संभालने-समझाने में लगी रही। इसके पहले उसे ख़ुद को समझाना पड़ा। कहानी अब एक शक्ल अख़्तियार कर रही थी। मोहब्बत, बगावत, ख़ुद्दारी, देश और दुनिया सब इसमें आ रहे थे। वह धीरे-धीरे जैसे अपने भीतर के भाप को बाहर निकाल रही थी। नहीं निकालेगी तो भीतर से फट पड़ेगी, मर जाएगी। उसने तय किया कि वह जो महसूस कर रही है, वही लिखेगी। जीवन में भले समझौते करने पड़ें, लेकिन कहानी में नहीं करेगी। उसने जल्दी-जल्दी कलम चलानी शुरू की। कहानी यक़ीन की, कहानी अलगाव की, कहानी दुराव की, कहानी बेदख़ली की। सब कहानियां मिलती चली गईं। वह भी सूत्रधार की तरह नाटक में शामिल हो गई। उसे लगा कि अपनी तकलीफ़ नहीं कहेगी तो नहीं रहेगी। और जाते-जाते उसने सूत्रधार के तौर पर कहा- ‘अब मैं ये नाटक भी छोड़ रही हूं और ये मुल्क भी। कहां जाऊंगी, पता नहीं। दुनिया में बहुत सारे बेआसरा लोग रहते हैं। ध्यान से देखिए तो ये दुनिया बेआसरा लोगों से बनी है। मुझे वही लोग आसरा देंगे। अलविदा।‘ उसने कल्पना की कि वह हाथ हिलाते-हिलाते धीरे-धीरे पीछे हटती हुई मंच से नेपथ्य की ओर जा रही है। बत्तियां बुझ रही हैं, एक स्पॉटलाइट उसका पीछा करते-करते मंद हो रही है और फिर बस दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट है। हालांकि दुख और बेदखली की इस कथा में तालियों का क्या काम? लेकिन शायद दुनिया ऐसे ही चलती है, ऐसे ही बनती है। उसने भी बत्तियां बुझाई और सो गई।
…….
अगली सुबह सामान्य लग रही थी। वह भी अपनी रुटीन पर लौट आई थी और सोसाइटी भी। हालांकि एक तनाव उसके भीतर बना हुआ था। कल तक जो डर था वह अब गुस्से में बदल रहा था। उसे लग रहा था कि उसके घर पर पत्थर फेंकने की यह जुर्रत किसने की? वह सोच रही थी कि पता लगाएगी। लेकिन आज उसके पहले कॉलेज जाना है। छात्रों को नाटक की स्क्रिप्ट देनी है। उसने फिर कंप्यूटर खोला, पूरी स्क्रिप्ट पढ़ी और प्रिंट निकाल लिया। उसे पता था कि कुछ झोल हैं. लेकिन यह खयाल था कि रिहर्सल के दौरान वे दूर हो जाएंगे। नाटक बनते-बनते भी बदल जाता है।
जब वह कॉलेज पहुंची तो हर कोई उसका हाल पूछ रहा था। इतिहास विभाग में हलचल थी। उसने मुस्कुराते हुए सबको वही बताया जो सेक्रेटरी ने कहा था- कुछ शरारती लड़कों की हरकत थी। बाक़ी सब सिर हिलाते रहे थे। बस प्रोफ़ेसर हरेराम भड़क उठे थे- ‘यह कुछ लड़कों की हरकत नहीं है- ‘हमारा पूरा समाज बीमार हो चला है। वह जैसे किसी को चैन से जीने नहीं देना चाहता। लड़की है, अकेली है और मुसलमान है तो कैसे जी लेगी।‘ हरेराम जी की यह पुरानी लड़ाई थी जो इतिहास विभाग में पहले से चला करती थी। कई बौद्धिक प्रोफ़ेसरों ने मुंह बिचका कर इस बातचीत से कन्नी काट ली।
लेकिन आज रुखसाना फिर भी कुछ बेपरवाह थी। छात्रों की बनाई संस्था महाविद्यालय आरंगन के लड़के-लड़कियां आ रहे थे। उसने मुस्कुराते हुए स्क्रिप्ट निकाली और उन्हें सौंप दी। सबने हुर्रा किया। अपनी मैम पर उन्हें भरोसा था। वे एक अच्छा नाटक लिख ही देंगी। उन्होंने कहा कि आज शाम से ही इसकी रीडिंग शुरू कर देते हैं। रुख़साना ने कहा कि जब प्रॉपर रिहर्सल शुरू हो जाए तो वह भी उनके साथ रहेगी। वह आज की रीडिंग में भी रहना चाहती थी, लेकिन किसी वजह से घर लौटना उसे ज़रूरी लग रहा था।
घर लौट कर अपने फ़्लैट की सीढ़ियां चढ़ते वह अचानक ठिठक गई। उसे कोई चोर-निगाहों से देख रहा था। यह तो सोसाइटी के प्रेसिडेंट का बेटा है। उस तक यह बात पहुंच चुकी थी कि शायद इसी ने पत्थर फेंका था। वह एक लम्हे को डर गई। इसका इरादा क्या है? कहीं वह चाकू-वाकू लेकर तो नहीं खड़ा है? क्या करना चाहता है वह? उसे लगा कि वह सीढ़ियों पर न जाए। वह मुड़ी भी। अचानक उसकी निगाह उस लड़के की निगाह से टकरा गई। वह कुछ अनिश्चय में दिख रहा था। जैसे यह समझना चाहता हो कि रुखसाना क्या सोच रही थी। लेकिन रुख़साना कुछ सोच नहीं रही थी। ऐसे मौक़ों पर अचानक कुछ अप्रत्याशित कर गुज़रने वाला कोई उसके भीतर सक्रिय हो जाता है- चाहे डर से या चौकन्नेपन से या फिर विरोध को न सहने की इच्छा के नतीजे से। उसके भीतर का वह बटन फिर दब चुका था। वह लड़के को टोक रही थी- ‘तुम्हारा नाम राकेश है न?’ लड़का बुरी तरह घबरा गया था। उसने बस मुंडी हिलाई- हां। ‘तुमसे कुछ बात करनी है, ऊपर आओ’. अपने भीतर के कंपन के बावजूद अपनी आवाज़ की स्थिरता से वह ख़ुद हैरान थी। जैसे वह उससे अनुरोध न कर रही हो, उसे आदेश दे रही हो, जैसे यह उसका छात्र हो।
लड़का प्रतिरोध तक नहीं कर सका। उसने एक बार इधर-उधर देखा। कुछ परेशान सा हो गया। लेकिन पीछे-पीछे चला आया। फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही बंद कमरे की मुसमुसाई हवा बाहर आई। रुख़साना ने जल्दी से खिड़कियों के परदे हटाए, एक दरवाज़ा खुला छोड़ा और राकेश को बैठने का इशारा किया। कुछ न समझ पा रहा राकेश हिचकता हुआ सोफे पर एक किनारे बैठ गया।
“क्या करते हो तुम?”
‘पढ़ता हूं- अगले साल ट्वेल्थ देना है।‘ वह सहमने और अकड़ने के बीच की अजीब सी मुद्रा में फंसा हुआ बोल रहा था।
‘अच्छा।‘ अब रुखसाना ख़ुद पर नियंत्रण पा चुकी थी। ऐसे अवसरों पर उसकी आवाज कुछ कोमल हो जाती है- ‘अरे वाह! साइंस?”
‘जी, आगे आइआइटी का एग्ज़ाम देना है। कोचिंग भी कर रहा हूं।‘ उसकी आवाज़ में भी एक छात्र चला आया था।
राकेश इस कोशिश में था कि वह ख़ुद को बहुत पढ़ने-लिखने वाला बच्चा साबित करे। वह इधर-उधर देख रहा था। कमरे में एक कोने पर रखे गिटार पर उसकी नज़र टिकी हुई थी।
‘अच्छा, तब तो बिल्कुल समय नहीं मिलता होगा तुम्हें खेलने-कूदने के लिए?’ रुख़साना ने उसे गिटार की ओर देखते हुए देखा तो पूछ बैठी- ‘म्यूज़िक में इंटरेस्ट है?’
‘हां, दो साल पहले तक गिटार सीख रहा था। सर आते थे।‘ वह सिर झुकाए बोल रहा था।
‘अरे वाह, चलो बजा कर दिखाओ।“ अचानक वह उठ खड़ी हुई, उसने एक झाड़न लेकर गिटार को पोछा और चमकाया और मुस्कुराती हुई लड़के को देने लगी।
लड़के ने हिचकते हुए गिटार संभाला, लेकिन फिर कहा- ‘ज्यादा नहीं सीखा था, बस कुछ फिल्मी धुनें।“
‘हां-हां, वही बजाओ।“
लड़के ने हिचकते हुए गिटार बजाना शुरू किया। यह जाना-पहचाना गीत था- ‘किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार, मिल सके तो ले किसी का दर्द उधार।‘
तब तक फ्रिज से कोल्ड ड्रिंक निकाल कर दो गिलासों में ढालती हुई रुखसाना उसके पास आ खड़ी हुई, गुनगुनाती हुई- ‘जीना इसी का नाम है।‘
लड़के का हाथ रुक चुका था. वह संकोच के साथ रुख़साना को देख रहा था। रुखसाना ने हंस कर कहा- ‘क्या राकेश, जीना इसी का नाम है?’ वह कुछ और बोल नहीं सका। ‘कुछ और सुनाओ।‘ उसने फिर बजाना शुरू किया, ‘दम मारो दम..मिट जाए ग़म।“
रुखसाना हंसने लगी- ‘अरे ये गाने तो मेरे जमाने के हैं। हम लोग गाया करते थे- दुनिया ने हमको दिया क्या, दुनिया ने हमसे लिया क्या, तुम्हें भी अच्छे लगते हैं?’
राकेश ने फिर मुंह खोला, ‘नहीं, सर ने यही सिखाया था, बोला था कि पहले ये सीख लो उसके बाद इधर के गाने।“
‘हूं, तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा राकेश।‘
राकेश चुप रहा। अमूमन उसकी आंखों में दिखने वाली हेठी अभी गायब थी और उसकी जगह उलझन थी।
‘चलो आते रहना। देखो न, कल किसी ने पत्थर मार कर घर का शीशा तोड़ दिया। परेशान थी बहुत। अकेली रहती हूं तो ज़्यादा डर लगता है। तुमसे मिलकर राहत मिली। और हां, कहीं भी निकलो तो मास्क ज़रूर ले लिया करो। अभी कोरोना गया नहीं है बच्चे।‘ उसने मुस्कुरा कर उसे विदा किया।
लेकिन उसके बाद वह उदास हो गई। इस किशोर के भीतर कौन भर रहा है इतनी नफ़रत? यह गिटार बजाने वाला, इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा लड़का अचानक उसको अपना दुश्मन कैसे मानने लगा? उसने सिर झटक दिया। सारी चीज़ों के बावजूद राकेश के साथ इस संक्षिप्त संवाद पर वह स्वयं पर ख़ुश थी। जैसे उसने अपने आततायी को शर्मिंदा कर दिया हो।
आने वाले दिन उदासियो, सवालों, उम्मीदों और अनिश्चय से भरे थे। सोसाइटी में उसको लेकर चल रहा विमर्श जैसे ख़त्म नहीं हो रहा था। मकान मालिक का फोन फिर आया था- इस बार उसने घर ख़ाली करने को तो नहीं कहा, लेकिन सावधान रहने का इशारा ज़रूर किया। इसके अलावा रात को आते-जाते लड़के उसे दिखते थे, लेकिन पत्थर या कुछ भी फेंकने की घटना नहीं हुई। उधर कॉलेज में अलग विवाद हो रहा था। लड़के रिहर्सल करते-करते उसे मांज रहे थे। लेकिन अचानक प्रिंसिपल को पता चल गया था कि नाटक में लव जेहाद और सीएए जैसे मुद्दे हैं तो वह भड़क उठीं। कहा कि ऐसा नाटक नहीं होगा। इसको लेकर तीखी बहस चली। एक बार लगा कि नाटक रुक जाएगा। गनीमत बस यही रही कि इस मौके पर विभाग ने उसका साथ दिया और छात्रों ने भी। सबने समझाया कि इसमें कोई विवादास्पद बात नहीं है, अंत में नाटक सद्भावना का संदेश देता है।
तो आखिरकार नाटक भी आगे बढ़ता रहा और जीवन भी। पत्थर फिलहाल पीछे छूटा हुआ था, लेकिन उसके क़रीबी लगातार दबाव बना रहे थे कि वह अब जगह बदले। कोई नया मकान देखे। वे याद दिला रहे थे कि वह किराया भी ज़्यादा दे रही है, जबकि कोरोना के बाद मकानों के किराये और घटे हैं। रुख़साना भी उस तरफ़ सोच रही थी। पत्थर प्रसंग ने उसका मन खट्टा कर दिया था। उसे इस बात का दुख था कि सोसाइटी ने उसे अकेला ही नहीं छोड़ दिया, एक तरह से उसे ही गुनहगार ठहराने की कोशिश की। सोसाइटी के सफ़ाईकर्मी, प्लंबर आदि आकर उसे बताते कि उसके बारे में कौन क्या बोल रहा है। बस वह नाटक ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही थी।
…………….
नाटक का दिन आ पहुंचा। सुबह-सुबह वह फिर अपना नाटक पलटती रही। अपने किरदारों से मिलती रही। उसे याद आती रहीं वे घटनाएं जिनकी वजह से नाटक को यह शक्ल मिली। कभी उदासी ने घेरा, कभी सुकून ने। लव जेहाद वाले जोड़े ने कहा, थैंक्यू दीदी, और वह मुस्कुराई, क्या उसने वाकई इस जोड़े की कल्पना अपने छोटे भाई या छोटी बहन के तौर पर की थी? उसने ऐसा सोचा तो नहीं था। कहां से चला आता है ऐसा भाईचारा या बहनापा?
नाटक छह बजे से था। छात्रों में इस नाटक को लेकर बहुत उत्साह है। उसके कुछ छात्र इस सोसाइटी में भी रहते हैं। उन्होंने भी उसी वजह से यहां मकान किराये पर लिया है जिस वजह से रुख़साना ने लिया है- कॉलेज सोसाइटी से बहुत करीब है। हालांकि इन सबसे उसका बहुत संवाद नहीं है। चार लड़कियां हैं जो कभी-कभी सामने पड़ जाने पर ‘विश’ कर देती हैं। उनका इतिहास से नहीं, विज्ञान या अंग्रेज़ी से वास्ता है। कुछ और छात्र भी हैं जो उससे कन्नी काटते हैं। पता नहीं, उनमें कुछ राकेश के दोस्त भी हों।
ख़ैर, अभी यह सब सोचने की फ़ुरसत नहीं है। उसे पहले ही कॉलेज पहुंचना है। वह तीन बजे के आसपास ही कॉलेज पहुंच गई। कॉलेज सजा-संवरा लग रहा था। तैयारी हो चुकी थी। छात्रों का फ़ाइनल रिहर्सल जारी था। सब मैम को आया देख खुश हुए। सब अपनी-अपनी पोशाक जांच रहे थे। कुछ मेकअप की तैयारी में लगे थे- एक-दूसरे का मजाक भी बना रहे थे।
रुखसाना इतनी ख़ुश आख़िरी बार कब हुई थी, उसे याद नहीं था। वह जो कहना चाह रही थी, वह समवेत स्वरों में बाहर आएगा।
गहमागहमी बढ़ती जा रही थी। उसने समय देखा। साढ़े पांच बज चुके थे। उसने कलाकारों को आखिरी बार बेस्ट ऑफ लक कहा और दर्शक दीर्घा की ओर बढ़ने लगी।
तब तक दौड़ी-दौड़ी सूत्रधार आई- “मैम, बहुत अच्छा नाटक है। आख़िरी दृश्य आते-आते मुझे डर लगता है कि मैं रोने न लगूं। लगता है, मैं भी आपके साथ बेआसरा हूं।‘ उसकी आंखों में पानी की कोर चमक रही थी। रुख़साना हैरान रह गई। इस लड़की ने नाटक में उसको भी खोज लिया? जान गई कि यह वही है जो बेआसरा है? और वह खुद भी बेआसरा हो गई?
उसकी भी आंख भर आई। वह कुछ कह न सकी, बस उसने लड़की के माथे पर हाथ फेरा।
अब वह दर्शक दीर्घा में थी। शुरुआती दीप प्रज्वलन, कुलपति महोदय के स्वागत और प्रिंसिपल साहब के बाद नाटक शुरू हो रहा था। हॉल की रोशनियां बुझ चुकी थीं- सब अंधेरे में थे। मंच भी अंधेरे में था। धीरे-धीरे रोशनी फूटी, धीरे-धीरे एक चेहरा दिखा, धीरे-धीरे एक आवाज़ सुनाई पड़ने लगी- यह सूत्रधार थी- बताती हुई कि यह नाटक नहीं जीवन है। उसकी आवाज़ में एक तराश है जो जैसे सबको बांध ले रही है। नाटक बढ़ता जा रहा था। बीच की बहुत हल्की खुसफुसाहटों के अलावा बस एक चुप्पी थी जो बता रही थी कि सब लोग नाटक का हिस्सा बन रहे हैं। जब एक पत्थर चला तो किसी ने दर्शक दीर्घा से कहा- आह। जैसे-जैसे नाटक बढ़ता जा रहा था, वैसे-वैसे रुख़साना के दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। वह चोरी-छुपे लोगों के चेहरों पर उनकी प्रतिक्रिया देखने की कोशिश कर रही थी। उसे लग रहा था, क्या लोग नाटक में उसे पहचान लेंगे? क्या वे अपने-आप को पहचान लेंगे? वे शर्मिंदा होंगे या नाराज़? अचानक उसे खयाल आया, कई नाटकों में तोड़फोड़ की घटनाएं होती रही हैं। कहीं यहां भी कोई बीच में उठ कर हंगामा न करे। लेकिन यहां नहीं होगा। यह तो उसका कॉलेज है।
इसी उधेड़बुन में नाटक निकलता जा रहा था। लड़कों के अभिनय में कुछ कच्चापन था। वह पेशेवर तराश नहीं थी जो थिएटर समूहों के नाटकों में होती है। लेकिन जैसे एक तरह का अनगढ़पन ही उसे वास्तविक बना रहा था।
और अब बिल्कुल आख़िरी दृश्य था। सूत्रधार की चाकू जैसी आवाज़ एक हल्की हिचक के साथ शुरू हो चुकी थी- ‘अब मैं ये नाटक भी छोड़ रही हूं और ये मुल्क भी। कहां जाऊंगी, पता नहीं। दुनिया में बहुत सारे बेआसरा लोग रहते हैं। ध्यान से देखिए तो ये दुनिया बेआसरा लोगों से बनी है। मुझे वही लोग आसरा देंगे। अलविदा।‘ यह ठीक वैसा नहीं था जैसा उसने लिखते हुए कल्पना की थी। मंच पर गहरी लाल रोशनी बस उसी पर फोकस कर रही थी। धीरे-धीरे पहले गाढ़ी और फिर मद्धिम होती रोशनी। बस अब अलविदा बोल कर वह फ्रीज हो जाएगी। और नाटक ख़त्म। लेकिन यह क्या, वह रो रही है, रोए जा रही है जार-जार। लाइट्समैन जैसे लाइट बुझाना भूल गया है। यह कैसा इंप्रोवाइज़ेशन है? अचानक उसने देखा, बाक़ी सारे कलाकार कतार में उसके पास पहुंच रहे हैं। निर्देशक भी उसकी पीठ थपथपा रही है। इसके बाद बत्ती बुझ गई है।
कुछ सेकेंड जैसे हर तरफ़ अंधेरा रहा। जैसे इस अंधेरे में सब बेसुध हो गए हों। और फिर ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट और वापस लौटती रोशनियों से जगमगाता मंच और अपनी दुनिया में लौटती दर्शक दीर्घा।
मंच पर रुख़साना का नाम पुकारा जा रहा था। कलाकारों के परिचय के बाद लेखक का परिचय हो रहा था। लेकिन उसे तो सब जानते हैं। वह भी बहुत सारे लोगों को जानती है। उसने दर्शक दीर्घा में देखने की कोशिश की। हैरान रह गई- उसकी सोसाइटी में रहने वाली कुछ लड़कियां भी थीं- उसकी ओर हाथ हिलाती हुई।
……………..
वह जैसे किसी खुमार में डूबी घर लौटी थी। दुनिया की सारी फ़िक्रें जैसे मिट गई थीं। उसका नाटक खेला गया, उसकी ज़िंदगी का नाटक – जिसमें उसने अपनी हताशा, अपना गुस्सा सब उंडेल दिया था।
लेकिन फ्लैट में दाख़िल होने के बाद वह दुनिया जैसे लौट आई थी जिसका उसने अपने नाटक से कुछ स्थगित कर दिया था। अब वह बहुत सारे सवालों से फिर घिरी थी। कमरे में टूटे हुए शीशे की जगह लगा हुआ नया शीशा अपने साफ-सुथरेपन के बावजूद बेमेल लग रहा था- याद दिलाता हुआ कि सारी झाड़ पोंछ के बावजूद वह यहां बेमेल है।
लेकिन वह कहां बेमेल नहीं है? पत्थर तो उसे हर जगह खाने हैं। कहीं रिवायत पत्थर मारती है, कहीं आधुनिकता पत्थर मारती है। कहीं मोहल्ले के जानने वाले मारते हैं, कहीं अनजान लोग बाइक से मार कर भाग जाते हैं। उसका मन फिर खट्टा सा हुआ। लेकिन थकान इतनी थी कि वह सो गई।
सुबह नींद फोन की घंटी से टूटी। उसने फोन उठाया तो उधर मकान मालिक था। उसने कहीं से उड़ती हुई अफवाह सुनी थी कि वह नया घर देख रही है। वह गुज़ारिश कर रहा था कि रुख़साना उसके फ्लैट में बनी रहे- ‘आपको आगे से कोई तंग नहीं करेगा। मैंने सेक्रेटरी को डांटा है। उन्होंने भी कहा है कि वे ध्यान रखेंगे।‘
रुख़साना को मालूम था कि इस गुज़ारिश के पीछे विनयशीलता से ज़्यादा कोरोना के बाद लग रही पैसे की चपत है। वह मकान ख़ाली कर जाएगी तो तत्काल किराये लगेगा भी नहीं। लेकिन वह तय कर चुकी थी कि वह निकल जाएगी। अब मामला पत्थर और फ्लैट का नहीं रहा था, नाटक के उस किरदार का हो चुका था जो वह बन गई थी। उसके लिए सूत्रधार बनी अल्पना मंच पर रोई है। वह ख़ुद को बेआसरा मानती है। उसने कहा है कि वह सबकुछ छोड़ देगी। वह उसे कैसे धोखा दे सकती है?
तैयार होकर वह चाय बना रही थी। सोचती हुई कि आगे क्या करेगी। लेकिन फिर फ्लैट के बाहर उसे कई आवाज़ें सुनाई पड़ीं। फिर बेल बजी। उसने दरवाज़ा खोला तो हैरान रह गई। दस-बारह लड़के-लड़कियां एक साथ उसके कमरे में आ गए थे। ये तो उसके नाटक के किरदार हैं- यानी कलाकार, जो महीने भर से उसके बनाए किरदारों को जी रहे हैं। सूत्रधार भी चली आई है- वही जो रो रही थी। इनमें वे लड़कियां भी शामिल हैं जो यहां रहती हैं। सूत्रधार ने फिर सूत्र संभाला- ‘मैम, आप कहीं नहीं जा रही हैं।‘
‘यानी?’
‘यानी हमें मालूम है कि आपको कुछ लोग सोसाइटी से निकालना चाहते थे। आपके घर पत्थर फेंका था। आप बाहर घर खोज रही हैं।“
वह हैरान सी उन्हें देखती रही। अब कोरस की तरह स्वर जुड़ रहे थे- प्लीज़ मैम, कहीं मत जाइए, यहीं रहिए, यहीं रहिए, यहीं रहिए।
एक ने याद दिलाया- ‘आपने ही नाटक में लिखा है मैम, पत्थर चलाने वाले जीत नहीं पाएंगे।‘
वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। आंखें धुंधली सी हो रही थीं। उसने पाया कि एक शख़्स सबसे पीछे चुपचाप खड़ा है। यह तो राकेश है। वह भी कांपते होंठों से कुछ कहने की कोशिश कर रहा था।
रुख़साना ने कुछ नहीं कहा। बस बांहें फैलाई, जैसे सबको गले लगाने के लिए बुला रही हो। उसने पाया कि उसकी बांहें इतनी बड़ी हो गई हैं कि उसमें सब समा गए हैं।
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