Wednesday, February 11, 2026
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रेखा राजवंशी की कविताएँ

1. सहमी हुई आँखों में
सहमी हुई आँखों में
चमक नहीं होती
सितारों की।
ख़्वाब नहीं होते
आसमाँ छूने के।
शांति नहीं होती
नदी की।
लोरियाँ नहीं होतीं
धमाके होते हैं
बम के।
बारिशें नहीं
मिसाइलें बरसती हैं
रक्त की।
सहमी हुई आँखों में
बस होती है
दहशत
कि आ सकते हैं
वे किसी भी वक्त
और एक गोली
चीर सकती है
उनका सीना
आखिर
युद्ध भूमि में जीना
भी है कोई जीना?
2. उम्मीद
एक लड़की
हर सुबह खंडहरों में
गुलाबी हिज़ाब पहनकर
निकलती है
अपने खोए हुए
भाई की तलाश में।
वह जानती है कि शायद
वह उसे कभी न मिले,
किस्मत से कि खुदा से
किससे करती गिले
अब भी दिल के कोने में
एक रौशनी बाकी है
सच है
प्रेम कभी-कभी,
उम्मीद के रूप में
जीना सीख लेता है।
3. जब युद्ध अपरिहार्य हो
महाभारत के युद्ध में
कृष्ण ने अर्जुन से कहा
पार्थ !
जब युद्ध अपरिहार्य हो
तो कदापि न डरो
शस्त्र उठाओ
और युद्ध करो
वर्तमान ही सत्य है
बाकी सब मिथ्या है
अपने न अपने हैं
पराए न पराए
सब शरीर धारण कर
इस धरती पर आए
अब युद्ध अपरिहार्य है
तो अधर्म का नाश
हमारा कर्म है
सत्य मार्ग अपनाना
ही अपना धर्म है
युद्ध प्रेम नहीं
रक्त मांगता है
युद्ध हर रिश्ते की
सीमा लांघता है
युद्ध में कोई अपना
कोई पराया नहीं
युद्ध करो पार्थ
अगर वही हो सही
हे पार्थ
बस इतना जान लो
मेरी यह बात
गाँठ बाँध लो
जीवन क्षण-भंगुर है
शरीर नश्वर है
आत्मा ही सत्य है
आत्मा ही अमर है !
तो पार्थ !
कदापि न डरो
शस्त्र उठाओ
और युद्ध करो !

रेखा राजवंशी, ऑस्ट्रेलिया
Email: [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. रेखा जी!

    आपकी तीनों ही कविताएँ युद्ध से जुड़ी हुई है।

    हर कविता एक दृश्य और एक दर्द लेकर चल रही है।
    आँखों का सहमना जीवन की स्थितियों और परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।
    जहाँ अनिश्चितता की स्थिति में असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। कोई राह नजर नहीं आती, और कुछ समझ नहीं पाते वही आँखों में सहमने का भाव नज़र आता है।
    युद्ध की स्थिति में मौत का खौफ़ सामने रहता है।
    युद्ध भूमि में जीना आसान नहीं रहता। जीवन ही दाँव पर लगा रहता है अस्ति और नास्ति की दुविधा में!

    आपकी कविता का प्रसंग बहुत मार्मिक है।
    खोए हुए लोगों के लौटने की उम्मीद अंत तक खत्म नहीं होती।

    गुप्त जी की कविता में एक पंक्ति है जिसमें यशोधरा अपनी सखी से कहती “आशा से आकाश थमा है”
    पर इस कविता को पढ़ाते हुए अनायास ही महादेवी वर्मा का रेखाचित्र “चीनी फेरीवाला” याद आ गया!
    महादेवी वर्मा को अपनी कहानी सुनाते हुए उसने बताया था कि जब छोटा था और सौतेली माँ की वजह सेp बहन घर छोड़ कर चली जाती है या उसे कोई ले जाता है यह नहीं जानता था पर किसी भी लड़की को अपनी बहन समझ कर वह उसके पीछे दौड़ने लगता था।
    उम्मीद इंसान में कितना भरोसा जगाकर रखती है।
    यहाँ पर बहन को भाई का इंतजार है।

    तीसरी कविता सच है।
    यह सही है कि यहां तक हो सके युद्ध को डालना चाहिए लेकिन अगर युद्ध अनिवार्य हो जाता है तो फिर उससे पीछे नहीं हटना चाहिये।

    प्रारंभ की दोनों ही कविताएँ बहुत मार्मिक लगीं लेकिन युद्ध की यही सच्चाई है।

    प्रेम बेशकीमती है, लेकिन पता नहीं इंसान क्यों ईर्ष्या और द्वेष के दीवारों के बीच दुश्मनी को मापता है।
    तीनों ही कविताएँ काफी अच्छी हैं। आपको बहुत-बहुत बधाई ।
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।

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