Tuesday, March 17, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती (भाग – 21 और 22)

भाग – 21
रास्ते के काँटे बटोरती रमकल्लो

प्राननाथ,
तुम्हारे बिना इस देह से मोह खत्म होने लगा है। जीवन का मूल उद्देश्य क्या है, इस पर चिन्तन करने लगी हूँ। सोचती हूँ कि यह संसार पेट-प्रजनन के घेरे को तोड़ने में कभी सफल हो पाएगा? मुझे नहीं लगता है कि इस आपाधापी में ऐसा संभव हो सकता है। विकास… विकास सब जगह यही कउआ-रोर मचा हुआ है। भौतिक विकास की विरोधी नहीं हूँ मैं, … मैं विकास के साथ मानवीय गुणों का प्रस्फुटन चाहती हूँ। मानव इसके उलट आचरण करके अपने को बलशाली मान रहा है। गाँव-घर से लेकर दुनिया में कमोवेश यही हालत है। जहाँ जिसका स्वार्थ नहीं निकलता, वहाँ उसे जड़-मूल से उखाड़ देना चाहता है। सारी दुनिया स्वार्थ में अंधी हुई जा रही है।
मखना कक्का का ही हाल सुन लो। उनके कारनामे पूँछ गधइया से है। उनकी बहू ने तीसरी बार बेटी को जन्म दिया, तो घर में भूचाल आ गया। वे चाहते थे कि दो पोतियों के ऊपर एक पोता हो जाए, तो गंगा नहा लें। बहू ने उन्हें गंगा नहाने का अवसर न दिया। वे झुंझलाए हुए हैं। सोर में पड़ी बहू को हमेशा के लिए मायके भेजना चाहते थे पर बहू उनकी महत्वाकांक्षी योजना को समझ गई थी। वह टस से मस न हुई। कह रही थी जिज्जी, चाहे मर जाऊँ पर बाहर पैर न रखूँगी।
प्राननाथ, उन्हें लगता है कि स्त्री के कारण बच्चे का लिंग निर्धारण होता है। बेशऊर धरे, पढ़े-लिखे थोड़े हैं। पढ़े होते, तो उन्हें मालूम होता कि लिंग निर्धारण पुरुष से होता है। स्त्री इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। इन मूढ़मगजों को कौन समझाए।
वे चाहते हैं कि बहू यहाँ से चली जाए, तो कलुआ का दूसरा ब्याह कर लें। पहली पत्नी के रहते, दूसरा ब्याह कैसे कर लेंगे? मैंने मखना से कहा कि कक्का, बहू को छोड़ना आसान नहीं है, दूसरे ब्याह की तो सोचना ही नहीं। जेल में सड़ना हो तो खूब मन की करते रहो।
मेरे कहे पर उन्हें ततइयाँ-सी लग गई। काकी तो नंगी नाचने लगी। एक साँस में अठत्तर पढ़ गई। उसने सारा आरोप मुझ पर मढ़ दिया, “तू ही हमारी बहू को भरमा रही है, नहीं तो वह इतनी न बमकती। एक के बदले वह चार सुनाती है।”
मैं डरती थोड़े हूँ। मैंने साफ कह दिया, “काकी मैं भरमा नहीं रही हूँ; तुम ही उसे बरबाद करना चाहते हो। तुम लड़का-लड़की में भेद करती हो। जिस घर से लड़का आता है, उसी घर से लड़की भी। लड़का-लड़की बरोबर।”
प्राननाथ, उसे बहुत बुरा लगा। मैंने उसकी दुखती रंग पर हाथ धर दिया था। वह मुझ पर गुर्रा पड़ी,” काए री! लड़का-लड़की बरोबर कहाँ होत? लड़का से वंश चलत, लड़की से का चलत? वह तो दूसरे वंश का नाव रोशन करत।”
अब बताव ले, इन्हें को समझा सकत। डुकरियों ने भी उसकी बात का समर्थन कर दिया। मेरी बात हेटी हो गई थी। गुस्सा में, मैंने भी कह दिया कि बहू अगर थाने में एफ.आई.आर. लिखा आई, तो पुलिस घर भर को अफरा देगी। पुलिस इन डुकरियों को भी जीप में धर ले जाएगी।
अए-हए… पुलिस का नाम सुनकर डुकरियाँ पसीना फेंक गईं। उन्होंने पल भर में पाला बदल ली। काकी अकेले कलपने लगी, “हाय रे! यह रमकल्लो हमारी रपोट लिखवा रही है। बहू थाना-अदालत का जाने, यही उसे भड़का रही है।” उसके मुँह से झाग निकल रहे थे, “अपना बेनाथ-पगहिया की है, इसे कौन काऊ को डर-भय है। बिना खसम की छुट्टा साड़नी-सी घूम रही है। खसम होता तो यह कुतिया-सी काँय-काँय न कर पाती। रोज थुथरी गुधलती सो अपने आप काँय-काँय बन्द हो जाती।”
मखना की दाई मुझे खसम खसम करती है। मेरे आदमी की क्या बात करती है। उसे देखकर लोग दाँतों तले उंगली दबा लेते हैं। मेरा आदमी ऐसा दकियानूसी नहीं है।
पोतियों के आने से घर भर के मानसून गड्डड्बड्ड हो गए। दहेज के डर से अंडा सिटपिटा रहे हैं। कौन पीले चावल देता कि दहेज देकर ब्याह करो। उन्हें पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा कर दो। सारे सोग-दोख मिट जाएँगे।
मुझसे बात करती है, धरी गिंधुली है। शौच के लिए बाहर-गाँव जाती है। आती है तो नाद में हाथ बोर देती है। सोचती है कि हाथ साफ हो गए। साबुन नहीं खरीद पाती है और डाक्टरों को हजारों दे आती है। उसके हाथ का खाना नई पुशात। जब कभी उसके यहाँ खाना खाने जाना पड़ता है, तो यही शंका बनी रहती है कि शौच के बाद हाथ धोए होंगे या ऐसे ही आटा गूँथ दिया होगा। उस समय कौर भीतर को ठेलते हैं, तो बाहर को निकलता है। बताव, इनके ऐसे लच्छनों से कैसे खाना हिताएगा?
गाँव में इसके जैसे और भी लोग हैं। कुछ कहो, तो कुतर्क करने लगते हैं। इन कुतर्कों से लोग सहमत भी हो जाते हैं। यहाँ का सबसे बड़ा शत्रु आलस है। शौच से लौटकर आती हैं, तो रास्ते में ही पंचायत लगा लेती हैं, यह पंचायत घंटों चलती है। इतने अन्तराल में ये साफ-सफाई भूल जाती है।
प्राननाथ, आपको ऐसा तो नहीं लगता है कि मैं उपदेश झाड़ रही हूँ। बुरा मत मानना, चिल्लर सर का असर आ गया है। क्या करूँ, जो कुछ जान-समझ पाती हूँ, वही तुम्हें लिख देती हूँ।
एक बात और बताऊँ प्राननाथ, मैं होशियार हो गई हूँ। चिल्लर सर कहते हैं कि रमकल्लो तू अच्छी बातें करती है। किताबें पढ़ने से ज्ञान मिलता है। विद्वानों के अनुभव इन्हीं किताबों में तो लिखे रहते हैं। अनुभवों से ही निरन्तर बदलाव हो रहे हैं। बदलाव जरूरी है। बदलाव न हो, तो दुनिया बेरंग हो जाए। इसी से तो कहा जाता है-“परिवर्तन जिन्दाबाद।”
प्राननाथ परिवर्तन मैं भी चाहती हूँ। संयोग के बाद वियोग और वियोग के बाद पुनः संयोग। आ जाइए, संयोग बन जाए।
आपकी
रमकल्लो
_________________________________________________________________________
भाग – 22

लौट आया परदेसी

प्राननाथ,
आ गए तुम। मैं जानती थी कि तुम आओगे। मेरी भेजी पातियाँ तुम्हें मिल गईं होंगी। तभी तो मेरे दिल की पुकार सुनकर दौड़े चले आए। तुम नहीं जानते प्राननाथ कि आज मैं कितनी खुश हूँ। तुम्हारे दर्शन से मेरी झोली खुशियों से भर गई।
मुझे तुमसे शिकायत है, इतनी चिट्ठियाँ भेजी, तुमने एक का भी जवाब नहीं दिया। एक ही चिट्ठी भेज देते, तो दिल को सुकून मिल जाता। ऊँच-नीच का भाव न रखना, बराबर की हकदार हूँ। एक कदम मैं बढ़ाऊँ, तो एक आप भी बढ़ाइये। पत्नी हूँ, गैर नहीं। ये न समझना कि मैं रो-डीपकर बैठ जाऊँगी। पीछा नहीं छोड़ूंगी। तुमसे प्रेम करती हूँ, तो अधिकार भी रखती हूँ। बंधन में बंधे हो तो साथ चलना पड़ेगा।
मैं भी क्या लेकर बैठ गई। तुम इतने दिनों बाद तो आए हो। राजी-खुशी कुछ नहीं, अपना रोना लेकर बैठ गई। देखो तो कितने दुबले हो गए हो, वहाँ खाना नहीं मिलता था क्या? मैं जानती हूँ कि तुम मेरी याद में दुबले हुए हो। तुम बेकार चिन्ता करते रहे, अपनी राजी-खुशी लिख तो देती थी मैं। कुछ परेशानियाँ आई थीं, पर मैंने उन्हें अपने तरीके से निपटा लिया। ठीक रहा, तुम आ गए। भैंस का दूध पिलाकर वैसा ही हट्टा-कट्टा बना दूँगी। मालिश से फिर वैसे ही गबड़ू जवान दिखने लगोगे। भाँति-भाँति का खाना बनाकर खिलाऊँगी। परदेस में उल्टा सीधा खाते रहे, तभी तो देह सूखकर ठठेरा हो गई। कहाव, आलस में खाना ही न बनाते हो। तुम्हारी दर-मुद्दत थोड़े हैं। कमाने का मतलब यह नहीं है कि पैसा जोड़ते रहो और खाओ कुछ न। खाओगे नहीं तो कमाओगे कैसे ?
प्राननाथ, तुम नाराज हो क्या? मुस्कुरा तो दो। तुम्हारी मुस्कान से मैं तृप्त हो जाऊँगी। परेशानियों की चिन्ता छोड़ो, मैं हूँ न। सब ठीक कर दूँगी। गाँव भर की औरतें
कह रही थीं कि तुम नहीं आओगे किन्तु मुझे पूरा विश्वास था। वर्षों की तपस्या ऐसे थोड़े भ्रष्ट हो जाएगी।
तुम्हें अब कुछ नहीं करना है। खेती करना और भैंस देखते रहना। बाकी का मैं संभाल लूँगी। जब तुम नहीं थे, तब दिन भर मैं अकेली नाचती रहती थी और शाम को थककर चारपाई पर ढह जाती। घंटों तुम्हारी याद में आँखें डबडबाती रहतीं। सारे दुख मिट गए। अब हम दोनों जिन्दगी के सुनहरे सपनों को परवान चढ़ाएँगे।
तुम्हारा सामान कहाँ है? बाहर छोड़ आए क्या? मुझसे मिलने की उतावली में सब कुछ भूल गए? तुम्हारे कपड़े फटे हुए क्यों हैं? ओह! रास्ते में जेब कट गई? यह जहरखुरानियों की करतूत है। मैंने तुम्हें इतना समझाया था कि भलू, रास्ते में किसी का खाने-पीने का सामान न छूना। तुमने एक न सुनी। मेरी बातों को तुम गंभीरता से नहीं लेते हो। सोचते होगे, औरत है, बोलती ज्यादा है। मेरी सीख मान ली होती, तो इस दुर्घटना से बच जाते। अब इन बातों का रंज न करो, तुम सुरक्षित लौट आए, मेरे लिए यही बहुत है। रुपये चले गए, तो चले जाने दो। कौन हम भूखों मर रहे हैं? सच कहती हूँ, मुझे रुपयों की तमन्ना नहीं है। रुपये तो हाथ का मैल हैं, फिर कमा लेंगे।
मेरी बातें सुनकर वे मुस्कुरा उठे। मैंने उन्हें बाँहों में भर लिया। अभी खोए-खोए से थे; अब कैसे मुस्करा रहे हैं। उन्होंने मुझे चूम लिया। मैं आनन्द विभोर हो उठी। देखो कैसी बरजोरी पर उतर आए हैं। उनकी बरजोरी मुझे अच्छी लगती है पर मैं जान बूझकर उनसे अलग हो जाती हूँ। वे मुझे पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। मैं हवा में उड़ने लगती हूँ। बागों की सैर करते हुए रंगीन फूलों को चुन-चुनकर उन पर न्योछावर कर देती हूँ।
ये पुष्प गीले क्यों हैं? गीलापन मेरी देह को भिगो रहा है। मैं भीग चुकी हूँ। अचानक मैं हड़बड़ाकर उठकर बैठ जाती हूँ। कमरे में अंधेरा था। मैंने अंधेरे में टटोला, कोई नहीं था। कपड़े चिपचिपा रहे थे। मैं उठकर बाथरूम चली गई।
मुँह से अनायास निकल पड़ा, “रात को भी सोने नहीं देते हैं। आने दो, ऐसी खबर लूँगी कि सारी हरकतें भूल जाएँगे।
सुबह रोहू लला मिल गए थे। मेरा चेहरा देखकर कह रहे थे कि भौजी मुँह उसवाना है? रात को सोई नहीं क्या ?
मैं क्या बताती कि रात में तुम आए थे? मुझे अपनी कौली में भरा था? बराबरी का है, ये बातें मैं उसे कैसे बताती? मैंने नहीं बताया।
प्राननाथ, एक बात पूछें? क्या मैं भी तुम्हारे सपनों में आती हूँ? बिलकुल आती होऊँगी। तुम बताते नहीं हो, न बताओ, जब तुम आओगे तो सब पूछ लूँगी।
और सब ठीक है, आनंद से रहना।
आपकी ही
रमकल्लो
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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7 टिप्पणी

  1. रमकल्लो इस पाती में कुछ दार्शनिक अंदाज में बतियाती नजर आई। हो भी क्यों नहीं, उसने शिक्षा के सूरज का ताबीज जो गले में टांँग रखा है। यही ताबीज गाँव में सदियों से धाक जमाए बैठे विसंगतियों और नाइंसाफियों के वीभत्स अंधेरों को ध्वस्त कर सकता है। इसीलिए रमकल्लो ‘परिवर्तन जिंदाबाद’ का नारा देती है। रमकल्लो की डिक्शनरी में परिवर्तन के मायने है- सत्यानाशी रूढ़ियों से मुक्ति। विकास की परिवर्तनकारी अवधारणा से उत्पन्न समूचे समाज की खुशहाली, लैंगिक समानता। स्त्री की अस्मिता को बंधक बनानेवाली सोच का खात्मा….
    अनेक मिथक तोड़ती यह पाती गाँव की उस तस्वीर से रूबरू कराती है जिसे लोग आज भी अनदेखा करते हैं।
    बतकही अंदाज में लिखी इस पाती में ढेर सारे ‘मजेदार’ देशज तथा ठेठ गँवई शब्द अपनी निचाट और विराट अर्थवत्ता लिए हुए हैं।
    कथाकार भाई लखनलाल पाल को उत्कृष्ट लेखन के लिए अनेक शुभकामनाएं और हार्दिक बधाई।

    रामशंकर भारती

  2. https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-pati-by-lakhan-lal-pal-21/

    हर गुजरते दिन के साथ रमकल्लो की पाती में भी बदलाव आ रहा है। ये दोनों 21 व 22 नंबर की पातियां उसकी गवाह हैं। वह जब से कॉलेज जाने लगी है और भी बुद्धिमान व मुखर हो गई है। मानवता के मूल्यों का आदर करती है। अब इस इक्कीसवीं पाती में ही देखिए कि मखना कक्का के यहाँ उनकी तीन पोतियां होने से उनके परिवार की ओछी सोच पर वह भड़की हुई प्रतीत हो रही है। उसके विचार क्रांतिकारी हैं। बेटियां क्यों भार होती हैं परिवार के लिये? यदि उन्हें मौका दिया जाये तो वह भी पढ़ लिखकर स्वाबलंबी हो सकती हैं। स्वच्छ मन की संवेदनशील रमकल्लो गांव में किसी के प्रति होते हुये अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर पाती है। बिना किसी की परवाह किये वह झांसी की रानी की तरह उनके लिए युद्ध के मैदान में उतर पड़ती है। हर किसी के लिये वह न्याय चाहती है। वह सोचती है कि बेटों और बेटियों में बिना भेद भाव किये यदि बेटियों को भी शिक्षित किया जाये तो वह भी समाज व परिवार में किसी पर भी भार नहीं रहेंगी। रमकल्लो स्वयं इस बात का उदाहरण है।

    और बाइसवीं पाती को पढ़ना शुरू करते ही लगने लगा था कि आखिरकार उसके प्राननाथ अब घर आ गये हैं। उम्मीद की किरणें बस फूट ही रही थीं वैसे ही झटका लगा कि यह सिर्फ एक सपना ही था जिसमें रमकल्लो अपने प्राननाथ से कुछ मीठी-मीठी और कभी झिड़की भरी बातें कर रही थी जैसे कि एक पत्नी अपने पति से करती है। वह गांव के कीचड़ में खिला हुआ एक ऐसा कमल है जो सबको अपने व्यवहार और साहस से अपनी मधुरिम आभा को गांव भर में बिखेरती रहती है। लोग उसकी बातों से और भी हतप्रभ होने लगे हैं। वह मानव अधिकारों के लिये कानून के दांव-पेचों से अब अवगत हो रही है। शिक्षा ने उस पर गहरा प्रभाव डाला है। अकेले का जीवन आसान नहीं होता है पर हे रमकल्लो तुम अपने प्राणनाथ की यादों में आत्मसात होकर अकेले ही कांटों के बीच चलना सीख रही हो।

    नारियों के लिये गर्व का
    प्रतीक हो तुम
    अपने ही लिये नहीं
    बल्कि औरों के लिये भी
    सीख हो तुम।

    लखनलाल जी, रमकल्लो की संरचना के लिये आपका धन्यवाद व हार्दिक शुभकामनाएं।

    -शन्नो अग्रवाल

    • आदरणीया शन्नो जी, आपने दोनों पातियों का सम्यक विवेचन किया है। इस विवेचन में रमकल्लो का चरित्र और उभरकर सामने आ गया है।
      सबसे बड़ी बात है कि आप रमकल्लो को नियमित अंक में पढ़ती ही नहीं बल्कि उस पर सटीक प्रतिक्रिया भी देती हैं।
      बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी

  3. सादर प्रणाम सर,
    इस बार रमकल्लो की भावनायें ज्यादा प्रबुद्ध और संवेदनशील लगीं यह शायद उसकी शिक्षा का असर है जो वह मुद्दों पर गहराई से चिंतन मनन करने लगी है। उसके सपनों में गांव का आदर्श रुप आकार ले रहा है।परिवेश में घुली मिली कुरीतियों और नकारात्मक विचारों का विरोध करना भी आ गया है। रमकल्लो नें लखना काका की.बहू के तीसरी बेटी के जन्म पर हुई उपेक्षा पर भी आवाज उठाई। उसकी शिक्षा ने उसे यह तो बता दिया है कि बेटी या बेटे के जन्म के लिए स्त्री उत्तरदायी नहीं होती।उसकी पाती अब और ज्यादा संवेदना और करुण भाव के साथ साथ नये जागरण की धी बाल करती है।
    **मैं डरती थोड़े हूँ। मैंने साफ कह दिया, “काकी मैं भरमा नहीं रही हूँ; तुम ही उसे बरबाद करना चाहते हो। तुम लड़का-लड़की में भेद करती हो। जिस घर से लड़का आता है, उसी घर से लड़की भी। लड़का-लड़की बरोबर।”
    रमकल्लो ने आज के भारत की नई तस्वीर दिखाई है।गांव भी शिक्षा के.बल पर आगे बढ सकते हैं ।बहुत बहुत बधाई सर।
    दूसरी पाती में अपने प्राननाथ के वापस लौट आने का स्वप्न है जिसमें.वह अपने पति के सान्निध्य में बहुत खुश और संतुष्ट नजर आती है।पर यह तो स्वप्न थाजो शायद कभी साकार हो सके।आपकी लेखनी का जादू बहुत ही उत्सुकता बढाता है।बहुत सुंदर,सुष्ठु लेखन।
    हार्दिक बधाई सर।

    • आदरणीया पद्मा मिश्रा जी, आपने रमकल्लो की प्रबुद्धता एवं संवेदनशीलता पर बहुत सटीक टिप्पणी लिखी है। इसके लिए आपने उसकी शिक्षा को मान दिया है।
      बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

  4. सर जी!
    रमकल्लो की दो पाती एक साथ देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ!

    मखना कक्का के यहाँ बहू की तीसरी लड़की के होने पर होने वाले हंगामे की बात सुनकर आश्चर्य आश्चर्य नहीं हुआ।
    जमाना चाहे कहीं पहुँच जाये पर यह सोच पूरी तरह नहीं बदलेगी।
    जो यह जानता है कि इसमें स्त्री का कोई कसूर नहीं वह भी स्त्री को प्रताड़ित करने से नहीं चूकते।
    लगता है इस एपिसोड का स्वप्न देखकर ही मोदी जी को शौचालय बनवाने का प्लान सूझा होगा !शायद
    यह तो सही है कि शिक्षा से ही परिवर्तन संभव है।
    साहेब आ गए।
    इंतजार समाप्त हुआ
    पर वह स्वप्न ही था।
    पर इस भाग में एक स्त्री के वियोग की पीड़ा महसूस हुई।
    इस बार एक अच्छा संदेश है कि लड़की भी लड़कों से कम नहीं।
    रमकल्लो की पाती के लिये आपको बधाई।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

    • आदरणीया नीलिमा करैया जी , अब एक साथ दो-दो पातियां ही आया करेंगी।
      आपकी टिप्पणी रमकल्लो के व्यक्तित्व को उभारती है।
      इस टिप्पणी के लिए आपका
      बहुत-बहुत धन्यवाद नीलिमा करैया जी

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