1 – पुस्तक ने सभा बुलाई
पुस्तक ने एक सभा बुलाई
काग़ज़ स्याही प्रकाशक औ लेखक से भी
गुहार लगाई।
कंप्यूटर इंटरनेट और डिजिटल देव को भेजा
निमंत्रण,
आने की दी करुण दुहाई।
दबी ढकी धूल औ
धूसरित पुस्तकालय को
भी अधलेटे आराम कुरसी पर बुलवाया।
औ उसे बना कर सभापति
पुस्तकों ने मिल अपनी शहनाई बजाई।
भारत भी इस मीठी तान
को सुन सभा में आया।
वोट बैंक को सूंघती
हैं, हैं… सियासत भी आई।
पुस्तकों ने करुण स्वर में
अपनी आवाज़ उठाई।
प्रकाशक ने भी विद्रूपता
से आँख मटकाई।
सियासत ने पहले उसे घूरा
बस नाप लिया उसके चांदी के पद त्राण को पूरा का पूरा।
पुस्तकों ने फिर दासीपुत्र
विदुर बन एक नीति की
आस दोहराई।
और सियासत को गुलदस्ते के बदले पुस्तकों
को उपहारित करने
और स्वयं के उपचार की
राह सुझाई।
लेखक ने भी आधे अधूरे मन से
अपनी हाजिरी लगाई।
पुरस्कार की राजनीति और संपर्क मकड़ी ने
अपने जाल की बात बताई।
पुस्तकों को डिजिटल अवतार ने अपनी बांहों में
कुछ यूं जकड़ा ,
जैसे किसी प्रेमी ने बेवफ़ा
महबूबा को पकड़ा।
सियासत और प्रकाशक ने
आँखों ही आँखों में की
चतुराई।
सियासत ने भी इस पर चुटकी बजाई
लोकतंत्र पर्व पर विचार करने की जुगत समझाई।
पुस्तकों की बस बजती रही यूं ही मीठी सी शुचित शहनाई।
सियासत ने इस गर्भवती सभा को अगले
आदेश तक विसर्जित कर
चुप रहने की सज़ा सुनाई।
पुस्तकों ने अब आम जन से आस लगाई
इस बार के विश्व पुस्तक और कॉपी-राइट दिवस में
अपनी पूर्ण निष्ठा जतलाई।
पुस्तकों ने अब आम जन से आस लगाई
इस बार के विश्व पुस्तक और कॉपी राइट दिवस में
अपनी पूर्ण निष्ठा जतलाई।
2 – इंसानियत हुई शर्मसार
लो आज फिर से दहशतगर्दी की शुरुआत हुई,
देखो तो आज फिर से
इंसानियत शर्मसार हुई।
धरती के स्वर्ग में फिर
से शैतानी हिमाकत हुई।
धारा 370 हटाने के बाद से
अमन ओ अम्मान को बदनाम करने की साजिश हुई।
पहले हुआ करती थी
ये गैर जिम्मेदाराना हरकतें
लो फिर से अब नमूदार हुई।
मासूम लोगों के खून से स्वर्ग की धरती
फिर से लहूलुहान हुई।
किसी की गोद सूनी
किसी की राखी सूनी
किसी की मांग का सिंदूर
धूला
तो कोई सदा के लिए
यतीम हुआ।
इंसानियत लो फिर से
अपमानित हुई।
एक देश एक विधान की
हक़ीक़त
आज फिर से दहशतगर्दी की शिकार हुई।
देश के निज़ाम को
आतंक ए शतरंज
की बिसात पर
शाह और मात के खेल की
शुरुआत हुई।
अब तो निज़ाम को भी
सरजोड़ कर सोच समझ कर,
आतंक के नाग को नाथने की रणनीति को अंज़ाम देने की बात हुई।

