कविताएं – पुस्तक मेले पर
– सूर्य कांत शर्मा
1. पुस्तकें…
आ रहीं हैं पुस्तकें,,,,
माँ वीणा वादिनी की
अमृतमयी वर्षा लिए
वासंतिक बयार में
नव रूप रंग कलेवर लिए।
ऋतुराज सा स्वरूप लिए
एन.बी.टी. का संग लिए
सज रहीं सँवर रहीं
पुस्तकें ही पुस्तकें।
भारतीय गणतंत्र को निहारती
हीरक जयंती को पखारती
लोकतंत्र में विहारती।
प्राकृतिक प्रतिमान सी
कभी माँ दादी कभी नानी
और तो और
बहिन सा मधुर रूप लिए।
कहीं मनमीत की मनुहार लिए
आ रहीं जीवन संगिनी सी
मेरी तुम्हारी हमारी
प्यारी न्यारी पुस्तकें।
कहीं कुंभ में नहाकर
पुण्य सलिला सी
जीवन सरिता सी
प्राणवायु पुस्तकें।
लोकतंत्र नृत्य की सी
भाव भंगिमा लिए
राजनैतिक झंझावातों में
वसुधैव कुटुम्बकीय अतुलनीय
अक्षुण्ण सहिष्णुता अर्जित
ज्ञान का गंग सा प्रवाह लिए।
सज रहा पुस्तकीय कुंभ
युवा भारत की आत्मनिर्भरीय
आभा लिए।
2. फूल नहीं पुस्तकें…
नया एक आहान लिए
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में
सज धज रहीं पुस्तकें।
प्रदेश की देश की
विदेश की औ फिर प्रवास की
सारे के सारे विश्व की।
नजरें बिछाए
पाठकों को ताकती
चाँद सी चकोर सी
नई और नकोर सी
पुस्तकें ही पुस्तकें
सिंधु के ज्वार सी।
बाल मन को दुलारती
युवाओं हेतु कल्पना ऑ सृजन
के पंख पसारती ।
आधी आबादी को पुकारती
आ रहीं पुस्तकें
बुला रहीं पुस्तकें।
आओ ना वसंत पंचमी
से पहले या बाद में
सारस्वत यज्ञ में समिधा डालने
पुस्तकें बुला रहीं
पुस्तकें बुला रहीं।
सूर्य कांत शर्मा, द्वारका, नई दिल्ली। मोबाइल – +91 79826 20596


सूर्यकांत जी नमस्कार
आपकी कविता सुंदर व्यंजना है, प्रासंगिक सामयिक ह्रदयस्पर्शी भी ।
वाह ,वाह वाह
Dr Prabha mishra
आदरणीय डॉक्टर प्रभा मिश्र जी,
देरी से उत्तर देने हेतु ,क्षमा प्रार्थित हूँ।
पुस्तकों पर केंद्रित रचनाओं पर आपकी टिप्पणी से मन आल्हादित हुआ और पुस्तकों के कद्रदान हैं और भी होंगे की लुप्त होती अवधारणा को बल मिला।
आपका हृदय से आभारी हूँ।