Wednesday, April 15, 2026
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संपादकीय – अब बैंड-एड पट्टियों से भी कैंसर

जिस अध्ययन की हम बात कर रहे हैं उसमें ये रिसर्च 40 अलग-अलग पट्टियों के 18 ब्रांडों पर की गई है और पाया गया कि पट्टियों में कैंसर पैदा करने वाला रसायन लगा होता है। बैंडेज में विषाक्त मात्रा में ‘पॉलीफ्लोरिनेटेड’ पदार्थ या पी.एफ.ए.एस. होते हैं. जिन्हें आमतौर पर ऐसे रसायनों के रूप में जाना जाता है जिन पर गर्मी, ग्रीज़, तेल या पानी का कोई असर नहीं होता। इन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता। इस मामले में ये प्लास्टिक से भी अधिक घातक हैं। इन्हें अंग्रेज़ी में फ़ॉर एवर केमिकल्स (For Ever Chemicals) कहा जाता है। रिसर्च टीम के अनुसार, 40 टेस्ट किये गये ब्राण्ड पट्टियों में से 26 ब्रांड्स में यह केमिकल पाए गये।

मैं अपना एक वाक्य बार-बार दोहराता हूं… “मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी वस्तु उसके लिये और प्रकृति के लिये घातक है!” उसकी बनाई चीज़ें पर्यावरण का भी नुकसान करती हैं और इन्सान के लिये हानिकारक भी सिद्ध होती हैं। हमने पेड़ काट-काट कर शहर बना डाले और ओज़ोन लेयर का इतना नुकसान कर दिया कि अब साँस लेना दूभर हो रहा है। विध्वंस के लिये बनाए गये हथियार अब इतना प्रदूषण फैला चुके हैं कि जीना मुहाल हो रहा है।
इन्सान किसी दवा का भी निर्माण करता है तो साथ ही उससे होने वाले प्रतिकूल प्रभावों की एक लंबी सूची टंगी रहती है। जो दवा एक बीमारी का इलाज करने के लिये बनाई जाती है वो शरीर के किसी महत्वपूर्ण अंग पर प्रतिकूल असर कर सकती है। 
अप्रैल 2024 में एक अध्ययन किया गया था जिसमें निष्कर्ष यह निकला कि छोटे घाव पर लगाई जाने वाली बैंडेज पट्टी से कैंसर होने का डर है। उन पट्टियों में कुछ ऐसे केमिकलों का उपयोग किया जाता है जो शरीर में कैंसर पैदा कर सकते हैं। 

पुरवाई के पाठकों को एक जानकारी देना आवश्यक है कि बैंडेज का आविष्कार लगभग सौ वर्ष पूर्व 1921 में अर्ल डिक्सन ने अमरीका में किया था। इन सूती पट्टियों पर क्रिनोलिन लगी होती थी और एक चिपकने वाला पदार्थ लगाया होता था जिससे ये पट्टी आसानी से घाव पर लपेटी जा सके। अर्ल डिक्सन जॉन्सन एण्ड जॉन्सन में कार्यरत थे। उनका यह आविष्कार बहुत जल्दी ही पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गया। ऐसी पहली पट्टियां करीब 18 इंच लंबी और अढ़ाई इंच चौड़ी हुआ करती थीं।
फिर तो इस बैंडेज में निरंतर बदलाव आते गये और एक ऐसा समय भी आ गया कि उंगली के लिये अलग साइज़ तो अंगूठे के लिये दूसरा। यानी कि तरह-तरह के साइज़ और शेप में ये पट्टियां बाज़ार में दिखाई देने लगीं। पहले तो प्लास्टर का कपड़ा इस्तेमाल किया जाता था, फिर उसकी जगह भी केमिकल प्लास्टर ने ले ली। 
दरअसल बैंड-एड का इस्तेमाल छोटे कट या घावों के लिये किया जाता है ताकि घाव खुला ना रहे और उसमें इंफ़ेक्शन होने का डर ना हो। आनंद बख़्शी का वो गीत है ना – “पतझड़ जो बाग़ उजाड़े, वो बाग़ बहार खिलाए / जो बाग़ बहार में उजड़े उसे कौन खिलाए?” उसी तरह सवाल यह उठता है कि जो दवा की पट्टी घाव को इंफ़ेक्शन से बचाने के लिये बनाई गई हो, यदि वही कैंसर पैदा करने का कारण बनने लगे तो क्या किया जाए?
जिस अध्ययन की हम बात कर रहे हैं उसमें ये रिसर्च 40 अलग-अलग पट्टियों के 18 ब्रांडों पर की गई है और पाया गया कि पट्टियों में कैंसर पैदा करने वाला रसायन लगा होता है। बैंडेज में विषाक्त मात्रा में ‘पॉलीफ्लोरिनेटेड’ पदार्थ या पी.एफ.ए.एस. होते हैं. जिन्हें आमतौर पर ऐसे रसायनों के रूप में जाना जाता है जिन पर गर्मी, ग्रीज़, तेल या पानी का कोई असर नहीं होता। इन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता। इस मामले में ये प्लास्टिक से भी अधिक घातक हैं। इन्हें अंग्रेज़ी में फ़ॉर एवर केमिकल्स (For Ever Chemicals) कहा जाता है। रिसर्च टीम के अनुसार, 40 टेस्ट किये गये ब्राण्ड पट्टियों में से 26 ब्रांड्स में यह केमिकल पाए गये। 
कहा जाता है. शरीर के संपर्क में आने पर ये केमिकल शरीर में मौजूद टिश्यू में स्टोर होते रहते हैं। क्योंकि हमारा शरीर इन्हें तोड़ नहीं पाता, इस वजह से ये लंबे समय तक शरीर में मौजूद रहते हैं। यही वजह है कि इन रासायनिक पदार्थों को ‘फॉर-एवर केमिकल्स’ कहा जाता है।
ये रसायन कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं जैसे ग्रोथ, बच्चा पैदा करने की शक्ति, मोटापा और कई तरह के कैंसर से जुड़े हैं। PFAS केमिकल से दूषित पानी पीने या खाना खाने से ये केमिकल आसानी से हमारे खून में प्रवेश कर सकते हैं। एक बार जब वे स्वस्थ टिश्यू में मिल जाते हैं तो हमारे रक्षा कवच (इम्यून सिस्टम), लिवर, किडनी और दूसरे अंगों को ये काफ़ी नुकसान पहुंचा सकते हैं। 
वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. लिंडा बर्नबॉम के अनुसार ये नतीजे काफ़ी चिंता पैदा करने वाले हैं। सच तो यह है कि ये ख़तरनाक पदार्थ एक लंबे समय तक हमारे घावों के साथ संपर्क में रहते हैं। इस प्रकार के रसायनों का 1940 के दशक में इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग में काफी इस्तेमाल किया जाता था।  हमारे रोज़मर्रा के जीवन की बहुत से उपकरणों जैसे कुक-वेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर, फूड-पैकेजिंग और फायर फाइटिंग फोम जैसी कई चीजों में मौजूद रहते हैं। 
ये रसायन दरअसल घाव के लिये दवाई का काम नहीं कर रहे होते। इनका इस्तेमाल मूल रूप से केवल बैंडेज को वाटरप्रूफ़ बनाने के लिये किया जाता है।  बाबू ईश्वर शरण हॉस्पिटल के सीनियर फिज़ीशियन डॉ समीर का कहना है कि, “अभी यह कहना कि बैंडेज के इस्तेमाल से सीधे तौर पर कैंसर फैल सकता है, ग़लत होगा। कुछ शोध और अध्ययनों में यह बात कही गई है, लेकिन इसको विस्तार से समझने के लिए शोध और अध्ययन किए जाने चाहिए।” उन्होंने कहा कि अगर बैंडेज बनाने में PFAS का इस्तेमाल हो रहा है, तो इससे सिर्फ कैंसर ही नहीं इन समस्याओं का भी खतरा रहता है जैसे कि – थायराइड की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल और प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना। 
जब यह पट्टी इतनी ख़तरनाक है तो इस पर अभी तक प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया? यह अध्ययन तो भारत के बाहर हुआ है। फिर भला भारत सरकार इस बारे में क्या कर रही है? क्या भारतीय नागरिकों की जान का कोई मूल्य नहीं है? स्वस्थ भारत नाम की संस्था ने हाल ही में डॉ मीणा पर आशुतोष कुमार सिंह की पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली में किया। उस दिन स्वास्थ्य सेवा में क्वालिटी कंट्रोल पर बातचीत की जा रही थी। क्या यह उसी क्वालिटी कंट्रोल के तहत नहीं आता कि यदि विदेश में एक अध्ययन किया गया है तो भारत सरकार के संबद्ध विभाग इस का संज्ञान लें और अपने यहां भी अवश्य अध्ययन करवाए जाएं और यदि आवश्यकता हो तो इन पट्टियों पर बैन लगाया जाए। 
मगर हम सरकार के भरोसे तो नहीं बैठ सकते। यदि हमें अपने आप को इस ख़तरे से बचाना है तो कुछ उपाय तो स्वयं ही करने होंगे। सबसे पहले तो हमें लेटेक्स-मुक्त बैंडेज (पट्टी) का उपयोग करना शुरू करना होगा।  कुछ अध्ययनों में लेटेक्स के संपर्क को भी PFAS के संपर्क से जोड़ा गया है। लेटेक्स-फ्री बैंडेज का इस्तेमाल करने से इसके ख़तरे को कम किया जा सकता है।
हमारा प्रयास रहना चाहिये कि हम आसानी से उपलब्धता के चक्कर में ना पड़ कर प्राकृतिक सामग्री से बने बैंडेज जैसे कॉटन या बांस जैसी प्राकृतिक सामग्री से बनी पट्टियों की तलाश करें। इनका हमारे शरीर पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा 
हमें पट्टी के उपयोग के समय को भी कम करना होगा। यदि संभव हो, तो घाव को साफ़ रखें और हवा लगने दें। इससे पट्टी के उपयोग की आवश्यकता कम हो सकती है। कई बार देखा है कि बैंड-एड में दबा घाव गीला रहता है और घाव सूखने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाती। 
मगर इस मुद्दे को लेकर एक सवाल पत्रकारों से भी करना चाहूंगा। इस ब्रेकिंग न्यूज़ के ज़माने में हम एक बार समाचार प्रकाशित करके अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाना चाहिये। हमें चाहिये कि समय-समय पर पता करने का प्रयास करें कि जो समाचार आम आदमी के जीवन से जुड़ा है और उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव के बारे में है, तो कम से कम पता करते रहें कि उस अध्ययन से आगे कुछ हुआ कि नहीं। जैसे हमारे पास आज कोई अपडेट नहीं है कि अप्रैल 2024 में जारी की गई अध्ययन की रिपोर्ट के बाद कुछ हुआ या नहीं। क्या आज भी बैंड-एड जैसी पट्टियां पुराने रसायनों के साथ ही बाज़ार में बेची जा रही हैं या उस पर कोई एक्शन लिया गया है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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36 टिप्पणी

  1. विज्ञान और तकनीक यूं तो मानव के कल्याण हेतु ईजाद गए हैं तिस पर भी खोजी और सजग मीडिया की मानिंद इसकी भी पड़ताल करता है यह समीचीन संपादकीय।
    आम भाषा में बैंडेज यानी पट्टी जो घाव पर लगती है के इतिहास को बताता और फिर औचित्य का समावेश कर विज्ञान से ओट प्रोत होकर जांच कर निडर होकर बताता कि फॉरएवर केमिकल्स किस प्रकार से इसी दर्द की निजात वाली युक्ति से कैंसर जैसी भयावह बीमारी भी सौंप रही है।
    यह निश्चित रूप से चिंतनीय स्थिति है जिसका संज्ञान हमारी सरकार और जनता दोनों को लेना चाहिए।
    संपादक और पुरवाई पत्रिका परिवार को साधुवाद।

    • भाई सूर्य कांत जी पुरवाई का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों से जुड़े तमाम मुद्दों की गहराई से पड़ताल करके मुद्दे उनके सामने रखे। हार्दिक धन्यवाद।

  2. 40 टेस्ट किये गये ब्राण्ड पट्टियों में से 26 ब्रांड्स में यह केमिकल पाया जाना अत्यंत गंभीर मसला है । इसमें इस्तेमाल हो रहे रासायनिक पदार्थों को ‘फॉर-एवर केमिकल्स’ कहा जाना और भी गंभीर है। बैंडेज बनाने में PFAS के इस्तेमाल से सिर्फ कैंसर ही नहीं थायराइड की बीमारी, हाई कोलेस्ट्रॉल और प्रतिरक्षा तंत्र का कमजोर होना – सच में चिंताजनक बात है। भारत सरकार भी इस बात को संज्ञान लें और यदि आवश्यकता हो तो इस पर बैन लगाए, अन्यथा यह धीमा जहर की तरह फैल सकता है। इस पर जागरूकता फैलाने की भी आवश्यकता है। इससे बचने के लिए हमें लेटेक्स-मुक्त बैंडेज का उपयोग करना शुरू करना होगा। इस पर भारत में गंभीर अध्ययन की जरूरत है और इससे कैसे बचा जाय, इसके उपाय निकालने की आवश्यकता है। इसका प्राकृतिक तरीके से कैसे इलाज हो, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अंत में “पतझड़ जो बाग़ उजाड़े, वो बाग़ बहार खिलाए / जो बाग़ बहार में उजड़े उसे कौन खिलाए?” – इस गाने के माध्यम से आपने विज्ञान और साहित्य का जो समन्वय किया है, बेजोड़ है। पुरवाई के सम्पादकीय के माध्यम से एक नई अवश्यकीय जानकारी देकर इसके पाठकों को ही नहीं, पूरी दुनिया को आपने सचेत किया है। आपका हार्दिक आभार।

  3. ऐसी जानकारियां बेहद डराने वाली हैँ, इसका तोड़ आम जन तक पहुंचना भी सम्भव होगा । इसके लिए गाने की पंक्ति एकदम सटीक है ।

  4. मैं तो स्तब्धचकित हूं कि आप कहां कहां से टौपिक्स ढूंढ ढूंढ कर पुरवाई परिवार को जानकारी देते हैं। अब प्रश्न ये उठता है कि अगर पे बैंडेज ना लगाएं तो करें क्या?

    • ज़किया जी, आपके साथ तो हर मुद्दे पर बातचीत भी होती है। आप पुरवाई की प्रेरणा स्रोत हैं। आपके सवाल का जवाब विस्तार से देंगे।

    • हमें अब आयुर्वेद के साधनों को पुनः अपना लेना चाहिए। घाव को साफ करके हल्दी को सरसों के तेल में पेस्ट बनाकर घाव पर लगा दें। कोई इंफेक्शन हो ही नहीं सकता है और घाव भी तेजी से भरता है।

  5. ज़किया जी का सवाल वाजिब है , उम्मीद है शीघ्र ही हाल निकाला जाएगा .
    पश्चिम के औषधि विज्ञान की खासियत है वह हमेशा स्क्रूटिनी के लिए तैयार रहता है और नई शोध के आलोक में विकल्प तलाश कर लेता है . याद कीजिए जॉनसन एंड जॉनसन का अरसे से इस्तेमाल किया जाने वाला बेबी टैलकम पाउडर नई शोध के अनुसार उसमें पाए जाने वाले कार्सिजिनिक केमिकल के कारण बाज़ार से हटा लिया गया था
    भाई तेजेन्द्र को मेरी भी बधाई एक अच्छी जानकारी साझा की है

  6. दवाओं के साइड इफ़ेक्ट तो हमने खूब सुने थे पर घाव पर सटाए जाने वाली इन पट्टियों के बारें में कोई जानकारी नहीं थी। इतना सुविधाजनक ये होता है पर इतना घातक अनुमान नहीं था। बच्चे छोटे थे तब ये घर के दराज़ में हमेशा मौजूद रहते थे।
    हैरत हो गई इसके साइड इफ़ेक्ट जान कर।

  7. इस नये रहस्योद्घाटन के लिये आभार तेजिंदर जी।पहले गाज़ पट्टियां ही घाव पर बांधी जाती थीं पर फिर बैंड एड आ गया।बहुत छोटे थे जब हम तो गाँव मे जरा जरा सी चोट पर तो तेल दो बूंद हथेली पर ले कर एक बूँद पानी की डाल तब तक फेंटते थे जब तक सफेद न हो जाए।देसी मलहम तैयार।ठीक भी हो जाते थे।
    आज से बैंड एड की छुट्टी हमारे घर से।

    • आपकी सार्थक टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है निवेदिता जी। हार्दिक धन्यवाद।

  8. पुरवाई के इस संपादकीय में – ‘बैंड-एड पट्टियों से भी कैंसर ।’

    इस विषय को लेकर आपने होने वाली हानियों से पाठकों को अवगत कराया है। पूरा संपादकीय पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि संपादकीय काफी शोध पूर्ण तरीके से लिखा गया है। जहां शोध की संभावना है उस पर भी बात की गई है। कितना सच है और कितना झूठ है इस पर सभी शोधकर्ता सहमत नहीं हैं। अगर सभी सहमत होते तो इस पर बैन जरूर लग जाता।
    विश्व आर्थिक धरातल पर टिका हुआ है। पूरे विश्व में इन पट्टियों की मांग है। मुझे लग रहा है कि विश्व के 80% लोगों ने इन पट्टियों का प्रयोग कर लिया होगा। अब गणित लगाइए कितना व्यवसाय हुआ होगा। ऐसे बिजनेस को कौन बंद करना चाहेगा। अगर किसी ने इस पर शोध कर दिया और इसके खतरे बता दिए तो कंपनी को नुक़सान हो जाएगा। कंपनी क्या करेगी? कंपनी उनका मुंह डालरों से भर देगी। अगर किसी देश की सरकार तीन-पांच करेगी तो उनके साथ भी यही होगा। जनहित गया चूल्हे में।
    लेकिन हम भी तो मजबूर हैं। घाव में हल्दी चूना, नीम की छाल, ऐलोवेरा, डीजल आदि नहीं लगा सकते हैं क्योंकि हमारा स्टैंडर्ड हाई है। दोस्त देखेंगे सुनेंगे तो हमें बोदा कहेंगे। बाईसवीं सदी में पहुंचने वाला मानव कैंसर जैसी पीड़ादायक बीमारी भोगकर भले ही मर जाए पर देशी नुस्खों का प्रयोग नहीं कर सकता है। भाई आप कहेंगे कि हमारे पास समय कहां है? बैंड -एड तो कहीं भी मिल जाती है। तो मैं कहूंगा भाई अपने लिए समय निकाल लो। एक दो दिन पार्टी वार्टी या गपशप नहीं करोगे तो ये सब बंद नहीं हो जाएगा। बाद में भी चलता रहेगा।
    खैर मैं केवल बैंड -एड की बात कर रहा हूं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को नहीं नकार रहा हूं। वह मानव जीवन के लिए अति हितकारी है। मेरा कंपनी वालों से मतभेद है। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि भाइयो ऐसे केमिकल न मिलाएं जिसमें कैंसर जैसी घातक बीमारियां उत्पन्न होती हो। पैसा तो और भी तरीके से कमाया जा सकता है। पैसा कमाते हुए अगर इंसान बना रहे आदमी तो यह हमारी बड़ी उपलब्धि है।
    तेजेन्द्र सर जी, आपके भीतर मानव जाति के प्रति लगाव है। इसलिए आपकी इस पर चिंता वाजिब है। बहुत बहुत बधाई आपको

    • भाई लखनलाल पाल जी, इस विस्तृत टिप्पणी के माध्यम से आपने संपादकीय के विषय की गंभीरता को रेखांकित किया है। हार्दिक धन्यवाद।

  9. सचेत करता, उपयोगी संपादकीय। स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को आप गहराई से खोजते हैं और पाठकों को जागरूक करते हैं। आप वास्तव में समाज के प्रति अपने संपादकीय कर्तव्य को अत्यन्त निष्ठा से निभा रहे हैं, हार्दिक धन्यवाद।

    • शैली जी, पुरवाई टीम का मुझ में विश्वास ही मुझे समाज से जुड़े विषयों पर लिखने की प्रेरणा देता है। आपका विशेष धन्यवाद।

  10. अब बैंडेज से कैंसर होने का खतरा यह तो बहुत खतरनाक बात है सरकार का ध्यान जाना चाहिए वरना एक चीज ठीक नहीं होगी दूसरी चीज बीमारी दे जाएगी। इस महत्वपूर्ण विषय पर आवाज उठाने के लिए जागरूक करने के लिए आपका आभार

  11. हमारे देश में सिर्फ बैंड एड की बात नहीं है बल्कि मेडिकल जनरल उठाकर देखें तो पायेंगे कि न्यूमिड या इससे मिलती जुलती दवायें विदेशों में प्रतिबंधित है लेकिन हमारे यहाँ खुले आम डॉक्टर लिख रहे हैं और कैमिस्ट बेच रहे हैं। ये भी तो इंसान के जीवन से खिलवाड़ है।

  12. जकिया जी हमें अब आयुर्वेद के साधनों को पुनः अपना लेना चाहिए। घाव को साफ करके हल्दी को सरसों के तेल में पेस्ट बनाकर घाव पर लगा दें। कोई इंफेक्शन हो ही नहीं सकता है और घाव भी तेजी से भरता है।

  13. जितेन्द्र भाई: इस बार के सम्पादकीय में आपने बहुत अच्छा विषय चुना है। PFAS के बारे में अधिक जानकारी के लिये जब इन्ट्रनेट पर गया तो बहुत कुछ पता चला। अधिक जानकारी के लिए इस टिप्पणी के साथ मैं एक लिंक भेज रहा हूं। मुझे पूरी आशा है कि इस से हमारे पाठकों को और बहुत सी जानकारी मिलेगी।
    https://www.dhs.wisconsin.gov/chemical/pfas.htm
    यहाँ मैं एक बात अवश्य कहना चाहँगा और वो है PFAS से सम्बन्धित सामान बनाने वालों की लॉबी। यह लॉबी इतनी ज़बरदस्त है कि इस के खिलाफ़ बोलना ‘नक्कारक़ाने में तूती की आवाज़’ की तरह से है। आप जितना मर्ज़ी चाहें शोर मचाएं, कोई सुनने वाला नहीं है। इस घातक कैमिकल का प्रयोग करने वाले केवल अपनी जेबें भरना और अपना मुनाफ़ा देखते हैं, भाड़ में जाए जन्ता। Slow poisoning की यह प्रथा कोई नई नहीं है। बहुत दिनों से चल रही है। समय समय पर, फिर भी जो कुछ इस बारे में पता चलता है, लोगों में एक टैम्पोरेरी जागृति आजाती है। यह जागृती अधिक दिन न रह कर, पानी के बुलबुले की तरह, कुछ दिन में फुस हो जाती है।

    • विजय भाई, आप ने केमिकल्स के बारे में सही जानकारी उपलब्ध करवाई है। आपका कथन सही है कि PFAS से सम्बन्धित सामान बनाने वालों की लॉबी इतनी ज़बरदस्त है कि उनके विरुद्ध किसी बात का कोई महत्व ही नहीं है। हार्दिक धन्यवाद।

  14. अब बैंड-एड पट्टियों से भी कैंसर…निश्चित ही बेहद डरावना है क्योंकि बैंड एड तो लगभग सभी के घरों में रहता है तथा शरीर के किसी भी भाग में कटने पर तुरंत ही लगाया भी जाता है।
    बैंड एड में PFAS कैमिकल उपस्थित रहने से कैंसर होने की संभावना के अतिरिक्त यह बात तो और भी दिल दहलाने वाली है कि PFAS केमिकल पानी या खाने की वस्तुओं में भी पाये जाने की संभावना है। इनसे युक्त दूषित पानी पीने या खाना खाने से ये केमिकल आसानी से इंसान खून में प्रवेश कर, उसके इम्युन सिस्टम को तहस -नहस करके उसके लिवर, किडनी और दूसरे अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    आपने सही लिखा है कि मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी वस्तु उसके लिये और प्रकृति के लिये घातक है।

    सच तो यह है कि कोई भी अविष्कार मनुष्य अपनी सुविधा के लिए करता है किन्तु जाने अनजाने वह अपना ही अहित कर लेता है।

    चेतावनी देने वाले इस आलेख के लिए आपको साधुवाद।

    • सुधा जी, आपकी टिप्पणी हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आपने सही विष्लेषण किया है। हार्दिक धन्यवाद।

  15. तेजेन्द्र जी!
    आपके इस बार के संपादकीय को पढ़कर शॉक्ड हुए। शॉक्ड इसलिए कि उसी दिन सुबह ही हमारी अपनी लापरवाही से छुरी से हमारा अँगूठा लगभग तीन सेंटीमीटर कट गया अब सीधा हाथ था तो हर काम में दिक्कत।हम तो वाटरप्रूफ बैंडेड घर में रखते ही हैं। लगाने के पहले ही संपादकीय का हैडिंग देख लिया।
    आपके संपादकीय का इंतजार इसीलिए रहता है कि दुनिया के किस कोने में किस कमी पर आपकी नजर पड़ने वाली है और आप हम लोगों को सचेत करने वाले हैं।
    सच कहें तो ऐसी चीजों को पढ़कर बहुत दुख होता है। आदमी खुद आदमी को मारने पर तुला हुआ है। इंसान कितना वहशी हो गया है निजी स्वार्थ में।
    हम लोग एक जमाने से तक घरेलू उपचार करते रहे बैंडेड का प्रयोग तो अभी-अभी करने लगे हैं वह भी मजबूरी में।
    कैंसर तो वैसे भी है एक खतरनाक बीमारी है। इंसान नाम से ही डर जाये।
    हमारे जीजा जी डॉक्टर थे तो बताते थे कि पेंटेड्स की गोली आती है। आधी गोली को पीस के उसमें नारियल का तेल मिलाकर घाव पर लगा लो और पट्टी बाँध लो और आधी गोली खा लो।
    जिन लोगों का शरीर जरा सी खरोच लगने पर भी पक जाता है, उसका उपचार भी हम लोग घर में ही कर लिया करते थे और 100% सफल।
    अगर पक गया है तो कंडे की राख गीली करके उसके ऊपर रख दो और पट्टी बाँध दो। उस समय सूती साड़ियाँ चला करती थीं। पुरानी साड़ियों को हम लोग सहेज के रखते थे। उन्हीं को बारीक बारीक फाड़कर पट्टियों का उपयोग करते थे। या फिर सूती फॉल। गीली राख से पस वाला हिस्सा गल जाता था और वहाँ की चमड़ी राख के साथ निकल जाती थी बिना दर्द के सारा पस राख सोख लेती थी। डेटॉल के पानी से साफ कर लेते थे अगर ज्यादा प्रॉब्लम हो तो सुई आग में गर्म करके छेद कर देते थे। राख निकाल के डिटॉल के पानी से साफ करके कड़का बाँध देते थे।
    कड़का बनाने की क्रिया ऐसी रहती थी कि एक कटोरी में घी गर्म करने रखा, जैसे ही गर्म हुआ तो घाव के हिसाब से रुई के टुकड़े को फैला कर पानी में गीला किया और उसको निचोड़ दिया हथेली से दबा के, घी में थोड़ी सी हल्दी डाली और तुरंत ही गली वाली रुई ,कड़कड़ आवाज होती है और उसको पलट लो।घी बस इतना ही डालना है कि रुई भीग जाए। जितनी कुनकुनी सहन की जा सके उतनी गरम उस घाव में रखकर पट्टी बाँध दी।और हम तो जो वैसलीन घर पर बनाते हैं छोटे-मोटे घाव के लिए जले के लिये और स्किन से संबंधित चर्म रोग के लिए वह बहुत यूज़फुल है। सिर्फ देसी बट्टी वाला कपूर, मधुमक्खी के छत्ते से बना हुआ कच्चा मोम और सरसों का तेल! तीन चीजों से मिलकर बनता है। ठंड भर हम लोग मुँह पर भी इसी वैसलीन को लगाते हैं।
    छोटी-छोटी चीजों के लिए हम लोग कभी अस्पताल नहीं गए ।दादी नानी के घरेलू उपचारों से काम चल गया। और आज भी चल रहा है।
    लेकिन आपका शुक्रिया आपके संपादकीय ने सचेत किया बैंडेड को लेकर हम तो बड़े खुश थे के चलो! बैंडेड का आविष्कार अच्छा हो गया।
    सचेत करने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।
    वैसे संपादकीय के माध्यम से धमाके अच्छे करते हैं आप!!!!!
    शुक्रिया पुनः!

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