Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : भला हुआ मैं न जली (भाग – 10)

प्राननाथ,
चरन स्पर्श 
मैं तुम्हें क्या बताऊँ प्राननाथ कि मेरे साथ कैसी गुजरी ?  मुझसे तो कहते नहीं बनता है। त्योहार की बातें त्योहार में ही छोड़ दी जाती हैं। ये थोड़े है कि तुम उसे मन में बिठाए रखो। परधान जी से मैंने होली क्या खेली, आफत में जान फँस गई। त्योहार के उल्लास में मैंने उन पर रंग क्या डाल दिया, वे तो मेरे पीछे ही पड़ गए।
एक दिन वे घर आकर यहाँ-वहाँ की बातें करते रहे। मुझे उनकी बातें अच्छी नहीं लग रही थीं। बातों का स्तर वो नहीं था, जो होना चाहिए था। यही विचलन मुझे परेशान कर रहा था। मैं सोच रही थी कि परधान जी बदले अंदाज में बात क्यों कर रहे हैं, पर कोई निष्कर्ष पर न पहुँच सकी।
परधान जी तो अपनी ही रौ में बोले जा रहे थे, “रमकल्लो, मैं तुझे बहुत चाहने लगा हूँ। तू भी मेरा साथ देगी, तो तेरे पेट का पानी न डुलने दूँगा।”
मैं उनकी बातें सुनकर सन्न रह गई। परधान जी को क्या हो गया है? दूसरे की औरत को ऐसा कैसे कह सकते हैं। गाँव के मुखिया हो, तो इसका मतलब ये थोड़े है कि किसी की औरत पर बुरी नजर डालो। मैंने उन्हें कठोरता से कहा, “परधान जी होश में तो हो, ये क्या कह रहे हो?”
परधान जी मनुहार करते हुए बोले, “हाँ रमकल्लो, मैं तुझे हमेशा खुश रखूँगा। तुझे किसी तरह की दिक्कत न आने दूंगा।” वे मेरा हाथ पकड़कर बोले, “जॉबकार्ड के सारे पैसे तू लेती रहना, मैं उसमें से एक पाई भी न लूँगा।”
उनकी ऐसी सोच पर मुझे गुस्सा आ गया, “परधान जी, मेरा आदमी नहीं है, तो तुम उसका नाजायज फायदा उठाओगे?”
“तू अकेली, बिना आदमी के कब तक रहेगी?”
“परधान जी ये तो मुझे सोचना है। मैं अकेली रह तो रही हूँ। मुझे कोई दिक्कत नहीं है, आप क्यों हमदर्दी दिखा रहे हो?”
“रमकल्लो, मैं तेरे बिना जी न सकूँगा।”
“जीने-मरने की बात छोड़ो परधान जी, उम्र का अन्तर भी देखो। मैं आपकी बेटी के बराबर हूँ।”
“प्रेम, उम्र नहीं देखता पगली। मैं तुझे चाहता हूँ और तू…।” यह कहकर उन्होंने मुझे आगोश में ले लिया। मेरे विरोध के बावजूद उन्होंने मेरे गाल में दाँत गड़ा दिए। मेरी छातियाँ कस के मींड़ दी। मेरे मुख से चीख निकल गई।
वे तो और आगे बढ़ रहे थे। लेकिन मैं संभल चुकी थी। मैंने अपने आपको उनकी गिरफ्त से छुड़ाकर धक्का दे दिया। वे लड़खड़ाकर पीछे की ओर झुक गए। मैंने परधान जी को चेताते हुए कहा कि परधान जी मुझे दोबारा मत छू देना, वरना बहुत बुरा होगा। मेरे कड़े तेवरों से वे झिझके। मैंने तुरन्त ही दूसरा प्रहार किया, “मैं अभी आपकी हरकत को परधानिन चाची (उनकी पत्नी) से कहती हूँ।”
परधानिन का नाम सुनकर वे सकपका गए। चाची को तो तुम जानते हो, ज़रा सी बात पर हंगामा खड़ा कर देती है। इस हरकत पर तो न जाने क्या करतीं। परधान जी मेरे सामने गिड़गिड़ाने लगे। वे हाथ-पैर जोड़ते हुए बोले, “रमकल्लो, किसी से कुछ मत कहना, बहुत बदनामी होगी। मुझसे गलती हो गई, मैंने तुझे गलत समझ लिया था। उस दिन तूने मुझ पर मुस्कराते हुए रंग डाला था, तभी से मैं तेरी उस अदा पर पागल हो गया था। तुझे पाने के लिए मैं अपने आपको रोक न सका।”
मेरे तेवर नरम नहीं हुए थे। मैं उनके किसी झाँसे में आने वाली नहीं थी। यह बात परधान जी भी समझ चुके थे। इसी से लज्जित होकर वे यहाँ से चले गए थे।
बरगओ, किसी से हँसना-बोलना मुश्किल है। हँसी का मतलब न जाने क्या निकाल लेता है आदमी। परधान जी समझ रहे थे कि मैं उनके बिछाए जाल में फँस जाऊँगी। रमकल्लो को कोई ऐसी न समझे, मैं हगासे लरका की आँखें पहचान लेती हूँ। पुरुष की निगाहें बता देती हैं कि वह क्या चाहता है?
वे अपने किए की गलती भले मान रहे थे, लेकिन मैं जानती हूँ कि यह गलती उन्होंने सोच-समझकर की थी। कामयाब हो गए, तो नई औरत उनके पहलू में होती, नहीं हुए तो मिन्नत करके अपने आपको बचा ले गए। परधान जी जैसे घाघ आदमी की तो चित्त भी अपनी, पट्ट भी अपनी।
प्राननाथ, मुझे इस बात का दुख है कि इतना प्रतिष्ठित आदमी जब ऐसी घिनौनी हरकत करेगा, तो आम आदमी कैसे जी पाएगा। रोहू लला ने भी तो मुझ पर रंग डाला था, उसने तो ऐसी गिरी हुई हरकत न की। वह मेरा हमउम्र है। वह ऐसी गलती करता तो मान लेते कि उसमें नादानी है। बताव ले, नाती-पोतों वाले नादानी पर उतर आए।
गुस्सा तो आ रहा था कि उतार चप्पल मुँह-मुँह मारूँ पर उनकी प्रतिष्ठा का खयाल करके सध गई। हद रे जमाने! आदमी रिश्ते-नाते भी नहीं देखता है। इन्हें तो बस एक मादा चाहिए, जो इनकी जाँघों में दबी रहे। इन्हें लाज-शरम थोड़े है।
रोहू लला हमेशा कहते हैं कि भौजी तुझे कोई दिक्कत हो तो बताना, संकोच न करना। आड़े वक्त में उसने कई बार मेरी सहायता की। उसकी माँ सरबत चाची अपने से अलग नहीं मानती है। जरा-सी परेशानी हो, तो सामने आ जाती है। परधान जी से ये लाख गुने अच्छे हैं।
प्राननाथ, परधान जी भी समझ गए होंगे कि किसी से पाला पड़ा है। काहिली के मारे मुझसे नजरें नहीं मिलाते हैं। पता नहीं लोग ऐसे काम करते ही क्यों हैं, जिससे नजरें चुरानी पड़े।
अब तो ‘बहू’ कहकर मुँह सूखता है। बड़ा सम्मान देने लगे हैं। डरते हैं, कहीं मैं उनकी हरकत पत्नी से न कह दूँ।
मैंने सरबत चाची को बता दिया है। चाची दाँदस में आ गई थी। उन्हें डर था कि कहीं परधान जी दोबारा कोई हरकत न कर दें, क्योंकि ये ऊपर से डरे हुए भले दिखें पर अन्दर से हारी नहीं मानते हैं।
चाची को मैंने समझाया कि अब वे ऐसी हरकत न करेंगे। अगर कर दी, तो गाँव भर में उनके नाम का ढिंढोरा पीट दूँगी, रिपोर्ट अलग लिखा आऊँगी। मैं दबकर रहने वाली नहीं हूँ। ऐसे दबने लगे, तो गाँव में न रह पाएँगे।
और सब ठीक है। अगर कुछ समझ में आ गया हो तो पत्र ही भेज देना।
आपकी ही
रमकल्लो 
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]
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8 टिप्पणी

  1. लखनलाल जी,

    आज रमकल्लो की दसवीं पाती पढ़िके बहुतय दुख भओ। पति के होते हुये भी वह अकेली है। ऐसे में कुछ लोग सोचने लगते हैं कि ‘नजर हटी और दुर्घटना घटी’ प्राननाथ की अनुपस्थिति में रमकल्लो के साथ भी ऐसी ही दुर्घटना होते-होते बची।

    एक जवान व अकेली स्त्री का जीवन बड़ा कठिन होता है। उसके चारों ओर पुरुष गिद्ध के जैसे मंडराने रहते हैं। परधान जी जैसे लोग जीना दूभर कर देते हैं। उनकी लोलुप निगाहें स्त्री के शरीर पर मंडराती रहती हैं। बाप की उमर के होते हुये भी काफी समय से परधान जी की गंदी नीयत रमकल्लो पर थी। जिसका आभास रमकल्लो को न होने पाया था। वह जाब कार्ड के अहसान तले दबी होने के कारण होली पर रंग लगाने की बात को तो बर्दाश्त कर गई। किंतु उसे आने वाले दिनों का पता नहीं था कि उनकी नीयत उस पर डोलो हुई है।

    और अचानक किसी दिन वह उसे भूखे भेड़िये की तरह दबोच लेंगे। और जब एक दिन प्रधान जी ने उसके अकेले होने का फायदा उठाना चाहा तो एक वीरांगना की तरह रमकल्लो ने स्वयं अपनी आन-बान की रक्षा की। और प्रधान जी के इरादों को धराशाई कर दिया। उसने ऐसी धमकी दी उन्हें कि उनके दिमाग से रोमांस का भूत सदा के लिए उतर गया। इतना सब कुछ हो जाने पर भी वह उनकी इज्जत की खातिर उनके बारे में ढिंढोरा नहीं पीटती।

    रमकल्लो कोई ऐसी-वैसी स्त्री नहीं है। अब तक वह एक समझदार व वफादार पत्नी का रोल निभाती आई है। अपने पति को घर, गाँव व अपने बारे में सब कुछ बताती आई है। भारत की नारी है पत्नी का धर्म निभाती आई है। उसकी पाती पढ़कर उसके प्राणनाथ को उसपर गर्व होना चाहिये। हर स्त्री अगर रमकल्लो जैसी बहादुर हो तो कितना अच्छा हो।

    -शन्नो अग्रवाल

    • शन्नो जी, आपकी टिप्पणी से लेखन को बल मिला। इस रचना के पात्र को मैंने साहसिक तौर पर ही सोचा था। उस जगह पर जहां आज भी स्त्रियां अपने अपमान को यूं ही सहन करती रहती हैं। कभी इज्जत के नाम पर और कभी बदनामी के डर से पीछे हट जाती है। लेकिन रमकल्लो पीछे नहीं हटती है। उसकी जितनी सीमा है उस हद तक विरोध करती है।
      बढ़िया प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  2. ————- भाई लखनलाल पालजी ! घटनाएं चरित्र का उदघाटन करती हैं और साथ में चरित्र का निर्माण भी। रामकल्लो निरंतर एक विकासमान चरित्र है। कहीं भी उसके चरित्र में दुर्बलता नहीं है। अब वह हिंदी साहित्य में एक ऐतिहासिक पात्र है। आपको हार्दिक बधाई !!

    • डॉ हरनेक सिंह गिल जी, आपकी यह प्रतिक्रिया मुझे संबल प्रदान कर रही है। आपका यह कहना कि ‘रमकल्लो साहित्य में ऐतिहासिक पात्र है।’ यह मेरे लिए बड़ी बात है ।
      आपकी टिप्पणी रोमांचित करती है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर।

  3. आदरणीय सर जी!
    अबकी बार की पाती ने शॉक्ड किया। पिछली पाती को पढ़ते हुए इस तरह का अंदेशा हुआ था कि कोई गड़बड़ न हो।
    पर शंका सही निकली। बेचारी रामकल्लो की परेशानियों का अंत ही नहीं।
    बेचारी रमकल्लो नहीं जानती कि त्योहार में तो बातें शुरू होती हैं।और जो शुरू होती हैं उसका अंत कहाँ और किस तरह होगा?
    पढ़कर हमें ही बहुत गुस्सा आ रहा है कि हम ही जाकर प्रधान की रिपोर्ट लिखवा दें।
    गाँव की भोली-भाली, ‌सरल ह्रदय रमकल्लो दुनियावी चालाकियों से वाकिफ नहीं।पर फिर भी उसने बुद्धिमत्ता से काम लिया और साहसिक कदम उठाया। उसकी हिम्मत को सलाम।
    अब प्राणनाथ की पाती नहीं प्राणनाथ का इंतजार है कि इस चिट्ठी की प्रतिक्रिया क्या होगी?पर एक बात है; परधानिन काकी का भय काम कर गया।
    सरबत चाची को बता कर उसने अच्छा किया।
    इस बेहतरीन श्रृंखला के लिये आपको और आपकी लेखनी को सलाम।
    प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का शुक्रिया
    पुरवाई का शुक्रिया।

    • आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपने रमकल्लो के भोले-भालेपन व सरल हृदय के साथ उसके साहस को बहुत अच्छे से व्यक्त कर दिया है। आपने उसका चरित्र चित्रण किया है यह उसके सर्वथा अनुकूल है।
      बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  4. अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रही “रमकल्लो की पाती” की दसवीं पाती अन्य पातियों से थोड़ा हटकर लगती है। इस पाती में रमकल्लो उदात्त चरित्र का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करती है। पंचायती राज्य सत्ता के तमाम प्रलोभनों, लाभों को दरकिनार करते हुए अपने स्वत्व की सगर्व रक्षात्मक संघर्ष के लिए तत्पर है। ‘गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई’ जैसे सदियों पुराने देह शोषणवादी अमानवीय मिथक को धराशायी करती है। एकाकी स्त्री का प्रधान जैसे शक्तिशाली व्यक्ति को नतमस्तक कर देना स्त्री अस्मिता की विजय है। सच्चे मायने में महिला सशक्तिकरण का उदाहरण है। स्त्री विमर्श के पैरोकारों को आइना दिखाना है।
    सामंतवादी सोच तथा प्रधान जैसे पद आदि पर काबिज लोगों का अपनी दबंगई, पैसा, प्रलोभन तथा अन्य दूसरे प्रकार के हथकंडों, षड्यंत्रों आदि से गाँवों की गरीब महिलाओं का देहशोषण करना आमबात है। प्रधानी के नशे में चूर यौनपिपासु प्रेत प्रधान के भीतर से अट्टहास करता हुआ निकलता है और स्त्रीत्व की अस्मिता के लिए प्रतिबद्ध गाँव की अकेली महिला रमकल्लो का शीलभंग करने की नाकाम कोशिश करना यही तस्दीक़ करता है। यहाँ यह कुतर्क भी दिया जा सकता है कि रमकल्लो ने प्रधान पर हँसते हुए रंग डाला ही क्यों था …? जिसके कारण वह रमकल्लो की इज्ज़त पर हाथ डालने का दुस्साहस करने लगा।
    गाँवों में आज भी होली के अवसर पर महिलाओं द्वारा बड़े-बुजुर्गों पर रंग डालने अबीर लगाना उनके प्रति सम्मान व श्रद्धा व्यक्त करने की सात्विक परंपरा प्रचलित है।
    प्रधान द्वारा रमकल्लो के साथ की गई छेड़खानी का वर्णन में लेखक ने देखने -सुनने अश्लील लगने वाले शब्दों का चमत्कारिक प्रयोग किया है। वे शब्द ही पाठकों के मन में खलनायक प्रधान के प्रति आक्रोश भरते हैं और रमकल्लो की चारित्रिक दृढ़ता की सराहना करते हैं। यहाँ लेखक ने कुछ अवाँछनीय शब्दों का वाँछनीय प्रयोग करके शब्द शक्ति का सशक्त उदाहरण दिया है। शब्दों के अर्थ वैशिष्ट्य ने इस प्रसंग को और भी प्रभावी बनाने में सफलता प्राप्त की है।
    इसी तरह लोक कहावतों व मुहावरों का छौंका भी अर्थवत्ता युक्त है-
    “हगासे लरका की आँखें पहचान लेना”,
    “जाँघों में दबी रहे”, “यहाँ वहाँ की बातें करना”, “पेट का पानी न डुलने देना” आदि
    हालांकि लेखक ने इस पाती में कुछ ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया है जिनसे बचा जा सकता था। यथा- विचलन (तकनीकी) पहलू, प्रहार, प्रतिष्ठा आदि।
    यदि अपनी ललित भाषा में कहूँ तो, “रमकल्लो की पाती” एकाकी स्त्री जीवन के संघर्षों का मूर्तसार है। स्त्री की जीवटता का गद्यात्मक महाकाव्य है। आँचलिक समाज का दिग्दर्शन है। और है पंचायती राज्य की विकासवादी अवधारणाओं को मटियामेट करते लोगों का विद्रूप चेहरा।
    कुलमिलाकर “रमकल्लो की पाती” समग्रतः से विमर्श के अनेक गवाक्ष और प्रवेशद्वार खोलती है।

    डॉ० रामशंकर भारती
    02 जुलाई 2025
    प्रातः6:45
    नौगाँव-छतरपुर (मध्यप्रदेश)

  5. आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने रमकल्लो के सशक्त और साहसिक कार्य के आकलन का जो लेखा-जोखा टिप्पणी के माध्यम से किया है वह रमकल्लो के रूप में स्त्री सशक्तीकरण पर मुहर लगाता है।
    मैंने रमकल्लो जैसे पात्र को साधारण स्त्री के रूप में चित्रित किया था। इतनी साधारण व संवेदनशील कि हर किसी के दुख में दुखी हो जाए और सुख में सुखी हो जाए। उसने अपने लिए भी रिक्त स्थान छोड़ा है। यह रिक्त स्थान आलोचकों के लिए, पाठकों के लिए मैंने स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया था। यह छूट उन सभी को बहुत कुछ मुहैया करा देता है।
    आपकी टिप्पणी हौसला बढ़ाने वाली है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार भारती जी

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