Monday, August 10, 2026
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लकी राजीव की कहानी – अहेरी

मेरी नज़रें एक झटके से उस पर अटकीं और उलझ गईं! लेकिन नहीं,ये वो हो ही नहीं सकता। ऐसा बदरंग कुर्ता, इतने उलझे बाल? ना! इतने पुख्ता यकीं के बाद भी,एक बार फिर चोर नज़रों से प्लेटफ़ॉर्म के कोने पर खड़े, सिगरेट फूंकते लड़के की आंखों को देखा..ये सविनय नहीं हो सकता था, लेकिन ऐसी उठी हुई नाक, गहरी स्लेटी आंखें उसके अलावा और किसकी हो सकती थीं ? सिगरेट के हर कश के साथ जैसे वो अपनी उपस्थिति को हवा में फैलाता जा रहा था। मुझे लगा मैंने उसकी उंगलियां ठीक उसी तरह सूंघ ली हों,जैसे पहले सूंघ लिया करती थी,क्या कहता था वो? 
“पैसिव स्मोकिंग है ये, मत किया करो”
आज इतने सालों बाद, वही महक मेरे आस पास इतनी तेज़ महसूस हुई जैसे वो ठीक मेरे बगल में, बिल्कुल पास खड़ा हो..सटकर! तीसरी बार भी देख ही लेती,तब तक घिसटते हुए एक ट्रेन आकर प्लेटफॉर्म पर आकर रुकने लगी थी..रुकने की आवाज़ बेहद इरिटेटिंग! मैंने उतरती भीड़ की भगदड़ के बीच, इतने चेहरों के बीच से फिर वो चेहरा देखा। सविनय अपना एक बैग उठाए मेरी  तरफ बढ़ता चला आ रहा था,बिना मुझे देखे.. मैं एक खंभे के पीछे से होती हुई,ओट में जाकर उसे देखती रही। उसके हर बढ़ते कदम के साथ वक्त साल दर साल पीछे जाने लगा था,घिसटती हुई ट्रेन की तरह और सब कुछ याद आने लगा था,ट्रेन के डिब्बों की ही तरह..एक के बाद एक; सविनय,साथ बीता हमारा वक्त,कॉलेज, हॉस्टल, मेरा रूम और मेरी रूममेट भी…
उस दिन वो कुछ लिख रही थी, पूछते ही बताने भी लगी,
“क्या बताऊं,क्या लिख रही हूं.. ये तो चिड़िया की कहानी है। बहुत मासूम,गौरैया मान लो”
कहते हुए उसने अपने बालों को समेटकर जूड़ा बनाने की कोशिश की, फिर अपने माथे पर हाथ मारकर बोली,
“ये लो! अभी मैं बांध लेती ! याद ही नहीं रहा कि हेयर स्ट्रेटनिंग के बाद चार दिन तक बांधे नहीं जाते बाल”
बाल‌‌ न बंध पाए, लेकिन इस भोलेपन पर मेरा मन ज़रूर बंधने लगा था उसके साथ! ऐसी ही थी वो मेरी रूममेट..एम ए फाइनल इयर में! नाज़ुक इतनी कि दूध का बना पेड़ा,छुओ तो टूट ही जाए और मासूम ऐसी कि दो साल की बच्ची उसके सामने बड़ी दिखे!कुछ भी नाम हो सकता था उसका ,फिलहाल के लिए ‘वो’ नामक सर्वनाम ही सही! अक्सर अपना बचपन खोल देती, खोलते ही उदास हो जाती, 
“तुम नहीं समझोगी, क़ैद में रहे यार! घर से बाहर सड़क तक नहीं देखी”
मैं सच में नहीं समझ पाती थी, जब क़ैद जैसा सब कुछ था तो वहां से निकलकर इतनी दूर पढ़ने आना फिर हॉस्टल में रहना कैसे संभव हुआ? जब पूछा तो फिर वही बोली,
“कहा था न ,तुम नहीं समझोगी..सब कुछ बदला है लड़कर! कभी मेरी कहानी पढ़ना, तब समझोगी। मेरे ही ऊपर लिखी है, चिड़िया वाली कहानी”
मुझे बहुत समझना था भी नहीं हालांकि उसकी दोस्ती के चलते दूसरों को समझाना बहुत पड़ा! उसके बारे में अच्छी बातें नहीं की जाती थीं, उसके भोलेपन को ‘विक्टिम कार्ड खेलना’ कहा जाता, मैं अक्सर उसका पक्ष लेकर लड़ पड़ती थी,
“वो बहुत झेल चुकी है यार..अब ठीक होने की कोशिश कर रही है तो क्या खराबी है?”
मेरी बात पर बाकी लड़कियां हँस पडतीं,
“लटके झटके तो कुछ और बताते हैं..ऐसी ग़म की मारी तो नहीं लगती”
मैं ऐसी बातों से कटने लगी, ऐसी जगहों से उठने लगी फिर धीरे-धीरे वहां पर बैठना भी बंद कर दिया। मेरी पढ़ाई, मेरा कॉलेज,मेरा कमरा और मेरी रूममेट..बस इतना बहुत तो था।
“एम ए के बाद रिसर्च करोगी?”
मैंने एक दिन पूछा तो उसकी आंखें चमक उठीं,
“नहीं, मैं नौकरी करूंगी”
“नौकरी? कहां मिलेगी नौकरी? तुम भी न”
“रास्ते बनाए जाते हैं, मैं भी बना लूंगी “
मैं उसकी इसी मासूमियत पर फिदा हो जाती थी‌। बाद में पता चला इस मासूमियत के कुछ दीवाने और भी थे.. कुछ नहीं कई दीवाने! मैंने एक दिन छेड़ भी दिया,
“आज क्लास के बाद तीन लड़के पीछा करते हुए आए थे! तुम्हारा वाला कौन था?”
वो अचानक संजीदा हो गयी,
“ये सब ठीक नहीं, बकवास बातें हैं। लफंगे हैं वो सब”
मैं चाहकर भी नहीं कह पायी कि पीली चेक की शर्ट वाला तो लफंगा नहीं था। आंखें गहरी थीं, चेहरे पर कुछ तो ख़ास था। अगले दिन लड़कियों ने आहें भरते हुए उसका परिचय दिया था, इंग्लिश डिपार्टमेंट का टॉपर था..अच्छा,ये बात थी! चेहरे पर ज्ञान की आभा थी, सफलता का गुरूर! मेरी आंखें अब अक्सर उस चेहरे को ढूंढतीं, जिस दिन वही‌ पीली शर्ट पहनता, मैं दूर से पहचान जाती, बाकी दिन थोड़ी और मेहनत करनी पड़ती। फिर एक दिन मंज़िल खुद चलकर मेरे पास आ गई,
“आप ग़लत लाईन में खड़ी हैं। एम ए हिंदी की लाईन है ये, एम ए इंग्लिश के असाइनमेंट का सबमिशन उधर है”
मैं घबराने की हद तक हड़बड़ा गई थी! मेरा सब्जेक्ट पता है इसको!क्यों? मतलब कैसे? हड़बड़ी में मेरे मुंह से निकला ‘थैंक्स’ उसको पसंद आ गया होगा। मेरे साथ आगे चलते हुए उसने बिना मेरी ओर देखे कहा,
“मैं सविनय,बनारस से हूं”
मैंने उसकी ओर देखकर कहा,
“मैं कानपुर से हूं।मेरी रूममेट भी बनारस से है, वो भी हिंदी एम ए.. “
“शाम को मिल सकते हैं?”
मेरी बात काटकर उसने पूछ लिया था, मैं मना नहीं कर पायी थी। उस‌ दिन वो शाम आई, फिर कुछ दिनों बाद वैसी ही एक और शाम आई..फिर अक्सर आने लगीं। हम सड़कों पर टहलते, बातें करते,बहस करते! कभी हिंदी साहित्य जीतने लगता ,कभी अंग्रेजी साहित्य बाज़ी मार ले जाता।
“तुमको पता है, कीट्स ने क्या लिखा है पतझड़ के लिए?”
मैं दो पंक्तियां भी नहीं कह पाती कि वो टोक देता,
“इससे अच्छी तो बच्चन जी की वो कविता है.. पतझड़ की शाम”
बहस पतझड़ से शुरू होती, खत्म सावन पर होती..जब मैं चौंककर कहती,
“बारिश होने वाली है, मैं तुरंत जा रही हूं”
सविनय मुस्कुरा देता,
“इस मौसम में बारिश? अच्छा तो फिर भीग ही लो न”
मैं कह भी नहीं पाती कि भीग तो चुकी हूं,अब बाकी क्या रह गया है ? अकेले में भी सविनय को ही  याद करके मुस्कुराती थी, बिना ये सोचे कि लोग देखते भी हैं!उस दिन मेरी रूममेट भी तो भौंचक्की होकर देखती रह गई थी,
“तुम पढ़ते हुए भी मुस्कुरा रही हो?”
“हां, कुछ था ऐसा लिखा कि हंसी आ गई”
मैं टालते हुए झेंप गयी! मेरी बात पर बड़ी आसानी से उसने यकीन कर लिया था, उसका भोलापन मुझे अपराध बोध तले दबा गया।अगला सवाल अपनी तरफ से पूछते मैं उसके पास चली गयी थी,
“क्या हुआ, बड़ी चुपचाप हो?”
 वो उस दिन भी कोई कहानी लिख रही थी,शायद वही चिड़िया वाली कहानी पूरी कर रही थी । मेरे पूछते ही उसकी आंखें अचानक भर आई थीं,
“दुनिया बड़ी अजीब है यार.. औरतें ही औरतों की दुश्मन बनी हुई हैं। मेरी बड़ी बहन को बड़ी उलझन है मेरे यहां रहने से! वो तो कहो, जीजाजी अच्छे हैं, उनको समझा दिया हमने..किसी दिन आएंगे वो लोग, मिलवाएंगे तुमको”
और फिर वो दिन आया भी लेकिन बस जीजाजी को लेकर! पहली बार उसने चमकती आंखों के साथ सामान दिखाया,
“ये सब जीजाजी लाए हैं ..जानती हो, दिन भर शॉपिंग करवाई,सच्ची! इतने अच्छे हैं”
सामान उलटते पलटते मैंने खुद ही पूछ लिया,
“दीदी नहीं आईं?”
मेरा सवाल तो जैसे सुना ही नहीं गया,आंखें फिर चमकीं,
“जानती हो, दस हज़ार और दे गए हैं..बोले कि पसंद का कुछ ले लेना “
उसकी किस्मत से हल्की सी जलन करते हुए मैंने उन दस हज़ार का हिसाब सुना, ख्यालों में ही सही उसने काफी कुछ खरीद तो लिया था! वो दो तीन दिनों तक काफ़ी ख़ुश रही लेकिन एक शाम उठा वो बवाल मुझे ही‌ नहीं,पूरे हॉस्टल को दहला गया था! उसकी कोई परिचित आकर वेटिंग हाल में बैठी थीं, 
कमरे का दरवाजा खटखटाकर वार्डन ने पूछा था,
“कोई आई हैं तुमसे मिलने..रूम में भेज दें?”
उसके हां कहते ही कमरे में वो औरत  भूचाल ओढ़कर आ गई थी,घुसते ही मरने मारने पर उतारू हो गयी थी,
“डायन भी सात घर छोड़ देती है,तुम तो उससे भी गई बीती हो..मेरा‌ ही हसबैंड मिला तुमको?”
लाल आंखें लिए वो औरत चीखी चिल्लाई फिर फफक कर रो पड़ी थी! मेरे लिए न उठते बन रहा था,न बैठते। अपना पर्स उठाकर  किसी तरह मैं निकली, कमरे के बाहर चप्पल पहन रही थी कि फिर कुछ सुनाई दिया,
“तुम ग़लत समझ रही हो..बस एकाध बार बात हुई थी और कुछ नहीं”
मेरी रूममेट की बात पूरी हो भी नहीं पायी थी कि वो औरत फिर चीखी,
“सहेली हो? सहेली का घर तोड़ते हैं? अरे, अपने फायदे के लिए तो तुम अपनी बहन का घर फूंक रही हो..मेरा भी फूंक रही हो! तुम्हारे जैसी को पता है क्या कहते हैं?”
इसके आगे मुझसे बर्दाश्त ही नहीं हुआ। खटाखट सीढ़ियां उतरते मैं उस बातचीत से बहुत दूर चली गयी थी। वहां रहती तो शायद उस मामले का हिस्सा बन जाती, जो उनका नितांत व्यक्तिगत था। दिल इतनी तेज़ धड़ धड़ कर रहा था कि अकेले संभालना मुश्किल था,सविनय को फोन करके बाहर बुलाया,खाना खाकर वापस हॉस्टल पहुंची, तब तक रात गहरा चुकी थी। 
“देखो, तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ?”
कमरे में घुसते ही उसकी ओर एक पैकेट मैंने बढ़ाया,
उसकी लाल ,सूजी हुई आंखें बात करने की हालत में नहीं थीं। बस हाथ चल रहे थे,कलम पकड़े हुए, कागज़ पर..बिना रुके, लगातार! मैंने कंधे पर हाथ रखा तो बिलख उठी,
“देख रही हो? किसी से बात कर लो तो आफ़त..अरे, कोई जान पहचान का मिल जाए, हेल्प मिल जाए तो क्या इसको फंसाना कहेंगे?”
पूछते हुए उसकी आवाज़ भर आई थी,
मैंने कागज़ की ओर देखा..
“चिड़िया वाली कहानी है न? कब दोगी पढ़ने को?”
उसने दूसरा एक पुलिंदा पकड़ा दिया,
“ये पढ़ो तब तक.. कहानी का पहला हिस्सा, बाकी का लिख लूं फिर पढ़ना”
मैंने उन भीगी आंखों में झांककर देखा, सच में..ये भोलापन निष्कलंक था। इस सादगी पर कोई कैसे आरोप लगा सकता था? वो कहीं दूर देखते हुए बोली,
“जानती हो..मेरी क्या कमी रही? मुझे सोचकर बोलना आया ही नहीं! कब किससे क्या बोलना है,सोचा ही नहीं। बस,जो जब अपना लगा दिल खोल दिया। इसको दुनिया चालाकी कहती रही”
मैंने उसके बाल सहला दिए थे,
“दुनिया अपने चश्मे से तुमको देखती है यार! वो चश्मा जिसपर चालाकी की पर्त चढ़ी हुई है”
उसकी मुस्कान मैं वापस ले आई थी, मेरा भी मन हल्का हुआ..उसी हल्के मन से मैंने उसकी कहानी पढ़ी। जैसे जैसे मैं पढ़ती गयी, उस लड़की से मुझे और प्यार होता गया। कहानी में चिड़िया वो खुद थी..लाचार,बेबस! ज़िन्दगी में हुई घटनाओं को चिड़िया के जीवन में दिखाकर, कहानी लिखी गयी थी, मैं पढ़ती जा रही थी,डूबती जा रही थी।
अगले दिन सविनय आया तो वो कहानी मैंने उसको भी पढ़ने के लिए दे दी थी।जैसे ही मैं कमरे में वापस लौटी, उसने तुरंत पूछा,
“ये सविनय था न,जो तुमसे मिलने आया था”
सवाल जिस ढंग से पूछा गया था, मुझे गर्व की अनुभूति करा गया था,
“हां, तुम्हारे ही डिपार्टमेंट का है,क्लास में मिली होगी!बात हुई होगी”
हैरानी से उसकी बड़ी बड़ी आंखें थोड़ी और फैल गयी थीं,
“ ये बात कहां करता है किसी से? टॉपर रहा है, ऐंठ में रहता है ..सौरी यार,ऐसे ही कह दिया”
शायद मेरे सामने उसकी बुराई करते हुए रुक गई होगी। मैंने अपने गर्व में थोड़ी और अकड़ जोड़कर कहा,
“कल ही मिल लेना, मैं मिलवा दूंगी। तुम्हारी  कहानी भी दी है पढ़ने के लिए”
दोनों को मैंने अगले दिन ही मिलवाया..फिर अगली कई शामें हमने साथ बितायीं। सविनय ने चाय का घूंट भरते हुए एक दिन पूछ लिया था, 
“तुम्हारी कहानी का अंत क्या हुआ? चिड़िया का क्या हुआ?”
कहीं दूर देखते हुए वो बोली ,
“हर कहानी अपना अंत खुद ढूंढ़ती है। चिड़िया का क्या होगा,उसको खुद नहीं पता”
सविनय ने बात संभाली,
“फिलहाल तो एग्ज़ाम पर ध्यान दो, इस कहानी को भी अपना अंत मिल ही जाएगा”
कहानी अंत ढूंढ़ रही होगी लेकिन हम सब अगले बीस दिनों तक हम किताबों में ही दुख सुख ढूंढते रहे। आखिरी एग्ज़ाम के बाद एक दिन भी फुर्सत का नहीं मिला, घर से बुलावे वाला फोन आ गया था।  रेलवे प्लेटफॉर्म पर सविनय भरा हुआ बैठा था,
“एग्ज़ाम के अगले दिन ही जा रही‌ हो, ऐसा क्या कर लोगी कज़िन की शादी में?”
सविनय ने मेरी हथेली थाम ली थी, कहने को कुछ था नही, या फिर इतना कि कहते ही नही बन रहा था! ट्रेन चलने वाली थी, उदासी फैली हुई थी।पास के खंभे पर एक चिड़िया भी बड़ी उदास दिखी, मेरे मन की एक चिंता बाहर आ गयी,
“मेरी रूममेट तुमसे बात करने से डरती है, आगे रिसर्च या नौकरी के बारे में पूछना चाहती थी,झिझक रही थी..कभी‌ दिखे तो तुम ही पूछ लेना”
उसका जवाब सुनने से पहले ही गाड़ी चल पड़ी थी। उस दिन सविनय को छोड़ते मन बहुत भारी रहा, अजीब तरह से धड़ धड़ करती धड़कनें..मन कौन सी विद्या में निपुण होकर आने वाला समय पढ़ रहा था?
सगाई-शादी के शोर शराबे में,घर परिवार के बीच सविनय से बस हाल चाल भर की ही बात होती रही। मैं थोड़ा ख़ाली हुई तब तक सविनय कहीं व्यस्त हो चुका था,वो भी ऐसा व्यस्त कि या तो फ़ोन नहीं उठता था,फिर उठता भी तो दो चार मिनट में रख दिया जाता। रूममेट का फोन नंबर भी बदल गया था, कुछ दिनों तक बात हुई फिर ‘ये नंबर अस्तित्व में नहीं है’ की रटी रटायी सूचना ही मिलती रही। मुझे घर आए हुए लंबा समय बीत चुका था, मन ऊबने लगा था।
मन में एक अजीब बेचैनी थी, कारण भी था। इधर मम्मी कई लड़कों और उनके परिवारों का ज़िक्र रुक रुककर छेड़ रही थीं, उधर कई दिनों से सविनय न तो मैसेज का जवाब दे रहा था,न फोन उठा रहा‌ था। 
“कल सुबह दस बजे वाली ट्रेन से पहुंच रही हूँ”
मैसेज भेजकर बहुत अजीब लगा, वो पढ़ चुका था, जवाब नहीं दिया था। मैं इतने दिनों तक रुक गयी,नाराज़ है क्या? तभी तो फ़ोन नहीं उठा रहा,जवाब नहीं दे रहा। मुझे ये नाराज़गी  पहले तो बड़ी भली लगी, लेकिन रेलवे स्टेशन पर उसकी अनुपस्थिति का मतलब ही नहीं समझ आया.. नाराज़ ही सही, मिलने तो आता! 
हल्का सा  झटका तो लगा, लेकिन उससे भी बड़ा झटका हॉस्टल पहुंचने पर लगा,मेरी रूममेट का सामान वहां नहीं था। अपना बैग पटककर मैं वार्डन के रूम की ओर भागी, मन ही मन प्रार्थना करते हुए कि मेरी रूममेट के घरवाले उसको जबरदस्ती खींचकर न ले गए हों..चश्मे के नीचे से झांकती वार्डन की निगाहें अजीब तरह से टटोल रही थीं मुझे,
“वो तो कुछ दिनों पहले खाली कर गई..तुम्हारी बात नही हुई क्या उससे? तुम रूम खाली कर रही हो या रहोगी? इंक्वायरी आ रही हैं”
मेरी आवाज़ लड़खड़ा गई,
“वो ठीक थी ना जाते समय? मतलब उसके घर के लोग आए थे क्या?”
“घर से कोई नहीं आया,हड़बड़ी में थी!उसका कुछ सामान भी रह गया, आई ही नहीं लेने”
एक छोटा सा बैग मेरी ओर बढ़ाते हुए वार्डन ने कंधे उचका दिए! छोटा सा बैग मुझे कितना वजनीला लगा,इतना कि कदम घसीटते हुए मैं कमरे तक आई ! मैं ऐसी भी क्या शादी ब्याह के नाच गाने में उलझी रही कि अपनी रूममेट की सुध न ले सकी। उसका बैग बिस्तर पर पलटते ही मुझे रोना आ गया.. कुछ पेपर्स, एक दो रुपए के कुछ सिक्के, एक कंघी,तीन रबर बैंड! एक लंबी सांस खींचकर मैं उठी,कमरे की खिड़की खोलकर सीलन की बदबू को बाहर का रास्ता दिखाया, हवा भीतर आई तो सवाल शक्ल लेने लगे! क्या हुआ होगा जो उसको अचानक जाना पड़ा? घर वालों ने बवाल मचा दिया होगा, फोन भी छीन लिया होगा, कहीं उसकी दीदी ने तो ये सब नहीं किया? एकदम ठंडे पानी से बार बार चेहरा धोने के बाद भी चेहरे का हर हिस्सा तप रहा था,सब कुछ एक साथ ही होना था? इधर ये सब,उधर सविनय की अपरिक्वता! अरे,बने रहो नाराज़,बात तो करो…किसी तरह पर्स उठाकर हॉस्टल से बाहर निकली, सविनय को जाकर मनाना ही ठीक था..फोन वो नही उठाएगा! सविनय के हॉस्टल गेट पर पहुंची ही थी कि पीली चेक की शर्ट दूर से दिख गई…आंखें भीगती ही चली गईं!
“सविनय!”
थोड़ी दूर से इतनी ही आवाज दे पाई मैं, दस लड़कों का झुंड न होता तो चिपककर फफक पड़ती!
“सॉरी..सविनय नहीं हैं यहाँ! आप शायद शर्ट से कन्फ्यूज़ हो गईं, उसकी शर्ट यहां रह गई थी”
पीली शर्ट वाला लड़का और भी कुछ बोलता जा रहा था, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, बस कांपते हुए मेरे होंठ हिले,
“सविनय कहां है?”
“आपके लिए एक पैकेट दे गया था”
लड़के ने मेरे सवाल का जवाब दिया नहीं या तो उसे जवाब पता नहीं था, या सही जवाब देने की मनाही थी,बस भूरे रंग का एक लिफाफा थमा गया!आज का दिन,गुमशुदा हुए लोगों से जुड़े सामान देखने का दिन था क्या? वहीं सड़क पर मैंने लिफाफे का टेप हटाकर देखा.. मेरी आंखों का रंग मुझे तो नहीं दिखा लेकिन देखने वालों ने लाल ही देखा होगा,खून वाला लाल रंग! लिफ़ाफ़े में मेरी लिखी हुई चिट्ठियां थीं, मेरा दिया हुआ मफलर! केवल मूलधन ही नहीं, ब्याज भी था उसमें,एक छोटी सी चिट्ठी के रूप में…
“तुमसे माफ़ी नहीं मांग सकता, सामना भी नहीं कर सकता,बस इतना समझ लो कुछ मोड़ ऐसे आते हैं,जहां हाथ छुड़ाकर रास्ते अलग करने पड़ते हैं..कभी मिलोगी तो पहचान लोगी?”
एक बार मुड़कर उसी भीड़ की तरफ देखा, दस लड़कों के झुंड में पीली शर्ट वाला लड़का अभी भी अलग दिख रहा था।रो ही लूं क्या उसको छूकर? थोड़ा बहुत सविनय रह गया है न उस कपड़े में भी! जाकर शर्ट मांग लूं, कमरे में जाकर शर्ट को नोच लूं, फाड़ दूं या बेतहाशा चूम लूं!  यहां सड़क पर बेहोश होकर गिरना भी तो इतना आसान नहीं..और ये लिफाफा? इसका वज़न उठाना ,वो भी तो आसान नहीं!सब कुछ फाड़ती हुई,बिखेरती हुई मैं कमरे में वापस चली आई थी। कुछ घंटों पहले पूछे गए सवाल का जवाब, मैंने वार्डन को चाभी थमाकर दिया था,
“थोड़ी देर में मेरी ट्रेन है, तब तक फॉर्मेलिटी पूरी कर दीजिए”
बोलते हुए गला फिर भर आया था, वो उठकर मेरे पास तक आईं,
“कुछ हुआ है क्या?”
“पता नही मैम ..बहुत अपसेट फील कर रही हूं, अब यहां रुका नही जा रहा”
क्या कहती उनसे? जिसके लिए वापस आई थी वो चार बड़ी बातें लिखकर गायब हो गया है? और वो लड़की जिसके लिए मैं दुनिया भर से लड़ती रही,वो? उसने जाने से पहले एक बार मेरी आवाज़ तक नही सुननी चाही!
मैम ने एक गहरी सांस लेकर फंसी हुई बात कहनी शुरू की,
“तुम पूछ रही थी न कि तुम्हारी रूममेट अकेली गई थी या? एक्चुअली वो आया था,बाहर खड़ा था.. दोनों साथ गए”
“कौन..क् कौन आया था”
पूछते हुए मैं हकलाने लगी थी! दांत नीचे वाले होंठ को काट रहे थे,मैम ने मेरे कंधे पर हाथ थपथपा दिया,
“वही लड़का..वो इंग्लिश डिपार्टमेंट वाला टॉपर, जो तुमसे मिलने आता था”
होंठ कटने से खून निकल आया था।  दर्द की लहर मेरे वजूद पर फैलती हुई कहीं भीतर जाकर धंस गई थी! क्या ये सच हो सकता था? दो लोगों के ग़ायब होने का ये मतलब कैसे हो सकता था कि दोनों हाथ थामकर धुंध  में खो गए..और ये भी कैसे हो सकता था कि दोनों को लील जाने वाली धुंध इस समय मेरी आंखों में धुआं बनकर भर रही थी,पूरी ताकत से! मैम घबराते हुए  पता नहीं क्या क्या कहती जा रही थीं.. मुझे होश नहीं था कि मैं कब वहां से उठी, कब स्टेशन पहुंची और कब कानपुर वाली ट्रेन में बैठ गयी थी!
साल दर साल बीतते रहे, कोई ऐसा दिन नहीं बीता जब सविनय और वो याद न आते! कभी सपना देखती कि दोनो एक दूसरे की बाहों में सिमटे दुनिया जहां से बेखबर हैं,कभी लगता कि सविनय उसकी गोद में लेटा गुनगुना रहा है..जब भी दोनो याद आते,एक घुटन भरी धुंध मुझे खोजकर मेरी ओर बढ़ने लगती। ऐसी घुटन जैसे किसी प्लास्टिक के थैले में मेरा चेहरा पैक हो गया हो, मैं बेबस होकर हाथ पैर पटकती जा रही हूं,कोई आज़ाद करने वाला हो ही न आस पास!
आज फिर ,इतने सालों बाद वही धुंध मेरी ओर तेजी से बढ़ती हुई आ रही थी, सविनय मुश्किल से पाँच कदम दूरी पर आकर रुक गया था,कुली से किसी ट्रेन का नाम पूछते हुए…मन में भयानक उठापटक चली,सामने आऊं या नहीं, मेरे भीतर से एक आवाज़ गूंजी, मैंने आवाज़ दे दी,
“सविनय!”
गहरी स्लेटी आंखें मुझपर आकर टिकीं, हैरत से फैलीं फिर पनीली हो गयीं। एक भी शब्द नहीं कहा उसने, शायद था ही नहीं उसके पास!
“कैसे हो?”
मैंने ही पूछा!
“अगर‌ कहूं कि तुमको ही ढूंढने कानपुर जा रहा था तो मानोगी?”
“हां..मान लूंगी, अब कुछ भी इंपॉसिबल नहीं लगता”
एक झटके में सालों पहले की एक बात मैंने खींचकर आज में रख दी थी! उसकी आंखें थोड़ी और गहरी दिखने लगी थीं,
“हर जगह से मुझे ब्लॉक कर चुकी हो..कोई रास्ता तो छोड़ती”
सविनय कुछ कदम चलकर मेरे थोड़ा और पास आ गया था। प्लेटफार्म पर मेरी ही ट्रेन की अनाउंसमेंट थी, मैने घड़ी देखी, मतलब ठीक पांच मिनट ही हैं मेरे पास, सारे हिसाब किताब के,सारे शिकवे शिकायत के! मन में कुछ तो घुमड़ रहा था..नाम क्या था इस उलझन का? क्या था जो बाहर आना चाहता था? गुस्सा,बदला या फिर कोई सवाल? शायद यही!
“वो कहां है आजकल? “
सीधा सविनय की आंख में आंख डालकर पूछा! अब तक मुझपर टिकी निगाहें इस सवाल पर झुक गईं,
“पता नहीं!जब तक मुझसे काम था, मेरे साथ थी,अब होगी कहीं और”
एक हवा मुझे छूकर गई! लगा जैसे किसी ने खींचकर वो प्लास्टिक की थैली फाड़ दी, जो मुझे सांस ही नहीं लेने दे रही थी। एक लंबी साँस की दरकार महसूस हुई, मैने पूरी ताकत से हवा अपने भीतर भरी! मेरी ट्रेन दूर से सरकती हुई आती दिख रही थी, मैने सूटकेस हाथ में उठा लिया,
सविनय ने हड़बड़ाकर कहा,
“प्लीज़..अभी नहीं जाना,मुझे अपनी बात रखने दो!”
मैं दूर से पास आती ट्रेन को देखती रही।सविनय को देखती तो खुद को संभालना और मुश्किल हो जाता। ट्रेन जैसे ही आकर मेरे सामने रुकी, सविनय ने मेरी हथेली थाम ली,
“मैं अपनी सफाई नहीं दे रहा हूं,बस इतना समझ लो कि वो एक दीमक थी। अगर दीमक किसी लकड़ी को खराब करने पर उतारू हो जाए तो इसमें लकड़ी की क्या गलती है?”
मैं हल्का सा मुस्कुराई..शब्दों के झांसे में आने वाली अब मेरी उमर रही कहां? उसी तरह से उसकी हथेली थपथपा कर मैने जवाब भी दिया,
“पता है सविनय, दीमक कौन सी लकड़ी को निशाना बनाती है? जो ख़ुद ही गलने के लिए तैयार हो। एक बात और भी है, दीमक लगी लकड़ी कोई घर में रखता है क्या?”
ट्रेन सीटी दे चुकी थी। अपना बिखरा मन, गिरने को तैयार आंसू संभालते मैं किसी तरह ट्रेन में चढ़ी! पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नही थी! समय जैसे उल्टे कदम चलकर कई साल पीछे चला गया था..प्लेटफार्म, ट्रेन, मेरा जाना,सविनय का यहीं रह जाना,सब कुछ वही था।ट्रेन चल चुकी थी, सब कुछ पीछे छूट रहा था। मैंने सीट पर सिर टिकाकर आंखें मूंद ली थीं, अचानक कुछ देखकर झटका सा लगा, पिछली बार की तरह इस बात भी एक बिजली के तार पर चिड़िया बैठी थी। मेरी रूममेट की चिड़िया वाली कहानी का क्या अंत लिखा होगा उसने? जवाब‌ में कई लोगों के चेहरे मेरी आंखों के आगे घूम गए..उसकी दीदी, उसकी वो रिश्तेदार, फिर मैं, मेरे बाद सविनय! इन‌ सबके साथ ,सारे अक्षर भी घूमकर मेरे सामने आ गए थे, शब्दों की शक्ल लेने लगे, लगा जैसे कोई पन्ना मेरे हाथ में है,मैं बुदबुदा रही थी, उस कहानी का अंत पढ़ती जा रही थी,
“सबको लगता था कि बेचारी छोटी सी चिड़िया पर बहुत ज़ुल्म हुए..वो सबका शिकार हुई..किसी को पता ही नहीं कि दरअसल वो चिड़िया कभी थी ही नहीं,वो तो हमेशा से शिकारी थी!जो कहानी वो लिख रही थी, उसमें वो ख़ुद चिड़िया नहीं थी..वो तो अपनी कहानी में एक के बाद चिड़िया मार रही थी,अहेरी बनकर!”


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10 टिप्पणी

  1. बहुत अच्छी कहानी।आज के दौर में बहुत सामयिक और आने वाले समय को इंगित करती हुई संवेदना से परिपूर्ण ।
    कथा शिल्प और संयोजन के लिए विशेष बधाई

  2. इतनी सुंदर कहानी की एक सांस में पूरा पढ़ गई हो जैसे…आपकी लिखने की कला का क्या कहना

  3. लकी जी!
    आपकी कहानी अहेरी पढ़ी। कुछ लड़कियाँ ऐसी भी होती हैं। लड़के झाँसे में आ जाते हैं। कहानी बहुत सामायिक है। आजकल इस तरह देखने में बहुत आ रहा है।
    बधाई आपको।

  4. हर बार की तरह बेहतरीन कहानी लकी जी। पढ़ते समय विराम का अवसर नहीं दिया आपने अहेरी की तरह। पुरवाई को धन्यवाद बेहतर कहानी और कहानीकार को मंच देने के लिए।

  5. कहानी पढ़ कर सोचने बैठ गई। शुरुआत से लेकर आखिर तक कहीं रुकी ही नहीं, कहानी चलचित्र की तरह चलती चली गई। चिड़िया की कहानी…कहानी का केंद्र बिंदु रही। दीमक और लकड़ी का जो तालमेल बनाया वो मन को छू गया। लड़कियां भी ऐसी होती हैं जो शिकार करती हैं फिर मासूम बन जाती हैं ऐसी बाला दो रूपों में ही पायी जाती है इन्हें पहचाना मुश्किल होता है इस कहानी में मैजिक था कहानी शानदार लगी। बधाई आपको

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